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NCERT Solutions for Class 8 Hindi Chapter 10 तरुण के स्वप्न (PDF) – 2027

NCERT Solutions for Class 8 Hindi Chapter 10 तरुण के स्वप्न – step-by-step answers to every exercise and in-text question of the chapter, as per the latest NCERT syllabus for 2027. Read them online or download the free question-answer PDF.

पाठ 10 नेताजी सुभाषचंद्र बोस के एक उद्‌बोधन (भाषण) का अंश है, जो उन्होंने 29 दिसंबर, 1929 को मेदिनीपुर जिला युवक-सम्मेलन में युवाओं को संबोधित करते हुए दिया था। इसमें वे अपना एक ही स्वप्न — ‘नया सर्वांगीण स्वाधीन संपन्न समाज और उस पर एक स्वाधीन राष्ट्र’ — तरुणों को उपहार के रूप में सौंप देते हैं। यह मल्हार का अंतिम पाठ है।

NCERT Solutions for Class 8 Hindi Chapter 10 तरुण के स्वप्न PDF

All the answers are on this page below. The PDF also explains every answer – why it is right and how to check it – so download it for revision.

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NCERT Solutions for Class 8 Hindi Chapter 10 तरुण के स्वप्न – Questions and Answers

All questions of the chapter are answered below, in the order of the book – in-text questions, activities and the end-of-chapter exercises. Each answer is written the way you would write it in the exam.

मेरी समझ से — पृष्ठ 142-143पाठ से

पाठ से
प्र.1(क) निम्नलिखित प्रश्नों के उपयुक्त उत्तर के सम्मुख तारा (★) बनाइए। कुछ प्रश्नों के एक से अधिक उत्तर भी हो सकते हैं।
(1) “उनके स्वप्न के उत्तराधिकारी आज हम हैं।” इस कथन में रेखांकित शब्द ‘हम’ किसके लिए प्रयुक्त हुआ है?
• सुभाषचंद्र बोस के लिए
• देश के तरुण वर्ग के लिए
• चित्तरंजन दास के लिए
• भारतवासियों के लिए
उत्तर

★ देश के तरुण वर्ग के लिए

कारण: यह भाषण नेताजी ने मेदिनीपुर जिला युवक-सम्मेलन में दिया था और वे सुनने वालों को “हे मेरे तरुण भाइयो!” कहकर पुकारते हैं। ‘हम’ में नेताजी स्वयं और उनके सामने बैठे तरुण शामिल हैं। यही तरुण चित्तरंजन दास के स्वप्न के उत्तराधिकारी हैं।

प्र.2(2) स्वाधीन राष्ट्र का स्वप्न साकार होगा?
• आर्थिक असमानता से
• स्त्री-पुरुष के भिन्न अधिकारों से
• श्रम और कर्म की मर्यादा से
• जातिभेद से
उत्तर

★ श्रम और कर्म की मर्यादा से।

कारण: पाठ में कहा गया है — “जिस समाज में श्रम और कर्म की पूरी मर्यादा होगी और आलसी तथा अकर्मण्य के लिए कोई स्थान नहीं रहेगा, वह राष्ट्र किसी भी विजातीय प्रभाव से हर प्रकार से मुक्त रहेगा।” बाकी तीन विकल्प — आर्थिक असमानता, स्त्री-पुरुष के भिन्न अधिकार और जातिभेद — वे बुराइयाँ हैं जिन्हें नेताजी उस समाज से हटाना चाहते हैं।

प्र.3(3) “उनके स्वप्न के उत्तराधिकारी आज हम हैं।” ‘उत्तराधिकारी’ होने से क्या अभिप्राय है?
• हमें उनके स्वप्नों को संजोकर रखना है
• हमें भी उनकी तरह स्वप्न देखने का अधिकार है
• उनके स्वप्नों को पूरा करने के लिए हमें ही कर्म करना है
• उनके स्वप्नों पर चर्चा करने का दायित्व हमारा ही है
उत्तर

★ उनके स्वप्नों को पूरा करने के लिए हमें ही कर्म करना है

कारण: उत्तराधिकारी वह होता है जिसे किसी के बाद उसकी संपत्ति मिलती है। यहाँ चित्तरंजन दास का स्वप्न ही वह संपत्ति है। वारिस को संपत्ति के साथ ज़िम्मेदारी भी मिलती है, इसलिए अब उस स्वप्न को पूरा करने का काम हमारा है। नेताजी आगे कहते हैं — “इसी स्वप्न की प्रेरणा से हम उठते हैं, बैठते हैं… काम-काज करते हैं।”

प्र.4(4) जब प्रत्येक व्यक्ति को शिक्षा और उन्नति का समान अवसर प्राप्त होगा तब—
• राष्ट्र की श्रम-शक्ति बढ़ेगी
• तरुणों का साहस बढ़ेगा
• राष्ट्र स्वाधीन बनेगा
• राष्ट्र स्वप्नदर्शी होगा
उत्तर

★ राष्ट्र की श्रम-शक्ति बढ़ेगी

कारण: जब पढ़ने और आगे बढ़ने का अवसर कुछ ही लोगों तक सीमित नहीं रहेगा, तो हर व्यक्ति अपनी योग्यता के अनुसार काम में लगेगा और देश की पूरी प्रतिभा काम आएगी। इसीलिए नेताजी इस बात के ठीक बाद ‘श्रम और कर्म की पूरी मर्यादा’ की बात करते हैं।

प्र.5(ख) हो सकता है कि आपके समूह के साथियों ने अलग-अलग उत्तर चुने हों। अपने मित्रों के साथ चर्चा कीजिए कि आपने ये उत्तर ही क्यों चुने?
उत्तर

“मैंने प्रश्न (1) में ‘देश के तरुण वर्ग के लिए’ चुना, क्योंकि भाषण युवक-सम्मेलन में दिया गया था और नेताजी ‘हे मेरे तरुण भाइयो!’ कहते हैं। मेरे मित्र ने ‘भारतवासियों के लिए’ भी चुना, क्योंकि तरुण भी भारतवासी ही हैं। प्रश्न (4) में मैंने ‘श्रम-शक्ति बढ़ेगी’ चुना, क्योंकि अगली पंक्ति श्रम और कर्म की मर्यादा की बात करती है। चर्चा से हमने सीखा कि जिस उत्तर के पीछे पाठ की पंक्ति का प्रमाण हो, वही उत्तर मज़बूत होता है।”

मिलकर करें मिलान — पृष्ठ 143पाठ से

पाठ से
प्र.6नीचे स्तंभ 1 में पाठ में से चुनकर कुछ पंक्तियाँ दी गई हैं और स्तंभ 2 में उन पंक्तियों से संबंधित भाव-विचार दिए गए हैं। स्तंभ 1 में दी गई पंक्तियों का स्तंभ 2 में दिए गए भाव-विचार से सही मिलान कीजिए।
क्रमस्तंभ 1स्तंभ 2
1.“इसी स्वप्न की प्रेरणा से हम उठते हैं, बैठते हैं, चलते हैं, फिरते हैं और लिखते हैं, भाषण देते हैं, काम-काज करते हैं।”1. समाज में सभी व्यक्तियों को सभी तरह की स्वतंत्रता हो और उस पर किसी तरह का बंधन या सामाजिक दबाव न हो।
2.“जो राष्ट्र हमारे स्वदेशी समाज के यंत्र के रूप में काम करेगा, सर्वोपरि वह समाज और राष्ट्र भारतवासियों का अभाव मिटाएगा।”2. हमारी समूची दिनचर्या और आचार-विचार इसी लक्ष्य (स्वप्न) की प्राप्ति पर केंद्रित हैं।
3.“उस समाज में व्यक्ति सब दृष्टियों से मुक्त हो तथा समाज के दबाव से वह मरे नहीं।”3. जिस देश की योजनाएँ हमारे अपने समाज को ध्यान में रखकर बनाई जाएँगी, उस देश में किसी भी प्रकार का अभाव नहीं होगा।
उत्तर
स्तंभ 1 की पंक्तिस्तंभ 2 का सही भाव-विचार
1. “इसी स्वप्न की प्रेरणा से हम उठते हैं, बैठते हैं…”2. हमारी समूची दिनचर्या और आचार-विचार इसी लक्ष्य (स्वप्न) की प्राप्ति पर केंद्रित हैं।
2. “जो राष्ट्र हमारे स्वदेशी समाज के यंत्र के रूप में काम करेगा…”3. जिस देश की योजनाएँ हमारे अपने समाज को ध्यान में रखकर बनाई जाएँगी, उस देश में किसी भी प्रकार का अभाव नहीं होगा।
3. “उस समाज में व्यक्ति सब दृष्टियों से मुक्त हो…”1. समाज में सभी व्यक्तियों को सभी तरह की स्वतंत्रता हो और उस पर किसी तरह का बंधन या सामाजिक दबाव न हो।

संक्षेप में — 1 → 2, 2 → 3, 3 → 1.

पंक्तियों पर चर्चा — पृष्ठ 144पाठ से

पाठ से
प्र.7पाठ से चुनकर कुछ पंक्तियाँ नीचे दी गई हैं। इन्हें ध्यानपूर्वक पढ़िए और इन पर विचार कीजिए। आपको इनका क्या अर्थ समझ में आया? अपने विचार अपनी कक्षा में साझा कीजिए।
(क) “उस समाज में अर्थ की विषमता न हो।”
उत्तर

यहाँ अर्थ का मतलब है धन, और विषमता का मतलब है असमानता। पंक्ति का सीधा अर्थ है — उस समाज में धन का बँटवारा इतना असमान न हो कि कुछ लोगों के पास सब कुछ हो और बहुतों के पास कुछ भी नहीं।

नेताजी आर्थिक बराबरी को स्वाधीनता की शर्त मानते थे, क्योंकि जिस व्यक्ति के पास दो वक्त का भोजन नहीं, वह नाम से स्वतंत्र होकर भी सचमुच स्वतंत्र नहीं होता। इसका उपाय वे अगली पंक्ति में बताते हैं — सबको ‘शिक्षा और उन्नति का समान सुअवसर’।

प्र.8(ख) “वही स्वप्न उनकी शक्ति का उत्स बना और उनके आनंद का निर्झर रहा।”
उत्तर

यह पंक्ति देशबंधु चित्तरंजन दास के बारे में है। इसका अर्थ है — जो स्वप्न उन्होंने देखा, वही उनकी सारी शक्ति का स्रोत था और वही उनके आनंद का न सूखने वाला झरना था।

शब्दार्थ — उत्स = सोता, स्रोत (जहाँ से पानी फूटकर निकलता है)। निर्झर = झरना, प्रपात।

यह रूपक है — स्वप्न को ही सोता और झरना कह दिया गया है। जैसे पहाड़ का सोता कभी नहीं थकता, वैसे ही बड़े लक्ष्य वाले व्यक्ति की शक्ति और आनंद कभी नहीं चुकते।

प्र.9(ग) “उस समाज में व्यक्ति सब दृष्टियों से मुक्त हो।”
उत्तर

इसका अर्थ है — उस समाज में व्यक्ति की स्वतंत्रता किसी एक तरह की न हो, हर तरह की हो। केवल विदेशी शासन से मुक्ति नहीं, बल्कि जाति, धन, भय, रूढ़ि और सामाजिक दबाव — सबसे मुक्ति।

इसका प्रमाण अगली पंक्तियों में है, जहाँ नेताजी बारी-बारी से जातिभेद, नारी के असमान अधिकार और अर्थ की विषमता को हटाने की बात करते हैं। साथ ही वे कहते हैं कि ‘समाज के दबाव से वह मरे नहीं’ — यानी अपने ही समाज का दबाव भी एक बंधन है।

सोच-विचार के लिए — पृष्ठ 144पाठ से

पाठ से
प्र.10अब आप इस पाठ को पुन: पढ़िए और निम्नलिखित के विषय में पता लगाकर लिखिए—
(क) नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने किस प्रकार के राष्ट्र निर्माण का स्वप्न देखा था?
उत्तर

नेताजी ने एक नए सर्वांगीण स्वाधीन संपन्न समाज और उस पर टिके एक स्वाधीन राष्ट्र का स्वप्न देखा था। उस राष्ट्र की पहचान वे स्वयं गिनाते हैं —

  • व्यक्ति सब दृष्टियों से मुक्त हो और समाज के दबाव से उसका दम न घुटे।
  • जातिभेद का कोई स्थान न हो।
  • नारी मुक्त होकर पुरुषों की तरह समान अधिकार का उपभोग करे और समाज तथा राष्ट्र की सेवा में समान रूप से हिस्सा ले।
  • अर्थ की विषमता न हो — धन की खाई न रहे।
  • हर व्यक्ति को शिक्षा और उन्नति का समान सुअवसर मिले।
  • श्रम और कर्म की पूरी मर्यादा हो; आलसी और अकर्मण्य के लिए कोई जगह न रहे।
  • वह राष्ट्र स्वदेशी समाज के यंत्र की तरह काम करे — यानी अपने ही समाज की ज़रूरतें पूरी करे — और ‘विजातीय प्रभाव’ से मुक्त रहे।
प्र.11(ख) नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने किस लक्ष्य की प्राप्ति को अपने जीवन की सार्थकता के रूप में देखा?
उत्तर

उन्होंने अपने स्वप्न को साकार करने — यानी उस आदर्श स्वाधीन, संपन्न और समानता वाले समाज तथा राष्ट्र की स्थापना — को ही अपने जीवन की सार्थकता माना।

“है सिर्फ यही स्वप्न जो हमें असीम शक्ति और अपार आनंद देता है, जो मेरे क्षुद्र जीवन को भी सार्थक बनाता है।”
प्र.12(ग) “आलसी तथा अकर्मण्य के लिए कोई स्थान नहीं रहेगा” सुभाषचंद्र बोस ने ऐसा क्यों कहा होगा?
उत्तर

क्योंकि नेताजी का पूरा स्वप्न कर्म पर टिका है। जो समाज वे बनाना चाहते हैं, वह भाषणों से नहीं, लोगों के परिश्रम से बनेगा — इसलिए उसमें काम से जी चुराने वाले के लिए जगह नहीं छोड़ी जा सकती।

पाठ में कहा गया है कि जिस समाज में श्रम और कर्म की पूरी मर्यादा होगी, वही राष्ट्र विजातीय प्रभाव से मुक्त रहेगा। परिश्रम से ही समाज आत्मनिर्भर बनता है और आत्मनिर्भर समाज ही स्वाधीन रह पाता है; आलस्य परतंत्रता की ओर ले जाता है।

प्र.13(घ) नेताजी सुभाषचंद्र बोस के लक्ष्यों या ध्येय को पूरा करने के लिए आज की युवा पीढ़ी क्या-क्या कर सकती है?
उत्तर

नेताजी ने जो-जो शर्तें गिनाई थीं, आज का युवा उन्हीं को अपने स्तर पर पूरा कर सकता है। हर काम को उसकी शर्त से जोड़कर देखिए —

नेताजी की शर्तआज युवा क्या कर सकता है
जातिभेद का स्थान न होअपनी कक्षा, टोली और मित्र-मंडली में किसी के साथ जाति या पृष्ठभूमि के कारण अलग व्यवहार न करना — बदलाव यहीं से शुरू होता है।
नारी को समान अधिकारघर और विद्यालय के काम में बराबर हिस्सा लेना; लड़कियों की पढ़ाई और खेल में उतनी ही भागीदारी को सामान्य बात मानना।
सबको शिक्षा और उन्नति का समान सुअवसरजो पढ़ाई में पीछे रह गया हो, उसकी मदद करना; बड़े होकर अपने कौशल से अपने क्षेत्र के लोगों को सिखाना।
श्रम और कर्म की मर्यादाअपना काम स्वयं करना और हाथ के काम को छोटा न समझना — यह सबसे सीधी बात है और सबसे कम की जाती है।
स्वदेशी समाज का यंत्रस्थानीय कारीगरों और गृह-उद्योगों की बनी चीज़ें अपनाना; अपने क्षेत्र की समस्या पर अपने कौशल से काम करना।
व्यक्ति सब दृष्टियों से मुक्त होअपने अधिकार जानना और दूसरों के अधिकारों का उतना ही ध्यान रखना; अन्याय देखकर चुप न रहना।

अनुमान और कल्पना से — पृष्ठ 144पाठ से

पाठ से
प्र.14(क) “उस समाज में व्यक्ति सब दृष्टियों से मुक्त हो”, सुभाषचंद्र बोस ने किन-किन दृष्टियों से मुक्ति की बात की होगी?
उत्तर

भाषण में ‘सब दृष्टियों’ की सूची नेताजी ने स्वयं दे दी है — उसी पंक्ति के बाद वे एक-एक करके बंधन गिनाते हैं। कम-से-कम छह तरह की मुक्ति उसमें से निकलती है —

  • सामाजिक मुक्ति — ‘समाज के दबाव से वह मरे नहीं’, यानी रीति-रिवाज और लोकलाज के दबाव में व्यक्ति का दम न घुटे।
  • जाति के बंधन से मुक्ति — ‘उस समाज में जातिभेद का स्थान नहीं हो’।
  • स्त्री-पुरुष के भेद से मुक्ति — ‘नारी मुक्त होकर… समान अधिकार का उपभोग करे’।
  • आर्थिक मुक्ति — ‘उस समाज में अर्थ की विषमता न हो’, यानी गरीबी और असमानता का बंधन न रहे।
  • अवसर की मुक्ति — ‘प्रत्येक व्यक्ति शिक्षा और उन्नति का समान सुअवसर पाए’; अशिक्षा भी एक बंधन है।
  • राजनीतिक मुक्ति — ‘वह राष्ट्र किसी भी विजातीय प्रभाव से हर प्रकार से मुक्त रहेगा’।
प्र.15(ख) “उस समाज में नारी मुक्त होकर समाज एवं राष्ट्र के पुरुषों की तरह समान अधिकार का उपभोग करे”, सुभाषचंद्र बोस को अपने भाषण में नारी के लिए समान अधिकारों की बात क्यों कहनी पड़ी?
उत्तर

क्योंकि 1929 के भारत में स्त्रियों को वे अधिकार प्राप्त नहीं थे। जिस बात के लिए विशेष रूप से कहना पड़े, वह अपने-आप उपलब्ध नहीं होती — नेताजी का यह वाक्य ही उस समय की स्थिति का प्रमाण है।

नेताजी ‘सर्वांगीण’ समाज चाहते थे; आधी आबादी को शिक्षा, संपत्ति और निर्णय के अधिकार न हों तो समाज पूरा नहीं हो सकता। वे जातिभेद और अर्थ की विषमता की तरह स्त्री की असमानता को भी एक बंधन मानते थे। वे स्त्री को केवल अधिकार नहीं, ‘समाज तथा राष्ट्र की सेवा में समान रूप से हिस्सा’ भी देना चाहते थे।

प्र.16(ग) आपके विचार से हमारे समाज में और कौन-कौन से लोग हैं जिन्हें विशेष अधिकार दिए जाने की आवश्यकता है?
उत्तर

ऐसे लोग, जो किसी कारण से दूसरों के बराबर शुरुआत नहीं कर पाते। उन्हें विशेष अधिकार इसलिए चाहिए ताकि वे बराबरी तक पहुँच सकें — विशेष अधिकार का उद्देश्य किसी को ऊपर उठाना नहीं, सबको एक ही रेखा पर लाना है।

किन्हेंक्योंकिस तरह की विशेष सुविधा
दिव्यांगजनसामान्य रास्ते, कक्षा और परीक्षा उनके लिए वैसे ही सुलभ नहीं होतेरैंप और सुलभ भवन, विशेष शिक्षा-सामग्री, परीक्षा में अतिरिक्त समय, आरक्षण
बच्चेवे अपने अधिकार स्वयं नहीं माँग सकतेनिःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा, बाल-श्रम पर रोक, पोषण
वरिष्ठ नागरिकआयु के कारण आय और आवागमन दोनों सीमित हो जाते हैंपेंशन, यात्रा और चिकित्सा में छूट, अलग पंक्ति
वंचित एवं निर्धन परिवारशिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्च करने की क्षमता नहींछात्रवृत्ति, निःशुल्क पाठ्यपुस्तक और भोजन, आवास तथा राशन की योजनाएँ
जनजातीय समुदाय के लोगदूरस्थ क्षेत्रों में विद्यालय, चिकित्सा और बाज़ार तक पहुँच कठिनआवासीय विद्यालय, वनोपज पर अधिकार, विशेष विकास योजनाएँ
प्र.17(घ) सुभाषचंद्र बोस देश के समस्त युवा वर्ग को संबोधित करते हुए कहते हैं— “हे मेरे तरुण भाइयो!” उनका संबोधन केवल ‘भाइयो’ शब्द तक ही क्यों सीमित रहा होगा?
उत्तर

सबसे संभावित कारण यह है कि 29 दिसंबर, 1929 के उस मेदिनीपुर जिला युवक-सम्मेलन में उनके सामने बैठे श्रोता लगभग सभी युवक थे। उस समय ऐसे सार्वजनिक सम्मेलनों में लड़कियों और स्त्रियों की उपस्थिति बहुत कम होती थी, इसलिए संबोधन भी उसी सभा के अनुसार बन गया।

यह नेताजी की सोच की सीमा नहीं थी, क्योंकि इसी भाषण में वे माँग करते हैं कि नारी ‘पुरुषों की तरह समान अधिकार का उपभोग करे’। उस समय पूरी सभा को ‘भाइयो’ कहकर पुकारना बोलचाल का सामान्य ढंग भी था।

प्र.18(ङ) “यह स्वप्न मैं तुम्हें उपहारस्वरूप देता हूँ— स्वीकार करो।” सुभाषचंद्र बोस के इस आह्वान पर श्रोताओं (युवा वर्ग) की क्या प्रतिक्रिया रही होगी?
उत्तर

श्रोता पहले कुछ क्षण स्तब्ध रहे होंगे, फिर सभा तालियों और नारों से गूँज उठी होगी। और सबसे गहरी प्रतिक्रिया शोर नहीं, वह चुप्पी रही होगी जिसमें हर तरुण ने अपने-आप से पूछा होगा — ‘क्या मैं इसे स्वीकार कर सकता हूँ?’

ऐसा इसलिए, क्योंकि नेताजी उनसे कुछ माँग नहीं रहे थे; वे अपनी एकमात्र संपत्ति — अपना स्वप्न — उन्हें सौंप रहे थे। ‘स्वीकार करो’ कहकर उन्होंने हर तरुण के सामने एक निर्णय रख दिया।

शीर्षक — पृष्ठ 145पाठ से

पाठ से
प्र.19(क) आपने नेताजी सुभाषचंद्र बोस के भाषण का एक अंश पढ़ा है, इसे ‘तरुण के स्वप्न’ शीर्षक दिया गया है। अपने समूह में चर्चा करके लिखिए कि यह शीर्षक क्यों दिया गया होगा?
उत्तर

यह शीर्षक इसलिए दिया गया होगा क्योंकि पूरे अंश में केवल दो चीज़ें हैं — एक स्वप्न, और वे तरुण जिन्हें वह स्वप्न सौंपा जा रहा है। शीर्षक ने पाठ के दोनों सिरे पकड़ लिए हैं।

‘स्वप्न’ शब्द इस छोटे-से अंश में बार-बार आता है। भाषण युवक-सम्मेलन में तरुणों के लिए दिया गया था और अंत में उन्हें सीधे पुकारा गया — ‘हे मेरे तरुण भाइयो!’ भाषण के अंत में नेताजी यह स्वप्न तरुणों को उपहार में सौंप देते हैं, इसलिए वह ‘तरुण के स्वप्न’ बन जाता है।

प्र.20(ख) यदि आपको भाषण के इस अंश को कोई अन्य नाम देना हो तो क्या नाम देंगे? आपने यह नाम क्यों सोचा? यह भी लिखिए।
उत्तर
“मैं इसका नाम ‘स्वीकार करो’ रखूँगा। कारण यह है कि नेताजी यहाँ कुछ बताते नहीं, कुछ सौंपते हैं। ‘तरुण के स्वप्न’ नाम से पता चलता है कि पाठ किसके बारे में है, पर ‘स्वीकार करो’ नाम पढ़ते ही पाठक को लगता है कि बात उससे की जा रही है। शीर्षक जब पाठक को भीतर खींच ले, तो वह अधिक प्रभावी होता है।”
प्र.21(ग) सुभाषचंद्र बोस ने अपने समय की स्थितियों या समस्याओं को अपने संबोधन में स्थान दिया है। यदि आपको अपनी कक्षा को संबोधित करने का अवसर मिले तो आप किन-किन विषयों को अपने उद्‌बोधन में सम्मिलित करेंगे और उसका क्या शीर्षक रखेंगे?
उत्तर

भाषा की बात — पृष्ठ 145पाठ से

पाठ से
प्र.22(क) सुभाषचंद्र बोस ने अपने भाषण में संख्या, संगठन या भाव आदि का बोध कराने वाले शब्दों के साथ उनकी विशेषता अथवा गुण बताने वाले शब्दों का प्रयोग किया है। उनके भाषण से विशेषता अथवा गुण बताने वाले शब्द ढूँढ़कर दिए गए शब्द समूह को पूरा कीजिए—
विशेषताशब्दविशेषताशब्द
अखंडसत्य ………… जीवन
 ………… समाज ………… शक्ति
 ………… राष्ट्र ………… आनंद
उत्तर

भाषण से भरा हुआ शब्द-समूह —

विशेषता बताने वाला शब्दशब्दभाषण की पंक्ति
अखंड (नित्य)सत्य“यह स्वप्न मेरे समक्ष नित्य एवं अखंड सत्य है।”
सर्वांगीण / स्वाधीन / संपन्नसमाज“हम चाहते हैं, एक नया सर्वांगीण स्वाधीन संपन्न समाज…”
स्वाधीन (आदर्श)राष्ट्र“…और उस पर एक स्वाधीन राष्ट्र।” / “आदर्श-राष्ट्र के रूप में गण्य होगा।”
क्षुद्रजीवन“जो मेरे क्षुद्र जीवन को भी सार्थक बनाता है।”
असीमशक्ति“जो हमें असीम शक्ति और अपार आनंद देता है।”
अपारआनंद“जो हमें असीम शक्ति और अपार आनंद देता है।”
प्र.23(ख) सुभाषचंद्र बोस ने तो उपर्युक्त विशेषताओं के साथ इन शब्दों को रखा है। आप किन विशेषताओं के साथ इन उपर्युक्त शब्दों को रखना चाहेंगे और क्यों? लिखिए।
उत्तर

इस प्रश्न में अपनी पसंद का विशेषण चुनना है, पर हर चुनाव के साथ कारण देना ज़रूरी है — यही प्रश्न का ‘क्यों’ माँग रहा है।

शब्दमेरा विशेषणकारण
सत्यकड़वा सत्यसच अक्सर सुनने में अच्छा नहीं लगता, फिर भी कहना पड़ता है।
समाजसमरस समाजजिसमें सब घुल-मिलकर रहें — यही नेताजी की ‘जातिभेद न हो’ वाली शर्त का दूसरा नाम है।
राष्ट्रआत्मनिर्भर राष्ट्र‘लेखक से परिचय’ में भी लिखा है कि नेताजी ने आत्मनिर्भर समाज का सपना देखा था।
जीवनसार्थक जीवननेताजी ने अपने जीवन को ‘क्षुद्र’ कहकर भी उसे स्वप्न से ‘सार्थक’ बना लिया — यही शब्द मुझे अधिक ठीक लगता है।
शक्तिसंगठित शक्तिअकेली शक्ति बिखर जाती है; ‘आजाद हिंद फौज’ इसी संगठित शक्ति का उदाहरण थी।
आनंदनिश्छल आनंदजिस खुशी में कोई छल या स्वार्थ न हो, वही देर तक टिकती है।

विपरीतार्थक शब्द और उनके प्रयोग — पृष्ठ 145-146पाठ से

पाठ से
प्र.24(क) “और उस पर एक स्वाधीन राष्ट्र” इस वाक्यांश में रेखांकित शब्द ‘स्वाधीन’ का विपरीत अर्थ देने वाला शब्द है ‘पराधीन’। इसी प्रकार के कुछ विपरीतार्थक शब्द आगे दिए गए हैं, लेकिन वे आमने-सामने नहीं हैं। रेखाएँ खींचकर विपरीतार्थक शब्दों के सही जोड़े बनाइए—
क्रमस्तंभ 1स्तंभ 2
1.स्वीकारकर्मण्य/कर्मठ
2.सार्थकविपन्न
3.विषमताअस्वीकार
4.क्षुद्रजीवन
5.संपन्ननिरर्थक
6.अकर्मण्यसमानता
7.मरणविशाल/वृहत/विराट/महान
उत्तर
क्रमस्तंभ 1विपरीतार्थक (स्तंभ 2)पहचान का सूत्र
1.स्वीकारअस्वीकार‘अ’ उपसर्ग जोड़ने से अर्थ उलट गया
2.सार्थकनिरर्थकसार्थक = अर्थ सहित; निरर्थक = अर्थ रहित (‘निर्’ उपसर्ग)
3.विषमतासमानताविषम = असमान, सम = बराबर
4.क्षुद्रविशाल / वृहत / विराट / महानक्षुद्र = छोटा, तुच्छ — इसलिए विपरीत में सब ‘बड़े’ अर्थ वाले शब्द
5.संपन्नविपन्नसंपन्न = साधन-संपन्न, धनी; विपन्न = विपत्ति में पड़ा, निर्धन
6.अकर्मण्यकर्मण्य / कर्मठयहाँ ‘अ’ हटाने से अर्थ उलट जाता है
7.मरणजीवनसीधा विलोम — कोई उपसर्ग नहीं, अलग शब्द
प्र.25(ख) अब स्तंभ 1 और स्तंभ 2 के सभी शब्दों से दिए गए उदाहरण के अनुसार वाक्य बनाकर लिखिए, जैसे— “समाज की उन्नति अकर्मण्य नहीं अपितु कर्मण्य व्यक्तियों पर निर्भर है।”
उत्तर

उदाहरण की तरह हर वाक्य में दोनों विपरीत शब्द आए हैं —

  1. स्वीकार / अस्वीकार — सच्ची सलाह को अस्वीकार नहीं, सहर्ष स्वीकार करना चाहिए।
  2. सार्थक / निरर्थक — बिना लक्ष्य के किया गया परिश्रम निरर्थक होता है, जबकि लक्ष्य के साथ किया गया वही परिश्रम सार्थक हो जाता है।
  3. विषमता / समानता — नेताजी ऐसे समाज के पक्ष में थे जिसमें अर्थ की विषमता नहीं, समानता हो।
  4. क्षुद्र / विशाल — नेताजी ने अपने जीवन को क्षुद्र कहा, पर उनका स्वप्न विशाल था।
  5. संपन्न / विपन्न — जिस देश में गृह-उद्योग फलते-फूलते हैं, वहाँ विपन्न परिवार भी धीरे-धीरे संपन्न बनने लगते हैं।
  6. अकर्मण्य / कर्मठ — अवसर अकर्मण्य की प्रतीक्षा नहीं करता, वह कर्मठ के हाथ लगता है।
  7. मरण / जीवन — जो जीवन किसी बड़े ध्येय के लिए बीता हो, उसका मरण भी ‘स्वर्ग समान’ हो जाता है।

आपकी बात — पृष्ठ 146पाठ से आगे

पाठ से आगे
प्र.26(क) आपने सुभाषचंद्र बोस के स्वप्न के बारे में जाना। आप अपने विद्यालय, राज्य और देश के बारे में कैसे स्वप्न देखते हैं? लिखिए।
उत्तर

विद्यालय — मैं ऐसे विद्यालय का स्वप्न देखता हूँ जहाँ किसी विद्यार्थी को उसकी जाति, भाषा या घर की स्थिति के कारण अलग न समझा जाए, पुस्तकालय और खेल का मैदान सबके लिए खुला हो, और पीछे रह गए साथी को सब साथ लेकर चलें।
राज्य — मैं चाहता हूँ कि मेरे राज्य के हर गाँव तक अच्छा विद्यालय, चिकित्सालय और सड़क पहुँचे, और यहाँ के कारीगरों को अपना सामान बेचने के लिए बड़ा बाज़ार मिले।
देश — मैं ऐसे भारत का स्वप्न देखता हूँ जो अपनी ज़रूरत की चीज़ें स्वयं बनाए, जहाँ स्त्री और पुरुष को हर क्षेत्र में समान अवसर हो, और जिसे दुनिया — नेताजी के शब्दों में — ‘आदर्श-राष्ट्र के रूप में गण्य’ माने।
प्र.27(ख) हमें बड़े संघर्षों के बाद स्वतंत्रता मिली है। अपनी इस स्वतंत्रता को बनाए रखने के लिए हम अपने स्तर पर क्या-क्या कर सकते हैं? लिखिए।
उत्तर

स्वतंत्रता को हर पीढ़ी को अपने आचरण से बनाए रखना पड़ता है। अपने स्तर पर हम ये काम कर सकते हैं —

  • अपने कर्तव्य निभाना — नियमों का पालन और सार्वजनिक संपत्ति की देखभाल।
  • सोच-समझकर मानना — कोई बात बिना जाँचे न मानना, न आगे बढ़ाना।
  • भेदभाव न करना और न सहना — जाति या स्त्री-पुरुष के आधार पर।
  • श्रम का सम्मान करना और अपना काम स्वयं करना।
  • स्वदेशी को अपनाना — अपने क्षेत्र के कारीगरों और गृह-उद्योगों का सामान लेना।
  • स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास जानना और दूसरों को बताना।

मिलान कीजिए — पृष्ठ 147पाठ से आगे

पाठ से आगे
प्र.28(क) नीचे स्तंभ 1 में स्वतंत्रता सेनानियों से संबंधित कुछ तथ्य दिए गए हैं और स्तंभ 2 में स्वतंत्रता सेनानियों के नाम दिए गए हैं। तथ्यों का स्वतंत्रता सेनानियों के नाम से रेखा खींचकर सही मिलान कीजिए। इसके लिए आप अपने शिक्षकों, अभिभावकों और पुस्तकालय तथा इंटरनेट की सहायता ले सकते हैं।
क्रमस्तंभ 1स्तंभ 2
1.8 अप्रैल, 1929 को ‘सेंट्रल असेंबली’ में बम फेंकने वाले क्रांतिकारी, ‘शहीद-ए-आज़म’ के नाम से जाने जाते हैं।1. सरदार वल्लभभाई पटेल
2.‘स्वराज पार्टी’ के संस्थापकों में से एक, सुभाषचंद्र बोस के राजनीतिक गुरु कहे जाते हैं।2. महात्मा गाँधी
3.जेल में क्रांतिकारियों के साथ राजबंदियों के समान व्यवहार न होने के कारण क्रांतिकारियों ने 13 जुलाई 1929 से भूख हड़ताल शुरू कर दी। अनशन के तिरसठवें दिन जेल में इनका देहांत हो गया।3. चंद्रशेखर आजाद
4.इनके जन्मदिवस पर ‘अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस’ मनाया जाता है।4. चित्तरंजन दास
5.नर्मदा नदी के तट पर इनकी एक विशाल प्रतिमा स्थापित है। जिसे ‘स्टैच्यू ऑफ यूनिटी’ कहा जाता है।5. जतिन दास
6.1921 में असहयोग आंदोलन में गिरफ्तार होने पर न्यायाधीश ने इनसे पिता का नाम पूछा तो इन्होंने कहा— “मेरा नाम आजाद है, पिता का नाम स्वतंत्रता और पता कारावास है।”6. भगत सिंह
उत्तर
स्तंभ 1 (तथ्य)स्तंभ 2 (सेनानी)
1. सेंट्रल असेंबली में बम, ‘शहीद-ए-आज़म’6. भगत सिंह
2. ‘स्वराज पार्टी’ के संस्थापक, बोस के राजनीतिक गुरु4. चित्तरंजन दास
3. 13 जुलाई 1929 से भूख हड़ताल, तिरसठवें दिन देहांत5. जतिन दास
4. जन्मदिवस पर ‘अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस’2. महात्मा गाँधी
5. नर्मदा तट पर ‘स्टैच्यू ऑफ यूनिटी’1. सरदार वल्लभभाई पटेल
6. “मेरा नाम आजाद है, पिता का नाम स्वतंत्रता…”3. चंद्रशेखर आजाद

संक्षेप में — 1 → 6, 2 → 4, 3 → 5, 4 → 2, 5 → 1, 6 → 3.

प्र.29(ख) इनमें से एक स्वतंत्रता सेनानी का नाम ‘तरुण के स्वप्न’ पाठ में भी आया है। उसे पहचान कर लिखिए।
उत्तर

चित्तरंजन दास।

“हमारे नेता स्वर्गीय देशबंधु चित्तरंजन दास ने भी एक स्वप्न देखा था। वही स्वप्न उनकी शक्ति का उत्स बना और उनके आनंद का निर्झर रहा। उनके स्वप्न के उत्तराधिकारी आज हम हैं।”

पाठ के आरंभ में ही नेताजी उनका नाम लेते हैं। मिलान वाली तालिका में भी उनका परिचय है — ‘स्वराज पार्टी’ के संस्थापकों में से एक और सुभाषचंद्र बोस के राजनीतिक गुरु।

सर्वांगीण स्वाधीन संपन्न समाज के लिए प्रयास — पृष्ठ 147पाठ से आगे

पाठ से आगे
प्र.30नेताजी सुभाषचंद्र बोस और अन्य स्वतंत्रता सेनानियों ने स्वाधीन संपन्न समाज की स्थापना के लिए अपने समय में अनेक प्रयास किए। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात इस दिशा में क्या-क्या उल्लेखनीय प्रयत्न किए गए हैं? अपनी सामाजिक अध्ययन की पाठ्यपुस्तक, अपने अनुभवों एवं पुस्तकालय की सहायता से लिखिए।
उत्तर

स्वतंत्रता के बाद नेताजी की हर शर्त की दिशा में ये प्रमुख प्रयत्न हुए —

नेताजी की शर्तस्वतंत्रता के बाद हुए प्रयत्न
व्यक्ति सब दृष्टियों से मुक्त हो1950 में लागू संविधान ने सभी नागरिकों को मूल अधिकार दिए — समानता, स्वतंत्रता, शोषण के विरुद्ध अधिकार और संवैधानिक उपचारों का अधिकार।
जातिभेद का स्थान न होसंविधान में अस्पृश्यता का अंत (अनुच्छेद 17); शिक्षा और नौकरियों में अनुसूचित जाति एवं जनजाति के लिए आरक्षण।
नारी को समान अधिकारस्त्री-पुरुष को समान मताधिकार पहले ही चुनाव से; उत्तराधिकार तथा विवाह संबंधी क़ानूनों में सुधार; पंचायतों और नगर निकायों में महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित।
अर्थ की विषमता न होपंचवर्षीय योजनाएँ, भूमि-सुधार, बैंकों का राष्ट्रीयकरण, हरित क्रांति और श्वेत क्रांति, तथा रोज़गार एवं खाद्य-सुरक्षा की योजनाएँ।
सबको शिक्षा और उन्नति का समान सुअवसरशिक्षा का अधिकार — 6 से 14 वर्ष के बच्चों के लिए निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा; मध्याह्न भोजन; ‘सर्व शिक्षा अभियान’ जैसे कार्यक्रम।
श्रम और कर्म की मर्यादाश्रमिकों के लिए क़ानून, न्यूनतम मज़दूरी, बाल-श्रम पर रोक, और कुटीर तथा लघु उद्योगों को बढ़ावा।
स्वदेशी समाज का यंत्र / आत्मनिर्भरताइस्पात, अंतरिक्ष, रक्षा और सूचना-प्रौद्योगिकी में अपनी क्षमता का विकास — पाठ के आरंभ के चित्र में भी भारतीय रेल, इसरो का रॉकेट, पवन-चक्कियाँ और यूपीआई दिखाए गए हैं।

स्त्री सशक्तीकरण — पृष्ठ 148पाठ से आगे

पाठ से आगे
प्र.31(क) सुभाषचंद्र बोस ने स्त्रियों के लिए समान अधिकार की बात की है। अपने अनुभवों के आधार पर बताइए कि उन्हें कौन-कौन से विशेषाधिकार राज्य की ओर से दिए गए हैं?
उत्तर

राज्य की ओर से स्त्रियों को ये प्रमुख विशेषाधिकार दिए गए हैं —

  • पंचायत और नगर निकायों में आरक्षण — स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित हैं, इसीलिए गाँव-गाँव में महिला सरपंच और पार्षद दिखती हैं।
  • मातृत्व अवकाश और सुविधाएँ — नौकरी करने वाली स्त्री को संतान के जन्म पर वेतन सहित अवकाश।
  • शिक्षा में सहायता — बालिकाओं के लिए निःशुल्क शिक्षा, छात्रवृत्ति, साइकिल तथा छात्रावास जैसी योजनाएँ।
  • सुरक्षा संबंधी व्यवस्थाएँ — कार्यस्थल पर उत्पीड़न के विरुद्ध क़ानून, महिला थाना और हेल्पलाइन, तथा रात में महिला कर्मचारी के लिए वाहन की व्यवस्था।
  • समान वेतन और संपत्ति में समान अधिकार — समान कार्य के लिए समान वेतन; पैतृक संपत्ति में बेटी को बेटे के बराबर हिस्सा।
  • रोज़ की छोटी सुविधाएँ — बसों तथा रेलगाड़ियों में आरक्षित सीटें, अलग डिब्बा, और सरकारी कार्यालयों में अलग पंक्ति।
प्र.32(ख) सुभाषचंद्र बोस ने ‘आजाद हिंद फौज’ का नेतृत्व किया था। उसमें एक टुकड़ी स्त्रियों की भी थी। उस टुकड़ी का नाम पता लगाकर लिखिए। उस टुकड़ी की भूमिका क्या थी? यह भी बताइए।
उत्तर

उस टुकड़ी का नाम था — रानी झाँसी रेजिमेंट (झाँसी की रानी रेजिमेंट)।

  • कब और कहाँ — सन् 1943 में सिंगापुर में इसकी घोषणा हुई। इसमें दक्षिण-पूर्व एशिया में बसे भारतीय परिवारों की लड़कियाँ और स्त्रियाँ स्वेच्छा से भर्ती हुईं।
  • नाम क्यों — 1857 में अंग्रेज़ों से लड़ने वाली रानी लक्ष्मीबाई के नाम पर, ताकि सैनिकों को यह याद रहे कि भारत की स्त्री पहले भी युद्ध-भूमि में उतर चुकी है।
  • नेतृत्व — इसकी कमान कैप्टन लक्ष्मी सहगल ने सँभाली, जो पेशे से चिकित्सक थीं।
  • भूमिका — इसकी सैनिकों ने पुरुष सैनिकों की तरह ही सैन्य प्रशिक्षण लिया — कवायद, हथियार चलाना और शिविर का अनुशासन। इनका काम युद्ध में भाग लेने के लिए तैयार रहना, घायलों की चिकित्सा-सेवा करना और सैनिकों तथा प्रवासी भारतीयों में उत्साह जगाना था।

आपके प्रिय स्वतंत्रता सेनानी — पृष्ठ 148पाठ से आगे

पाठ से आगे
प्र.33आप किस स्वतंत्रता सेनानी के कार्यों व विचारों से प्रभावित हैं? कारण सहित लिखिए और अभिनय (रोल प्ले) करते हुए उनके विचारों को कक्षा में प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर
“मैं नेताजी सुभाषचंद्र बोस से सबसे अधिक प्रभावित हूँ। जिस कार्य ने मुझे प्रभावित किया वह है ‘आजाद हिंद फौज’ का गठन — उन्होंने भारत से बाहर रहकर, बिखरे हुए भारतीयों को जोड़कर एक सेना खड़ी कर दी, और उसमें स्त्रियों की भी टुकड़ी बनाई। उनका जो विचार मुझे सबसे अच्छा लगता है वह इसी पाठ में है — ‘आलसी तथा अकर्मण्य के लिए कोई स्थान नहीं रहेगा’। इससे मैंने यह सीखा कि बड़े सपने देखना काफ़ी नहीं, उसके लिए रोज़ का काम भी करना पड़ता है। इसीलिए मैंने तय किया है कि अपना काम टालूँगा नहीं। रोल प्ले में मैं उनके भाषण का अंतिम भाग प्रस्तुत करूँगा — ‘हे मेरे तरुण भाइयो! …यह स्वप्न मैं तुम्हें उपहारस्वरूप देता हूँ— स्वीकार करो।’”

“तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूँगा।” — पृष्ठ 148पाठ से आगे

पाठ से आगे
प्र.34ब्रिटिश शासन के विरुद्ध संघर्ष में 1944 में सुभाषचंद्र बोस ने ‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूँगा’ नारे के माध्यम से आह्वान किया था। स्वाधीनता संग्राम के दौरान और भी बहुत से नारे दिए गए। ये नारे स्वतंत्रता सेनानियों के अदम्य साहस, निर्भीकता और देश-प्रेम को दर्शाते हैं।
नीचे स्तंभ 1 में कुछ नारे दिए गए हैं। नारों के सामने लिखिए कि यह किसके द्वारा दिया गया? आप पुस्तकालय या इंटरनेट की सहायता भी ले सकते हैं।
नारास्वतंत्रता सेनानी
स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है। ………… 
करो या मरो ………… 
मैं आजाद हूँ, आजाद रहूँगा और आजाद ही मरूँगा ………… 
इंकलाब जिंदाबाद, साम्राज्यवाद मुर्दाबाद ………… 
पूर्ण स्वराज ………… 
उत्तर
नारास्वतंत्रता सेनानी
स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है।बाल गंगाधर तिलक
करो या मरोमहात्मा गाँधी
मैं आजाद हूँ, आजाद रहूँगा और आजाद ही मरूँगाचंद्रशेखर आजाद
इंकलाब जिंदाबाद, साम्राज्यवाद मुर्दाबादभगत सिंह (और उनके साथी)
पूर्ण स्वराजजवाहरलाल नेहरू (कांग्रेस का लाहौर अधिवेशन, 1929)

परियोजना कार्य — पृष्ठ 149पाठ से आगे

पाठ से आगे
प्र.35आप सभी राज्यों के स्वतंत्रता सेनानियों के विषय में पढ़कर उनमें से 10 महिला एवं 10 पुरुष स्वतंत्रता सेनानियों के चित्रों का संग्रह करके एक संग्रहिका तैयार कीजिए। चित्रों के नीचे उनके विशेष योगदान के बारे में एक-दो वाक्य भी लिखिए। अपनी संग्रहिका तैयार करते समय ध्यान रखिए कि आप किसी भी राज्य से एक से अधिक व्यक्ति न चुनें।
उत्तर

यह हाथ से करने वाला काम है। शर्त सबसे महत्वपूर्ण है — कुल 20 सेनानी, 10 महिला और 10 पुरुष, और एक राज्य से केवल एक व्यक्ति। इसका अर्थ है कि आपको कम-से-कम 20 अलग-अलग राज्यों तक जाना पड़ेगा। इसीलिए पहले नाम चुनिए, चित्र बाद में।

नमूना प्रविष्टियाँ (आप इन्हें अपनी सूची के लिए आधार बना सकते हैं, पर राज्य दोहराइए नहीं) —
नामराज्य / क्षेत्रविशेष योगदान (एक वाक्य में)
रानी गाइदिन्ल्यूमणिपुर / नागालैंड क्षेत्रकिशोरावस्था में ही अंग्रेज़ी शासन के विरुद्ध आंदोलन का नेतृत्व किया और लंबा कारावास भोगा।
मातंगिनी हाजरापश्चिम बंगालभारत छोड़ो आंदोलन में तिरंगा थामे जुलूस का नेतृत्व करते हुए गोली लगने पर भी झंडा नहीं गिरने दिया।
कैप्टन लक्ष्मी सहगलतमिलनाडुआजाद हिंद फौज की ‘रानी झाँसी रेजिमेंट’ की कमान सँभाली।
कित्तूर रानी चेन्नम्माकर्नाटक1824 में अंग्रेज़ों के विरुद्ध सशस्त्र प्रतिरोध करने वाली आरंभिक शासकों में से एक।
भगत सिंहपंजाबसेंट्रल असेंबली में बम फेंककर बहरी सरकार तक अपनी बात पहुँचाई; ‘शहीद-ए-आज़म’ कहलाए।
बिरसा मुंडाझारखंड‘उलगुलान’ आंदोलन से जनजातीय समाज को अंग्रेज़ी शासन और भू-व्यवस्था के विरुद्ध संगठित किया।
सरदार वल्लभभाई पटेलगुजरातबारदोली सत्याग्रह का नेतृत्व और स्वतंत्रता के बाद रियासतों का भारत में विलय।
सुभाषचंद्र बोसओड़िशा (जन्म — कटक)‘आजाद हिंद फौज’ का नेतृत्व और ‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूँगा’ का आह्वान।
इसी तरह शेष नाम अलग-अलग राज्यों से चुनकर बीस पूरे कीजिए।

साझी समझ — पृष्ठ 150पाठ से आगे · ‘झरोखे से’ — गृहउद्योग के विषय में नेताजी का एक पत्र (पृष्ठ 149)

पाठ से आगे
प्र.36उपर्युक्त पत्र में नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने गृह एवं कुटीर उद्योग की बात की है। यह पत्र देश की स्वतंत्रता से पहले लिखा गया था। अपने आस-पास के गृह एवं कुटीर उद्योगों के विषय में अपने साथियों के साथ चर्चा कीजिए।
उत्तर

हमारे आस-पास कई गृह एवं कुटीर उद्योग चलते हैं — अचार-पापड़ बनाना, अगरबत्ती और मोमबत्ती बनाना, मिट्टी के दीये और बरतन, टोकरी-चटाई बुनना, सिलाई-कढ़ाई। इनमें पूँजी कम लगती है, काम जल्दी सीखा जा सकता है और परिवार के लोग फुरसत के समय में घर पर ही कर लेते हैं — ठीक वैसे ही जैसे नेताजी ने अपने पत्र में मिट्टी के खिलौनों और सीप के बटनों के बारे में लिखा था। इनकी सबसे बड़ी कठिनाई माल बेचना है। आज स्वयं सहायता समूह, सहकारी समितियाँ और कारीगर मेले इसमें मदद करते हैं, जैसा काम नेताजी की ‘समिति’ करने वाली थी।

खोजबीन के लिए — पृष्ठ 150पाठ से आगे

पाठ से आगे
प्र.37नीचे दी गई इंटरनेट कड़ी का प्रयोग करके आप सुभाषचंद्र बोस पर आधारित फिल्म देख सकते हैं।
• ‘आजाद हिंद फौज’ के विषय में और अधिक जानकारी जुटाइए और अपनी कक्षा में प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर

आजाद हिंद फौज — प्रस्तुति के मुख्य बिंदु

  • दूसरे विश्वयुद्ध के समय दक्षिण-पूर्व एशिया में बनी; अंग्रेज़ी में इसे Indian National Army (आई.एन.ए.) कहते हैं।
  • सन् 1943 में नेताजी ने इसका नेतृत्व सँभाला और ‘आजाद हिंद’ की अस्थायी सरकार बनाई।
  • इसमें गांधी, नेहरू और आजाद ब्रिगेड के साथ स्त्रियों की रानी झाँसी रेजिमेंट भी थी।
  • इसके नारे थे — ‘दिल्ली चलो’, ‘जय हिंद’ और ‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूँगा’।
  • युद्ध के बाद लाल क़िले में इसके अधिकारियों पर चले मुक़दमों ने पूरे देश में जनभावना जगा दी।

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