NCERT Solutions for Class 8 Hindi Chapter 8 नए मेहमान – step-by-step answers to every exercise and in-text question of the chapter, as per the latest NCERT syllabus for 2027. Read them online or download the free question-answer PDF.
मल्हार (कक्षा 8) के पाठ 8 नए मेहमान में उदयशंकर भट्ट (1898–1966) की एक एकांकी है — गरमी की एक रात, किराये का एक छोटा-सा मकान, और दो ऐसे मेहमान जिन्हें घर का कोई नहीं जानता। यहाँ पृष्ठ 105 से 125 तक की हर गतिविधि का हल है। हर प्रश्न में पहले वह उत्तर है जो कॉपी में लिखना है; कारण, संकेत और अतिरिक्त जानकारी ‘विस्तार से समझिए’ में है।
NCERT Solutions for Class 8 Hindi Chapter 8 नए मेहमान PDF
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|---|---|---|
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NCERT Solutions for Class 8 Hindi Chapter 8 नए मेहमान – Questions and Answers
All questions of the chapter are answered below, in the order of the book – in-text questions, activities and the end-of-chapter exercises. Each answer is written the way you would write it in the exam.
मेरी समझ से — पृष्ठ 117 और 118पाठ से
1. आगंतुकों ने विश्वनाथ के बच्चों को ‘सीधे लड़के’ किस संदर्भ में कहा?
• अतिथियों की सेवा करने के कारण
• किसी तरह का प्रश्न न करने के कारण
• आज्ञाकारिता के भाव के कारण
• गरमी को चुपचाप सहने के कारण
★ अतिथियों की सेवा करने के कारण
★ किसी तरह का प्रश्न न करने के कारण
★ आज्ञाकारिता के भाव के कारण
कारण: प्रमोद बिना कुछ पूछे बरफ का ठंडा पानी ले आया और किरण ने कहते ही पंखा तेज कर दिया। पानी पीकर नन्हेमल कहता है — “कितने सीधे लड़के हैं।” गरमी तो घर में सभी सह रहे थे; यह बात बच्चों के व्यवहार पर कही गई है, इसलिए चौथा विकल्प सही नहीं।
• उन्हें कष्ट में देखकर प्रसन्न होते हैं
• पड़ोसी किसी प्रकार का सहयोग नहीं करते हैं
• लड़ने-झगड़ने के अवसर ढूँढ़ते हैं
• अतिथियों का अपमान करते हैं
★ उन्हें कष्ट में देखकर प्रसन्न होते हैं
★ पड़ोसी किसी प्रकार का सहयोग नहीं करते हैं
कारण: खाली छत पड़ी रहने पर भी पड़ोसी बच्चों के लिए एक खाट नहीं बिछाने देते। रेवती भी कहती है — “वे तो हमको मुसीबत में देखकर प्रसन्न होते हैं।” (आगे के झगड़े वाले दृश्य के आधार पर तीसरा विकल्प भी तर्क सहित चुना जा सकता है।)
• मेहमान के ठहरने की उचित व्यवस्था न होने के कारण
• रेवती का स्वास्थ्य कुछ समय से ठीक न होने के कारण
• अतिथियों के आने से घर का कार्य बढ़ जाने के कारण
• उसे अतिथियों का आना-जाना पसंद न होने के कारण
★ मेहमान के ठहरने की उचित व्यवस्था न होने के कारण
★ रेवती का स्वास्थ्य कुछ समय से ठीक न होने के कारण
★ अतिथियों के आने से घर का कार्य बढ़ जाने के कारण
कारण: घर इतना छोटा है कि परिवार के लिए भी खाटें पूरी नहीं आतीं; रेवती पंद्रह दिन से सिरदर्द से परेशान है; और नौकर न टिकने से घर का सारा काम उसी पर है। चौथा विकल्प ग़लत है — अंत में वही रेवती अपने भाई के लिए खुशी से खाना बनाती है।
• पानी की कमी होने की
• पड़ोसियों के चिल्लाने की
• मेहमानों के आने की
• गरमी के कारण बीमारी की
★ मेहमानों के आने की
कारण: यह वाक्य ठीक तब निकलता है जब बाहर से कोई दरवाजा खटखटाता है। रेवती थोड़ी देर पहले ही कह चुकी थी — “ईश्वर करें इन दिनों कोई मेहमान न आए।” दस्तक सुनते ही उसे वही डर लगता है।
• संवाद
• कथा
• वर्णन
• मंचन
★ संवाद
कारण: इस एकांकी में लेखक अपनी ओर से कुछ नहीं सुनाता; गरमी, गरीबी, पड़ोसी का झगड़ा और मेहमानों का झूठ — सब पात्रों के संवादों से पता चलता है। पुस्तक भी कहती है कि एकांकी में कहानी मुख्य रूप से संवादों से आगे बढ़ती है। (‘मंचन’ को भी तर्क सहित चुना जा सकता है।)
“प्रश्न 3 में मैंने पहले तीन विकल्प चुने, क्योंकि रेवती स्वयं कहती है — ‘पिछले पंद्रह दिन से दर्द के मारे सिर फट रहा है’ और ‘मैं ही जानती हूँ जैसे रोटी बनाती हूँ।’ चौथा विकल्प मैंने छोड़ दिया, क्योंकि एकांकी के अंत में वही रेवती अपने भाई के लिए खुशी-खुशी खाना बनाने उठ जाती है। अगर उसे मेहमान ही नापसंद होते, तो भाई का आना भी नापसंद होता।”
पंक्तियों पर चर्चा — पृष्ठ 118पाठ से
• “पानी पीते-पीते पेट फूला जा रहा है, और प्यास है कि बुझने का नाम नहीं लेती।”
अर्थ: गरमी इतनी है कि पानी पेट भर चुका है, पर प्यास फिर भी नहीं मरी। विश्वनाथ चार गिलास पीकर आया है और होंठ अब भी सूख रहे हैं।
भाव: यह पंक्ति एक साथ दो बातें कहती है। ऊपर से यह गरमी की तीव्रता बताती है। भीतर से यह उस परिवार की पूरी हालत का चित्र है — जो उपाय उनके पास है, वह उनकी तकलीफ के आगे बहुत छोटा है। पानी है, पर राहत नहीं; मकान है, पर हवा नहीं; कमाई है, पर बड़ा मकान नहीं।
अर्थ: लू और तपन इतनी है मानो आसमान से पानी नहीं, आग बरस रही हो। पूरा शहर तप रहा है — केवल एक घर नहीं।
भाव: विश्वनाथ यह वाक्य कहकर आगे जोड़ता है — “इसीलिए यहाँ गर्मियों में सभी संपन्न लोग पहाड़ों पर चले जाते हैं।” और रेवती का उत्तर पूरी बात खोल देता है — “चले जाते होंगे। गरीबों की तो मौत है।” यानी गरमी सब पर बरसती है, पर उससे बचने का उपाय सबके पास नहीं। यहाँ मौसम का वर्णन चुपके से एक सामाजिक बात कह जाता है।
अर्थ: जैसे भाड़ (भट्ठी) में चने डालकर भूने जाते हैं, वैसे ही हम इस तंग, गरम मकान में भुनते रहते हैं — और यही हमारी किस्मत है।
भाव: यह रेवती का सबसे कड़वा वाक्य है। इससे ठीक पहले वह कह चुकी है कि नौकर तीन मंजिल पानी चढ़ाने से भाग जाता है — “किसी को क्या जरूरत पड़ी है जो गरमी में भुने।” यानी नौकर के पास तो भाग जाने का विकल्प है, उनके पास वह भी नहीं। ‘भाग्य’ शब्द में शिकायत भी है और हार भी।
अर्थ: ठंडा पानी पीते ही नन्हेमल को राहत मिलती है। ‘जान में जान आना’ का अर्थ है — घबराहट या बेचैनी दूर होकर चैन आ जाना।
भाव: भीषण गरमी में पानी ही सबसे बड़ी राहत है — उसी से प्यासे, थके व्यक्ति के प्राण जैसे लौट आते हैं। इसलिए वह कहता है कि गरमी में पानी ही तो जान है।
मिलकर करें मिलान — पृष्ठ 118पाठ से
| क्रम | स्तंभ 1 | क्रम | स्तंभ 2 |
|---|---|---|---|
| 1. | लाखों के आदमी खाक में मिल गए। | 1. | भोजन की व्यवस्था कब तक हो जाएगी |
| 2. | धोती ऐसी चर्रा रही है, जैसे पुरानी हो। | 2. | पहले अपना ध्यान फिर दूसरा काम |
| 3. | माल-मसाला तो अंटी में है न? | 3. | बहुत ही समृद्ध व्यक्ति थे पर अब उनके पास कुछ भी नहीं है |
| 4. | खाने में क्या देर-दार है। | 4. | कपड़ा पसीने से भीगकर पुराने जैसा हो गया है |
| 5. | पहले आत्मा फिर परमात्मा | 5. | धनराशि सुरक्षित तो है न! |
सही मिलान: 1 → 3, 2 → 4, 3 → 5, 4 → 1, 5 → 2
| स्तंभ 1 | → | स्तंभ 2 | यह भाव क्यों |
|---|---|---|---|
| 1. लाखों के आदमी खाक में मिल गए। | → 3 | बहुत ही समृद्ध व्यक्ति थे पर अब उनके पास कुछ भी नहीं है | नन्हेमल संपतराम के बारे में कहता है — “उन बेचारों का कारोबार सब चौपट हो गया।” ‘खाक में मिलना’ मुहावरा है — पूरी तरह नष्ट हो जाना। |
| 2. धोती ऐसी चर्रा रही है, जैसे पुरानी हो। | → 4 | कपड़ा पसीने से भीगकर पुराने जैसा हो गया है | बाबूलाल की धोती नई है — “पिछले दिनों नकद नौ रुपये खर्च करके खरीदी थी” — पर पसीने से भीगकर चरचराने लगी है। |
| 3. माल-मसाला तो अंटी में है न? | → 5 | धनराशि सुरक्षित तो है न! | ‘अंटी’ = कमर में धोती की गाँठ, जहाँ रुपये रखे जाते थे। नन्हेमल का उत्तर इसे पक्का कर देता है — “नहीं, जेब में है, बंडी की जेब में है।” |
| 4. खाने में क्या देर-दार है। | → 1 | भोजन की व्यवस्था कब तक हो जाएगी | नन्हेमल भूख और नींद का हवाला देकर खाने की देर पूछ रहा है — “बात यह है कि नींद बड़े जोर से आ रही है।” |
| 5. पहले आत्मा फिर परमात्मा | → 2 | पहले अपना ध्यान फिर दूसरा काम | रेवती कहती है — “जब शरीर ही ठीक नहीं रहता तो फिर और क्या करूँ?” यानी पहले अपना शरीर सँभालूँ, बाकी बाद में। |
सोच-विचार के लिए — पृष्ठ 118 और 119पाठ से
(क) “शहर में तो ऐसे ही मकान होते हैं।” नन्हेमल का ‘ऐसे ही मकान’ से क्या आशय है?
‘ऐसे ही मकान’ से नन्हेमल का आशय है — शहर के छोटे, तंग और बंद किराये के मकान, जिनमें आगे एक कमरा, उसके पीछे एक और कमरा, पीछे छोटा-सा आँगन और ऊपर छत होती है और हवा का नाम नहीं होता। बाबूलाल के पूछने पर कि “क्या मकान इतना ही बड़ा है?”, नन्हेमल कहता है कि शहर में तो ऐसे ही मकान होते हैं — यानी यह कोई अनोखी बात नहीं, शहर में अधिकतर लोग ऐसे ही मकानों में रहते हैं।
शिकायत: विश्वनाथ के मेहमानों ने उसकी छत पर हाथ धोकर गंदा पानी फैला दिया। पहले भी उनके एक मेहमान ने पानी फैलाया था और उसकी खाट बिछाकर लेट गया था। उसका कहना है — “यदि मेहमान बुलाने हों तो बड़ा-सा मकान लो।”
मेरा मत: पड़ोसी की शिकायत उचित है, पर व्यवहार अनुचित। छत उसकी है और विश्वनाथ भी मानता है — “वाकई गलती हो गई।” पर क्षमा माँगने पर भी वह ताने मारता है, गरीबी पर तंज करता है और खाली छत पर बच्चों के लिए एक खाट तक नहीं बिछाने देता। वह अपनी बात शांति से भी कह सकता था।
विश्वनाथ उन्हें इन कारणों से घर में आने देता है —
- संकोच: वह परिचय पूछना चाहता है, पर शिष्टता के कारण हर बार प्रश्न अधूरा छोड़ देता है — “दो-तीन बार पूछा, ठीक-ठीक उत्तर ही नहीं देते।”
- आतिथ्य का संस्कार: दरवाजे पर आए व्यक्ति को लौटाना उसे ठीक नहीं लगता — “कोई भी हों, जब आए हैं तो खाना जरूर खाएँगे।”
- मेहमानों की चतुराई: वे बिस्तर-संदूक लेकर सीधे भीतर आ जाते हैं, संपतराम जैसे नाम लेते हैं और हर प्रश्न टाल देते हैं — “हम तो आपके पास के हैं।”
- विश्वनाथ — “क्षमा कीजिएगा आप कहाँ से पधारे हैं?”
- विश्वनाथ — “मैं संपतराम को नहीं जानता।”
- रेवती — “ये लोग कौन हैं? जान-पहचान के तो मालूम नहीं पड़ते।” विश्वनाथ — “न जाने कौन हैं।”
- नन्हेमल — “हाँ, हाँ पूछिए, मालूम होता है, आपने हमें पहचाना नहीं है।”
- विश्वनाथ — “तो आप कोई चिट्ठी-विट्ठी लाए हैं?” दोनों (सकपकाकर) — “चिट्ठी, चिट्ठी तो नहीं लाए हैं।”
- विश्वनाथ — “लेकिन मैं कविराज तो नहीं हूँ?” … “पर मैं तो वैद्य नहीं हूँ।”
- विश्वनाथ — “कहीं आप कविराज रामलाल वैद्य के यहाँ तो नहीं आए हैं?” दोनों (उछलकर) — “अरे हाँ, वही तो कविराज रामलाल।”
- “इन बंद मकानों में रहना कितना भयंकर है! मकान है कि भट्टी!”
- “पत्ता तक नहीं हिल रहा है। जैसे साँस बंद हो जाएगी।”
- “पानी पीते-पीते पेट फूला जा रहा है और प्यास है कि बुझने का नाम नहीं लेती।”
- “सारे शहर में जैसे आग बरस रही हो।”
- “तमाम शरीर मारे गरमी के उबल उठा है।”
- “चारों तरफ दीवारें तप रही हैं।”
- “बच्चे को ले जाओ। यह गरमी में भुन रहा है।”
- “ठंडा-ठंडा पानी पिलाओ दोस्त, प्राण सूखे जा रहे हैं।”
- “तबीयत अब शांत हुई है, फिर भी पसीने से नहा गया हूँ।”
अनुमान और कल्पना से — पृष्ठ 119 और 120पाठ से
(क) एकांकी में विश्वनाथ अपनी पत्नी को अतिथियों के लिए भोजन की व्यवस्था करने के लिए कहता है। साथ ही रेवती की अस्वस्थता का विचार करके भोजन बाजार से मँगवाने का सुझाव भी देता है। लेकिन उसने स्वयं अतिथियों के लिए भोजन बनाने के विषय में क्यों नहीं सोचा?
क्योंकि उस समय के समाज में रसोई को स्त्री का काम मान लिया गया था। विश्वनाथ को रेवती की परवाह है — इसीलिए वह बाजार से खाना मँगाने का सुझाव देता है — पर उसकी सोच में दो ही रास्ते हैं: पत्नी बनाए या बाजार से आए। ‘मैं स्वयं बना दूँ’ — यह विचार उसके मन में आता ही नहीं। घर का काम सबकी साझी जिम्मेदारी है; यदि वह हाथ बँटाता, तो बीमार रेवती का बोझ हल्का हो जाता।
क्योंकि घर में काम बाँटने वाला और कोई नहीं है और प्रमोद सबसे बड़ा बच्चा है। नौकर तीन मंजिल पानी चढ़ाने के कारण टिकता नहीं, माँ पंद्रह दिन से बीमार है और पिता मेहमानों के पास बैठे हैं। इसलिए बरफ लाना, मेहमानों को नल तक ले जाना और छोटी बहन उषा को सँभालना — ये काम प्रमोद को करने पड़ते हैं। ऐसे काम उसे जिम्मेदार भी बनाते हैं।
क्योंकि इस बार आने वाला अजनबी नहीं, उसका अपना भाई है। भाई के लिए किया गया काम उसे बोझ नहीं, अपनापन लगता है। भाई का तार नहीं मिला था और वह चार घंटे से मकान ढूँढ़ रहा था, इसलिए उसे भूखा सुलाना रेवती को ठीक नहीं लगा। भाई स्वयं संकोच कर रहा था — “खाना-वाना रहने दो” — और ऐसे अतिथि के लिए मन अपने आप उदार हो जाता है। इसीलिए रेवती कहती है — “भैया भूखे नहीं सो सकते।”
| गरमी की भीषणता दर्शाने वाली पंक्तियाँ | सर्दी की भीषणता दर्शाने वाली पंक्तियाँ | वर्षा की भीषणता दर्शाने वाली पंक्तियाँ |
|---|---|---|
| 1. यह गरमी में भुन रहा है। | यह सर्दी में जम गया। | यह वर्षा में भीग रहा है। |
| 2. पर बरफ भी कोई कहाँ तक पिए। | ||
| 3. सारे शहर में जैसे आग बरस रही हो। | ||
| 4. प्यास है कि बुझने का नाम नहीं लेती। | ||
| 5. चारों तरफ दीवारें तप रही हैं। | ||
| 6. ठंडा-ठंडा पानी पिलाओ दोस्त, प्राण सूखे जा रहे हैं। | ||
| 7. सचमुच गरमी में पानी ही तो जान है। | ||
| 8. यह तो हमारा ही भाग्य है कि चने की तरह भाड़ में भुनते रहते हैं। | ||
| 9. फिर भी पसीने से नहा गया हूँ। |
पहली पंक्ति पुस्तक में भरी हुई है। शेष आठ इस प्रकार भरी जा सकती हैं (आपके वाक्य अलग भी हो सकते हैं, बस भाव वही रहे):
| गरमी की भीषणता दर्शाने वाली पंक्तियाँ | सर्दी की भीषणता दर्शाने वाली पंक्तियाँ | वर्षा की भीषणता दर्शाने वाली पंक्तियाँ |
|---|---|---|
| 1. यह गरमी में भुन रहा है। | यह सर्दी में जम गया। | यह वर्षा में भीग रहा है। |
| 2. पर बरफ भी कोई कहाँ तक पिए। | पर रजाई भी कोई कहाँ तक ओढ़े। | पर छाता भी कोई कहाँ तक ताने। |
| 3. सारे शहर में जैसे आग बरस रही हो। | सारे शहर पर जैसे बरफ जम रही हो। | सारे शहर पर जैसे आसमान फट पड़ा हो। |
| 4. प्यास है कि बुझने का नाम नहीं लेती। | ठिठुरन है कि जाने का नाम नहीं लेती। | झड़ी है कि थमने का नाम नहीं लेती। |
| 5. चारों तरफ दीवारें तप रही हैं। | चारों तरफ दीवारें बरफ हुई जा रही हैं। | चारों तरफ दीवारें सील रही हैं। |
| 6. ठंडा-ठंडा पानी पिलाओ दोस्त, प्राण सूखे जा रहे हैं। | गरम-गरम चाय पिलाओ दोस्त, प्राण जमे जा रहे हैं। | सूखा-सूखा कपड़ा दे दो दोस्त, प्राण काँपे जा रहे हैं। |
| 7. सचमुच गरमी में पानी ही तो जान है। | सचमुच सर्दी में धूप ही तो जान है। | सचमुच वर्षा में सूखी छत ही तो जान है। |
| 8. यह तो हमारा ही भाग्य है कि चने की तरह भाड़ में भुनते रहते हैं। | यह तो हमारा ही भाग्य है कि बरफ की सिल्ली की तरह जमते रहते हैं। | यह तो हमारा ही भाग्य है कि मेंढक की तरह पानी में डूबते-उतराते रहते हैं। |
| 9. फिर भी पसीने से नहा गया हूँ। | फिर भी ठंड से नीला पड़ गया हूँ। | फिर भी छाते के नीचे भीग गया हूँ। |
एकांकी की रचना — पृष्ठ 120 और 121पाठ से
(क) अपने समूह में मिलकर इस एकांकी की विशेषताओं की सूची बनाइए।
‘नए मेहमान’ एकांकी की विशेषताएँ —
- एक ही अंक — आरंभ से ‘यवनिका’ तक एक ही प्रवाह।
- एक ही स्थान — विश्वनाथ के घर का एक कमरा।
- कम समय — एक ही रात, आठ बजे से आधी रात तक।
- सीमित पात्र — आरंभ में पात्र-परिचय दिया गया है।
- संवाद-प्रधान — कहानी संवादों से आगे बढ़ती है।
- कोष्ठक में रंगमंच-निर्देश — समय, स्थान और कमरे की बनावट।
- अभिनय संकेत — (तुनककर), (सकपकाकर), (खीझकर), (उछलकर)।
- वेशभूषा संबंधी निर्देश — काली बंडी, सफेद पगड़ी, मैली धोती।
- नेपथ्य का प्रयोग और अंत में ‘यवनिका’।
- बोलचाल की भाषा, मुहावरे और अंत में चौंकाने वाला मोड़।
| क्र. | वाक्य | हाँ/नहीं |
|---|---|---|
| 1. | ‘नए मेहमान’ एकांकी में पूरी कहानी एक ही स्थान, घर में घटित होती दिखाई गई है। | |
| 2. | एकांकी में पात्रों की संख्या बहुत अधिक है। | |
| 3. | एकांकी में एक कहानी छिपी है। | |
| 4. | एकांकी और कहानी में कोई अंतर नहीं है। | |
| 5. | एकांकी में कहानी की घटनाएँ अलग-अलग दिनों या महीनों में हो रही हैं। | |
| 6. | एकांकी में कहानी मुख्य रूप से संवादों से आगे बढ़ती है। | |
| 7. | एकांकी में पात्रों को अभिनय के लिए निर्देश दिए गए हैं। |
1. हाँ 2. नहीं 3. हाँ 4. नहीं 5. नहीं 6. हाँ 7. हाँ
| क्र. | वाक्य | हाँ / नहीं | कारण |
|---|---|---|---|
| 1. | पूरी कहानी एक ही स्थान, घर में घटित होती दिखाई गई है। | हाँ | सारा घटनाक्रम विश्वनाथ के एक कमरे में होता है। छत, नल और आँगन की बातें भी संवाद के रास्ते ही मंच तक आती हैं। |
| 2. | एकांकी में पात्रों की संख्या बहुत अधिक है। | नहीं | गिनती के आठ पात्र हैं (विश्वनाथ, रेवती, प्रमोद, किरण, नन्हेमल, बाबूलाल, पड़ोसी, आगंतुक)। एकांकी में पात्र सीमित ही रखे जाते हैं। |
| 3. | एकांकी में एक कहानी छिपी है। | हाँ | बिना बुलाए दो मेहमानों का आना, संदेह, पूछताछ और अंत में गलत घर का खुलासा — यह पूरी कहानी है, जो संवादों में गुँथी हुई है। |
| 4. | एकांकी और कहानी में कोई अंतर नहीं है। | नहीं | कहानी लेखक स्वयं सुनाता है और वह पढ़ने के लिए होती है; एकांकी पात्रों के संवादों से चलती है और मंच पर खेलने के लिए लिखी जाती है। उसमें रंगमंच-निर्देश, वेशभूषा और अभिनय संकेत होते हैं। |
| 5. | घटनाएँ अलग-अलग दिनों या महीनों में हो रही हैं। | नहीं | पूरी कथा एक ही रात की है — “रात के आठ बजे का समय” से लेकर “ढूँढ़ते-ढूँढ़ते आधी रात हो गई” तक। |
| 6. | कहानी मुख्य रूप से संवादों से आगे बढ़ती है। | हाँ | गरमी, गरीबी, पड़ोसी की कड़वाहट और मेहमानों का झूठ — हर बात किसी न किसी पात्र के मुँह से हम तक पहुँचती है। |
| 7. | पात्रों को अभिनय के लिए निर्देश दिए गए हैं। | हाँ | (तुनककर), (सकपकाकर), (खीझकर), (उछलकर), (आँचल से मुँह का पसीना पोंछती हुई) — ये सब अभिनय संकेत हैं। |
अभिनय की बारी — पृष्ठ 121पाठ से
“मैंने विद्यालय के वार्षिकोत्सव में एक एकांकी देखी थी। ‘नए मेहमान’ के मंचन के लिए मैं मंच पर एक मेज, दो कुर्सियाँ, एक पलंग और एक पुराना पंखा रखूँगा। विश्वनाथ कुरता-धोती में, रेवती साड़ी में, और नन्हेमल-बाबूलाल काली बंडी, सफेद पगड़ी और मैली धोती में होंगे — कंधे पर बिस्तर, हाथ में संदूक। गरमी दिखाने के लिए हर पात्र पसीना पोंछेगा और पंखा झलेगा। दरवाजा खटखटाने और नेपथ्य की आवाजें पीछे से दी जाएँगी। मैं आरंभ में एक सूत्रधार जोड़ूँगा जो समय और स्थान बताए, और अंत में तार लेकर आता डाकिया दिखाऊँगा।”
तैयारी ऐसे कीजिए —
- भूमिकाएँ बाँटिए — विश्वनाथ, रेवती, नन्हेमल, बाबूलाल, प्रमोद, किरण, पड़ोसी और आगंतुक (रेवती का भाई); दो-तीन साथी ध्वनि, प्रकाश और सामान सँभालें।
- समय बाँटिए — मिले हुए समय (जैसे 15 मिनट) को दृश्यों में बाँटिए: गरमी की बातचीत, मेहमानों का आना, पड़ोसी का झगड़ा, खुलासा, भाई का आना।
- अभ्यास कीजिए — पहले बैठकर संवाद पढ़िए, फिर हाव-भाव के साथ, फिर सामान के साथ पूरा दोहराइए।
- साधारण साधन — आस-पास की चीजें (कुर्सी, मेज) काम में लीजिए; जगह कम हो तो अपने स्थान पर खड़े-खड़े संवाद बोलिए।
भाषा की बात — पृष्ठ 121 और 122पाठ से
“चारों तरफ दीवारें तप रही हैं।”
“यह तो हमारा ही भाग्य है कि चने की तरह भाड़ में भुनते रहते हैं।”
उपर्युक्त वाक्यों में रेखांकित शब्द गरमी की प्रचंडता को दर्शा रहे हैं कि तापमान अत्यधिक है। एकांकी में इस प्रकार के और भी प्रयोग हुए हैं जहाँ शब्दों के माध्यम से विशेष प्रभाव उत्पन्न किया गया है, उन प्रयोगों को छाँटकर अपनी लेखन पुस्तिका में लिखिए।
एकांकी में ऐसे और प्रयोग —
- “मकान है कि भट्टी!” — गरमी की प्रचंडता
- “पत्ता तक नहीं हिल रहा है।” — हवा का बिलकुल न चलना
- “जाने कब तक इस जेलखाने में सड़ना होगा।” — घुटन और बेबसी
- “तमाम शरीर मारे गरमी के उबल उठा है।” — शरीर की तपन
- “कपड़े तो ऐसे हो गए कि निचोड़ लो।” — पसीने की अधिकता
- “प्राण सूखे जा रहे हैं।” — प्यास की तीव्रता
- “सिर फटा जा रहा है।” — असह्य पीड़ा
- “लाखों के आदमी खाक में मिल गए।” — पूरी बरबादी
- “अब जान में जान आई।” — गहरी राहत
“आज दो साल से दिन-रात एक करके ढूँढ़ रहा हूँ।”
“लाखों के आदमी खाक में मिल गए।”
उपर्युक्त वाक्यों में रेखांकित वाक्यांश ‘रात-दिन एक करना’ तथा ‘खाक में मिलना’ मुहावरों का प्रायोगिक रूप है। ये वाक्य में एक विशेष प्रभाव उत्पन्न कर रहे हैं। एकांकी में आए अन्य मुहावरों की पहचान करके लिखिए और उनके अर्थ समझते हुए उनका अपने वाक्यों में प्रयोग कीजिए।
| मुहावरा | अर्थ | एकांकी में | मेरा अपना वाक्य |
|---|---|---|---|
| जान में जान आना | घबराहट दूर होकर चैन मिलना | “आह! अब जान में जान आई।” | बेटे का फोन आते ही माँ की जान में जान आई। |
| सिर फटना | तेज सिरदर्द होना | “दर्द के मारे सिर फटा जा रहा है।” | दिन भर के शोर से मेरा सिर फटा जा रहा है। |
| भाड़ में भुनना | बहुत कष्ट सहना | “चने की तरह भाड़ में भुनते रहते हैं।” | बिना पंखे के उस कमरे में हम भाड़ में भुनते रहे। |
| गला तर करना | पानी पीकर प्यास बुझाना | “ज़रा गला ही तर कर लूँ।” | दौड़ से लौटकर उसने पहले गला तर किया। |
| चल बसना | मर जाना | “और वह चल बसी।” | लंबी बीमारी के बाद वे चल बसे। |
| चौपट होना | पूरी तरह नष्ट हो जाना | “उन बेचारों का कारोबार सब चौपट हो गया।” | बाढ़ में किसानों की सारी फसल चौपट हो गई। |
| धुन सवार होना | किसी बात की लगन या जिद चढ़ जाना | “तुम्हें भी न जाने क्या धुन सवार हो जाती है।” | उसे इन दिनों तैराकी सीखने की धुन सवार है। |
• “वह तो कहो, मैं भी ढूँढ़कर ही रहा।”
उपर्युक्त वाक्य से रेखांकित शब्द ‘ही’ हटाकर पढ़िए—
“वह तो कहो, मैं भी ढूँढ़कर रहा”
(क) दो-दो के जोड़े में चर्चा कीजिए कि वाक्य में ‘ही’ के प्रयोग से किस बात को बल मिल रहा था और ‘ही’ हटा देने से क्या कमी आई?
‘ही’ से बल: ‘ही’ आगंतुक के दृढ़ निश्चय पर बल देता है — इतने बड़े शहर में घंटों भटकने के बाद भी उसने हार नहीं मानी और मकान ढूँढ़कर ही दम लिया।
‘ही’ हटाने से कमी: “मैं भी ढूँढ़कर रहा” में जोर और निश्चय का भाव खत्म हो जाता है; वाक्य केवल एक सूचना बनकर रह जाता है और अधूरा-सा लगता है।
1. विश्वनाथ के अतिथि यहाँ रुकेंगे — और किसी के अतिथि नहीं।
2. विश्वनाथ के अतिथि यहाँ रुकेंगे — यहाँ के अतिरिक्त और कहीं नहीं।
3. विश्वनाथ के अतिथि यहाँ रुकेंगे — यहाँ रुकना निश्चित है।
1. विश्वनाथ के ही अतिथि यहाँ रुकेंगे।
2. विश्वनाथ के अतिथि यहीं (यहाँ ही) रुकेंगे।
3. विश्वनाथ के अतिथि यहाँ रुकेंगे ही।
‘ही’ उसी शब्द के ठीक बाद लगता है जिस पर बल देना है — पहले में ‘विश्वनाथ के’, दूसरे में ‘यहाँ’ और तीसरे में ‘रुकेंगे’ पर।
उपर्युक्त वाक्य में ‘तो’ का स्थान बदलकर अर्थ में आए परिवर्तन पर ध्यान दें—
“तुम तो नहाने जाओ।”
“तुम नहाने जाओ तो।”
‘ही’ और ‘तो’ के ऐसे और प्रयोग करके वाक्य बनाइए।
अर्थ में अंतर: “तुम नहाने तो जाओ” — बाकी बातें छोड़ो, पहले नहाने जाओ; “तुम तो नहाने जाओ” — दूसरों की चिंता मत करो, तुम जाओ; “तुम नहाने जाओ तो” — जाओ तो सही (इसमें आग्रह और हल्का उलाहना है)।
‘ही’ के वाक्य: रेवती ही खाना बनाएगी। / रेवती खाना ही बनाएगी। / रेवती खाना बनाएगी ही।
‘तो’ के वाक्य: तुम तो पहले पानी पी लो। / तुम पानी तो पी लो। / आया तो वह था, पर बहुत देर से।
आपकी बात — पृष्ठ 123पाठ से आगे
विश्वनाथ— क्या पूछ लूँ? दो-तीन बार पूछा, ठीक-ठीक उत्तर ही नहीं देते।”
उपर्युक्त संवाद से पता चलता है कि विश्वनाथ दुविधा की स्थिति में है। क्या आपके सामने कभी कोई ऐसी दुविधापूर्ण स्थिति आई है जब आपको यह समझने में समय लगा हो कि क्या सही है और क्या गलत? अपने अनुभव साझा कीजिए।
“एक बार कक्षा-परीक्षा में मेरे पास बैठे मित्र ने चुपके से उत्तर पूछा। वह मेरा अच्छा मित्र था और माँ के बीमार होने से पढ़ नहीं पाया था; पर परीक्षा में बताना गलत था। मैं देर तक तय नहीं कर पाया कि दोस्ती निभाऊँ या ईमानदारी। मैंने उस समय उत्तर नहीं बताया, पर छुट्टी के बाद उसके घर जाकर उसे पूरा पाठ समझाया। अगली परीक्षा में वह स्वयं अच्छे अंक लाया। अब मुझे लगता है कि मेरा निर्णय ठीक था — सच्ची मदद वही है जो दूसरे को आगे के लिए तैयार करे।”
“मेरे सबसे अच्छे मित्र आरव और सलमा हैं। आरव मुझे इसलिए प्रिय है क्योंकि वह मेरी गलती मेरे मुँह पर कह देता है — जब मैंने एक छोटे बच्चे का मजाक उड़ाया था, तो सबके सामने नहीं, पर अकेले में उसने मुझे टोका था। सलमा इसलिए प्रिय है क्योंकि वह सुनना जानती है; मेरे नाना के देहांत के बाद वह रोज मेरे साथ बैठकर बिना कुछ पूछे बस साथ रहती थी। मेरे लिए अच्छा मित्र वह है जो सुख में साथ हँसे और दुख में साथ चुप रह सके।”
किसी के घर जाने से पहले मैं ये तैयारियाँ करता/करती हूँ —
- फोन या संदेश से पहले ही बता देना कि कब आ रहे हैं, कितने लोग हैं और कितने दिन रुकेंगे।
- पूरा पता, गली का नाम और फोन नंबर लिख लेना।
- उचित समय पर पहुँचने की योजना बनाना — बहुत रात को नहीं।
- अपने कपड़े, तौलिया, दवाइयाँ और पानी की बोतल साथ रखना।
- घर के बच्चों के लिए छोटा-सा उपहार या अपने क्षेत्र की कोई चीज ले जाना।
“हमारे बगल में एक अकेली बुजुर्ग महिला रहती हैं। उनकी आँखें कमजोर हैं, इसलिए मैं सप्ताह में दो बार उनके पत्र और बिजली का बिल पढ़कर सुना देती हूँ। पिछली गरमी में जब उनके घर पानी की मोटर खराब हो गई, तो हमने तीन दिन तक अपने घर से पानी भरकर पहुँचाया। वे बदले में हमारे लिए अचार बनाकर भेजती हैं।”
मेरे अनुसार सामान्य अतिथि को —
- आने से पहले सूचना देनी चाहिए और उचित समय पर पहुँचना चाहिए।
- पहुँचते ही अपना स्पष्ट परिचय देना चाहिए।
- मेजबान की सुविधा-असुविधा का ध्यान रखना चाहिए; माँग-माँगकर सेवा नहीं करानी चाहिए।
- जो मिले उसी में संतोष करना और अपना काम स्वयं करना चाहिए।
- घर और पड़ोस के नियमों का पालन करना चाहिए।
जैसे रेवती का भाई कहता है — “इस समय खाना-वाना रहने दो। मैं पानी पीकर सो जाऊँगा।”
सावधानी और सुरक्षा — पृष्ठ 123पाठ से आगे
मैं उन्हें भीतर लाने से पहले विनम्रता से पर स्पष्ट रूप से उनका पूरा परिचय पूछता/पूछती —
- आप कौन हैं, कहाँ से आए हैं और किससे मिलना है?
- जिनके यहाँ जाना है, उनका नाम और पूरा पता क्या है?
- क्या कोई चिट्ठी या पहचान साथ है?
परिचय साफ न होने पर उन्हें घर के भीतर न ले जाता, पर पानी पिलाकर सही पता ढूँढ़ने में उनकी मदद करता। संदेह बना रहता तो घर के बड़ों या पड़ोसियों को साथ बुला लेता।
- दरवाजा न खोलें; पहले खिड़की या आइ-होल से देखें कि कौन है।
- बंद दरवाजे के भीतर से ही बात करें और यह न बताएँ कि घर पर कोई बड़ा नहीं है।
- तुरंत माता-पिता या अभिभावक को फोन करके बताएँ।
- किसी अपरिचित को भीतर न बुलाएँ, चाहे वह डिलीवरी या मरम्मत वाला ही क्यों न हो; उससे कोई खाने की चीज न लें।
- अपना नाम, पता या घर के लोगों के आने-जाने का समय न बताएँ।
- डर लगे तो भरोसेमंद पड़ोसी को बुलाएँ या 112 पर फोन करें।
सृजन — पृष्ठ 123पाठ से आगे
नमूना उत्तर — ‘उस रात के मेहमान’
एक दिन मेरे घर में मेहमान आ गए। गरमी की रात थी, पत्ता तक नहीं हिल रहा था। हमारा किराये का मकान छोटा और बंद था। माँ पंद्रह दिन से सिरदर्द से परेशान थीं और चाहती थीं कि इन दिनों कोई मेहमान न आए। तभी दरवाजा खटका और बिस्तर-संदूक लिए दो अजनबी — नन्हेमल और बाबूलाल — भीतर आ गए। उन्होंने ठंडा पानी, खाना और नहाने का प्रबंध माँगा, पर ठीक से नहीं बताया कि वे कौन हैं। उन्होंने पड़ोसी की छत पर पानी फैलाया तो पड़ोसी झगड़ने आ गया। अंत में पता चला कि उन्हें पिछली गली के कविराज रामलाल वैद्य के यहाँ जाना था, और वे चले गए। तभी मामा जी आ पहुँचे, जिनका तार हमें मिला ही नहीं था। जो माँ अजनबियों के लिए खाना बनाने से मना कर चुकी थीं, वही बोलीं — “भैया भूखे नहीं सो सकते।”
गरमी का प्रकोप — पृष्ठ 123 और 124पाठ से आगे
चार्ट के मुख्य बिंदु — गरमी से बचाव
- थोड़ी-थोड़ी देर में पानी पिएँ; नींबू-पानी, छाछ, आम पन्ना लें; बाहर जाते समय पानी की बोतल साथ रखें।
- दोपहर 12 से 4 बजे तक धूप में निकलने से बचें।
- ढीले, सूती, हल्के रंग के कपड़े पहनें; सिर ढककर निकलें।
- हल्का, ताजा भोजन करें; तरबूज, खीरा, दही खाएँ; बासी और खुला खाना न खाएँ।
- लू के लक्षण (चक्कर, उल्टी, तेज बुखार) दिखें तो छाया में लिटाकर ओ.आर.एस. दें और डॉक्टर को दिखाएँ।
- पक्षियों के लिए पानी रखें; बच्चों और बुजुर्गों का विशेष ध्यान रखें।
- पेड़ लगाएँ; बिजली-पानी बचाएँ।
तार से संदेश — पृष्ठ 124पाठ से आगे
अनुमान — यह एकांकी लगभग 70 से 90 वर्ष पहले लिखी गई होगी।
कारण: उस समय जल्दी संदेश भेजने का साधन तार था; एकांकी में फोन का कहीं जिक्र नहीं है। लेखक उदयशंकर भट्ट का देहांत 1966 में हुआ, इसलिए यह उससे पहले लिखी गई। एकांकी में ‘आने’ की मुद्रा चलती है, जो 1957 में दशमलव मुद्रा (नए पैसे) आने से पहले प्रचलित थी।
आजकल संदेश भेजने के सुलभ साधन हैं — मोबाइल फोन (बातचीत), एस.एम.एस., संदेश-ऐप (मैसेजिंग ऐप), ई-मेल, वीडियो कॉल, सोशल मीडिया और भारतीय डाक (पत्र, स्पीड पोस्ट)। इनमें फोन और संदेश-ऐप सबसे तेज हैं, ई-मेल औपचारिक संदेशों के लिए उपयोगी है और डाक देश के कोने-कोने तक पहुँचती है।
“मैं सबसे अधिक मोबाइल फोन का उपयोग करता हूँ। घर पर देर होने की सूचना देनी हो तो सीधे फोन कर लेता हूँ, क्योंकि उसमें तुरंत उत्तर मिल जाता है। मित्रों से गृहकार्य पूछना हो या किसी पन्ने का चित्र भेजना हो तो संदेश-ऐप का प्रयोग करता हूँ, क्योंकि लिखी हुई बात बाद में भी दिख जाती है। नानी को जन्मदिन की बधाई देनी हो तो वीडियो कॉल करता हूँ, क्योंकि उन्हें चेहरा देखकर ज्यादा अच्छा लगता है। और विद्यालय में छुट्टी का प्रार्थना-पत्र भेजना हो तो ई-मेल करता हूँ, क्योंकि वह औपचारिक रिकॉर्ड बन जाता है।”
पत्र लिखकर लिफाफे पर पाने वाले का पूरा पता और पिनकोड लिखिए, टिकट लगाइए और डाकपेटी में डालिए।
नमूना पत्र:
14, गांधी नगर
जबलपुर — 482002
2 सितंबर 2026
पूज्य नानी जी,
सादर प्रणाम।
आशा है आप कुशल होंगी। हम सब यहाँ ठीक हैं। इस बार गरमी बहुत पड़ी। हमने कक्षा में ‘नए मेहमान’ एकांकी पढ़ी, जिसमें एक घर में बिना बताए दो मेहमान आ जाते हैं। मुझे आपकी याद आई, क्योंकि आप जब भी आती हैं, पहले से चिट्ठी भेज देती हैं।
उसी एकांकी में ‘तार’ का जिक्र है। अध्यापिका जी ने बताया कि तार-सेवा अब बंद हो चुकी है, इसलिए मैंने सोचा कि आपको फोन नहीं, चिट्ठी लिखूँ।
दशहरे की छुट्टियों में हम आपके पास आएँगे। नाना जी को मेरा प्रणाम कहिएगा।
आपका प्रिय नाती
अनुराग
नाप, तौल और मुद्राएँ — पृष्ठ 124पाठ से आगे
एक रुपये में 16 आने होते थे।
1 आना = 4 (पुराने) पैसे
1957 में दशमलव प्रणाली अपनाने के बाद 1 रुपया = 100 (नए) पैसे हो गया और ‘आना’ धीरे-धीरे चलन से बाहर हो गया।
चार आने में 25 पैसे होते हैं।
इसलिए 16 आने = 100 पैसे
1 आना = 100 ÷ 16 = 6.25 पैसे
4 आने = 4 × 6.25 = 25 पैसे
इसी कारण चवन्नी (25 पैसे) को ‘चार आने’ और अठन्नी (50 पैसे) को ‘आठ आने’ कहा जाता था — और आज भी बहुत से लोग यही कहते हैं।
हमारे आस-पास ‘गज’ शब्द इन संदर्भों में प्रयोग होता है —
- कपड़े की दुकान पर — “दो गज कपड़ा दे दीजिए।” दर्जी भी अक्सर गज में नाप बताते हैं।
- जमीन-मकान में — प्लॉट का माप ‘वर्ग गज’ में, जैसे “सौ गज का मकान”।
- खेल में — क्रिकेट की पिच 22 गज लंबी होती है।
- मुहावरों में — ‘दो गज जमीन’ (कब्र भर की जगह)।
एक गज में तीन (3) फीट होती हैं।
1 फीट = 12 इंच
इसलिए 1 गज = 3 × 12 = 36 इंच
झरोखे से — पृष्ठ 125पाठ से आगे
….. ऐसे अवसरों की कमी नहीं जब वे अकस्मात पहुँच कर कहने लगे…… “मेरे इक्के पर कुछ लकड़ियाँ, थोड़ा घी आदि रखवा दो। अतिथि आए हैं, घर में सामान नहीं है।”
उनके अतिथि यहाँ भोजन करने आ जावें, सुनकर उनकी दृष्टि में बालकों जैसा विस्मय छलक आता है। जो अपना घर समझकर आए हैं, उनसे यह कैसे कहा जाए कि उन्हें भोजन के लिए दूसरे घर जाना होगा।
भोजन बनाने से लेकर जूठे बर्तन माँजने तक का काम वे अपने अतिथि देवता के लिए सहर्ष करते हैं। तैंतीस कोटि देवताओं के देश में इस वर्ग के देवताओं की संख्या कम नहीं, पर आधुनिक युग ने उनकी पूजा विधि में बहुत कुछ सुधार कर लिया है। अब अतिथि-पूजा के अवसर वैसे कम ही आते हैं और यदि आ भी पड़े तो देवता के और अभिषेक, शृंगार आदि संस्कार बेयरा, नौकर आदि ही संपन्न करा देते हैं। पुजारी गृहपति को तो भोग लगाने की मेज पर उपस्थित रहने भर का कर्तव्य सँभालना पड़ता है। कुछ देवता इस कर्तव्य से भी उसे मुक्ति दे देते हैं।
ऐसे युग में आतिथ्य की दृष्टि से निराला जी में वही पुरातन संस्कार है जो इस देश के ग्रामीण किसान में मिलता है।
उनके भाव की अतल गहराई और अबाध वेग भी आधुनिक सभ्यता के छिछले और बँधे भाव-व्यापार से भिन्न हैं।
अंश का सार: निराला जी के घर अतिथि आते तो घर में सामान न होने पर भी वे उन्हें लौटाते नहीं थे — लकड़ी, घी आदि माँगकर ले जाते और भोजन बनाने से लेकर जूठे बर्तन माँजने तक का काम स्वयं, खुशी से करते। महादेवी वर्मा के अनुसार उनमें आतिथ्य का वही पुराना संस्कार था जो गाँव के किसान में मिलता है। ‘नए मेहमान’ में थोपा गया आतिथ्य बोझ बन जाता है, जबकि यहाँ मन से किया गया आतिथ्य सुख है।
साझी समझ — पृष्ठ 125पाठ से आगे
“हमारे घर अतिथि के आते ही सबसे पहले उन्हें बैठने को कहा जाता है और ठंडा पानी दिया जाता है। हम बड़ों के चरण छूकर प्रणाम करते हैं और हमउम्र लोगों से हाथ जोड़कर नमस्ते कहते हैं। मैं अपने अतिथियों को अपने क्षेत्र का दाल-बाटी-चूरमा खिलाना चाहूँगी, क्योंकि यह हमारे यहाँ हर खास मौके पर बनता है और इसे मेरी दादी अब भी उपलों की आँच पर बनाती हैं।”
खोजबीन के लिए — पृष्ठ 125पाठ से आगे
- आना — पुरानी भारतीय मुद्रा; 1 रुपया = 16 आने, 1 आना = 4 पैसे = 12 पाई। 1957 में दशमलव मुद्रा (1 रुपया = 100 नए पैसे) आने के बाद यह चलन से बाहर हो गया।
- गज — लंबाई की पुरानी (ब्रिटिश) इकाई; 1 गज = 3 फीट = 36 इंच ≈ 0.91 मीटर। आज भी कपड़े और जमीन के माप में बोला जाता है।
- तार (टेलीग्राफ) — बिजली की धारा और पूर्व-निर्धारित संकेतों (मोर्स कोड) से भेजा जाने वाला छोटा, तेज संदेश; शब्दों की गिनती से पैसे लगते थे। भारत में यह सेवा 15 जुलाई 2013 को बंद हो गई।
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