NCERT Solutions for Class 8 Hindi Chapter 10 तरुण के स्वप्न – step-by-step answers to every exercise and in-text question of the chapter, as per the latest NCERT syllabus for 2027. Read them online or download the free question-answer PDF.
पाठ 10 नेताजी सुभाषचंद्र बोस के एक उद्बोधन (भाषण) का अंश है, जो उन्होंने 29 दिसंबर, 1929 को मेदिनीपुर जिला युवक-सम्मेलन में युवाओं को संबोधित करते हुए दिया था। इसमें वे अपना एक ही स्वप्न — ‘नया सर्वांगीण स्वाधीन संपन्न समाज और उस पर एक स्वाधीन राष्ट्र’ — तरुणों को उपहार के रूप में सौंप देते हैं। यह मल्हार का अंतिम पाठ है।
NCERT Solutions for Class 8 Hindi Chapter 10 तरुण के स्वप्न PDF
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|---|---|---|
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NCERT Solutions for Class 8 Hindi Chapter 10 तरुण के स्वप्न – Questions and Answers
All questions of the chapter are answered below, in the order of the book – in-text questions, activities and the end-of-chapter exercises. Each answer is written the way you would write it in the exam.
मेरी समझ से — पृष्ठ 142-143पाठ से
(1) “उनके स्वप्न के उत्तराधिकारी आज हम हैं।” इस कथन में रेखांकित शब्द ‘हम’ किसके लिए प्रयुक्त हुआ है?
• सुभाषचंद्र बोस के लिए
• देश के तरुण वर्ग के लिए
• चित्तरंजन दास के लिए
• भारतवासियों के लिए
★ देश के तरुण वर्ग के लिए
कारण: यह भाषण नेताजी ने मेदिनीपुर जिला युवक-सम्मेलन में दिया था और वे सुनने वालों को “हे मेरे तरुण भाइयो!” कहकर पुकारते हैं। ‘हम’ में नेताजी स्वयं और उनके सामने बैठे तरुण शामिल हैं। यही तरुण चित्तरंजन दास के स्वप्न के उत्तराधिकारी हैं।
• आर्थिक असमानता से
• स्त्री-पुरुष के भिन्न अधिकारों से
• श्रम और कर्म की मर्यादा से
• जातिभेद से
★ श्रम और कर्म की मर्यादा से।
कारण: पाठ में कहा गया है — “जिस समाज में श्रम और कर्म की पूरी मर्यादा होगी और आलसी तथा अकर्मण्य के लिए कोई स्थान नहीं रहेगा, वह राष्ट्र किसी भी विजातीय प्रभाव से हर प्रकार से मुक्त रहेगा।” बाकी तीन विकल्प — आर्थिक असमानता, स्त्री-पुरुष के भिन्न अधिकार और जातिभेद — वे बुराइयाँ हैं जिन्हें नेताजी उस समाज से हटाना चाहते हैं।
• हमें उनके स्वप्नों को संजोकर रखना है
• हमें भी उनकी तरह स्वप्न देखने का अधिकार है
• उनके स्वप्नों को पूरा करने के लिए हमें ही कर्म करना है
• उनके स्वप्नों पर चर्चा करने का दायित्व हमारा ही है
★ उनके स्वप्नों को पूरा करने के लिए हमें ही कर्म करना है
कारण: उत्तराधिकारी वह होता है जिसे किसी के बाद उसकी संपत्ति मिलती है। यहाँ चित्तरंजन दास का स्वप्न ही वह संपत्ति है। वारिस को संपत्ति के साथ ज़िम्मेदारी भी मिलती है, इसलिए अब उस स्वप्न को पूरा करने का काम हमारा है। नेताजी आगे कहते हैं — “इसी स्वप्न की प्रेरणा से हम उठते हैं, बैठते हैं… काम-काज करते हैं।”
• राष्ट्र की श्रम-शक्ति बढ़ेगी
• तरुणों का साहस बढ़ेगा
• राष्ट्र स्वाधीन बनेगा
• राष्ट्र स्वप्नदर्शी होगा
★ राष्ट्र की श्रम-शक्ति बढ़ेगी
कारण: जब पढ़ने और आगे बढ़ने का अवसर कुछ ही लोगों तक सीमित नहीं रहेगा, तो हर व्यक्ति अपनी योग्यता के अनुसार काम में लगेगा और देश की पूरी प्रतिभा काम आएगी। इसीलिए नेताजी इस बात के ठीक बाद ‘श्रम और कर्म की पूरी मर्यादा’ की बात करते हैं।
“मैंने प्रश्न (1) में ‘देश के तरुण वर्ग के लिए’ चुना, क्योंकि भाषण युवक-सम्मेलन में दिया गया था और नेताजी ‘हे मेरे तरुण भाइयो!’ कहते हैं। मेरे मित्र ने ‘भारतवासियों के लिए’ भी चुना, क्योंकि तरुण भी भारतवासी ही हैं। प्रश्न (4) में मैंने ‘श्रम-शक्ति बढ़ेगी’ चुना, क्योंकि अगली पंक्ति श्रम और कर्म की मर्यादा की बात करती है। चर्चा से हमने सीखा कि जिस उत्तर के पीछे पाठ की पंक्ति का प्रमाण हो, वही उत्तर मज़बूत होता है।”
मिलकर करें मिलान — पृष्ठ 143पाठ से
| क्रम | स्तंभ 1 | स्तंभ 2 |
|---|---|---|
| 1. | “इसी स्वप्न की प्रेरणा से हम उठते हैं, बैठते हैं, चलते हैं, फिरते हैं और लिखते हैं, भाषण देते हैं, काम-काज करते हैं।” | 1. समाज में सभी व्यक्तियों को सभी तरह की स्वतंत्रता हो और उस पर किसी तरह का बंधन या सामाजिक दबाव न हो। |
| 2. | “जो राष्ट्र हमारे स्वदेशी समाज के यंत्र के रूप में काम करेगा, सर्वोपरि वह समाज और राष्ट्र भारतवासियों का अभाव मिटाएगा।” | 2. हमारी समूची दिनचर्या और आचार-विचार इसी लक्ष्य (स्वप्न) की प्राप्ति पर केंद्रित हैं। |
| 3. | “उस समाज में व्यक्ति सब दृष्टियों से मुक्त हो तथा समाज के दबाव से वह मरे नहीं।” | 3. जिस देश की योजनाएँ हमारे अपने समाज को ध्यान में रखकर बनाई जाएँगी, उस देश में किसी भी प्रकार का अभाव नहीं होगा। |
| स्तंभ 1 की पंक्ति | स्तंभ 2 का सही भाव-विचार |
|---|---|
| 1. “इसी स्वप्न की प्रेरणा से हम उठते हैं, बैठते हैं…” | 2. हमारी समूची दिनचर्या और आचार-विचार इसी लक्ष्य (स्वप्न) की प्राप्ति पर केंद्रित हैं। |
| 2. “जो राष्ट्र हमारे स्वदेशी समाज के यंत्र के रूप में काम करेगा…” | 3. जिस देश की योजनाएँ हमारे अपने समाज को ध्यान में रखकर बनाई जाएँगी, उस देश में किसी भी प्रकार का अभाव नहीं होगा। |
| 3. “उस समाज में व्यक्ति सब दृष्टियों से मुक्त हो…” | 1. समाज में सभी व्यक्तियों को सभी तरह की स्वतंत्रता हो और उस पर किसी तरह का बंधन या सामाजिक दबाव न हो। |
संक्षेप में — 1 → 2, 2 → 3, 3 → 1.
पंक्तियों पर चर्चा — पृष्ठ 144पाठ से
(क) “उस समाज में अर्थ की विषमता न हो।”
यहाँ अर्थ का मतलब है धन, और विषमता का मतलब है असमानता। पंक्ति का सीधा अर्थ है — उस समाज में धन का बँटवारा इतना असमान न हो कि कुछ लोगों के पास सब कुछ हो और बहुतों के पास कुछ भी नहीं।
नेताजी आर्थिक बराबरी को स्वाधीनता की शर्त मानते थे, क्योंकि जिस व्यक्ति के पास दो वक्त का भोजन नहीं, वह नाम से स्वतंत्र होकर भी सचमुच स्वतंत्र नहीं होता। इसका उपाय वे अगली पंक्ति में बताते हैं — सबको ‘शिक्षा और उन्नति का समान सुअवसर’।
यह पंक्ति देशबंधु चित्तरंजन दास के बारे में है। इसका अर्थ है — जो स्वप्न उन्होंने देखा, वही उनकी सारी शक्ति का स्रोत था और वही उनके आनंद का न सूखने वाला झरना था।
शब्दार्थ — उत्स = सोता, स्रोत (जहाँ से पानी फूटकर निकलता है)। निर्झर = झरना, प्रपात।
यह रूपक है — स्वप्न को ही सोता और झरना कह दिया गया है। जैसे पहाड़ का सोता कभी नहीं थकता, वैसे ही बड़े लक्ष्य वाले व्यक्ति की शक्ति और आनंद कभी नहीं चुकते।
इसका अर्थ है — उस समाज में व्यक्ति की स्वतंत्रता किसी एक तरह की न हो, हर तरह की हो। केवल विदेशी शासन से मुक्ति नहीं, बल्कि जाति, धन, भय, रूढ़ि और सामाजिक दबाव — सबसे मुक्ति।
इसका प्रमाण अगली पंक्तियों में है, जहाँ नेताजी बारी-बारी से जातिभेद, नारी के असमान अधिकार और अर्थ की विषमता को हटाने की बात करते हैं। साथ ही वे कहते हैं कि ‘समाज के दबाव से वह मरे नहीं’ — यानी अपने ही समाज का दबाव भी एक बंधन है।
सोच-विचार के लिए — पृष्ठ 144पाठ से
(क) नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने किस प्रकार के राष्ट्र निर्माण का स्वप्न देखा था?
नेताजी ने एक नए सर्वांगीण स्वाधीन संपन्न समाज और उस पर टिके एक स्वाधीन राष्ट्र का स्वप्न देखा था। उस राष्ट्र की पहचान वे स्वयं गिनाते हैं —
- व्यक्ति सब दृष्टियों से मुक्त हो और समाज के दबाव से उसका दम न घुटे।
- जातिभेद का कोई स्थान न हो।
- नारी मुक्त होकर पुरुषों की तरह समान अधिकार का उपभोग करे और समाज तथा राष्ट्र की सेवा में समान रूप से हिस्सा ले।
- अर्थ की विषमता न हो — धन की खाई न रहे।
- हर व्यक्ति को शिक्षा और उन्नति का समान सुअवसर मिले।
- श्रम और कर्म की पूरी मर्यादा हो; आलसी और अकर्मण्य के लिए कोई जगह न रहे।
- वह राष्ट्र स्वदेशी समाज के यंत्र की तरह काम करे — यानी अपने ही समाज की ज़रूरतें पूरी करे — और ‘विजातीय प्रभाव’ से मुक्त रहे।
उन्होंने अपने स्वप्न को साकार करने — यानी उस आदर्श स्वाधीन, संपन्न और समानता वाले समाज तथा राष्ट्र की स्थापना — को ही अपने जीवन की सार्थकता माना।
क्योंकि नेताजी का पूरा स्वप्न कर्म पर टिका है। जो समाज वे बनाना चाहते हैं, वह भाषणों से नहीं, लोगों के परिश्रम से बनेगा — इसलिए उसमें काम से जी चुराने वाले के लिए जगह नहीं छोड़ी जा सकती।
पाठ में कहा गया है कि जिस समाज में श्रम और कर्म की पूरी मर्यादा होगी, वही राष्ट्र विजातीय प्रभाव से मुक्त रहेगा। परिश्रम से ही समाज आत्मनिर्भर बनता है और आत्मनिर्भर समाज ही स्वाधीन रह पाता है; आलस्य परतंत्रता की ओर ले जाता है।
नेताजी ने जो-जो शर्तें गिनाई थीं, आज का युवा उन्हीं को अपने स्तर पर पूरा कर सकता है। हर काम को उसकी शर्त से जोड़कर देखिए —
| नेताजी की शर्त | आज युवा क्या कर सकता है |
|---|---|
| जातिभेद का स्थान न हो | अपनी कक्षा, टोली और मित्र-मंडली में किसी के साथ जाति या पृष्ठभूमि के कारण अलग व्यवहार न करना — बदलाव यहीं से शुरू होता है। |
| नारी को समान अधिकार | घर और विद्यालय के काम में बराबर हिस्सा लेना; लड़कियों की पढ़ाई और खेल में उतनी ही भागीदारी को सामान्य बात मानना। |
| सबको शिक्षा और उन्नति का समान सुअवसर | जो पढ़ाई में पीछे रह गया हो, उसकी मदद करना; बड़े होकर अपने कौशल से अपने क्षेत्र के लोगों को सिखाना। |
| श्रम और कर्म की मर्यादा | अपना काम स्वयं करना और हाथ के काम को छोटा न समझना — यह सबसे सीधी बात है और सबसे कम की जाती है। |
| स्वदेशी समाज का यंत्र | स्थानीय कारीगरों और गृह-उद्योगों की बनी चीज़ें अपनाना; अपने क्षेत्र की समस्या पर अपने कौशल से काम करना। |
| व्यक्ति सब दृष्टियों से मुक्त हो | अपने अधिकार जानना और दूसरों के अधिकारों का उतना ही ध्यान रखना; अन्याय देखकर चुप न रहना। |
अनुमान और कल्पना से — पृष्ठ 144पाठ से
भाषण में ‘सब दृष्टियों’ की सूची नेताजी ने स्वयं दे दी है — उसी पंक्ति के बाद वे एक-एक करके बंधन गिनाते हैं। कम-से-कम छह तरह की मुक्ति उसमें से निकलती है —
- सामाजिक मुक्ति — ‘समाज के दबाव से वह मरे नहीं’, यानी रीति-रिवाज और लोकलाज के दबाव में व्यक्ति का दम न घुटे।
- जाति के बंधन से मुक्ति — ‘उस समाज में जातिभेद का स्थान नहीं हो’।
- स्त्री-पुरुष के भेद से मुक्ति — ‘नारी मुक्त होकर… समान अधिकार का उपभोग करे’।
- आर्थिक मुक्ति — ‘उस समाज में अर्थ की विषमता न हो’, यानी गरीबी और असमानता का बंधन न रहे।
- अवसर की मुक्ति — ‘प्रत्येक व्यक्ति शिक्षा और उन्नति का समान सुअवसर पाए’; अशिक्षा भी एक बंधन है।
- राजनीतिक मुक्ति — ‘वह राष्ट्र किसी भी विजातीय प्रभाव से हर प्रकार से मुक्त रहेगा’।
क्योंकि 1929 के भारत में स्त्रियों को वे अधिकार प्राप्त नहीं थे। जिस बात के लिए विशेष रूप से कहना पड़े, वह अपने-आप उपलब्ध नहीं होती — नेताजी का यह वाक्य ही उस समय की स्थिति का प्रमाण है।
नेताजी ‘सर्वांगीण’ समाज चाहते थे; आधी आबादी को शिक्षा, संपत्ति और निर्णय के अधिकार न हों तो समाज पूरा नहीं हो सकता। वे जातिभेद और अर्थ की विषमता की तरह स्त्री की असमानता को भी एक बंधन मानते थे। वे स्त्री को केवल अधिकार नहीं, ‘समाज तथा राष्ट्र की सेवा में समान रूप से हिस्सा’ भी देना चाहते थे।
ऐसे लोग, जो किसी कारण से दूसरों के बराबर शुरुआत नहीं कर पाते। उन्हें विशेष अधिकार इसलिए चाहिए ताकि वे बराबरी तक पहुँच सकें — विशेष अधिकार का उद्देश्य किसी को ऊपर उठाना नहीं, सबको एक ही रेखा पर लाना है।
| किन्हें | क्यों | किस तरह की विशेष सुविधा |
|---|---|---|
| दिव्यांगजन | सामान्य रास्ते, कक्षा और परीक्षा उनके लिए वैसे ही सुलभ नहीं होते | रैंप और सुलभ भवन, विशेष शिक्षा-सामग्री, परीक्षा में अतिरिक्त समय, आरक्षण |
| बच्चे | वे अपने अधिकार स्वयं नहीं माँग सकते | निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा, बाल-श्रम पर रोक, पोषण |
| वरिष्ठ नागरिक | आयु के कारण आय और आवागमन दोनों सीमित हो जाते हैं | पेंशन, यात्रा और चिकित्सा में छूट, अलग पंक्ति |
| वंचित एवं निर्धन परिवार | शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्च करने की क्षमता नहीं | छात्रवृत्ति, निःशुल्क पाठ्यपुस्तक और भोजन, आवास तथा राशन की योजनाएँ |
| जनजातीय समुदाय के लोग | दूरस्थ क्षेत्रों में विद्यालय, चिकित्सा और बाज़ार तक पहुँच कठिन | आवासीय विद्यालय, वनोपज पर अधिकार, विशेष विकास योजनाएँ |
सबसे संभावित कारण यह है कि 29 दिसंबर, 1929 के उस मेदिनीपुर जिला युवक-सम्मेलन में उनके सामने बैठे श्रोता लगभग सभी युवक थे। उस समय ऐसे सार्वजनिक सम्मेलनों में लड़कियों और स्त्रियों की उपस्थिति बहुत कम होती थी, इसलिए संबोधन भी उसी सभा के अनुसार बन गया।
यह नेताजी की सोच की सीमा नहीं थी, क्योंकि इसी भाषण में वे माँग करते हैं कि नारी ‘पुरुषों की तरह समान अधिकार का उपभोग करे’। उस समय पूरी सभा को ‘भाइयो’ कहकर पुकारना बोलचाल का सामान्य ढंग भी था।
श्रोता पहले कुछ क्षण स्तब्ध रहे होंगे, फिर सभा तालियों और नारों से गूँज उठी होगी। और सबसे गहरी प्रतिक्रिया शोर नहीं, वह चुप्पी रही होगी जिसमें हर तरुण ने अपने-आप से पूछा होगा — ‘क्या मैं इसे स्वीकार कर सकता हूँ?’
ऐसा इसलिए, क्योंकि नेताजी उनसे कुछ माँग नहीं रहे थे; वे अपनी एकमात्र संपत्ति — अपना स्वप्न — उन्हें सौंप रहे थे। ‘स्वीकार करो’ कहकर उन्होंने हर तरुण के सामने एक निर्णय रख दिया।
शीर्षक — पृष्ठ 145पाठ से
यह शीर्षक इसलिए दिया गया होगा क्योंकि पूरे अंश में केवल दो चीज़ें हैं — एक स्वप्न, और वे तरुण जिन्हें वह स्वप्न सौंपा जा रहा है। शीर्षक ने पाठ के दोनों सिरे पकड़ लिए हैं।
‘स्वप्न’ शब्द इस छोटे-से अंश में बार-बार आता है। भाषण युवक-सम्मेलन में तरुणों के लिए दिया गया था और अंत में उन्हें सीधे पुकारा गया — ‘हे मेरे तरुण भाइयो!’ भाषण के अंत में नेताजी यह स्वप्न तरुणों को उपहार में सौंप देते हैं, इसलिए वह ‘तरुण के स्वप्न’ बन जाता है।
भाषा की बात — पृष्ठ 145पाठ से
| विशेषता | शब्द | विशेषता | शब्द |
|---|---|---|---|
| अखंड | सत्य | ………… | जीवन |
| ………… | समाज | ………… | शक्ति |
| ………… | राष्ट्र | ………… | आनंद |
भाषण से भरा हुआ शब्द-समूह —
| विशेषता बताने वाला शब्द | शब्द | भाषण की पंक्ति |
|---|---|---|
| अखंड (नित्य) | सत्य | “यह स्वप्न मेरे समक्ष नित्य एवं अखंड सत्य है।” |
| सर्वांगीण / स्वाधीन / संपन्न | समाज | “हम चाहते हैं, एक नया सर्वांगीण स्वाधीन संपन्न समाज…” |
| स्वाधीन (आदर्श) | राष्ट्र | “…और उस पर एक स्वाधीन राष्ट्र।” / “आदर्श-राष्ट्र के रूप में गण्य होगा।” |
| क्षुद्र | जीवन | “जो मेरे क्षुद्र जीवन को भी सार्थक बनाता है।” |
| असीम | शक्ति | “जो हमें असीम शक्ति और अपार आनंद देता है।” |
| अपार | आनंद | “जो हमें असीम शक्ति और अपार आनंद देता है।” |
इस प्रश्न में अपनी पसंद का विशेषण चुनना है, पर हर चुनाव के साथ कारण देना ज़रूरी है — यही प्रश्न का ‘क्यों’ माँग रहा है।
| शब्द | मेरा विशेषण | कारण |
|---|---|---|
| सत्य | कड़वा सत्य | सच अक्सर सुनने में अच्छा नहीं लगता, फिर भी कहना पड़ता है। |
| समाज | समरस समाज | जिसमें सब घुल-मिलकर रहें — यही नेताजी की ‘जातिभेद न हो’ वाली शर्त का दूसरा नाम है। |
| राष्ट्र | आत्मनिर्भर राष्ट्र | ‘लेखक से परिचय’ में भी लिखा है कि नेताजी ने आत्मनिर्भर समाज का सपना देखा था। |
| जीवन | सार्थक जीवन | नेताजी ने अपने जीवन को ‘क्षुद्र’ कहकर भी उसे स्वप्न से ‘सार्थक’ बना लिया — यही शब्द मुझे अधिक ठीक लगता है। |
| शक्ति | संगठित शक्ति | अकेली शक्ति बिखर जाती है; ‘आजाद हिंद फौज’ इसी संगठित शक्ति का उदाहरण थी। |
| आनंद | निश्छल आनंद | जिस खुशी में कोई छल या स्वार्थ न हो, वही देर तक टिकती है। |
विपरीतार्थक शब्द और उनके प्रयोग — पृष्ठ 145-146पाठ से
| क्रम | स्तंभ 1 | स्तंभ 2 |
|---|---|---|
| 1. | स्वीकार | कर्मण्य/कर्मठ |
| 2. | सार्थक | विपन्न |
| 3. | विषमता | अस्वीकार |
| 4. | क्षुद्र | जीवन |
| 5. | संपन्न | निरर्थक |
| 6. | अकर्मण्य | समानता |
| 7. | मरण | विशाल/वृहत/विराट/महान |
| क्रम | स्तंभ 1 | विपरीतार्थक (स्तंभ 2) | पहचान का सूत्र |
|---|---|---|---|
| 1. | स्वीकार | अस्वीकार | ‘अ’ उपसर्ग जोड़ने से अर्थ उलट गया |
| 2. | सार्थक | निरर्थक | सार्थक = अर्थ सहित; निरर्थक = अर्थ रहित (‘निर्’ उपसर्ग) |
| 3. | विषमता | समानता | विषम = असमान, सम = बराबर |
| 4. | क्षुद्र | विशाल / वृहत / विराट / महान | क्षुद्र = छोटा, तुच्छ — इसलिए विपरीत में सब ‘बड़े’ अर्थ वाले शब्द |
| 5. | संपन्न | विपन्न | संपन्न = साधन-संपन्न, धनी; विपन्न = विपत्ति में पड़ा, निर्धन |
| 6. | अकर्मण्य | कर्मण्य / कर्मठ | यहाँ ‘अ’ हटाने से अर्थ उलट जाता है |
| 7. | मरण | जीवन | सीधा विलोम — कोई उपसर्ग नहीं, अलग शब्द |
उदाहरण की तरह हर वाक्य में दोनों विपरीत शब्द आए हैं —
- स्वीकार / अस्वीकार — सच्ची सलाह को अस्वीकार नहीं, सहर्ष स्वीकार करना चाहिए।
- सार्थक / निरर्थक — बिना लक्ष्य के किया गया परिश्रम निरर्थक होता है, जबकि लक्ष्य के साथ किया गया वही परिश्रम सार्थक हो जाता है।
- विषमता / समानता — नेताजी ऐसे समाज के पक्ष में थे जिसमें अर्थ की विषमता नहीं, समानता हो।
- क्षुद्र / विशाल — नेताजी ने अपने जीवन को क्षुद्र कहा, पर उनका स्वप्न विशाल था।
- संपन्न / विपन्न — जिस देश में गृह-उद्योग फलते-फूलते हैं, वहाँ विपन्न परिवार भी धीरे-धीरे संपन्न बनने लगते हैं।
- अकर्मण्य / कर्मठ — अवसर अकर्मण्य की प्रतीक्षा नहीं करता, वह कर्मठ के हाथ लगता है।
- मरण / जीवन — जो जीवन किसी बड़े ध्येय के लिए बीता हो, उसका मरण भी ‘स्वर्ग समान’ हो जाता है।
आपकी बात — पृष्ठ 146पाठ से आगे
विद्यालय — मैं ऐसे विद्यालय का स्वप्न देखता हूँ जहाँ किसी विद्यार्थी को उसकी जाति, भाषा या घर की स्थिति के कारण अलग न समझा जाए, पुस्तकालय और खेल का मैदान सबके लिए खुला हो, और पीछे रह गए साथी को सब साथ लेकर चलें।
राज्य — मैं चाहता हूँ कि मेरे राज्य के हर गाँव तक अच्छा विद्यालय, चिकित्सालय और सड़क पहुँचे, और यहाँ के कारीगरों को अपना सामान बेचने के लिए बड़ा बाज़ार मिले।
देश — मैं ऐसे भारत का स्वप्न देखता हूँ जो अपनी ज़रूरत की चीज़ें स्वयं बनाए, जहाँ स्त्री और पुरुष को हर क्षेत्र में समान अवसर हो, और जिसे दुनिया — नेताजी के शब्दों में — ‘आदर्श-राष्ट्र के रूप में गण्य’ माने।
स्वतंत्रता को हर पीढ़ी को अपने आचरण से बनाए रखना पड़ता है। अपने स्तर पर हम ये काम कर सकते हैं —
- अपने कर्तव्य निभाना — नियमों का पालन और सार्वजनिक संपत्ति की देखभाल।
- सोच-समझकर मानना — कोई बात बिना जाँचे न मानना, न आगे बढ़ाना।
- भेदभाव न करना और न सहना — जाति या स्त्री-पुरुष के आधार पर।
- श्रम का सम्मान करना और अपना काम स्वयं करना।
- स्वदेशी को अपनाना — अपने क्षेत्र के कारीगरों और गृह-उद्योगों का सामान लेना।
- स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास जानना और दूसरों को बताना।
मिलान कीजिए — पृष्ठ 147पाठ से आगे
| क्रम | स्तंभ 1 | स्तंभ 2 |
|---|---|---|
| 1. | 8 अप्रैल, 1929 को ‘सेंट्रल असेंबली’ में बम फेंकने वाले क्रांतिकारी, ‘शहीद-ए-आज़म’ के नाम से जाने जाते हैं। | 1. सरदार वल्लभभाई पटेल |
| 2. | ‘स्वराज पार्टी’ के संस्थापकों में से एक, सुभाषचंद्र बोस के राजनीतिक गुरु कहे जाते हैं। | 2. महात्मा गाँधी |
| 3. | जेल में क्रांतिकारियों के साथ राजबंदियों के समान व्यवहार न होने के कारण क्रांतिकारियों ने 13 जुलाई 1929 से भूख हड़ताल शुरू कर दी। अनशन के तिरसठवें दिन जेल में इनका देहांत हो गया। | 3. चंद्रशेखर आजाद |
| 4. | इनके जन्मदिवस पर ‘अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस’ मनाया जाता है। | 4. चित्तरंजन दास |
| 5. | नर्मदा नदी के तट पर इनकी एक विशाल प्रतिमा स्थापित है। जिसे ‘स्टैच्यू ऑफ यूनिटी’ कहा जाता है। | 5. जतिन दास |
| 6. | 1921 में असहयोग आंदोलन में गिरफ्तार होने पर न्यायाधीश ने इनसे पिता का नाम पूछा तो इन्होंने कहा— “मेरा नाम आजाद है, पिता का नाम स्वतंत्रता और पता कारावास है।” | 6. भगत सिंह |
| स्तंभ 1 (तथ्य) | स्तंभ 2 (सेनानी) |
|---|---|
| 1. सेंट्रल असेंबली में बम, ‘शहीद-ए-आज़म’ | 6. भगत सिंह |
| 2. ‘स्वराज पार्टी’ के संस्थापक, बोस के राजनीतिक गुरु | 4. चित्तरंजन दास |
| 3. 13 जुलाई 1929 से भूख हड़ताल, तिरसठवें दिन देहांत | 5. जतिन दास |
| 4. जन्मदिवस पर ‘अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस’ | 2. महात्मा गाँधी |
| 5. नर्मदा तट पर ‘स्टैच्यू ऑफ यूनिटी’ | 1. सरदार वल्लभभाई पटेल |
| 6. “मेरा नाम आजाद है, पिता का नाम स्वतंत्रता…” | 3. चंद्रशेखर आजाद |
संक्षेप में — 1 → 6, 2 → 4, 3 → 5, 4 → 2, 5 → 1, 6 → 3.
चित्तरंजन दास।
पाठ के आरंभ में ही नेताजी उनका नाम लेते हैं। मिलान वाली तालिका में भी उनका परिचय है — ‘स्वराज पार्टी’ के संस्थापकों में से एक और सुभाषचंद्र बोस के राजनीतिक गुरु।
सर्वांगीण स्वाधीन संपन्न समाज के लिए प्रयास — पृष्ठ 147पाठ से आगे
स्वतंत्रता के बाद नेताजी की हर शर्त की दिशा में ये प्रमुख प्रयत्न हुए —
| नेताजी की शर्त | स्वतंत्रता के बाद हुए प्रयत्न |
|---|---|
| व्यक्ति सब दृष्टियों से मुक्त हो | 1950 में लागू संविधान ने सभी नागरिकों को मूल अधिकार दिए — समानता, स्वतंत्रता, शोषण के विरुद्ध अधिकार और संवैधानिक उपचारों का अधिकार। |
| जातिभेद का स्थान न हो | संविधान में अस्पृश्यता का अंत (अनुच्छेद 17); शिक्षा और नौकरियों में अनुसूचित जाति एवं जनजाति के लिए आरक्षण। |
| नारी को समान अधिकार | स्त्री-पुरुष को समान मताधिकार पहले ही चुनाव से; उत्तराधिकार तथा विवाह संबंधी क़ानूनों में सुधार; पंचायतों और नगर निकायों में महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित। |
| अर्थ की विषमता न हो | पंचवर्षीय योजनाएँ, भूमि-सुधार, बैंकों का राष्ट्रीयकरण, हरित क्रांति और श्वेत क्रांति, तथा रोज़गार एवं खाद्य-सुरक्षा की योजनाएँ। |
| सबको शिक्षा और उन्नति का समान सुअवसर | शिक्षा का अधिकार — 6 से 14 वर्ष के बच्चों के लिए निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा; मध्याह्न भोजन; ‘सर्व शिक्षा अभियान’ जैसे कार्यक्रम। |
| श्रम और कर्म की मर्यादा | श्रमिकों के लिए क़ानून, न्यूनतम मज़दूरी, बाल-श्रम पर रोक, और कुटीर तथा लघु उद्योगों को बढ़ावा। |
| स्वदेशी समाज का यंत्र / आत्मनिर्भरता | इस्पात, अंतरिक्ष, रक्षा और सूचना-प्रौद्योगिकी में अपनी क्षमता का विकास — पाठ के आरंभ के चित्र में भी भारतीय रेल, इसरो का रॉकेट, पवन-चक्कियाँ और यूपीआई दिखाए गए हैं। |
स्त्री सशक्तीकरण — पृष्ठ 148पाठ से आगे
राज्य की ओर से स्त्रियों को ये प्रमुख विशेषाधिकार दिए गए हैं —
- पंचायत और नगर निकायों में आरक्षण — स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित हैं, इसीलिए गाँव-गाँव में महिला सरपंच और पार्षद दिखती हैं।
- मातृत्व अवकाश और सुविधाएँ — नौकरी करने वाली स्त्री को संतान के जन्म पर वेतन सहित अवकाश।
- शिक्षा में सहायता — बालिकाओं के लिए निःशुल्क शिक्षा, छात्रवृत्ति, साइकिल तथा छात्रावास जैसी योजनाएँ।
- सुरक्षा संबंधी व्यवस्थाएँ — कार्यस्थल पर उत्पीड़न के विरुद्ध क़ानून, महिला थाना और हेल्पलाइन, तथा रात में महिला कर्मचारी के लिए वाहन की व्यवस्था।
- समान वेतन और संपत्ति में समान अधिकार — समान कार्य के लिए समान वेतन; पैतृक संपत्ति में बेटी को बेटे के बराबर हिस्सा।
- रोज़ की छोटी सुविधाएँ — बसों तथा रेलगाड़ियों में आरक्षित सीटें, अलग डिब्बा, और सरकारी कार्यालयों में अलग पंक्ति।
उस टुकड़ी का नाम था — रानी झाँसी रेजिमेंट (झाँसी की रानी रेजिमेंट)।
- कब और कहाँ — सन् 1943 में सिंगापुर में इसकी घोषणा हुई। इसमें दक्षिण-पूर्व एशिया में बसे भारतीय परिवारों की लड़कियाँ और स्त्रियाँ स्वेच्छा से भर्ती हुईं।
- नाम क्यों — 1857 में अंग्रेज़ों से लड़ने वाली रानी लक्ष्मीबाई के नाम पर, ताकि सैनिकों को यह याद रहे कि भारत की स्त्री पहले भी युद्ध-भूमि में उतर चुकी है।
- नेतृत्व — इसकी कमान कैप्टन लक्ष्मी सहगल ने सँभाली, जो पेशे से चिकित्सक थीं।
- भूमिका — इसकी सैनिकों ने पुरुष सैनिकों की तरह ही सैन्य प्रशिक्षण लिया — कवायद, हथियार चलाना और शिविर का अनुशासन। इनका काम युद्ध में भाग लेने के लिए तैयार रहना, घायलों की चिकित्सा-सेवा करना और सैनिकों तथा प्रवासी भारतीयों में उत्साह जगाना था।
आपके प्रिय स्वतंत्रता सेनानी — पृष्ठ 148पाठ से आगे
“तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूँगा।” — पृष्ठ 148पाठ से आगे
नीचे स्तंभ 1 में कुछ नारे दिए गए हैं। नारों के सामने लिखिए कि यह किसके द्वारा दिया गया? आप पुस्तकालय या इंटरनेट की सहायता भी ले सकते हैं।
| नारा | स्वतंत्रता सेनानी |
|---|---|
| स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है। | ………… |
| करो या मरो | ………… |
| मैं आजाद हूँ, आजाद रहूँगा और आजाद ही मरूँगा | ………… |
| इंकलाब जिंदाबाद, साम्राज्यवाद मुर्दाबाद | ………… |
| पूर्ण स्वराज | ………… |
| नारा | स्वतंत्रता सेनानी |
|---|---|
| स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है। | बाल गंगाधर तिलक |
| करो या मरो | महात्मा गाँधी |
| मैं आजाद हूँ, आजाद रहूँगा और आजाद ही मरूँगा | चंद्रशेखर आजाद |
| इंकलाब जिंदाबाद, साम्राज्यवाद मुर्दाबाद | भगत सिंह (और उनके साथी) |
| पूर्ण स्वराज | जवाहरलाल नेहरू (कांग्रेस का लाहौर अधिवेशन, 1929) |
परियोजना कार्य — पृष्ठ 149पाठ से आगे
यह हाथ से करने वाला काम है। शर्त सबसे महत्वपूर्ण है — कुल 20 सेनानी, 10 महिला और 10 पुरुष, और एक राज्य से केवल एक व्यक्ति। इसका अर्थ है कि आपको कम-से-कम 20 अलग-अलग राज्यों तक जाना पड़ेगा। इसीलिए पहले नाम चुनिए, चित्र बाद में।
| नाम | राज्य / क्षेत्र | विशेष योगदान (एक वाक्य में) |
|---|---|---|
| रानी गाइदिन्ल्यू | मणिपुर / नागालैंड क्षेत्र | किशोरावस्था में ही अंग्रेज़ी शासन के विरुद्ध आंदोलन का नेतृत्व किया और लंबा कारावास भोगा। |
| मातंगिनी हाजरा | पश्चिम बंगाल | भारत छोड़ो आंदोलन में तिरंगा थामे जुलूस का नेतृत्व करते हुए गोली लगने पर भी झंडा नहीं गिरने दिया। |
| कैप्टन लक्ष्मी सहगल | तमिलनाडु | आजाद हिंद फौज की ‘रानी झाँसी रेजिमेंट’ की कमान सँभाली। |
| कित्तूर रानी चेन्नम्मा | कर्नाटक | 1824 में अंग्रेज़ों के विरुद्ध सशस्त्र प्रतिरोध करने वाली आरंभिक शासकों में से एक। |
| भगत सिंह | पंजाब | सेंट्रल असेंबली में बम फेंककर बहरी सरकार तक अपनी बात पहुँचाई; ‘शहीद-ए-आज़म’ कहलाए। |
| बिरसा मुंडा | झारखंड | ‘उलगुलान’ आंदोलन से जनजातीय समाज को अंग्रेज़ी शासन और भू-व्यवस्था के विरुद्ध संगठित किया। |
| सरदार वल्लभभाई पटेल | गुजरात | बारदोली सत्याग्रह का नेतृत्व और स्वतंत्रता के बाद रियासतों का भारत में विलय। |
| सुभाषचंद्र बोस | ओड़िशा (जन्म — कटक) | ‘आजाद हिंद फौज’ का नेतृत्व और ‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूँगा’ का आह्वान। |
साझी समझ — पृष्ठ 150पाठ से आगे · ‘झरोखे से’ — गृहउद्योग के विषय में नेताजी का एक पत्र (पृष्ठ 149)
हमारे आस-पास कई गृह एवं कुटीर उद्योग चलते हैं — अचार-पापड़ बनाना, अगरबत्ती और मोमबत्ती बनाना, मिट्टी के दीये और बरतन, टोकरी-चटाई बुनना, सिलाई-कढ़ाई। इनमें पूँजी कम लगती है, काम जल्दी सीखा जा सकता है और परिवार के लोग फुरसत के समय में घर पर ही कर लेते हैं — ठीक वैसे ही जैसे नेताजी ने अपने पत्र में मिट्टी के खिलौनों और सीप के बटनों के बारे में लिखा था। इनकी सबसे बड़ी कठिनाई माल बेचना है। आज स्वयं सहायता समूह, सहकारी समितियाँ और कारीगर मेले इसमें मदद करते हैं, जैसा काम नेताजी की ‘समिति’ करने वाली थी।
खोजबीन के लिए — पृष्ठ 150पाठ से आगे
• ‘आजाद हिंद फौज’ के विषय में और अधिक जानकारी जुटाइए और अपनी कक्षा में प्रस्तुत कीजिए।
आजाद हिंद फौज — प्रस्तुति के मुख्य बिंदु
- दूसरे विश्वयुद्ध के समय दक्षिण-पूर्व एशिया में बनी; अंग्रेज़ी में इसे Indian National Army (आई.एन.ए.) कहते हैं।
- सन् 1943 में नेताजी ने इसका नेतृत्व सँभाला और ‘आजाद हिंद’ की अस्थायी सरकार बनाई।
- इसमें गांधी, नेहरू और आजाद ब्रिगेड के साथ स्त्रियों की रानी झाँसी रेजिमेंट भी थी।
- इसके नारे थे — ‘दिल्ली चलो’, ‘जय हिंद’ और ‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूँगा’।
- युद्ध के बाद लाल क़िले में इसके अधिकारियों पर चले मुक़दमों ने पूरे देश में जनभावना जगा दी।
Chapter 10 of 10 – Hindi
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NCERT Solutions Class 8 Hindi Chapter 10 तरुण के स्वप्न – Overview
| Class | Class 8 |
| Subject | Hindi |
| Chapter | 10 – तरुण के स्वप्न |
| Session | 2027 |
| Format | Full answers on this page + PDF |
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