NCERT Solutions for Class 8 Hindi Chapter 4 हरिद्वार provide clear, step-by-step answers to every exercise and in-text question from the chapter हरिद्वार of the NCERT textbook मल्हार. Prepared by subject experts as per the latest NCERT (CBSE) syllabus for 2026-27, these NCERT Solutions for Class 8 Hindi help you understand each concept, write exam-ready answers, and check your own solutions. You can read them online below or download the free Class 8 Hindi Chapter 4 question-answer PDF.
NCERT Solutions for Class 8 Hindi Chapter 4 हरिद्वार
- Class: Class 8
- Subject: Hindi
- Chapter: Chapter 4 – हरिद्वार
- Textbook: मल्हार (NCERT)
- Study material: NCERT Solutions – questions with answers, free PDF
These solutions answer all the exercise questions of Chapter 4 हरिद्वार — including the in-text questions, short-answer and long-answer questions, and activities — with complete explanations so you can follow the method, not just the final answer. Read the full solutions below.
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Questions Covered in This Chapter
These NCERT Solutions answer all 51 questions of this chapter. The questions solved are:
- (क) निम्नलिखित प्रश्नों के उपयुक्त उत्तर के सम्मुख तारा (★) बनाइए। कुछ प्रश्नों के एक से अधिक उत्तर भी हो सकते हैं। 1. “सज्जन ऐसे कि पत्थर मारने से फल देते हैं” का क्या अर्थ है? • लेखक के अनुसार सज्जन लोग बिना पूछे स्वादिष्ट रसीले फल देते हैं। • लेखक फलदार वृक्षों की उदारता को मानवीय रूप में व्यक्त कर रहे हैं। • लेखक का मानना था कि हरिद्वार के सभी दुकानदार बहुत सज्जन थे। • लेखक को पत्थर मारकर पके हुए फल तोड़कर खाना पसंद था।
- 2. “वैराग्य और भक्ति का उदय होता था” इस कथन से लेखक का कौन-सा भाव प्रकट होता है? • शारीरिक थकान और मानसिक बेचैनी • आर्थिक संतोष और मानसिक विकास • मानसिक शांति और आध्यात्मिक अनुभव • सामाजिक सद्भाव और पारिवारिक प्रेम
- 3. “पत्थर पर का भोजन का सुख सोने की थाल से बढ़कर था” इस वाक्य का सर्वाधिक उपयुक्त निष्कर्ष क्या है? • संतुष्टि में सुख होता है। • सुखी लोग पत्थर पर भोजन करते हैं। • लेखक के पास सोने की थाली नहीं थी। • पत्थर पर रखा भोजन अधिक स्वादिष्ट होता है।
- 4. “एक दिन मैंने श्री गंगा जी के तट पर रसोई करके पत्थर ही पर जल के अत्यंत निकट परोसकर भोजन किया।” यह प्रसंग किस मूल्य को बढ़ावा देता है? • अंधविश्वास और लालच • मानवता और देशप्रेम • सादगी और आत्मनिर्भरता • स्वच्छता और प्रकृति प्रेम
- 5. लेखक का हरिद्वार अनुभव मुख्यतः किस प्रकार का था? • राजनीतिक • आध्यात्मिक • सामाजिक • प्राकृतिक
- 6. पत्र की भाषा का एक मुख्य लक्षण क्या है? • कठिन शब्दों का प्रयोग और बोझिलता • मुहावरों का अधिक प्रयोग • सरलता और चित्रात्मकता • जटिलता और संक्षिप्तता
- (ख) हो सकता है कि आपके समूह के साथियों ने अलग-अलग उत्तर चुने हों। अपने मित्रों के साथ चर्चा कीजिए कि आपने ये उत्तर ही क्यों चुने?
- पाठ से चुनकर कुछ शब्द नीचे दिए गए हैं। आपस में चर्चा कीजिए और इनके उपयुक्त संदर्भों से इनका मिलान कीजिए— शब्द — 1. हरिद्वार 2. गंगा 3. भगीरथ 4. चण्डिका 5. भागवत 6. दालचीनी संदर्भ — 1. मान्यताओं के अनुसार दुर्गा का एक रूप। 2. यह अठारह पुराणों में से सर्वप्रसिद्ध एक पुराण है। इसमें अधिकांश श्री कृष्ण संबंधी कथाएँ हैं। 3. यह भारत के उत्तराखंड राज्य में स्थित एक प्रसिद्ध तीर्थस्थान है। यहाँ से गंगा पहाड़ों को छोड़कर मैदान में आती है। 4. यह एक पेड़ का नाम है। यह दक्षिण भारत में बहुतायत से मिलता है। इस पेड़ की सुगंधित छाल दवा और मसाले के काम में आती है। इसे दारचीनी भी कहते हैं। 5. यह भारतवर्ष की एक प्रधान नदी है जो हिमालय से निकलकर लगभग 1560 मील पूर्व की ओर बहकर बंगाल की खाड़ी में गिरती है। इसके अनेक नाम हैं, जैसे— भागीरथी, त्रिपथगा, अलकनंदा, मंदाकिनी, सुरनदी आदि। 6. ये अयोध्या के प्रसिद्ध सूर्यवंशी राजा थे। कहा जाता है कि ये घोर तपस्या करके गंगा को पृथ्वी पर लाए थे। इसीलिए गंगा का एक नाम ‘भागीरथी’ भी है।
- (क) पाठ से चुनकर कुछ वाक्य नीचे दिए गए हैं। प्रत्येक वाक्य के सामने दो-दो निष्कर्ष दिए गए हैं— एक सही और एक भ्रामक। अपने समूह में इन पर विचार कीजिए और उपयुक्त निष्कर्ष पर सही का चिह्न लगाइए। 1. पर्वतों पर अनेक प्रकार की वल्ली हरी-भरी सज्जनों के शुभ मनोरथों की भाँति फैलकर लहलहा रही है। 2. बड़े-बड़े वृक्ष भी ऐसे खड़े हैं मानो एक पैर से खड़े तपस्या करते हैं और साधुओं की भाँति घाम, ओस और वर्षा अपने ऊपर सहते हैं। 3. इन वृक्षों पर अनेक रंग के पक्षी चहचहाते हैं और नगर के दुष्ट बधिकों से निडर होकर कल्लोल करते हैं। 4. जल यहाँ का अत्यंत शीतल है और मिष्ट भी वैसा ही है मानो चीनी के पने को बरफ में जमाया है। 5. एक दिन मैंने श्री गंगा जी के तट पर रसोई करके पत्थर ही पर जल के अत्यंत निकट परोसकर भोजन किया। 6. निश्चय है कि आप इस पत्र को स्थानदान दीजिएगा।
- पाठ से चुनकर कुछ पंक्तियाँ नीचे दी गई हैं। इन्हें ध्यानपूर्वक पढ़िए और इन पर विचार कीजिए। आपको इनका क्या अर्थ समझ में आया? अपने विचार अपने समूह में साझा कीजिए और लिखिए। (क) “यहाँ की कुशा सबसे विलक्षण होती है जिसमें से दालचीनी, जावित्री इत्यादि की अच्छी सुगंध आती है। मानो यह प्रत्यक्ष प्रगट होता है कि यह ऐसी पुण्यभूमि है कि यहाँ की घास भी ऐसी सुगंधमय है।”
- (ख) “अहा! इनके जन्म भी धन्य हैं जिनसे अर्थी विमुख जाते ही नहीं। फल, फूल, गंध, छाया, पत्ते, छाल, बीज, लकड़ी और जड़; यहाँ तक कि जले पर भी कोयले और राख से लोगों का मनोरथ पूर्ण करते हैं।”
- पाठ को पुन: ध्यान से पढ़िए, पता लगाइए और लिखिए। (क) “और संपादक महाशय, मैं चित्त से तो अब तक वहीं निवास करता हूँ…” लेखक का यह वाक्य क्या दर्शाता है? क्या आपने कभी किसी स्थान को छोड़कर ऐसा अनुभव किया है? कब-कब? (संकेत— किसी स्थान से लौटने के बाद भी उसी के विषय में सोचते रहना)
- (ख) “पंडे भी यहाँ बड़े विलक्षण संतोषी हैं। एक पैसे को लाख करके मान लेते हैं।” लेखक का यह कथन आज के समाज में कितना सच है? क्या अब भी ऐसे संतोषी लोग मिलते हैं? अपने विचार उदाहरण सहित लिखिए।
- (ग) “मैं दीवान कृपा राम के घर के ऊपर के बंगले पर टिका था। यह स्थान भी उस क्षेत्र में टिकने योग्य ही है।” आपके विचार से लेखक ने उस स्थान को ‘टिकने योग्य’ क्यों कहा है? उस स्थान में कौन-कौन सी विशेषताएँ होंगी जो उसे ‘टिकने योग्य’ बनाती होंगी? (संकेत— केवल आराम, सुविधा या कोई और कारण भी।)
- (घ) “फल, फूल, गंध, छाया, पत्ते, छाल, बीज, लकड़ी और जड़; यहाँ तक कि जले पर भी कोयले और राख से लोगों का मनोरथ पूर्ण करते हैं।” इस वाक्य के माध्यम से आपको वृक्षों के महत्व के बारे में कौन-कौन सी बातें सूझ रही हैं?
- (क) “यह भूमि तीन ओर सुंदर हरे-हरे पर्वतों से घिरी है।” कल्पना कीजिए कि आप हरिद्वार में हैं। आप वहाँ क्या-क्या करना चाहेंगे?
- (ख) “जल के छलके पास ही ठंढे-ठंढे आते थे।” कल्पना कीजिए कि आप गंगा के तट पर हैं और पानी के छींटे आपके मुँह पर आ रहे हैं। अपने अनुभवों को अपनी कल्पना से लिखिए।
- (ग) “सज्जन ऐसे कि पत्थर मारने से फल देते हैं।” यदि पेड़-पौधे सच में मनुष्यों की तरह व्यवहार करने लगें तो क्या होगा?
- (घ) “यहाँ पर श्री गंगा जी दो धारा हो गई हैं— एक का नाम नील धारा, दूसरी श्री गंगा जी ही के नाम से।” इस पाठ में ‘गंगा’ शब्द के साथ ‘श्री’ और ‘जी’ लगाया गया है। आपके अनुसार उन्होंने ऐसा क्यों किया होगा?
- (ङ) कल्पना कीजिए कि आप हरिद्वार एक श्रवणबाधित या दृष्टिबाधित व्यक्ति के साथ गए हैं। उसकी यात्रा को अच्छा बनाने के लिए कुछ सुझाव दीजिए।
- (क) “मेरे संग कल्लू जी मित्र भी परमानंदी थे।” लेखक और कल्लू जी के बीच हरिद्वार यात्रा पर एक काल्पनिक संवाद लिखिए।
- (ख) “यह भूमि तीन ओर सुंदर हरे-हरे पर्वतों से घिरी है।” लेखक और प्रकृति के बीच एक कल्पनात्मक संवाद तैयार कीजिए— जैसे पर्वत बोल रहे हों।
- इन वाक्यों में रेखांकित शब्दों के प्रयोग पर ध्यान दीजिए— • विशेष आश्चर्य का विषय यह है कि यहाँ केवल गंगा जी ही देवता हैं, दूसरा देवता नहीं। • यों तो वैरागियों ने मठ मंदिर कई बना लिए हैं। आप जानते ही हैं कि एकवचन संज्ञा शब्दों के साथ ‘है’ का प्रयोग किया जाता है और बहुवचन संज्ञा शब्दों के साथ ‘हैं’ का। सोचिए, ‘गंगा’ शब्द एकवचन है, फिर भी इसके साथ ‘हैं’ क्यों लिखा गया है?
- अब ‘आदरार्थ बहुवचन’ को ध्यान में रखते हुए उपयुक्त शब्दों से रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए— 1. प्रधानाचार्य जी विद्यालय में नहीं ________, वे अभी सभा में उपस्थित ________। 2. माता-पिता हमारे जीवन के मार्गदर्शक होते ________, हमें उनका कहना मानना चाहिए। 3. मेरी बहन बाजार जा रही ________ वहाँ से किताबें ले आएगी। 4. बाहर फेरीवाला ________ ________। ________ बुला लाओ। 5. डाकिया जी आए ________। उन्हें भी बुला लाओ। 6. आप तो बहुत दिन बाद ________, ________ का स्वागत है। 7. डॉक्टर साहब बहुत विद्वान ________, ________ से परामर्श लेना चाहिए। 8. आपके माता-पिता कहाँ ________? क्या मैं ________ से मिल सकता हूँ? 9. ये हमारे हिंदी के अध्यापक ________, हम ________ से बहुत-कुछ सीखते-समझते हैं। 10. बंदर पेड़ पर उछल-कूद कर ________ ________।
- नीचे कुछ पंक्तियाँ दी गई हैं। सोचिए कि इनमें कौन-सा भाव प्रकट हो रहा है? पहचानिए और चुनकर लिखिए— (दिए गए भाव — प्रेम, संतोष, भक्ति, श्रद्धा, वैराग्य, आश्चर्य, करुणा, हास्य, शांति, परोपकार, दया, दुख) 1. उस समय के पत्थर पर का भोजन का सुख सोने की थाल के भोजन से कहीं बढ़ के था। 2. चित्त में बारंबार ज्ञान, वैराग्य और भक्ति का उदय होता था। 3. पंडे भी यहाँ बड़े विलक्षण संतोषी हैं। 4. हर तरफ पवित्रता और प्रसन्नता बिखरी हुई थी। 5. सज्जन ऐसे कि पत्थर मारने से फल देते हैं।
- “यहाँ हरि की पैड़ी नामक एक पक्का घाट है और यहीं स्नान भी होता है।” आप जानते ही होंगे कि काल के तीन भेद होते हैं— भूतकाल, वर्तमान काल और भविष्य काल। परस्पर चर्चा करके पता लगाइए कि ऊपर दिए गए वाक्य में कौन-सा काल प्रदर्शित हो रहा है? सही पहचाना, यह वाक्य वर्तमान काल को प्रदर्शित कर रहा है। (क) नीचे दी गई पाठ की इन पंक्तियों को पढ़कर बताइए, इनमें क्रिया कौन-से काल को प्रदर्शित कर रही है? (भूतकाल/वर्तमान/भविष्य) 1. निश्चय है कि आप इस पत्र को स्थानदान दीजिएगा। 2. यह भूमि तीन ओर सुंदर हरे-हरे पर्वतों से घिरी है। 3. वृक्ष ऐसे हैं कि पत्थर मारने से फल देते हैं। 4. चित्त में बारंबार ज्ञान, वैराग्य और भक्ति का उदय होता था। 5. मैं दीवान कृपा राम के घर के ऊपर के बंगले पर टिका था।
- (ख) अब इन वाक्यों के काल को अन्य कालों में बदलकर लिखिए और नए वाक्य बनाइए।
- नीचे इस पत्र की कुछ विशेषताएँ दी गई हैं। अपने समूह के साथ मिलकर इन विशेषताओं से जुड़े वाक्यों से इनका मिलान कीजिए— पत्र की विशेषताएँ — 1. व्यक्तिपरकता— पत्र लेखन में लेखक के विचार, अनुभव और भावनाएँ प्रमुख होते हैं। 2. संवादात्मकता— पत्र संवाद का रूप है; पाठक से सीधा संवाद होता है। 3. स्वाभाविक शैली— भाषा कृत्रिम नहीं होती; भावनाओं के अनुरूप होती है। 4. व्यक्तिगत अनुभवों का वर्णन— जहाँ लेखक अपने वास्तविक अनुभव को साझा करता है। 5. अभिवादन या संबोधन— पत्र का आरंभ, जिसमें संबोधित व्यक्ति को आदरपूर्वक संबोधित किया जाता है। 6. हस्ताक्षर— लेखक अपने नाम या संबंध से पत्र को समाप्त करता है। 7. उपसंहार और निवेदन— लेखक पत्र समाप्त करता है और अपनी इच्छा या निवेदन प्रकट करता है। 8. मुख्य विषय-वस्तु पत्र से उदाहरण — “ग्रहण में बड़े आनंदपूर्वक स्नान किया… · श्रीमान कविवचन सुधा संपादक महामहिम मित्रवरेषु! · आपका मित्र — यात्री · मुझे हरिद्वार का समाचार लिखने में बड़ा आनंद होता है… · हरिद्वार की प्राकृतिक सुंदरता, धार्मिकता, साधु-संन्यासियों का जीवन, नदी, पर्वत, जल, गंगा स्नान आदि का अत्यंत विस्तार से वर्णन। जैसे— “यह भूमि तीन ओर सुंदर हरे-हरे पर्वतों से घिरी है…” · और संपादक महाशय, मैं चित्त से तो अब तक वहीं निवास करता हूँ… निश्चय है कि आप इस पत्र को स्थानदान दीजिएगा। · एक दिन मैंने श्री गंगा जी के तट पर रसोई करके… · और संपादक महाशय, मैं चित्त से तो अब तक वहीं निवास करता हूँ…” आप एक विशेषता को एक से अधिक वाक्यों से भी जोड़ सकते हैं।
- आपने जो यात्रा-वर्णन पढ़ा है, इसे भारतेंदु हरिश्चंद्र ने एक संपादक को पत्र के रूप में लिखकर भेजा था। आप भी अपनी किसी यात्रा के विषय में अपने किसी परिचित को पत्र लिखकर बताइए।
- नीचे दिए गए स्थानों में ‘हरिद्वार’ से जुड़े शब्द अपने मन से या पाठ से चुनकर लिखिए— (शब्द-जाल के बीच में ‘हरिद्वार’ लिखा है और उसके चारों ओर सात रिक्त खाने दिए गए हैं।)
- (क) ‘हरिद्वार’ पाठ में लेखक ने हरिद्वार के अपने अनुभवों को बहुत ही साहित्यिक और कल्पनाशील भाषा में प्रस्तुत किया है जिसमें कई स्थानों पर उन्होंने तुलनात्मक वाक्यों के माध्यम से दृश्यों का वर्णन किया है। जैसे— हरी-भरी लताओं की तुलना सज्जनों से इस प्रकार की गई है— “पर्वतों पर अनेक प्रकार की वल्ली हरी-भरी सज्जनों के शुभ मनोरथों की भाँति फैलकर लहलहा रही है।” नीचे कुछ तुलनात्मक वाक्य दिए गए हैं। पाठ में ढूँढ़िए कि इन तुलनात्मक वाक्यों को लेखक ने किस प्रकार विशिष्ट तरीके से लिखा है यानी विशिष्टता प्रदान की है? 1. वृक्षों की तुलना साधुओं से की गई है। 2. गंगाजल की मिठास की तुलना चीनी से की गई है। 3. हरियाली की तुलना गलीचे से की गई है। 4. नदी की धारा की तुलना राजा भगीरथ के यश (कीर्ति) से की गई है।
- (ख) “मैं उस पुण्य भूमि का वर्णन करता हूँ जहाँ प्रवेश करने ही से मन शुद्ध हो जाता है।” “पंडे भी यहाँ बड़े विलक्षण संतोषी हैं। एक पैसे को लाख करके मान लेते हैं।” उपर्युक्त पंक्तियों को ध्यान से देखिए, ये आज की हिंदी की तरह नहीं लिखी गई हैं। इसे लेखक ने न केवल अपनी शैली में लिखा है, अपितु इसमें प्राचीन हिंदी भाषा की छवि भी दिखाई देती है। नीचे कुछ पंक्तियाँ दी गई हैं आप इन्हें आज की हिंदी में लिखिए। 1. “इन वृक्षों पर अनेक रंग के पक्षी चहचहाते हैं और नगर के दुष्ट बधिकों से निडर होकर कल्लोल करते हैं।” 2. “वर्षा के कारण सब ओर हरियाली ही दृष्टि पड़ती थी मानो हरे गलीचा की जात्रियों के विश्राम के हेतु बिछायत बिछी थी।” 3. “यह ऐसा निर्मल तीर्थ है कि इच्छा क्रोध की खानि जो मनुष्य हैं सो वहाँ रहते ही नहीं।” 4. “मेरा तो चित्त वहाँ जाते ही ऐसा प्रसन्न और निर्मल हुआ कि वर्णन के बाहर है।” 5. “यहाँ रात्रि को ग्रहण हुआ और हम लोगों ने ग्रहण में बड़े आनंदपूर्वक स्नान किया और दिन में श्री भागवत का पारायण भी किया।” 6. “उस समय के पत्थर पर का भोजन का सुख सोने की थाल के भोजन से कहीं बढ़ के था।” 7. “निश्चय है कि आप इस पत्र को स्थानदान दीजिएगा।”
- (ग) इस रचना में हरिश्चंद्र जी ने कहीं-कहीं प्राचीन वर्तनी का प्रयोग किया है, जैसे— शिखर के लिए शिषर, यात्रियों के लिए जात्रियों। ऐसे शब्दों की सूची बनाइए। आप इन शब्दों को कैसे लिखते हैं? कक्षा में चर्चा कीजिए।
- 1. “मैंने गंगा जी के तट पर रसोई करके… भोजन किया।” क्या आपने कभी खुले वातावरण में या प्रकृति के पास भोजन किया है? वह अनुभव घर के खाने से कैसे भिन्न था?
- 2. “उस समय के पत्थर पर का भोजन का सुख सोने की थाल के भोजन से कहीं बढ़ के था।” आपके जीवन में ऐसा कोई क्षण आया, जब किसी सामान्य-सी वस्तु ने आपको गहरा सुख दिया हो? उसके बारे में बताइए।
- 3. “हर तरफ पवित्रता और प्रसन्नता बिखरी हुई थी।” आपको किस स्थान पर पवित्रता और प्रसन्नता का अनुभव होता है? क्या कोई ऐसा स्थान है जहाँ जाते ही मन शांत हो गया हो? उस स्थान की कौन-सी बातें आपको अच्छी लगीं?
- 4. पाठ में वर्णित है, यहाँ के वृक्ष “फल, फूल, गंध… जले पर भी कोयले और राख से लोगों का मनोरथ पूर्ण करते हैं।” क्या आपके जीवन में कोई पेड़, फूल या प्राकृतिक वस्तु है जिससे आप विशेष जुड़ाव महसूस करते हैं? क्यों?
- “यह भूमि तीन ओर सुंदर हरे-हरे पर्वतों से घिरी है…” आपने पत्र में पढ़ा कि हरिद्वार का प्राकृतिक सौंदर्य अद्भुत है। इस सौंदर्य को बनाए रखने में प्रत्येक मानव की महत्वपूर्ण भूमिका है। इस विषय में अपने समूह में चर्चा कीजिए। इसके बाद अपने समूह के साथ मिलकर “तीर्थ ही नहीं, पृथ्वी भी पावन हो!” विषय पर जन-जागरूकता पोस्टर बनाइए।
- “चित्त में बारंबार ज्ञान, वैराग्य और भक्ति का उदय होता था।” (क) 5 मिनट ध्यान लगाकर या मौन बैठकर अपने आस-पास की ध्वनियों को सुनिए, अपनी श्वास पर ध्यान दीजिए तथा ध्यान को केंद्रित करने का प्रयास कीजिए। इस अनुभव के विषय में एक अनुच्छेद लिखिए।
- (ख) अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के उपलक्ष्य में अपने विद्यालय के कार्यक्रमों को बताने के लिए एक ‘सूचना’ लिखिए जिसे सूचना-पट पर लगाया जा सके।
- “सज्जन ऐसे कि पत्थर मारने से फल देते हैं।” (क) एक पौधा लगाइए और उसकी देखभाल कीजिए ताकि वह कुछ वर्षों में बड़ा पेड़ बन सके। उसे एक नाम दीजिए और उसका मित्र बनिए।
- (ख) उसके बारे में अपनी दैनंदिनी में नियमित रूप से लिखिए।
- “शीतल वायु… स्पर्श ही से पावन करता हुआ संचार करता है।” आइए, एक रोचक गतिविधि करते हैं। ‘शीतल’ शब्द को केंद्र में रखिए और उसके चारों ओर ये चार बातें लिखिए— अर्थ, विपरीतार्थक शब्द, समानार्थी शब्द, वाक्य प्रयोग। अब इसी प्रकार आपके समूह का प्रत्येक सदस्य इस पत्र से एक-एक शब्द चुनकर उसके लिए ऐसा ही शब्द-चित्र बनाए।
- इस पत्र में आपने हरिद्वार की एक यात्रा का वर्णन पढ़ा है। मान लीजिए कि आपको अपने मित्रों या अभिभावकों के साथ अपनी रुचि के किसी स्थान की यात्रा करनी है। उस स्थान को ध्यान में रखते हुए निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए— (क) मान लीजिए कि यात्रा के लिए आपको ₹1000 दिए गए हैं। यात्रा, खाना आदि सब मिलाकर एक व्यय विवरण बनाइए।
- (ख) मान लीजिए कि आप इस यात्रा में एक छोटी वस्तु (स्मृति चिह्न) खरीदना चाहते हैं। आप क्या खरीदेंगे और क्यों? (संकेत — सोचिए, क्या वह आवश्यक है? बजट कैसे संभालेंगे?)
- (क) कल्पना कीजिए कि कुछ मित्रों का समूह एक यात्रा पर जा रहा है। आप एक मार्गदर्शक या टूरिस्ट गाइड हैं। आप इन सबकी यात्रा को सुविधाजनक बनाने के लिए किन-किन बातों का ध्यान रखेंगे? उपर्युक्त चित्र में सबकी अलग-अलग आवश्यकताएँ हो सकती हैं। इन्हें ध्यान में रखते हुए सोचिए कि वहाँ पहुँचने, घूमने, भोजन आदि में आप कैसे सहायता करेंगे?
- (ख) अपने किसी मित्र के साथ बिना बोले संवाद कीजिए— संकेतों से। अब सोचिए कि यात्रा में श्रवणबाधित व्यक्ति के लिए क्या-क्या आवश्यक होगा?
- (ग) यात्रा करते हुए ऐतिहासिक धरोहरों या भवनों की सुरक्षा के लिए आप किन किन बातों का ध्यान रखेंगे?
- पाठ में से शब्द खोजिए और नीचे दिए गए रिक्त स्थानों में लिखिए— 1. एक मसाले का नाम 2. कपास से जुड़ा एक शब्द 3. जहाँ स्नान होता है 4. वृक्ष के किसी अंग का नाम 5. एक नगर या तीर्थ का नाम 6. व्यापार से जुड़ा स्थान 7. एक नदी का नाम 8. एक पर्वत का नाम 9. एक धार्मिक ग्रंथ का नाम
- भारतेंदु हरिश्चंद्र द्वारा लिखे एक और पत्र का एक अंश नीचे दिया गया है। इसे पढ़िए और आपस में विचार कीजिए। हरिद्वार के मार्ग में — “हरिद्वार के मार्ग में अनेक प्रकार के वृक्ष और पक्षी देखने में आए। एक पीले रंग का पक्षी छोटा बहुत मनोहर देखा गया। बया एक छोटी चिड़िया है उसके घोंसले बहुत मिले। ये घोंसले सूखे बबूल काँटे के वृक्ष में हैं और एक-एक डाल में लड़ी की भाँति बीस-बीस, तीस-तीस लटकते हैं। इन पक्षियों की शिल्पविद्या तो प्रसिद्ध ही है, लिखने का कुछ काम नहीं है। इसी से इनका सब चातुर्य प्रगट है कि सब वृक्ष छोड़ के काँटे के वृक्ष में घर बनाया है। इसके आगे ज्वालापुर और कनखल और हरिद्वार हैं, जिसका वृत्तांत अगले नंबरों में लिखूँगा।”
- भारतेंदु हरिश्चंद्र का एक प्रसिद्ध नाटक है— अंधेर नगरी। इसे पुस्तकालय या इंटरनेट से ढूँढ़कर पढ़िए और अपने सहपाठियों के साथ चर्चा कीजिए।
Chapter at a Glance
- हरिद्वार कोई कहानी या निबंध नहीं, एक पत्र है। भारतेंदु हरिश्चंद्र ने इसे कविवचन सुधा पत्रिका के संपादक के नाम लिखा और उसी में यह 14 अक्टूबर 1871 ई. को छपा। पत्र का आरंभ संबोधन से होता है — “श्रीमान कविवचन सुधा संपादक महामहिम मित्रवरेषु!” — और अंत हस्ताक्षर से — “आपका मित्र / यात्री / — भारतेंदु हरिश्चंद्र”। इसलिए यह एक साथ पत्र भी है और यात्रा-वृत्तांत भी।
- लेखक हरिद्वार को पहले आँख से दिखाते हैं — तीन ओर हरे पर्वत, पर्वतों पर फैली वल्ली (लताएँ), एक पैर पर खड़े तपस्वी-से बड़े वृक्ष, रंग-बिरंगे निडर पक्षी, बरसात के बाद की हरियाली, दो धाराओं में बँटी गंगा, नील धारा, चण्डिका देवी की मूर्ति वाला चुटीला पर्वत और हरि की पैड़ी का पक्का घाट।
- फिर वे हरिद्वार को मन से दिखाते हैं। यहाँ “केवल गंगा जी ही देवता हैं, दूसरा देवता नहीं”; पंडे “एक पैसे को लाख करके मान लेते हैं”; “इच्छा क्रोध की खानि जो मनुष्य हैं सो वहाँ रहते ही नहीं”; और “झगड़े-लड़ाई का कहीं नाम भी नहीं था।” इस क्षेत्र के पाँच मुख्य तीर्थ वे गिनाते हैं — हरिद्वार, कुशावर्त्त, नीलधारा, विल्वपर्वत और कनखल ।
- पत्र का सबसे यादगार अनुभव सादगी का है — गंगा तट पर पत्थर पर ही रसोई करके, जल के छींटों के बीच किया गया भोजन, जिसका सुख “सोने की थाल के भोजन से कहीं बढ़ के था।” यहीं से पाठ का मूल भाव निकलता है — सुख वस्तु में नहीं, संतोष में है ।
- लेखक की सबसे बड़ी खूबी उनकी तुलनात्मक, चित्र खींचने वाली भाषा है — लताएँ सज्जनों के शुभ मनोरथों की भाँति फैली हैं, वृक्ष साधुओं की भाँति घाम-ओस-वर्षा सहते हैं, गंगाजल मानो “चीनी के पने को बरफ में जमाया” हो, हरियाली मानो यात्रियों के विश्राम के लिए बिछा हरा गलीचा हो, और गंगा की धारा राजा भगीरथ की उज्ज्वल कीर्ति की लता-सी दिखती है।
- भाषा लगभग 150 वर्ष पुरानी है, इसलिए इसमें पुरानी वर्तनी और पुराने शब्द मिलते हैं — शिखर के लिए शिषर , यात्रियों के लिए जात्रियों , मनोरथ के लिए मनोर्थ , ठंडे के लिए ठंढे । पाठ के अंत में ‘झरोखे से’ में भारतेंदु के एक और पत्र का अंश हरिद्वार के मार्ग में दिया गया है, जिसमें बया पक्षी के घोंसलों की शिल्पविद्या का वर्णन है।
How to Download NCERT Solutions for Class 8 Hindi Chapter 4 PDF
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NCERT Solutions for Class 8 Hindi – All Chapters
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- Chapter 1 स्वदेश
- Chapter 2 दो गौरैया
- Chapter 3 एक आशीर्वाद
- Chapter 4 हरिद्वार
- Chapter 5 कबीर के दोहे
- Chapter 6 एक टोकरी भर मिट्टी
- Chapter 7 मत बाँधो
- Chapter 8 नए मेहमान
- Chapter 9 आदमी का अनुपात
- Chapter 10 तरुण के स्वप्न
NCERT Solutions for Class 8 – All Subjects
Just like Chapter 4 of Hindi, you can get the exercise questions with answers for every other subject of Class 8. Here are the NCERT Solutions for all subjects of Class 8.
NCERT Solutions for Class 8 Hindi Chapter 4 – An Overview
The key highlights of this study material are as follows.
| Aspects | Details |
|---|---|
| Class | Class 8 |
| Subject | Hindi |
| Chapter Number | Chapter 4 |
| Chapter Name | हरिद्वार |
| Book Name | मल्हार |
| Book By | NCERT (National Council of Educational Research and Training) |
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NCERT Solutions for Class 8 Hindi Chapter 4 हरिद्वार – FAQs
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