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NCERT Solutions for Class 8 Hindi Chapter 5 कबीर के दोहे (PDF) – 2027

NCERT Solutions for Class 8 Hindi Chapter 5 कबीर के दोहे – step-by-step answers to every exercise and in-text question of the chapter, as per the latest NCERT syllabus for 2027. Read them online or download the free question-answer PDF.

पाठ 5 में संत कबीर के आठ दोहे संकलित हैं। दो-दो पंक्तियों की इन छोटी रचनाओं में कबीर सत्य, गुरु, संतुलित वाणी, आलोचना, विवेक और संगति जैसे बड़े विषयों को खजूर के पेड़, सूप, साबुन और पंछी जैसे रोज़ के चित्रों के सहारे कह जाते हैं — इसीलिए ये दोहे कहावतों की तरह लोगों की ज़बान पर चढ़ गए। हर प्रश्न में पहले वह उत्तर है जो कॉपी में लिखना है; कारण, भाव और अतिरिक्त जानकारी ‘विस्तार से समझिए’ में है।

NCERT Solutions for Class 8 Hindi Chapter 5 कबीर के दोहे PDF

All the answers are on this page below. The PDF also explains every answer – why it is right and how to check it – so download it for revision.

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NCERT Solutions for Class 8 Hindi Chapter 5 कबीर के दोहे – Questions and Answers

All questions of the chapter are answered below, in the order of the book – in-text questions, activities and the end-of-chapter exercises. Each answer is written the way you would write it in the exam.

मेरी समझ से — पृष्ठ 64-66पाठ से

पाठ से
प्र.1(क) निम्नलिखित प्रश्नों के उपयुक्त उत्तर के सम्मुख तारा (★) बनाइए। कुछ प्रश्नों के एक से अधिक उत्तर भी हो सकते हैं।
(1) “गुरु गोविंद दोऊ खड़े काके लागौं पाँय। बलिहारी गुरु आपने गोविंद दियो बताय॥” इस दोहे में किसके विषय में बताया गया है?
• श्रम का महत्व
• गुरु का महत्व
• ज्ञान का महत्व
• भक्ति का महत्व
उत्तर

★ गुरु का महत्व

कारण: शिष्य गोविंद (ईश्वर) से पहले गुरु के चरण छूता है, क्योंकि ईश्वर तक का रास्ता गुरु ने ही बताया — ‘बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय।’

प्र.2(2) “अति का भला न बोलना अति का भला न चूप। अति का भला न बरसना अति की भली न धूप॥” इस दोहे का मूल संदेश क्या है?
• हमेशा चुप रहने में ही हमारी भलाई है
• बारिश और धूप से बचना चाहिए
• हर परिस्थिति में संतुलन होना आवश्यक है
• हमेशा मधुर वाणी बोलनी चाहिए
उत्तर

★ हर परिस्थिति में संतुलन होना आवश्यक है।

कारण: दोहा कहता है कि न बहुत बोलना भला है, न बहुत चुप रहना — जैसे न बहुत वर्षा भली है, न बहुत धूप। यानी हर बात में ‘अति’ से बचकर संतुलन रखना चाहिए।

प्र.3(3) “बड़ा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर। पंथी को छाया नहीं फल लागै अति दूर॥” यह दोहा किस जीवन कौशल को विकसित करने पर बल देता है?
• समय का सदुपयोग करना
• दूसरों के काम आना
• परिश्रम और लगन से काम करना
• सभी के प्रति उदार रहना
उत्तर

★ दूसरों के काम आना (मुख्य उत्तर)
★ सभी के प्रति उदार रहना (यह भी सही है)

कारण: खजूर का पेड़ ऊँचा है, पर राही को न छाया देता है, न उसके फल हाथ आते हैं। बड़प्पन तभी सार्थक है जब वह दूसरों के काम आए। पाठ की मिलान-तालिका में भी इस दोहे का अर्थ दिया है — ‘बड़ा होने के साथ व्यक्ति को उदार भी होना चाहिए।’

प्र.4(4) “ऐसी बानी बोलिए मन का आपा खोय। औरन को सीतल करै आपहुँ सीतल होय॥” इस दोहे के अनुसार मधुर वाणी बोलने का सबसे बड़ा लाभ क्या है?
• लोग हमारी प्रशंसा और सम्मान करने लगते हैं
• दूसरों और स्वयं को मानसिक शांति मिलती है
• किसी से विवाद होने पर उसमें जीत हासिल होती है
• सुनने वालों का मन इधर-उधर भटकने लगता है
उत्तर

★ दूसरों और स्वयं को मानसिक शांति मिलती है।

कारण: ‘औरन को सीतल करै, आपहुँ सीतल होय’ — अहंकार छोड़कर बोली गई मीठी वाणी सुनने वाले को भी शीतलता (शांति) देती है और बोलने वाले को भी।

प्र.5(5) “साँच बराबर तप नहीं झूठ बराबर पाप। जाके हिरदे साँच है ता हिरदे गुरु आप॥” इस दोहे से क्या निष्कर्ष निकाला जा सकता है?
• सत्य और झूठ में कोई अंतर नहीं होता है
• सत्य का पालन करना किसी साधना से कम नहीं है
• बाहरी परिस्थितियाँ ही जीवन में सफलता तय करती हैं
• सत्य महत्वपूर्ण जीवन मूल्य है जिससे हृदय प्रकाशित होता है
उत्तर

★ सत्य का पालन करना किसी साधना से कम नहीं है।
★ सत्य महत्वपूर्ण जीवन मूल्य है जिससे हृदय प्रकाशित होता है।

कारण: कबीर सत्य को तप (साधना) के बराबर मानते हैं, और कहते हैं कि जिसके हृदय में सत्य है, उसी हृदय में गुरु (ज्ञान का प्रकाश) स्वयं बसते हैं।

प्र.6(6) “निंदक नियरे राखिए आँगन कुटी छवाय। बिन पानी साबुन बिना निर्मल करै सुभाय॥” यहाँ जीवन में किस दृष्टिकोण को अपनाने की सलाह दी गई है?
• आलोचना से बचना चाहिए
• आलोचकों को दूर रखना चाहिए
• आलोचकों को पास रखना चाहिए
• आलोचकों की निंदा करनी चाहिए
उत्तर

★ आलोचकों को पास रखना चाहिए।

कारण: ‘निंदक नियरे राखिए’ — निंदक (आलोचक) को आँगन में कुटिया छवाकर पास रखिए, क्योंकि वह बिना पानी और साबुन के हमारा स्वभाव निर्मल कर देता है।

प्र.7(7) “साधू ऐसा चाहिए जैसा सूप सुभाय। सार-सार को गहि रहै थोथा देइ उड़ाय॥” इस दोहे में ‘सूप’ किसका प्रतीक है?
• मन की कल्पनाओं का
• सुख-सुविधाओं का
• विवेक और सूझबूझ का
• कठोर और क्रोधी स्वभाव का
उत्तर

★ विवेक और सूझबूझ का।

कारण: सूप अनाज का सार (भरा दाना) रख लेता है और थोथा (हल्का भूसा) उड़ा देता है। अच्छे और बेकार को अलग पहचानने की यही शक्ति विवेक है।

प्र.8(ख) हो सकता है कि आपके समूह के साथियों ने अलग-अलग उत्तर चुने हों। अपने मित्रों के साथ चर्चा कीजिए कि आपने ये उत्तर ही क्यों चुने?
उत्तर

“हमारे समूह में प्रश्न 3 पर मतभेद था — तीन साथियों ने ‘दूसरों के काम आना’ चुना और दो ने ‘सभी के प्रति उदार रहना’। चर्चा में हमने पाया कि दोनों एक ही बात के दो रूप हैं — उदारता भाव है और दूसरों के काम आना उसका व्यवहार। ‘परिश्रम और लगन से काम करना’ किसी ने नहीं चुना, क्योंकि दोहे में परिश्रम की बात ही नहीं है। हर साथी ने अपने उत्तर के साथ दोहे की वह पंक्ति भी बताई जिसके आधार पर उसने उसे चुना था।”

मिलकर करें मिलान — पृष्ठ 66-67पाठ से

पाठ से
प्र.1(क) पाठ से चुनकर कुछ पंक्तियाँ नीचे स्तंभ 1 में दी गई हैं। अपने समूह में इन पर चर्चा कीजिए और इन्हें स्तंभ 2 में दिए गए इनके सही अर्थ या संदर्भ से मिलाइए। इसके लिए आप शब्दकोश, इंटरनेट या अपने शिक्षकों की सहायता ले सकते हैं।
क्रमस्तंभ 1स्तंभ 2
1.गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागौं पाँय।1. सत्य का पालन कठिन है और झूठ पाप के समान है।
2.अति का भला न बोलना, अति का भला न चूप।2. बड़ा होने के साथ व्यक्ति को उदार भी होना चाहिए।
3.ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोय।3. गुरु शिष्य का मार्गदर्शन करते हैं और शिष्य गुरु का आदर करते हैं।
4.निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय।4. मन को नियंत्रित करना और सही दिशा में ले जाना महत्वपूर्ण है।
5.साधू ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय।5. जीवन में संतुलन महत्वपूर्ण है।
6.कबिरा मन पंछी भया, भावै तहवाँ जाय।6. हमें मधुर वाणी बोलनी चाहिए जिससे मन को शांति प्राप्त हो सके।
7.साँच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप।7. विवेकशील व्यक्ति को अच्छे और बुरे की पहचान होती है।
8.बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर।8. आलोचकों को अपने पास रखना चाहिए। वे हमें हमारी गलतियाँ बताते हैं।
उत्तर

सही मिलान: 1 → 3, 2 → 5, 3 → 6, 4 → 8, 5 → 7, 6 → 4, 7 → 1, 8 → 2

स्तंभ 1 (पंक्ति)स्तंभ 2 (सही अर्थ)क्यों
1. गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागौं पाँय।3. गुरु शिष्य का मार्गदर्शन करते हैं और शिष्य गुरु का आदर करते हैं।शिष्य पहले गुरु के चरण छूता है, क्योंकि गोविंद तक का रास्ता गुरु ने बताया।
2. अति का भला न बोलना, अति का भला न चूप।5. जीवन में संतुलन महत्वपूर्ण है।दोनों अतियाँ — बहुत बोलना और बिलकुल चुप रहना — समान रूप से हानिकारक हैं।
3. ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोय।6. हमें मधुर वाणी बोलनी चाहिए जिससे मन को शांति प्राप्त हो सके।‘सीतल’ शब्द ही शांति की ओर संकेत करता है — दूसरों की भी, अपनी भी।
4. निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय।8. आलोचकों को अपने पास रखना चाहिए। वे हमें हमारी गलतियाँ बताते हैं।‘नियरे’ का अर्थ ही निकट है; ‘कुटी छवाय’ उसे स्थायी रूप से पास बसाना है।
5. साधू ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय।7. विवेकशील व्यक्ति को अच्छे और बुरे की पहचान होती है।सूप सार रखता है और थोथा उड़ाता है — यही पहचानने की शक्ति विवेक है।
6. कबिरा मन पंछी भया, भावै तहवाँ जाय।4. मन को नियंत्रित करना और सही दिशा में ले जाना महत्वपूर्ण है।पंछी की तरह मन जहाँ चाहे उड़ जाता है, इसीलिए उसे दिशा देनी पड़ती है।
7. साँच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप।1. सत्य का पालन कठिन है और झूठ पाप के समान है।सत्य को ‘तप’ कहना ही बताता है कि उसका पालन आसान नहीं।
8. बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर।2. बड़ा होने के साथ व्यक्ति को उदार भी होना चाहिए।खजूर ऊँचा है पर छाया और फल किसी को नहीं देता — ऊँचाई बिना उदारता व्यर्थ है।
प्र.2(ख) नीचे स्तंभ 1 में दी गई दोहों की पंक्तियों को स्तंभ 2 में दी गई उपयुक्त पंक्तियों से जोड़िए—
क्रमस्तंभ 1स्तंभ 2
1.गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागौं पाँय।1. बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करै सुभाय॥
2.अति का भला न बोलना, अति का भला न चूप।2. औरन को सीतल करै, आपहुँ सीतल होय॥
3.ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोय।3. जाके हिरदे साँच है, ता हिरदे गुरु आप॥
4.निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय।4. सार सार को गहि रहै, थोथा देइ उड़ाय॥
5.साधू ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय।5. पंथी को छाया नहीं, फल लागै अति दूर॥
6.कबिरा मन पंछी भया, भावै तहवाँ जाय।6. अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप॥
7.बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर।7. जो जैसी संगति करै, सो तैसा फल पाय॥
8.साँच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप।8. बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय॥
उत्तर

सही जोड़ी: 1 → 8, 2 → 6, 3 → 2, 4 → 1, 5 → 4, 6 → 7, 7 → 5, 8 → 3

स्तंभ 1 (पहली पंक्ति)स्तंभ 2 (दूसरी पंक्ति)
1. गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागौं पाँय।8. बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय॥
2. अति का भला न बोलना, अति का भला न चूप।6. अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप॥
3. ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोय।2. औरन को सीतल करै, आपहुँ सीतल होय॥
4. निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय।1. बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करै सुभाय॥
5. साधू ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय।4. सार सार को गहि रहै, थोथा देइ उड़ाय॥
6. कबिरा मन पंछी भया, भावै तहवाँ जाय।7. जो जैसी संगति करै, सो तैसा फल पाय॥
7. बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर।5. पंथी को छाया नहीं, फल लागै अति दूर॥
8. साँच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप।3. जाके हिरदे साँच है, ता हिरदे गुरु आप॥

पंक्तियों पर चर्चा — पृष्ठ 67पाठ से

पाठ से
प्र.1पाठ से चुनकर कुछ पंक्तियाँ नीचे दी गई हैं। इन्हें ध्यानपूर्वक पढ़िए और इन पर विचार कीजिए। आपको इनका क्या अर्थ समझ में आया? अपने विचार अपने समूह में साझा कीजिए और लिखिए—
(क) “कबिरा मन पंछी भया भावै तहवाँ जाय।
जो जैसी संगति करै सो तैसा फल पाय”
उत्तर

अर्थ: कबीर कहते हैं कि मन पंछी बन गया है — जहाँ उसका जी चाहता है, वहीं उड़ जाता है। पर जो व्यक्ति जैसी संगति करता है, उसे वैसा ही फल मिलता है।

मेरी समझ: मन चंचल है और उसे रोकना कठिन है, इसलिए हमें अपनी संगति सोच-समझकर चुननी चाहिए। अच्छे मित्रों के साथ रहने से अच्छी आदतें और अच्छे परिणाम मिलते हैं, बुरी संगति से बुरे। इसी दोहे की दूसरी पंक्ति से कहावत बनी — ‘जैसा संग वैसा रंग’।

प्र.2(ख) “साँच बराबर तप नहीं झूठ बराबर पाप।
जाके हिरदे साँच है ता हिरदे गुरु आप॥”
उत्तर

अर्थ: सत्य के बराबर कोई तपस्या नहीं और झूठ के बराबर कोई पाप नहीं। जिसके हृदय में सत्य है, उसी के हृदय में गुरु स्वयं निवास करते हैं।

मेरी समझ: सच बोलना आसान नहीं — उसमें कभी-कभी डाँट या नुकसान भी सहना पड़ता है, इसलिए वह तप है। झूठ विश्वास तोड़ता है, इसलिए वह सबसे बड़ा दोष है। जो भीतर से सच्चा है, उसे सही राह अपने हृदय से ही मिल जाती है।

सोच-विचार के लिए — पृष्ठ 67-68पाठ से

पाठ से
प्र.1पाठ को पुनः ध्यान से पढ़िए, पता लगाइए और लिखिए—
(क) “गुरु गोविंद दोऊ खड़े काके लागौं पाँय।” इस दोहे में गुरु को गोविंद (ईश्वर) से भी ऊपर स्थान दिया गया है। क्या आप इससे सहमत हैं? अपने विचार लिखिए।
उत्तर

हाँ, मैं सहमत हूँ। शिष्य ईश्वर को तभी पहचान पाता है जब गुरु उसे रास्ता दिखाते हैं — ‘गोविंद दियो बताय’। इसलिए कृतज्ञता में पहला नमन गुरु को ही जाता है। कबीर यहाँ गुरु को ईश्वर तक पहुँचाने वाला होने के कारण पहला स्थान देते हैं। आज भी माता-पिता, शिक्षक या कोई भी व्यक्ति जो हमें सही राह दिखाए, हमारा गुरु है और सबसे पहले आदर का पात्र है।

प्र.2(ख) “बड़ा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर।” इस दोहे में कहा गया है कि सिर्फ बड़ा या संपन्न होना ही पर्याप्त नहीं है। बड़े या संपन्न होने के साथ-साथ मनुष्य में और कौन-कौन सी विशेषताएँ होनी चाहिए? अपने विचार साझा कीजिए।
उत्तर

बड़े या संपन्न होने के साथ मनुष्य में ये विशेषताएँ भी होनी चाहिए —

  • उदारता — अपने धन, ज्ञान या पद से दूसरों की मदद करना।
  • विनम्रता — बड़प्पन का अहंकार न करना।
  • सुलभता — छोटे से छोटा व्यक्ति भी बिना डरे उस तक पहुँच सके।
  • परोपकार — बरगद की छाया की तरह दूसरों के काम आना।
  • संवेदनशीलता — दूसरों की ज़रूरत और दुख को समझना।
प्र.3(ग) “ऐसी बानी बोलिए मन का आपा खोय।” क्या आप मानते हैं कि शब्दों का प्रभाव केवल दूसरों पर ही नहीं स्वयं पर भी पड़ता है? आपके बोले गए शब्दों ने आपके या किसी अन्य के स्वभाव या मनोदशा को कैसे परिवर्तित किया? उदाहरण सहित बताइए।
उत्तर

हाँ, शब्दों का प्रभाव बोलने वाले पर भी पड़ता है — ‘औरन को सीतल करै, आपहुँ सीतल होय।’ कठोर शब्द बोलने के बाद हमारा अपना मन भी अशांत और पछतावे से भरा रहता है, जबकि मीठे शब्द दोनों को शांति देते हैं।

उदाहरण (नमूना): मैच हारने पर मैंने गुस्से में मित्र से कहा — ‘तुम्हारे कारण हारे।’ वह उदास होकर चला गया और मेरा मन भी पूरी शाम खराब रहा। अगले दिन मैंने कहा — ‘कैच तो किसी से भी छूट सकता है, तुम्हारी बल्लेबाज़ी से ही हम इतनी दूर पहुँचे थे।’ उसका चेहरा खिल गया और मेरे मन का बोझ भी उतर गया।

प्र.4(ङ) “जो जैसी संगति करै सो तैसा फल पाय॥” हमारे विचारों और कार्यों पर संगति का क्या प्रभाव पड़ता है? उदाहरण सहित बताइए।
उत्तर

संगति का हमारे विचारों और कार्यों पर गहरा प्रभाव पड़ता है — ‘जो जैसी संगति करै, सो तैसा फल पाय।’ जिनके साथ हम रोज़ रहते हैं, उनकी भाषा, आदतें और सोच धीरे-धीरे हमारी बन जाती हैं। अच्छी संगति गलत काम पर टोकती है और आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है; बुरी संगति गलत काम को साधारण बना देती है।

उदाहरण (नमूना): हमारी कक्षा का एक विद्यार्थी गणित से घबराता था। वह ऐसे दो साथियों के साथ बैठने लगा जो रोज़ आधा घंटा अभ्यास करते थे। कुछ ही महीनों में उसने भी यह आदत अपना ली और उसके अंक काफ़ी बढ़ गए।

दोहे की रचना — पृष्ठ 68पाठ से

पाठ सेगतिविधि
प्र.1“अति का भला न बोलना, अति का भला न चूप।
अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप॥”
इन दोनों पंक्तियों पर ध्यान दीजिए। इन दोनों पंक्तियों के दो-दो भाग दिखाई दे रहे हैं। इन चारों भागों का पहला शब्द है ‘अति’। इस कारण इस दोहे में एक विशेष प्रभाव उत्पन्न हो गया है। आप ध्यान देंगे तो इस कविता में आपको ऐसी कई विशेषताएँ दिखाई देंगी, जैसे— दोनों की प्रत्येक पंक्ति को बोलने में एक-समान समय लगता है। अपने-अपने समूह में मिलकर पाठ में दिए गए दोहों की विशेषताओं की सूची बनाइए।

(क) दोहों की उन पंक्तियों को चुनकर लिखिए जिनमें—
(1) एक ही अक्षर से प्रारंभ होने वाले (जैसे— राजा, रस्सी, रात) दो या दो से अधिक शब्द एक साथ आए हैं।
उत्तर

ऐसी पंक्तियाँ (साथ-साथ आए, एक ही अक्षर से शुरू होने वाले शब्द मोटे अक्षरों में) —

  • “गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागौं पाँय।” — गुरु गोविंद
  • “निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय।” — निंदक नियरे
  • “साधू ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय।” — सूप सुभाय
  • “सार सार को गहि रहै, थोथा देइ उड़ाय॥” — सार सार
  • “कबिरा मन पंछी भया, भावै तहवाँ जाय।” — भया भावै
  • “जो जैसी संगति करै, सो तैसा फल पाय॥” — जो जैसी
प्र.2(2) एक शब्द एक साथ दो बार आया है। (जैसे— बार-बार)
उत्तर

“सार सार को गहि रहै, थोथा देइ उड़ाय॥” — यहाँ ‘सार’ शब्द साथ-साथ दो बार आया है।

प्र.3(3) लगभग एक जैसे शब्द, जिनमें केवल एक मात्रा भर का अंतर है (जैसे— जल, जाल) एक ही पंक्ति में आए हैं।
उत्तर
  • “बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करै सुभाय॥” — बिन / बिना (केवल ‘आ’ की मात्रा का अंतर)
  • “अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप॥” — का / की और भला / भली
प्र.4(4) एक ही पंक्ति में विपरीतार्थक शब्दों (जैसे— अच्छा-बुरा) का प्रयोग किया गया है।
उत्तर
  • “साँच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप।” — साँच × झूठ, तप × पाप
  • “अति का भला न बोलना, अति का भला न चूप।” — बोलना × चुप रहना
  • “अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप॥” — वर्षा × धूप
  • “सार सार को गहि रहै, थोथा देइ उड़ाय॥” — सार × थोथा, पकड़ना × उड़ा देना
प्र.5(5) किसी की तुलना किसी अन्य से की गई है। (जैसे— दूध जैसा सफेद)
उत्तर
  • “बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर।” — बड़े आदमी की तुलना खजूर के पेड़ से
  • “साधू ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय।” — साधु के स्वभाव की तुलना सूप से
  • “साँच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप।” — सत्य की तुलना तप से और झूठ की पाप से
प्र.6(6) किसी को कोई अन्य नाम दे दिया गया है। (जैसे— मुख चंद्र है)
उत्तर

“कबिरा मन पंछी भया, भावै तहवाँ जाय।”

यहाँ मन को ‘पंछी’ नाम दे दिया गया है — मन पंछी के समान नहीं कहा गया, बल्कि पंछी ही बन गया है।

प्र.7(7) किसी शब्द की वर्तनी थोड़ी अलग है। (जैसे— ‘चुप’ के स्थान पर ‘चूप’)
उत्तर

“अति का भला न चूप।” के अलावा ऐसे कुछ और शब्द —

दोहे का शब्दआज की हिंदी मेंपंक्ति
साँचसच / सत्यसाँच बराबर तप नहीं
हिरदेहृदयजाके हिरदे साँच है
दोऊदोनोंगुरु गोविंद दोऊ खड़े
पाँयपाँव / चरणकाके लागौं पाँय।
सीतलशीतलऔरन को सीतल करै
बानीवाणीऐसी बानी बोलिए
साधूसाधुसाधू ऐसा चाहिए
आपहुँस्वयं भीआपहुँ सीतल होय॥
नियरेनिकटनिंदक नियरे राखिए
सुभायस्वभावनिर्मल करै सुभाय॥
तहवाँवहींभावै तहवाँ जाय।
कबिराकबीरकबिरा मन पंछी भया
प्र.8(8) उदाहरण द्वारा कही गई बात को समझाया गया है।
उत्तर
  • “बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर। पंथी को छाया नहीं, फल लागै अति दूर॥” — बड़प्पन की बात खजूर के पेड़ के उदाहरण से।
  • “साधू ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय। सार सार को गहि रहै, थोथा देइ उड़ाय॥” — विवेक की बात सूप से अनाज फटकने के उदाहरण से।
  • “अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप॥” — संतुलन की बात वर्षा और धूप के उदाहरण से।
  • “निंदक नियरे राखिए… बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करै सुभाय॥” — आलोचना का लाभ बिना साबुन-पानी कपड़ा साफ़ होने के उदाहरण से।
प्र.9(ख) अपने समूह की सूची को कक्षा में सबके साथ साझा कीजिए।
उत्तर

यह गतिविधि है। सूची इस तरह बनाइए कि साझा करते समय हर बात का प्रमाण साथ हो।

विशेषतापाठ से उदाहरणक्या नाम है
एक ही अक्षर से शुरू होते शब्दनिंदक नियरे; सार सार; गुरु गोविंदअनुप्रास
शब्द का दोहरावसार सारपुनरुक्ति
विलोम शब्द एक पंक्ति मेंसाँच × झूठ; बोलना × चूपविलोम शब्दों का प्रयोग
एक मात्रा भर का अंतरबिन–बिना; भला–भलीमिलते-जुलते शब्द
तुलनाजैसे पेड़ खजूर; जैसा सूप सुभायउपमा
दूसरा नाम दे देनामन पंछी भयारूपक
उदाहरण से समझानाबिन पानी साबुन बिना…दृष्टांत
अलग वर्तनीचूप, साँच, हिरदे, सीतलबोलचाल के रूप
तुकपाँय–बताय, चूप–धूप, खोय–होयतुकांत
एक-सी लयहर पंक्ति बोलने में लगभग बराबर समयमात्रा का संतुलन

अनुमान और कल्पना से — पृष्ठ 68-69पाठ से

पाठ से
प्र.1अपने समूह में मिलकर चर्चा कीजिए—
(क) “गुरु गोविंद दोऊ खड़े काके लागौं पाँय।”
• यदि आपके सामने यह स्थिति होती तो आप क्या निर्णय लेते और क्यों?
• यदि संसार में कोई गुरु या शिक्षक न होता तो क्या होता?
उत्तर

• मेरा निर्णय: मैं भी पहले गुरु के चरण छूता, क्योंकि गोविंद (ईश्वर) को पहचानने की समझ गुरु ने ही दी है। जो हमें किसी बड़ी चीज़ तक पहुँचाता है, पहला धन्यवाद उसी का बनता है — इसमें ईश्वर का अनादर नहीं, ज्ञान का आदर है।

• गुरु या शिक्षक न होते तो — ज्ञान एक पीढ़ी से दूसरी तक नहीं पहुँच पाता; भाषा, लिपि, गिनती, खेती, दवा — सब हर बार शून्य से सीखना पड़ता। लोग केवल अपनी गलतियों से सीखते, जो बहुत धीमा और कभी-कभी खतरनाक रास्ता है। समाज अज्ञान और अंधविश्वास में ही रह जाता।

प्र.2(ख) “अति का भला न बोलना, अति का भला न चूप।”
• यदि कोई व्यक्ति बहुत अधिक बोलता है या बहुत चुप रहता है तो उसके जीवन पर क्या प्रभाव पड़ सकता है?
• यदि वर्षा आवश्यकता से अधिक या कम हो तो क्या परिणाम हो सकते हैं?
• आवश्यकता से अधिक मोबाइल या मल्टीमीडिया का प्रयोग करने से क्या परिणाम हो सकते हैं?
उत्तर

• बहुत बोलने या बहुत चुप रहने का असर — बहुत बोलने वाले की बात का महत्व घट जाता है, लोग उसे गंभीरता से नहीं लेते और बिना सोचे कही बातों से संबंध बिगड़ते हैं। बहुत चुप रहने वाला ज़रूरी बात भी नहीं कह पाता; उसकी परेशानी अनकही रह जाती है और लोग उसे गलत समझ लेते हैं।

• वर्षा अधिक या कम हो तो — अधिक वर्षा से बाढ़ आती है, मिट्टी बह जाती है और फ़सलें गल जाती हैं; कम वर्षा से सूखा पड़ता है और फ़सलें सूख जाती हैं। दोनों में नुकसान है।

• मोबाइल या मल्टीमीडिया की अति — आँखों और नींद पर बुरा असर, पढ़ाई में ध्यान न लगना, और परिवार, मित्रों व खेल के लिए समय घट जाना।

प्र.3(ग) “साँच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप।”
• झूठ बोलने पर आपके जीवन पर क्या प्रभाव पड़ सकता है?
• कल्पना कीजिए कि आपके शिक्षक ने आपके किसी गलत उत्तर के लिए अंक दे दिए हैं, ऐसी परिस्थिति में आप क्या करेंगे?
उत्तर

• झूठ का प्रभाव — एक झूठ को छिपाने के लिए कई झूठ बोलने पड़ते हैं। झूठ पकड़े जाने पर लोगों का विश्वास टूट जाता है, जो जल्दी वापस नहीं आता। मन में पकड़े जाने का डर और बेचैनी रहती है, और गलती सुधारने का अवसर भी खो जाता है।

• गलत उत्तर पर अंक मिल जाएँ तो — मैं स्वयं शिक्षक को बताऊँगा कि मेरा यह उत्तर गलत है और ये अंक मुझे नहीं मिलने चाहिए। अंक भले कम हों, पर मैं सही उत्तर सीख पाऊँगा और मेरे मन पर कोई बोझ नहीं रहेगा। कबीर के अनुसार यही सत्य का ‘तप’ है।

प्र.4(घ) “ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोय।”
• यदि सभी मनुष्य अपनी वाणी को मधुर और शांति देने वाली बना लें तो लोगों में क्या परिवर्तन आ सकते हैं?
• क्या कोई ऐसी परिस्थिति हो सकती है जहाँ कटु वचन बोलना आवश्यक हो? अनुमान लगाइए।
उत्तर

• सबकी वाणी मधुर हो जाए तो — झगड़े और कटुता घट जाएगी, लोग एक-दूसरे की बात ध्यान से सुनेंगे, घर और विद्यालय में आपसी विश्वास और प्रेम बढ़ेगा, और बोलने वालों को भी शांति मिलेगी — ‘आपहुँ सीतल होय’।

• कटु वचन कब आवश्यक — हाँ, कुछ स्थितियों में कठोर स्वर ज़रूरी हो सकता है — जैसे किसी के साथ अन्याय हो रहा हो, कोई तुरंत खतरे में हो, या बार-बार समझाने पर भी कोई गलत आदत न छोड़े। पर तब भी शब्द कठोर हों, अपमानजनक नहीं, और उनके पीछे अहंकार नहीं, सुधार की इच्छा हो।

प्र.5(ङ) “बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर।”
• यदि कोई व्यक्ति अपने बड़े होने का अहंकार रखता हो तो आप इस दोहे का उपयोग करते हुए उसे ‘बड़े होने या संपन्न होने’ का क्या अर्थ बताएँगे या समझाएँगे?
• खजूर, नारियल आदि ऊँचे वृक्ष अनुपयोगी नहीं होते हैं। वे किस प्रकार से उपयोगी हो सकते हैं? बताइए।
• आप अपनी कक्षा का कक्षा नायक या नायिका (मॉनीटर) चुनने के लिए किसी विद्यार्थी की किन-किन विशेषताओं पर ध्यान देंगे?
उत्तर

• अहंकारी व्यक्ति से कहूँगा — “बड़प्पन इससे नहीं नापा जाता कि आपके पास कितना है, बल्कि इससे कि आपसे कितनों का भला होता है। खजूर बहुत ऊँचा है, पर राही को न छाया देता है, न उसके फल हाथ आते हैं। ऐसा बड़प्पन किस काम का?”

• खजूर-नारियल की उपयोगिता — इनके फल (खजूर, नारियल-पानी, गिरी) भोजन हैं; नारियल से तेल निकलता है; पत्तों से चटाई, टोकरी, झाड़ू और छप्पर बनते हैं; जटा से रस्सी और तने से लकड़ी मिलती है।

• कक्षा नायक/नायिका में देखूँगा — सबकी बात सुनने का धैर्य, निष्पक्षता, ईमानदारी, समय की पाबंदी, कमज़ोर साथियों की मदद का स्वभाव और शांत स्वर में बात कहने की क्षमता।

प्र.6(च) “निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय।”
• यदि कोई आपकी गलतियों को बताता रहे तो आपको उससे क्या लाभ होगा?
• यदि समाज में कोई भी एक-दूसरे की गलतियाँ न बताए तो क्या होगा?
उत्तर

• गलतियाँ बताने वाले से लाभ — अपनी कमियाँ हमें स्वयं दिखाई नहीं देतीं; बताने वाला दर्पण का काम करता है। गलती जल्दी पकड़ में आ जाती है, इसलिए समय रहते सुधर जाती है और आदत नहीं बनती। धीरे-धीरे आलोचना सुनने का साहस और आत्मविश्वास भी बढ़ता है।

• कोई किसी की गलती न बताए तो — गलतियाँ दोहराई जाती रहेंगी और बढ़ती जाएँगी; लोग मुँह पर प्रशंसा और पीठ पीछे निंदा करेंगे; सुधार रुक जाएगा और समाज आगे नहीं बढ़ पाएगा।

प्र.7(छ) “साधू ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय।”
• कल्पना कीजिए कि आपके पास ‘सूप’ जैसी विशेषता है तो आपके जीवन में कौन-कौन से परिवर्तन आएँगे?
• यदि हम बिना सोचे-समझे हर बात को स्वीकार कर लें तो उसका हमारे जीवन पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
उत्तर

• ‘सूप’ जैसी विशेषता हो तो — मैं हर बात में से काम की बात रख लूँगा और बेकार छोड़ दूँगा: पढ़ाई में मुख्य बिंदु पहचान पाऊँगा, आलोचना में से सुधार की बात ले लूँगा, इंटरनेट की जाँची हुई सूचना मानूँगा और अफ़वाह छोड़ दूँगा, मित्रों की केवल अच्छी सलाह मानूँगा। मन भी हल्का रहेगा।

• बिना सोचे हर बात मान लेने का प्रभाव — हम दूसरों के कहने पर चलने लगेंगे, अफ़वाहों और गलत सूचनाओं में फँसेंगे और उन्हें आगे भी फैलाएँगे, गलत निर्णय लेंगे और लोग हमारा लाभ उठा सकेंगे।

प्र.8(ज) “कबिरा मन पंछी भया, भावै तहवाँ जाय।”
• यदि मन एक पंछी की तरह उड़ सकता तो आप उसे कहाँ ले जाना चाहते और क्यों?
• संगति का हमारे जीवन पर क्या-क्या प्रभाव पड़ सकता है?
उत्तर

• मन उड़ सकता तो (नमूना उत्तर) — मैं उसे हिमालय के किसी शांत गाँव में ले जाना चाहूँगा, क्योंकि शहर के शोर में मेरा मन दिनभर इधर-उधर भागता रहता है; शांति में मैं अपने भीतर की बात सुन पाऊँगा। फिर उसे पुस्तकालय में बिठाऊँगा, क्योंकि पंछी जिस पेड़ पर बैठता है, वैसा ही फल पाता है।

• संगति का प्रभाव — संगति हमारी आदतों, भाषा, व्यवहार और लक्ष्यों को बदल देती है। अच्छी संगति पढ़ने, खेलने और सही काम करने की प्रेरणा देती है; बुरी संगति गलत काम को ‘सब करते हैं’ कहकर साधारण बना देती है।

वाद-विवाद — पृष्ठ 70पाठ से

पाठ सेगतिविधि
प्र.1“अति का भला न बोलना, अति का भला न चूप।
अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप॥”
(क) इस दोहे का आज के समय में क्या महत्व है? इसके बारे में कक्षा में एक वाद-विवाद गतिविधि का आयोजन कीजिए। एक समूह के साथी इसके पक्ष में अपने विचार प्रस्तुत करेंगे और दूसरे समूह के साथी इसके विपक्ष में बोलेंगे। एक तीसरा समूह निर्णायक बन सकता है।
उत्तर

आज के समय में महत्व: यह दोहा आज और भी उपयोगी है, क्योंकि आज ‘अति’ के अवसर बहुत बढ़ गए हैं — मोबाइल और सोशल मीडिया पर बिना सोचे बहुत बोलना, गलत होते देखकर भी चुप रहना, ज़रूरत से ज़्यादा उपभोग। प्रकृति में भी अति वर्षा से बाढ़ और वर्षा की कमी से सूखा दिखता है। दोहा सिखाता है कि हर काम में संतुलन रखें।

आयोजन: विषय — “हर स्थिति में संतुलन ही सही रास्ता है।” तीन समूह — पक्ष, विपक्ष और निर्णायक; हर वक्ता को 2 मिनट।

प्र.2(ख) पक्ष और विपक्ष के समूह अपने-अपने मत के लिए तर्क प्रस्तुत करेंगे, जैसे—
• पक्ष – वाणी पर संयम रखना आवश्यक है।
• विपक्ष – अत्यधिक चुप रहना भी उचित नहीं है।
उत्तर

नमूना तर्क —

पक्ष — वाणी पर संयम आवश्यक हैविपक्ष — अत्यधिक चुप रहना भी उचित नहीं
बिना सोचे कही बात वापस नहीं ली जा सकती; तीर और बोल दोनों लौटते नहीं।अन्याय के समय चुप्पी अन्याय करने वाले का साथ देती है।
कम बोलने वाले की बात का वज़न अधिक होता है; लोग ध्यान से सुनते हैं।जो अपनी बात नहीं कहता, उसकी परेशानी किसी को पता नहीं चलती और समाधान भी नहीं मिलता।
संयम से बोलने पर झगड़े टलते हैं और सोचने का समय मिल जाता है।चुप्पी को कई बार सहमति मान लिया जाता है, जिससे गलतफ़हमी बढ़ती है।
‘ऐसी बानी बोलिए’ वाला दोहा भी यही कहता है — शब्द दूसरों को और स्वयं को शीतल करें।बहुत चुप रहने वाले में आत्मविश्वास और बोलने का अभ्यास दोनों घट जाते हैं।
प्र.3(ग) पक्ष और विपक्ष में प्रस्तुत तर्कों की सूची अपनी लेखन-पुस्तिका में लिख लीजिए।
उत्तर

सूची को उपयोगी बनाने के लिए इसे केवल वाक्यों की कतार मत बनाइए। चार खानों की तालिका बनाइए —

क्रमतर्कपक्ष / विपक्षउसका प्रमाण या उदाहरण
1बिना सोचे कही बात लौटती नहींपक्षगुस्से में कहा गया एक वाक्य वर्षों की मित्रता तोड़ देता है
2अन्याय पर चुप्पी अन्याय बढ़ाती हैविपक्षकक्षा में किसी को चिढ़ाया जा रहा हो और कोई न बोले

इसी ढाँचे में शेष तर्क भरते जाइए। अंत में दो पंक्तियों का अपना निष्कर्ष ज़रूर लिखिए — किस तर्क ने आपको सबसे अधिक प्रभावित किया और क्यों।

शब्द से जुड़े शब्द — पृष्ठ 70पाठ से

पाठ से
प्र.1नीचे दिए गए स्थानों में कबीर से जुड़े शब्द पाठ में से चुनकर लिखिए और अपने मित्रों के साथ चर्चा कीजिए—
बानी कबीर
पुस्तक का शब्द-जाल — सात खाने, जिनमें केवल ‘बानी’ पहले से भरा है।
उत्तर

पुस्तक में केंद्र के ‘कबीर’ से सात खाने जुड़े हैं और उनमें से एक में बानी पहले से भरा है। शेष छह खाने पाठ में आए शब्दों से इस तरह भरे जा सकते हैं —

दोहे बानी गुरु साँच निंदक साधू संगति कबीर
‘कबीर’ से जुड़े शब्द — बीच वाला ‘बानी’ पुस्तक में पहले से दिया गया है।

ये शब्द क्यों —

शब्दकबीर से क्या संबंध
बानी‘ऐसी बानी बोलिए’ — कबीर की सबसे बड़ी चिंता ही वाणी है।
दोहेकबीर की पहचान का छंद; पूरा पाठ आठ दोहों का है।
गुरु‘गुरु गोविंद दोऊ खड़े’ — कबीर के यहाँ गुरु का स्थान सबसे ऊँचा है।
साँच‘साँच बराबर तप नहीं’ — सत्य कबीर का केंद्रीय मूल्य है।
निंदक‘निंदक नियरे राखिए’ — आलोचक को अपना बनाने की सीख।
साधू‘साधू ऐसा चाहिए’ — कबीर का आदर्श व्यक्ति।
संगति‘जो जैसी संगति करै’ — जीवन का फल तय करने वाली चीज़।

दोहे और कहावतें — पृष्ठ 70-71पाठ से

पाठ से
प्र.1“कबिरा मन पंछी भया, भावै तहवाँ जाय।
जो जैसी संगति करै, सो तैसा फल पाय॥”
इस दोहे को पढ़कर ऐसा लगता है कि यह बात तो हमने पहले भी अनेक बार सुनी है। यह दोहा इतना अधिक प्रसिद्ध और लोकप्रिय है कि इसकी दूसरी पंक्ति लोगों के बीच कहावत— ‘जैसा संग वैसा रंग’ (व्यक्ति जिस संगति में रहता है, वैसा ही उसका व्यवहार और स्वभाव बन जाता है।) की तरह प्रयुक्त होती है। कहावतें ऐसे वाक्य होते हैं जिन्हें लोग अपनी बात को अधिक प्रभावशाली बनाने के लिए प्रयोग करते हैं। इसमें सामान्यतः जीवन के गहरे अनुभव को सरल और संक्षेप में बता दिया जाता है।
• अब आप ऐसी अन्य कहावतों का प्रयोग करते हुए अपने मन से कुछ वाक्य बनाकर लिखिए।
उत्तर

नमूना वाक्य —

कहावतअर्थवाक्य
जैसा संग वैसा रंगव्यक्ति अपनी संगति जैसा बन जाता हैपहले वह पढ़ाई से भागता था, पर अच्छे साथी मिलते ही रोज़ पुस्तकालय जाने लगा — जैसा संग वैसा रंग।
अब पछताए होत क्या, जब चिड़िया चुग गई खेतसमय निकल जाने पर पछताना बेकार हैपरीक्षा के एक दिन पहले पूरी पुस्तक खोलकर बैठने से क्या होगा — अब पछताए होत क्या, जब चिड़िया चुग गई खेत।
दूर के ढोल सुहावनेदूर से हर चीज़ अच्छी लगती है, पास जाकर सच्चाई पता चलती हैशहर के विद्यालय की चर्चा सुनकर वह उत्साहित था, पर वहाँ पहुँचकर बोला — दूर के ढोल सुहावने।
एक हाथ से ताली नहीं बजतीझगड़े में दोनों पक्षों का हाथ होता हैशिक्षक ने दोनों को समझाया कि केवल एक को दोष नहीं दिया जा सकता, एक हाथ से ताली नहीं बजती।
नाच न जाने आँगन टेढ़ाअपनी कमी छिपाने के लिए बहाना बनानावह हर बार कहता है कि कलम ठीक नहीं है — नाच न जाने आँगन टेढ़ा।
बूँद-बूँद से घड़ा भरता हैछोटे-छोटे प्रयास मिलकर बड़ा परिणाम देते हैंरोज़ दस शब्द याद करते-करते उसकी अंग्रेज़ी अच्छी हो गई — बूँद-बूँद से घड़ा भरता है।

सबकी प्रस्तुति — पृष्ठ 71पाठ से

पाठ सेगतिविधि
प्र.1पाठ के किसी एक दोहे को चुनकर अपने समूह के साथ मिलकर भिन्न-भिन्न प्रकार से कक्षा के सामने प्रस्तुत कीजिए। उदाहरण के लिए—
• गायन करना, जैसे लोकगीत शैली में।
• भाव-नृत्य प्रस्तुति।
• कविता पाठ करना।
• संगीत के साथ प्रस्तुत करना।
• अभिनय करना, जैसे एक दोस्त गुस्से में आकर कुछ गलत कह देता है लेकिन दूसरा दोस्त उसे समझाता है कि मधुर भाषा का कितना प्रभाव पड़ता है। (ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोय।)
उत्तर
नमूना योजना (अभिनय) — दोहा: “ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोय।”
दृश्य 1: मैदान में मैच हारने पर एक खिलाड़ी साथी पर चिल्लाता है — “तुम्हारे कारण हारे!” साथी सिर झुकाकर चला जाता है।
दृश्य 2: अगले दिन वही खिलाड़ी अकेला बैठा है; उसका मन भी खराब है। तीसरा साथी आकर दोहा गुनगुनाता है।
दृश्य 3: वह साथी के पास जाकर कहता है — “कल मुझसे गलत कहा गया। कैच किसी से भी छूट सकता है।” दोनों हँसकर खेलने चले जाते हैं।
समापन: पूरा समूह मिलकर दोहा बोलता है और एक विद्यार्थी कहता है — “मीठा बोल सुनने वाले को ही नहीं, बोलने वाले को भी ठंडक देता है।”

आपकी बात — पृष्ठ 71पाठ से आगे

पाठ से आगे
प्र.1(क) “गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागौं पाँय।” क्या आपके जीवन में कोई ऐसा व्यक्ति है जिसने आपको सही दिशा दिखाने में सहायता की हो? उस व्यक्ति के बारे में बताइए।
उत्तर
“छठी कक्षा में मैं गणित से इतना डरता था कि प्रश्न देखते ही कॉपी बंद कर देता था। हमारे शिक्षक श्री रमेश जी ने एक दिन मुझे रोककर कहा — ‘उत्तर मत सोचो, पहला कदम सोचो।’ फिर उन्होंने रोज़ भोजनावकाश के दस मिनट मुझे केवल पहला कदम लिखवाना सिखाया। तीन महीने बाद मैं पूरा प्रश्न स्वयं हल करने लगा। उन्होंने मुझे गणित नहीं सिखाया था — उन्होंने डर के सामने खड़ा होना सिखाया था। मेरे लिए वे ही कबीर वाले गुरु हैं, क्योंकि रास्ता उन्होंने ही दिखाया।”
प्र.2(ख) “निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय।” क्या कभी किसी ने आपकी कमियों या गलतियों के विषय में बताया है जिनमें आपको सुधार करने का अवसर मिला हो? उस अनुभव को साझा कीजिए।
उत्तर
“मुझे लगता था कि मैं वाद-विवाद में अच्छा बोलता हूँ। एक दिन मेरी सहेली ने कहा — ‘तुम बोलते समय किसी की बात पूरी नहीं सुनतीं, बीच में काट देती हो।’ मुझे बहुत बुरा लगा और दो दिन मैंने उससे बात नहीं की। फिर अगली प्रतियोगिता की रिकॉर्डिंग देखी तो सचमुच मैंने तीन बार दूसरों को टोका था। मैंने तय किया कि जब तक सामने वाला रुक न जाए, मैं नहीं बोलूँगी। अगली बार निर्णायकों ने मेरी ‘सुनने की क्षमता’ की तारीफ़ की। उस दिन समझ आया कि जो सच बता दे, वह मित्र है — इसीलिए कबीर उसे आँगन में बसाने को कहते हैं।”
प्र.3(ग) “कबिरा मन पंछी भया, भावै तहवाँ जाय।” क्या आपने कभी अनुभव किया है कि आपकी संगति (जैसे— मित्र) आपके विचारों और आदतों या व्यवहारों को प्रभावित करती है? अपने अनुभव साझा कीजिए।
उत्तर
“पिछले वर्ष तक मैं विद्यालय से लौटकर सीधे मोबाइल उठा लेता था। इस वर्ष हमारे मोहल्ले में दो लड़के शाम को मैदान में खो-खो खेलने लगे और मुझे भी बुला लिया। पहले हफ़्ते मैं मन मारकर गया, फिर आदत बन गई। अब मैं रोज़ एक घंटा खेलता हूँ, रात को समय पर नींद आ जाती है और सुबह पढ़ने में मन लगता है। किसी ने मुझे मोबाइल छोड़ने को नहीं कहा था — बस मेरा ‘पेड़’ बदल गया।”

सृजन — पृष्ठ 71-72पाठ से आगे

पाठ से आगेगतिविधि
प्र.1(क) “साँच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप।” इस दोहे पर आधारित एक कहानी लिखिए जिसमें किसी व्यक्ति ने कठिन परिस्थितियों में भी सत्य का साथ नहीं छोड़ा। (संकेत— किसी खेल में आपकी टीम द्वारा नियमों के उल्लंघन का आपके द्वारा विरोध किया जाना।)
उत्तर
नमूना कहानी — आख़िरी गेंद
अंतर-विद्यालय क्रिकेट फ़ाइनल की आख़िरी गेंद थी। विपक्षी टीम को जीत के लिए दो रन चाहिए थे। बल्लेबाज़ ने शॉट मारा और हमारे साथी ने डाइव लगाकर गेंद पकड़ ली। अंपायर ने आउट दे दिया और हमारी टीम खुशी से उछल पड़ी।
पर मैं पास ही खड़ा था — गेंद पहले ज़मीन पर टप्पा खाकर उसके हाथों में आई थी। एक साथी ने धीरे से कहा, “चुप रहना, किसी ने नहीं देखा।” मैं उलझन में था, फिर अंपायर के पास जाकर बोला, “सर, गेंद ज़मीन छू चुकी थी, यह कैच नहीं है।”
निर्णय बदला गया। बल्लेबाज़ तब तक दो रन दौड़ चुके थे, इसलिए विपक्षी टीम जीत गई। कई दिन मेरे साथी मुझसे नाराज़ रहे। पर अगले वर्ष कोच ने मुझे कप्तान बनाया और कहा, “कप्तान वही, जिसकी बात पर सब भरोसा कर सकें।” तब मुझे समझ आया — साँच बराबर तप नहीं।
प्र.2(ख) “गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागौं पाँय।” इस दोहे को ध्यान में रखते हुए अपने किसी प्रेरणादायक शिक्षक से साक्षात्कार कीजिए और उनके योगदान पर एक निबंध लिखिए।
उत्तर
नमूना निबंध (संक्षिप्त) — “गोविंद दियो बताय”
कबीर कहते हैं कि गुरु ही ईश्वर तक का रास्ता बताते हैं। मेरे लिए ऐसी ही गुरु हैं हमारी हिंदी शिक्षिका, जो बीस वर्षों से पढ़ा रही हैं। साक्षात्कार में उन्होंने बताया, “मेरी अपनी शिक्षिका ने मुझमें पढ़ने की लगन जगाई थी, इसलिए मैं शिक्षिका बनी।” उनकी सबसे बड़ी चुनौती है हर बच्चे तक पहुँचना; इसके लिए वे कक्षा में कहानियाँ और नाटक करवाती हैं। उन्होंने ‘पढ़ो और बताओ’ कार्यक्रम शुरू किया, जिससे कई बच्चों में पढ़ने की आदत पड़ी। मैं पहले कक्षा में बोलने से डरता था; उन्होंने मुझे प्रार्थना-सभा में समाचार पढ़ने का काम दिया और मेरा डर चला गया। सच में, अच्छे शिक्षक केवल पाठ नहीं पढ़ाते, जीवन की राह दिखाते हैं।

कबीर हमारे समय में — पृष्ठ 72पाठ से आगे

पाठ से आगे
प्र.1(क) कल्पना कीजिए कि कबीर आज के समय में आ गए हैं। वे आज किन-किन विषयों पर कविता लिख सकते हैं? उन विषयों की सूची बनाइए।
उत्तर
  • मोबाइल और स्क्रीन की अति — ‘अति का भला न’ का सीधा विस्तार।
  • अफ़वाह और झूठी ख़बर — बिना जाँचे आगे भेज देना; ‘साधू ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय’ यहीं काम आता है।
  • दिखावे की चमक — फ़ोटो में सुखी दिखना और भीतर बेचैन रहना।
  • पानी और पेड़ों की बरबादी — नदी, कुआँ, कटते जंगल।
  • कचरा और प्लास्टिक — खरीदने-फेंकने की अति।
  • जाति, धर्म और भाषा के भेद — कबीर का सबसे पुराना और सबसे ज़रूरी विषय।
  • परीक्षा और अंकों का दबाव — बच्चों के मन पर बोझ।
  • बुज़ुर्गों का अकेलापन — घर भरे हुए, पर बात करने वाला कोई नहीं।
  • ऑनलाइन गाली-गलौज — ‘ऐसी बानी बोलिए’ का आज का मैदान।
प्र.2(ख) इन विषयों पर आप भी दो-दो पंक्तियाँ लिखिए।
उत्तर

नमूना पंक्तियाँ —

मोबाइल पर —
हाथ में मोबाइल रहे, पास बैठा परिवार।
बात किसी से हो नहीं, सूना सब घर-द्वार॥

झूठी ख़बर पर —
बिना परख जो बात को, आगे देय बढ़ाय।
झूठ फैलाने में वही, भागीदार कहाय॥

पानी पर —
नल टपकै दिन-रात भर, बूँद-बूँद बह जाय।
आज बहाया व्यर्थ जो, कल प्यासा रह जाय॥

पेड़ पर —
छाया माँगे हर कोई, पौधा रोपे कौन।
जो बोवै सो पावई, बाकी बैठे मौन॥

भेदभाव पर —
एक हवा सब साँस लें, एक धरा सब गाँव।
ऊँच-नीच की बात क्यों, एक-सी सबकी छाँव॥

साइबर सुरक्षा और दोहे — पृष्ठ 72पाठ से आगे

पाठ से आगे
प्र.1नीचे दिए गए प्रश्नों पर कक्षा में विचार-विमर्श कीजिए और साझा कीजिए—
(क) “अति का भला न बोलना, अति का भला न चूप।” इंटरनेट पर अनावश्यक सूचनाएँ साझा करने के क्या-क्या संकट हो सकते हैं?
उत्तर

इंटरनेट पर अनावश्यक सूचनाएँ साझा करने के संकट —

  • निजी जानकारी का दुरुपयोग: घर का पता, विद्यालय, दिनचर्या या यात्रा की जानकारी से कोई अजनबी हमें नुकसान पहुँचा सकता है।
  • फ़ोटो का गलत उपयोग: तस्वीर बदलकर या गलत संदर्भ में फैलाई जा सकती है।
  • ठगी: जन्मतिथि, पालतू का नाम जैसी बातों से पासवर्ड का अनुमान लगाकर खाते में सेंध लग सकती है।
  • अफ़वाह फैलना: बिना जाँचे आगे भेजी गई बात से किसी निर्दोष को नुकसान हो सकता है।
  • स्थायी रिकॉर्ड: एक बार डाली गई बात पूरी तरह मिटती नहीं।
  • समय और ध्यान की हानि: हर बात पर प्रतिक्रिया देने की आदत पढ़ाई का समय खा जाती है।
प्र.2(ख) “साधू ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय।” किसी भी वेबसाइट, ईमेल या मीडिया पर उपलब्ध जानकारी को ‘सूप’ की तरह छानने की आवश्यकता क्यों है? कैसे तय करें कि कौन-सी सूचना उपयोगी है और कौन-सी हानिकारक?
उत्तर

छानने की आवश्यकता: इंटरनेट पर कोई भी कुछ भी डाल सकता है, इसलिए वहाँ सही और गलत, उपयोगी और हानिकारक सूचनाएँ मिली-जुली रहती हैं। बहुत-सी सामग्री कुछ बेचने, डराने या केवल क्लिक पाने के लिए बनाई जाती है। बिना छाने मान लेने से हम गलत निर्णय लेते हैं और झूठ फैलाते हैं।

कैसे तय करें: देखें कि सूचना किसने दी (भरोसेमंद सरकारी या शैक्षिक स्रोत है या नहीं), लेखक और तिथि दी है या नहीं, दावे का प्रमाण है या नहीं, और वही बात दूसरी भरोसेमंद जगहों पर मिलती है या नहीं। “तुरंत सबको भेजें” जैसी भाषा अक्सर अफ़वाह का लक्षण होती है।

आज के समय में — पृष्ठ 72-73पाठ से आगे

पाठ से आगे
प्र.1नीचे कुछ घटनाएँ दी गई हैं। इन्हें पढ़कर आपको कबीर के कौन-से दोहे याद आते हैं? घटनाओं के नीचे दिए गए रिक्त स्थान पर उन दोहों को लिखिए—
1. अमित का मन पढ़ाई में नहीं लगता था और वह गलत संगति में चला गया। कुछ समय बाद जब उसके अंक कम आए तो उसे समझ में आया — “संगति का असर जीवन पर पड़ता है।”
उत्तर
“कबिरा मन पंछी भया, भावै तहवाँ जाय।
जो जैसी संगति करै, सो तैसा फल पाय॥”

कारण: अमित गलत संगति में गया और उसका फल कम अंकों के रूप में मिला — ‘जो जैसी संगति करै, सो तैसा फल पाय’।

प्र.22. एक विद्यार्थी इंटरनेट पर लगातार सूचनाएँ खोज रहा था। उसके पिता ने कहा — “हर जानकारी सही नहीं होती, सही बातों को चुनो और बेकार छोड़ दो।”
उत्तर
“साधू ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय।
सार सार को गहि रहै, थोथा देइ उड़ाय॥”

कारण: पिता की सलाह ‘सही बातें चुनो, बेकार छोड़ दो’ ही सूप का स्वभाव है — ‘सार सार को गहि रहै, थोथा देइ उड़ाय’।

प्र.33. आपका एक मित्र आपकी किसी गलत बात पर आपकी आलोचना करता है। आप पहले परेशान होते हैं, लेकिन फिर आपने सोचा — “आलोचना मुझे सुधरने का मौका देती है, मुझे इन बातों का बुरा नहीं मानना चाहिए। इसे सकारात्मक रूप से लेना चाहिए।”
उत्तर
“निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय।
बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करै सुभाय॥”

कारण: आलोचना करने वाला मित्र ही ‘निंदक’ है, जो बिना पानी-साबुन के हमारा स्वभाव निर्मल करता है; इसलिए उसे पास रखना चाहिए।

प्र.44. रीमा ने अपने गुस्से में सहकर्मी को बुरा-भला कह दिया, जिससे वातावरण बिगड़ गया। बाद में उसने समझा कि अगर वह शांति से बात करती तो समस्या हल हो जाती।
उत्तर
“ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोय।
औरन को सीतल करै, आपहुँ सीतल होय॥”

कारण: रीमा ने गुस्से और अहंकार में कटु वचन कहे, जिससे वातावरण बिगड़ा; शांत और मधुर वाणी दूसरों को भी शीतल करती और उसे भी।

प्र.55. कक्षा में मोहन ने बहुत अधिक बोलकर सबको परेशान कर दिया, जबकि रमेश बिल्कुल चुप रहा। गुरुजी ने कहा — “बोलचाल में संतुलन आवश्यक है, न अधिक बोलो, न अधिक चुप रहो।”
उत्तर
“अति का भला न बोलना, अति का भला न चूप।
अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप॥”

कारण: मोहन ने अति बोला और रमेश अति चुप रहा; दोहा दोनों अतियों को गलत बताकर संतुलन सिखाता है, जैसा गुरुजी ने कहा।

प्र.66. सुरेश को जब ‘प्रतिभा सम्मान’ मिला तो उसने कहा — “इसमें मेरे परिश्रम के साथ मेरे गुरुजनों का मार्गदर्शन भी सम्मिलित है।”
उत्तर
“गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागौं पाँय।
बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय॥”

कारण: सुरेश अपनी सफलता का श्रेय गुरुजनों के मार्गदर्शन को देता है, जैसे दोहे का शिष्य गुरु को पहला स्थान देता है।

खोजबीन के लिए — पृष्ठ 74पाठ से आगे

पाठ से आगेगतिविधि
प्र.1अपने परिजनों, मित्रों, शिक्षकों, पुस्तकालय या इंटरनेट की सहायता से कबीर के भजनों, गीतों, लोकगीतों को खोजिए और सुनिए। किसी एक गीत को अपनी लेखन-पुस्तिका में लिखिए। कक्षा के सभी समूहों द्वारा एकत्रित गीतों को जोड़कर एक पुस्तिका बनाइए और कक्षा के पुस्तकालय में उसे सम्मिलित कीजिए। (पुस्तक में NCERT OFFICIAL यूट्यूब चैनल की कड़ियाँ दी गई हैं — संत कबीर, कबीर वाणी, कबीर की साखियाँ, तथा ‘दोहे — कबीर, रहीम, तुलसी’।)
उत्तर

नमूना (लेखन-पुस्तिका के लिए) — कबीर का एक प्रसिद्ध पद:

मोकों कहाँ ढूँढ़े बंदे, मैं तो तेरे पास में।
ना मैं देवल ना मैं मसजिद, ना काबे कैलास में।
ना तो कौने क्रिया-कर्म में, नहीं योग बैराग में।
खोजी होय तो तुरतै मिलिहौं, पल भर की तालास में।
कहैं कबीर सुनो भई साधो, सब स्वाँसों की स्वाँस में॥

भाव: कबीर कहते हैं कि ईश्वर मंदिर-मस्जिद, तीर्थ या कर्मकांड में नहीं, हर प्राणी की साँसों में — हमारे भीतर — है; सच्चे मन से खोजने वाले को वह तुरंत मिल जाता है।

स्रोत: पुस्तकालय की पुस्तक या पुस्तक में दी गई NCERT OFFICIAL कड़ी (पद के पाठ में थोड़ा अंतर मिल सकता है)।

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