NCERT Solutions for Class 8 Hindi Chapter 4 हरिद्वार – step-by-step answers to every exercise and in-text question of the chapter, as per the latest NCERT syllabus for 2027. Read them online or download the free question-answer PDF.
मल्हार (कक्षा 8) का पाठ 4 हरिद्वार भारतेंदु हरिश्चंद्र (1850–1885) का लिखा एक यात्रा-वृत्तांत है, जो पत्र के रूप में कविवचन सुधा पत्रिका में 14 अक्टूबर सन् 1871 ई. को छपा था। इसकी हिंदी लगभग 150 वर्ष पुरानी है। हर प्रश्न के नीचे पहले वह उत्तर है जो कॉपी में लिखना है; कारण, पुराने शब्दों के अर्थ और अतिरिक्त नमूने ‘विस्तार से समझिए’ में हैं।
NCERT Solutions for Class 8 Hindi Chapter 4 हरिद्वार PDF
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|---|---|---|
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NCERT Solutions for Class 8 Hindi Chapter 4 हरिद्वार – Questions and Answers
All questions of the chapter are answered below, in the order of the book – in-text questions, activities and the end-of-chapter exercises. Each answer is written the way you would write it in the exam.
मेरी समझ से — पृष्ठ 49–50पाठ से
1. “सज्जन ऐसे कि पत्थर मारने से फल देते हैं” का क्या अर्थ है?
• लेखक के अनुसार सज्जन लोग बिना पूछे स्वादिष्ट रसीले फल देते हैं।
• लेखक फलदार वृक्षों की उदारता को मानवीय रूप में व्यक्त कर रहे हैं।
• लेखक का मानना था कि हरिद्वार के सभी दुकानदार बहुत सज्जन थे।
• लेखक को पत्थर मारकर पके हुए फल तोड़कर खाना पसंद था।
सही उत्तर (★): लेखक फलदार वृक्षों की उदारता को मानवीय रूप में व्यक्त कर रहे हैं।
कारण: यह वाक्य वृक्षों वाले अनुच्छेद में आया है। वृक्ष पत्थर मारने वाले को भी फल देते हैं — यही सज्जन का स्वभाव है। निर्जीव वृक्ष को सज्जन मनुष्य का गुण देना मानवीकरण है।
• शारीरिक थकान और मानसिक बेचैनी
• आर्थिक संतोष और मानसिक विकास
• मानसिक शांति और आध्यात्मिक अनुभव
• सामाजिक सद्भाव और पारिवारिक प्रेम
सही उत्तर (★): मानसिक शांति और आध्यात्मिक अनुभव।
कारण: पूरी पंक्ति है — “चित्त में बारंबार ज्ञान, वैराग्य और भक्ति का उदय होता था।” ज्ञान, वैराग्य और भक्ति मन की अवस्थाएँ हैं। तीर्थ के वातावरण में लेखक का मन शांत था और ईश्वर की ओर लगा था।
• संतुष्टि में सुख होता है।
• सुखी लोग पत्थर पर भोजन करते हैं।
• लेखक के पास सोने की थाली नहीं थी।
• पत्थर पर रखा भोजन अधिक स्वादिष्ट होता है।
सही उत्तर (★): संतुष्टि में सुख होता है।
कारण: ‘सोने की थाल’ अमीरी का प्रतीक है। गंगा तट पर पत्थर पर किया गया सादा भोजन लेखक को उससे बढ़कर लगा, क्योंकि सुख वस्तु की कीमत से नहीं, मन के संतोष से मिलता है।
• अंधविश्वास और लालच
• मानवता और देशप्रेम
• सादगी और आत्मनिर्भरता
• स्वच्छता और प्रकृति प्रेम
सही उत्तर (★): सादगी और आत्मनिर्भरता (साथ में — स्वच्छता और प्रकृति प्रेम)।
कारण: लेखक ने स्वयं रसोई की (आत्मनिर्भरता), पत्थर पर ही परोसकर खाया (सादगी) और जल के अत्यंत निकट बैठकर खाया (प्रकृति प्रेम)। पुस्तक कहती है कि कुछ प्रश्नों के एक से अधिक उत्तर हो सकते हैं।
• राजनीतिक
• आध्यात्मिक
• सामाजिक
• प्राकृतिक
सही उत्तर (★): आध्यात्मिक।
कारण: लेखक लिखते हैं कि यहाँ “प्रवेश करने ही से मन शुद्ध हो जाता है” और “चित्त में बारंबार ज्ञान, वैराग्य और भक्ति का उदय होता था।” प्रकृति का वर्णन भी अंत में मन की पवित्रता से ही जुड़ता है।
• कठिन शब्दों का प्रयोग और बोझिलता
• मुहावरों का अधिक प्रयोग
• सरलता और चित्रात्मकता
• जटिलता और संक्षिप्तता
सही उत्तर (★): सरलता और चित्रात्मकता।
कारण: पत्र की भाषा सहज है और पढ़ते ही दृश्य आँखों के सामने बन जाता है — जैसे “बड़े-बड़े वृक्ष भी ऐसे खड़े हैं मानो एक पैर से खड़े तपस्या करते हैं।”
हमारे समूह में प्रश्न 5 पर मतभेद हुआ — कुछ साथियों ने ‘आध्यात्मिक’ चुना, कुछ ने ‘प्राकृतिक’। दोनों ने पाठ से पंक्तियाँ दीं: “मेरा तो चित्त वहाँ जाते ही ऐसा प्रसन्न और निर्मल हुआ कि वर्णन के बाहर है” और “यह भूमि तीन ओर सुंदर हरे-हरे पर्वतों से घिरी है।” चर्चा के बाद हमने माना कि लेखक प्रकृति का वर्णन भी मन की पवित्रता दिखाने के लिए करते हैं, इसलिए ‘आध्यात्मिक’ मुख्य उत्तर है और ‘प्राकृतिक’ दूसरा।
मिलकर करें मिलान — पृष्ठ 50पाठ से
| क्रम | शब्द | संदर्भ |
|---|---|---|
| 1. | हरिद्वार | 1. मान्यताओं के अनुसार दुर्गा का एक रूप। |
| 2. | गंगा | 2. यह अठारह पुराणों में से सर्वप्रसिद्ध एक पुराण है। इसमें अधिकांश श्री कृष्ण संबंधी कथाएँ हैं। |
| 3. | भगीरथ | 3. यह भारत के उत्तराखंड राज्य में स्थित एक प्रसिद्ध तीर्थस्थान है। यहाँ से गंगा पहाड़ों को छोड़कर मैदान में आती है। |
| 4. | चण्डिका | 4. यह एक पेड़ का नाम है। यह दक्षिण भारत में बहुतायत से मिलता है। इस पेड़ की सुगंधित छाल दवा और मसाले के काम में आती है। इसे दारचीनी भी कहते हैं। |
| 5. | भागवत | 5. यह भारतवर्ष की एक प्रधान नदी है जो हिमालय से निकलकर लगभग 1560 मील पूर्व की ओर बहकर बंगाल की खाड़ी में गिरती है। इसके अनेक नाम हैं, जैसे— भागीरथी, त्रिपथगा, अलकनंदा, मंदाकिनी, सुरनदी आदि। |
| 6. | दालचीनी | 6. ये अयोध्या के प्रसिद्ध सूर्यवंशी राजा थे। कहा जाता है कि ये घोर तपस्या करके गंगा को पृथ्वी पर लाए थे। इसीलिए गंगा का एक नाम ‘भागीरथी’ भी है। |
सही मिलान: 1. हरिद्वार — 3 · 2. गंगा — 5 · 3. भगीरथ — 6 · 4. चण्डिका — 1 · 5. भागवत — 2 · 6. दालचीनी — 4
हरिद्वार = उत्तराखंड का तीर्थ; गंगा = प्रधान नदी; भगीरथ = सूर्यवंशी राजा; चण्डिका = दुर्गा का रूप; भागवत = पुराण; दालचीनी = सुगंधित छाल वाला पेड़।
मिलकर करें चयन — पृष्ठ 51पाठ से
| क्रम | पंक्ति | निष्कर्ष |
|---|---|---|
| 1. | पर्वतों पर अनेक प्रकार की वल्ली हरी-भरी सज्जनों के शुभ मनोरथों की भाँति फैलकर लहलहा रही है। | • लताओं का फैलना सज्जनों की शुभ इच्छाओं की तरह सौम्यता और सुंदरता को दर्शाता है। • सज्जनों की शुभ इच्छाएँ लताओं के समान फैल जाती हैं। |
| 2. | बड़े-बड़े वृक्ष भी ऐसे खड़े हैं मानो एक पैर से खड़े तपस्या करते हैं और साधुओं की भाँति घाम, ओस और वर्षा अपने ऊपर सहते हैं। | • वृक्षों की स्थिति साधुओं जैसी है जो हर मौसम को सहने के लिए विवश हैं। • वृक्षों की स्थिति साधुओं जैसी है जो हर मौसम को सहते हुए तपस्या करते हैं। |
| 3. | इन वृक्षों पर अनेक रंग के पक्षी चहचहाते हैं और नगर के दुष्ट बधिकों से निडर होकर कल्लोल करते हैं। | • यहाँ के पक्षी प्रकृति में सुरक्षित अनुभव करते हैं, इसलिए वे निडर होकर कल्लोल करते हैं। • यहाँ के पक्षी नगर से डरकर इस जगह आ गए हैं इसलिए वे कल्लोल करते हैं। |
| 4. | जल यहाँ का अत्यंत शीतल है और मिष्ट भी वैसा ही है मानो चीनी के पने को बरफ में जमाया है। | • गंगाजल की ठंडक और मिठास का अनुभव बहुत मनोहारी है। • गंगाजल की शीतलता और मिठास से शक्कर और बरफ बनाई जा सकती है। |
| 5. | एक दिन मैंने श्री गंगा जी के तट पर रसोई करके पत्थर ही पर जल के अत्यंत निकट परोसकर भोजन किया। | • लेखक ने भोजन इसलिए बनाया क्योंकि गंगा का पानी बहुत गरम था और वह पकाने में सहायक था। • लेखक ने गंगा के समीप बैठकर भोजन किया, जिससे उनकी प्रकृति से निकटता झलकती है। |
| 6. | निश्चय है कि आप इस पत्र को स्थानदान दीजिएगा। | • लेखक चाहता है कि पत्र को महत्व देकर कहीं स्थान दिया जाए, यानी इसे पढ़ा और सँजोया जाए। • लेखक चाहता है कि पत्र को महत्व देकर प्रकाशित किया जाए। |
सही निष्कर्ष (✓):
| क्रम | सही निष्कर्ष |
|---|---|
| 1. | लताओं का फैलना सज्जनों की शुभ इच्छाओं की तरह सौम्यता और सुंदरता को दर्शाता है। |
| 2. | वृक्षों की स्थिति साधुओं जैसी है जो हर मौसम को सहते हुए तपस्या करते हैं। |
| 3. | यहाँ के पक्षी प्रकृति में सुरक्षित अनुभव करते हैं, इसलिए वे निडर होकर कल्लोल करते हैं। |
| 4. | गंगाजल की ठंडक और मिठास का अनुभव बहुत मनोहारी है। |
| 5. | लेखक ने गंगा के समीप बैठकर भोजन किया, जिससे उनकी प्रकृति से निकटता झलकती है। |
| 6. | लेखक चाहता है कि पत्र को महत्व देकर प्रकाशित किया जाए। |
पंक्तियों पर चर्चा — पृष्ठ 52पाठ से
(क) “यहाँ की कुशा सबसे विलक्षण होती है जिसमें से दालचीनी, जावित्री इत्यादि की अच्छी सुगंध आती है। मानो यह प्रत्यक्ष प्रगट होता है कि यह ऐसी पुण्यभूमि है कि यहाँ की घास भी ऐसी सुगंधमय है।”
अर्थ: हरिद्वार की कुशा (पूजा में काम आने वाली घास) असाधारण है — उसमें से दालचीनी और जावित्री जैसे मसालों की सुगंध आती है। लेखक कहते हैं कि जहाँ की साधारण घास भी इतनी सुगंधित हो, वह भूमि निश्चय ही पवित्र है; यह सुगंध मानो आँखों के सामने इसका प्रमाण है।
मेरा विचार: लेखक सबसे छोटी चीज — घास — से सबसे बड़ी बात सिद्ध करते हैं। इससे लगता है कि हरिद्वार की पवित्रता पूरी मिट्टी में घुली हुई है।
अर्थ: वृक्षों का जन्म धन्य है, क्योंकि उनके पास से कोई माँगने वाला (अर्थी) खाली हाथ नहीं लौटता। वे फल, फूल, सुगंध, छाया, पत्ते, छाल, बीज, लकड़ी और जड़ — सब कुछ देते हैं; जल जाने के बाद भी कोयले और राख के रूप में लोगों की इच्छा (मनोर्थ) पूरी करते हैं।
मेरा विचार: यह पंक्ति परोपकार का आदर्श रखती है — वृक्ष बिना बदले की इच्छा के, जीवन भर और उसके बाद भी देते रहते हैं।
सोच-विचार के लिए — पृष्ठ 52पाठ से
(क) “और संपादक महाशय, मैं चित्त से तो अब तक वहीं निवास करता हूँ…”
लेखक का यह वाक्य क्या दर्शाता है? क्या आपने कभी किसी स्थान को छोड़कर ऐसा अनुभव किया है? कब-कब?
(संकेत— किसी स्थान से लौटने के बाद भी उसी के विषय में सोचते रहना)
यह वाक्य दर्शाता है कि लेखक शरीर से तो हरिद्वार से लौट आए हैं, पर उनका मन (चित्त) अब भी वहीं है। हरिद्वार का अनुभव उन्हें भीतर तक छू गया था, इसलिए वे लौटकर भी उसी के बारे में सोचते रहते हैं।
नमूना उत्तर (अपना अनुभव): हाँ, पिछली गर्मियों में नानी के गाँव से लौटने के बाद कई दिनों तक मुझे वहाँ का आँगन, नीम का पेड़ और तालाब की ओर जाती पगडंडी याद आती रही। कक्षा में बैठे-बैठे भी मेरा मन गाँव में ही रहता था।
लेखक का यह कथन आज के समाज में कितना सच है? क्या अब भी ऐसे संतोषी लोग मिलते हैं? अपने विचार उदाहरण सहित लिखिए।
अर्थ: पंडे थोड़ा-सा मिलने पर भी उसे लाख जितना मानकर संतुष्ट हो जाते हैं।
मेरा विचार: आज यह कथन पूरी तरह सच नहीं, पर झूठ भी नहीं है। बाजार और विज्ञापन के कारण लोगों में असंतोष बढ़ा है; तीर्थों में भी मोल-भाव दिखता है। फिर भी संतोषी लोग आज भी मिलते हैं — जैसे हमारे मोहल्ले के बुजुर्ग साइकिल-मिस्त्री, जो तय पैसे ही लेते हैं और विद्यार्थियों से हवा भरने के पैसे नहीं लेते। इससे समझ आता है कि संतोष कमाई पर नहीं, स्वभाव पर निर्भर करता है।
आपके विचार से लेखक ने उस स्थान को ‘टिकने योग्य’ क्यों कहा है? उस स्थान में कौन-कौन सी विशेषताएँ होंगी जो उसे ‘टिकने योग्य’ बनाती होंगी?
(संकेत— केवल आराम, सुविधा या कोई और कारण भी।)
लेखक ने उस स्थान को ‘टिकने योग्य’ केवल आराम या सुविधा के कारण नहीं कहा, बल्कि इसलिए कहा कि वहाँ मन शांत रह सकता था — अगला ही वाक्य है, “चारों ओर से शीतल पवन आती थी।”
विशेषताएँ: (1) घर के ऊपर का बंगला — भीड़ और शोर से दूर, चारों ओर का दृश्य सामने; (2) शीतल, स्वच्छ हवा; (3) गंगा का घाट पास; (4) झगड़े-रहित, शांत वातावरण; (5) परिचित मेजबान का अपनापन; (6) भागवत के पारायण जैसे पाठ-पूजा के लिए अनुकूल जगह।
इस वाक्य के माध्यम से आपको वृक्षों के महत्व के बारे में कौन-कौन सी बातें सूझ रही हैं?
- वृक्ष का कोई भी अंग व्यर्थ नहीं — फल, फूल, छाया, पत्ते, छाल, बीज, लकड़ी और जड़, सब किसी न किसी काम आते हैं।
- वृक्ष बिना शर्त और बिना बदले के देते हैं; इसीलिए लेखक ने उन्हें ‘सज्जन’ कहा।
- वे जलकर भी कोयले और राख के रूप में काम आते हैं — मरकर भी देते हैं।
- इसलिए पेड़ काटना इन सब चीजों को खोना है; पेड़ लगाना और बचाना हमारा कर्तव्य है।
अनुमान और कल्पना से — पृष्ठ 52–53पाठ से
कल्पना कीजिए कि आप हरिद्वार में हैं। आप वहाँ क्या-क्या करना चाहेंगे?
यदि मैं हरिद्वार जाऊँ तो पहले हरि की पैड़ी के घाट पर बैठकर गंगा की धारा देखूँगा और जल के वेग का शब्द सुनूँगा। फिर उस छोटे पर्वत पर चढ़ूँगा जिसके शिखर पर चण्डिका देवी की मूर्ति है, ताकि ऊपर से नील धारा और गंगा की दूसरी धारा देख सकूँ। कनखल और विल्वपर्वत भी देखूँगा। शाम को घाट की सीढ़ियों पर बैठकर अपनी यात्रा-डायरी लिखूँगा और लौटते समय वहाँ एक पौधा लगाऊँगा।
कल्पना कीजिए कि आप गंगा के तट पर हैं और पानी के छींटे आपके मुँह पर आ रहे हैं। अपने अनुभवों को अपनी कल्पना से लिखिए।
मैं गंगा किनारे धूप से गरम एक पत्थर पर बैठा हूँ। धारा पत्थर से टकराती है और ठंडी-ठंडी बूँदें उछलकर मेरे मुँह पर आ गिरती हैं — इतनी ठंडी कि आँखें अपने-आप बंद हो जाती हैं। कानों में लगातार कलकल की आवाज है और दूर से घंटियों की झंकार आ रही है। सामने पानी पर एक दीया बहता जा रहा है। कुछ देर में मन बिल्कुल शांत हो जाता है — शायद इसी को लेखक ने चित्त का निर्मल होना कहा है।
यदि पेड़-पौधे सच में मनुष्यों की तरह व्यवहार करने लगें तो क्या होगा?
यदि पेड़-पौधे मनुष्यों की तरह व्यवहार करने लगें तो वे अपनी जरूरतें बता सकेंगे — कब पानी चाहिए, कौन-सी बीमारी लगी है — और कटने का विरोध भी कर सकेंगे। तब लोग पेड़ काटने से डरेंगे। पर उनमें मनुष्य के अवगुण भी आ सकते हैं — वे छाया और फल के बदले कुछ माँगेंगे, नाराज होंगे, हिसाब रखेंगे। तब ‘पत्थर मारने से फल देने’ वाली उनकी सज्जनता ही समाप्त हो जाएगी। इसलिए पेड़ जैसे हैं वैसे ही अच्छे हैं; बदलना हमें अपना व्यवहार है।
इस पाठ में ‘गंगा’ शब्द के साथ ‘श्री’ और ‘जी’ लगाया गया है। आपके अनुसार उन्होंने ऐसा क्यों किया होगा?
लेखक के लिए गंगा केवल नदी नहीं, पूज्य देवी और माता हैं। ‘श्री’ और ‘जी’ आदर-सूचक शब्द हैं, इसलिए उन्होंने आदर प्रकट करने के लिए इन्हें लगाया। यह पत्र तीर्थयात्रा और भक्ति-भाव का वर्णन है, और उस समय पूज्य नामों के साथ ‘श्री’ लगाना सामान्य था — जैसे “श्री भागवत”। इसी आदर के कारण क्रिया भी बहुवचन में है — “गंगा जी ही देवता हैं”।
सबसे पहले साथी से पूछूँगा कि उन्हें किस सहायता की आवश्यकता है।
- दृष्टिबाधित साथी के लिए: दृश्य का शब्दों में वर्णन, सीढ़ी या ढलान आने से पहले सूचना, चलते समय उन्हें अपनी कोहनी पकड़ने देना, और जल के छींटे, कलकल ध्वनि, फूलों की गंध जैसे अनुभव कराना।
- श्रवणबाधित साथी के लिए: आमने-सामने, रोशनी में बात करना; जरूरी सूचनाएँ लिखकर या संकेतों से बताना; घोषणाएँ तुरंत उन तक पहुँचाना।
- दोनों के लिए: कम भीड़ का समय, रैंप वाले रास्ते, बीच-बीच में विश्राम और बराबरी का व्यवहार।
लिखें संवाद — पृष्ठ 53पाठ से
लेखक और कल्लू जी के बीच हरिद्वार यात्रा पर एक काल्पनिक संवाद लिखिए।
नमूना संवाद
भारतेंदु: कल्लू जी, आज सवेरे घाट पर आप कहाँ रह गए थे?
कल्लू जी: नील धारा की ओर निकल गया था। एक ही गंगा जी यहाँ दो धाराओं में बँट जाती हैं!
भारतेंदु: और यहाँ के पंडे देखिए — एक पैसे को लाख करके मान लेते हैं।
कल्लू जी: सच! कल गंगा तट पर पत्थर पर बैठकर जो भोजन किया, उसका स्वाद अब तक याद है।
भारतेंदु: उस सुख के आगे सोने की थाल का भोजन भी फीका है।
कल्लू जी: लौटने का मन है?
भारतेंदु: शरीर तो लौटेगा, पर चित्त यहीं रह जाएगा। संपादक जी को यही सब लिखकर भेजूँगा।
कल्लू जी: अवश्य लिखिए, ताकि पाठक भी यह आनंद पा सकें।
लेखक और प्रकृति के बीच एक कल्पनात्मक संवाद तैयार कीजिए— जैसे पर्वत बोल रहे हों।
नमूना संवाद
पर्वत: रुको यात्री! थोड़ी देर मेरी छाया में बैठ जाओ।
भारतेंदु: आप बोलते भी हैं? मैं तो आपको केवल देख रहा था।
पर्वत: मैं तीन ओर से इस भूमि को घेरे खड़ा हूँ। मुझसे होकर आती हवा से ही यहाँ की पवन इतनी शीतल है।
भारतेंदु: आप पर फैली यह हरी वल्ली और ये तपस्वी-से वृक्ष कितने सुंदर हैं!
पर्वत: ये घाम, ओस और वर्षा सहकर भी सबको फल और छाया देते हैं। पक्षी इन पर निडर होकर कल्लोल करते हैं।
भारतेंदु: आप मेरे पाठकों से कुछ कहना चाहेंगे?
पर्वत: बस इतना — जो मुझे देखने आएँ, मुझे स्वच्छ और हरा-भरा छोड़कर जाएँ।
भारतेंदु: यह बात मैं पत्र में अवश्य लिखूँगा। प्रणाम!
‘है’ और ‘हैं’ का उपयोग — पृष्ठ 53–54पाठ से
• विशेष आश्चर्य का विषय यह है कि यहाँ केवल गंगा जी ही देवता हैं, दूसरा देवता नहीं।
• यों तो वैरागियों ने मठ मंदिर कई बना लिए हैं।
आप जानते ही हैं कि एकवचन संज्ञा शब्दों के साथ ‘है’ का प्रयोग किया जाता है और बहुवचन संज्ञा शब्दों के साथ ‘हैं’ का। सोचिए, ‘गंगा’ शब्द एकवचन है, फिर भी इसके साथ ‘हैं’ क्यों लिखा गया है?
‘गंगा’ एकवचन है, फिर भी ‘हैं’ इसलिए लिखा गया है कि लेखक गंगा को देवी मानकर उनका आदर कर रहे हैं। आदर दिखाने के लिए एकवचन संज्ञा के साथ बहुवचन क्रिया का प्रयोग आदरार्थ बहुवचन कहलाता है। (दूसरे वाक्य में ‘मठ मंदिर कई’ सचमुच अनेक हैं, इसलिए वहाँ ‘हैं’ सामान्य बहुवचन है।)
1. प्रधानाचार्य जी विद्यालय में नहीं ________, वे अभी सभा में उपस्थित ________।
2. माता-पिता हमारे जीवन के मार्गदर्शक होते ________, हमें उनका कहना मानना चाहिए।
3. मेरी बहन बाजार जा रही ________ वहाँ से किताबें ले आएगी।
4. बाहर फेरीवाला ________ ________। ________ बुला लाओ।
5. डाकिया जी आए ________। उन्हें भी बुला लाओ।
6. आप तो बहुत दिन बाद ________, ________ का स्वागत है।
7. डॉक्टर साहब बहुत विद्वान ________, ________ से परामर्श लेना चाहिए।
8. आपके माता-पिता कहाँ ________? क्या मैं ________ से मिल सकता हूँ?
9. ये हमारे हिंदी के अध्यापक ________, हम ________ से बहुत-कुछ सीखते-समझते हैं।
10. बंदर पेड़ पर उछल-कूद कर ________ ________।
- प्रधानाचार्य जी विद्यालय में नहीं हैं, वे अभी सभा में उपस्थित हैं।
- माता-पिता हमारे जीवन के मार्गदर्शक होते हैं, हमें उनका कहना मानना चाहिए।
- मेरी बहन बाजार जा रही है, वहाँ से किताबें ले आएगी।
- बाहर फेरीवाला आया है। उसे बुला लाओ।
- डाकिया जी आए हैं। उन्हें भी बुला लाओ।
- आप तो बहुत दिन बाद आए हैं, आपका स्वागत है।
- डॉक्टर साहब बहुत विद्वान हैं, उनसे परामर्श लेना चाहिए।
- आपके माता-पिता कहाँ हैं? क्या मैं उनसे मिल सकता हूँ?
- ये हमारे हिंदी के अध्यापक हैं, हम इनसे बहुत-कुछ सीखते-समझते हैं।
- बंदर पेड़ पर उछल-कूद कर रहा है।
भावों की पहचान — पृष्ठ 54–55पाठ से
(दिए गए भाव — प्रेम, संतोष, भक्ति, श्रद्धा, वैराग्य, आश्चर्य, करुणा, हास्य, शांति, परोपकार, दया, दुख)
1. उस समय के पत्थर पर का भोजन का सुख सोने की थाल के भोजन से कहीं बढ़ के था।
2. चित्त में बारंबार ज्ञान, वैराग्य और भक्ति का उदय होता था।
3. पंडे भी यहाँ बड़े विलक्षण संतोषी हैं।
4. हर तरफ पवित्रता और प्रसन्नता बिखरी हुई थी।
5. सज्जन ऐसे कि पत्थर मारने से फल देते हैं।
- संतोष — जो मिला उसी में पूरा सुख।
- भक्ति (साथ में वैराग्य) — मन ईश्वर की ओर लगा है।
- संतोष — पंडे थोड़े में ही प्रसन्न हैं।
- शांति — चारों ओर पवित्र, प्रसन्न और ठहरा हुआ वातावरण।
- परोपकार — बुराई के बदले भी भलाई करना।
काल की पहचान — पृष्ठ 55पाठ से
आप जानते ही होंगे कि काल के तीन भेद होते हैं— भूतकाल, वर्तमान काल और भविष्य काल। परस्पर चर्चा करके पता लगाइए कि ऊपर दिए गए वाक्य में कौन-सा काल प्रदर्शित हो रहा है? सही पहचाना, यह वाक्य वर्तमान काल को प्रदर्शित कर रहा है।
(क) नीचे दी गई पाठ की इन पंक्तियों को पढ़कर बताइए, इनमें क्रिया कौन-से काल को प्रदर्शित कर रही है? (भूतकाल/वर्तमान/भविष्य)
1. निश्चय है कि आप इस पत्र को स्थानदान दीजिएगा।
2. यह भूमि तीन ओर सुंदर हरे-हरे पर्वतों से घिरी है।
3. वृक्ष ऐसे हैं कि पत्थर मारने से फल देते हैं।
4. चित्त में बारंबार ज्ञान, वैराग्य और भक्ति का उदय होता था।
5. मैं दीवान कृपा राम के घर के ऊपर के बंगले पर टिका था।
- दीजिएगा — भविष्य काल
- घिरी है — वर्तमान काल
- हैं, देते हैं — वर्तमान काल
- होता था — भूतकाल
- टिका था — भूतकाल
पहचान: है/हैं → वर्तमान; था/थे → भूत; गा/गी/गे → भविष्य।
हर वाक्य को तीनों कालों में बदलकर देखिए। ध्यान रखिए — केवल क्रिया बदलेगी, वाक्य का अर्थ नहीं।
| मूल वाक्य | भूतकाल | वर्तमान काल | भविष्य काल |
|---|---|---|---|
| निश्चय है कि आप इस पत्र को स्थानदान दीजिएगा। (भविष्य) | आपने इस पत्र को स्थानदान दिया। | आप इस पत्र को स्थानदान दे रहे हैं। | — (मूल वाक्य) |
| यह भूमि तीन ओर सुंदर हरे-हरे पर्वतों से घिरी है। (वर्तमान) | यह भूमि तीन ओर सुंदर हरे-हरे पर्वतों से घिरी थी। | — (मूल वाक्य) | यह भूमि तीन ओर सुंदर हरे-हरे पर्वतों से घिरी रहेगी। |
| वृक्ष ऐसे हैं कि पत्थर मारने से फल देते हैं। (वर्तमान) | वृक्ष ऐसे थे कि पत्थर मारने से फल देते थे। | — (मूल वाक्य) | वृक्ष ऐसे होंगे कि पत्थर मारने से फल देंगे। |
| चित्त में बारंबार ज्ञान, वैराग्य और भक्ति का उदय होता था। (भूत) | — (मूल वाक्य) | चित्त में बारंबार ज्ञान, वैराग्य और भक्ति का उदय होता है। | चित्त में बारंबार ज्ञान, वैराग्य और भक्ति का उदय होगा। |
| मैं दीवान कृपा राम के घर के ऊपर के बंगले पर टिका था। (भूत) | — (मूल वाक्य) | मैं दीवान कृपा राम के घर के ऊपर के बंगले पर टिका हूँ। | मैं दीवान कृपा राम के घर के ऊपर के बंगले पर टिकूँगा। |
पत्र की रचना — पृष्ठ 55–56पाठ से
| क्रम | पत्र की विशेषताएँ | पत्र से उदाहरण |
|---|---|---|
| 1. | व्यक्तिपरकता— पत्र लेखन में लेखक के विचार, अनुभव और भावनाएँ प्रमुख होते हैं। | “ग्रहण में बड़े आनंदपूर्वक स्नान किया… |
| 2. | संवादात्मकता— पत्र संवाद का रूप है; पाठक से सीधा संवाद होता है। | श्रीमान कविवचन सुधा संपादक महामहिम मित्रवरेषु! |
| 3. | स्वाभाविक शैली— भाषा कृत्रिम नहीं होती; भावनाओं के अनुरूप होती है। | आपका मित्र — यात्री |
| 4. | व्यक्तिगत अनुभवों का वर्णन— जहाँ लेखक अपने वास्तविक अनुभव को साझा करता है | मुझे हरिद्वार का समाचार लिखने में बड़ा आनंद होता है… |
| 5. | अभिवादन या संबोधन— पत्र का आरंभ, जिसमें संबोधित व्यक्ति को आदरपूर्वक संबोधित किया जाता है। | हरिद्वार की प्राकृतिक सुंदरता, धार्मिकता, साधु-संन्यासियों का जीवन, नदी, पर्वत, जल, गंगा स्नान आदि का अत्यंत विस्तार से वर्णन। जैसे— “यह भूमि तीन ओर सुंदर हरे-हरे पर्वतों से घिरी है…” |
| 6. | हस्ताक्षर— लेखक अपने नाम या संबंध से पत्र को समाप्त करता है। | और संपादक महाशय, मैं चित्त से तो अब तक वहीं निवास करता हूँ… निश्चय है कि आप इस पत्र को स्थानदान दीजिएगा। |
| 7. | उपसंहार और निवेदन— लेखक पत्र समाप्त करता है और अपनी इच्छा या निवेदन प्रकट करता है। | एक दिन मैंने श्री गंगा जी के तट पर रसोई करके… |
| 8. | मुख्य विषय-वस्तु | और संपादक महाशय, मैं चित्त से तो अब तक वहीं निवास करता हूँ… |
एक उपयुक्त मिलान इस प्रकार बनता है —
| क्रम | पत्र की विशेषता | पत्र से उदाहरण | यही क्यों |
|---|---|---|---|
| 1. | व्यक्तिपरकता | “मुझे हरिद्वार का समाचार लिखने में बड़ा आनंद होता है…” | वाक्य का केंद्र ‘मुझे’ है — विषय हरिद्वार है, पर बात लेखक के अपने आनंद की हो रही है। |
| 2. | संवादात्मकता | “और संपादक महाशय, मैं चित्त से तो अब तक वहीं निवास करता हूँ…” | बीच वर्णन में अचानक ‘संपादक महाशय’ कहकर पाठक की ओर मुड़ना — मानो सामने बैठकर बात हो रही हो। |
| 3. | स्वाभाविक शैली | “ग्रहण में बड़े आनंदपूर्वक स्नान किया…” | न कोई सजावट, न बड़े-बड़े शब्द — जो किया, वैसा ही सीधे कह दिया। |
| 4. | व्यक्तिगत अनुभवों का वर्णन | “एक दिन मैंने श्री गंगा जी के तट पर रसोई करके…” | यह लेखक का अपना, एक विशेष दिन का अनुभव है — सामान्य जानकारी नहीं। |
| 5. | अभिवादन या संबोधन | “श्रीमान कविवचन सुधा संपादक महामहिम मित्रवरेषु!” | पत्र की पहली पंक्ति, जिसमें आदरपूर्वक संबोधन है। ‘मित्रवरेषु’ = श्रेष्ठ मित्र के प्रति। |
| 6. | हस्ताक्षर | “आपका मित्र — यात्री” | पत्र का अंतिम भाग, जहाँ लेखक अपना संबंध और पहचान लिखता है। |
| 7. | उपसंहार और निवेदन | “और संपादक महाशय, … निश्चय है कि आप इस पत्र को स्थानदान दीजिएगा।” | यह समापन भी है और निवेदन भी — पत्र छापने की प्रार्थना। |
| 8. | मुख्य विषय-वस्तु | हरिद्वार की प्राकृतिक सुंदरता, धार्मिकता, साधु-संन्यासियों का जीवन, नदी, पर्वत, जल, गंगा स्नान आदि का विस्तार से वर्णन — जैसे “यह भूमि तीन ओर सुंदर हरे-हरे पर्वतों से घिरी है…” | यह किसी एक पंक्ति की नहीं, पूरे पत्र की सामग्री की बात है — यही उसका विषय है। |
पत्र — पृष्ठ 56पाठ से
नमूना पत्र
14, शिवाजी नगर
भोपाल (म.प्र.)
दिनांक: 12 अक्टूबर 20XX
पूज्य मामा जी,
सादर प्रणाम।
आशा है आप सब सकुशल होंगे। पिछले सप्ताह हमारे विद्यालय की ओर से हम भीमबेटका की गुफाएँ देखने गए। रास्ते में बरसात के बाद ऐसी हरियाली थी मानो धरती पर हरी चादर बिछी हो। गुफाओं की दीवारों पर लाल और सफेद रंग से बने हजारों वर्ष पुराने चित्र थे — हिरन, बैल, नाचते और शिकार करते लोग। उन्हें देखकर मैं देर तक चुप खड़ा रहा। दोपहर में हमने चट्टान की छाया में बैठकर घर से लाया भोजन मिल-जुलकर खाया, जो किसी होटल के खाने से अच्छा लगा। यह यात्रा मुझे सदा याद रहेगी।
मामी जी को प्रणाम और छोटी बहन को स्नेह। उत्तर अवश्य दीजिएगा।
आपका भांजा
अनुराग
शब्द से जुड़े शब्द — पृष्ठ 57पाठ से
भरा हुआ शब्द-जाल (नमूना): गंगा, हरि की पैड़ी, नील धारा, कनखल, विल्वपर्वत, कुशा, धर्मशाला
लेखन के अनोखे तरीके — पृष्ठ 57–58पाठ से
नीचे कुछ तुलनात्मक वाक्य दिए गए हैं। पाठ में ढूँढ़िए कि इन तुलनात्मक वाक्यों को लेखक ने किस प्रकार विशिष्ट तरीके से लिखा है यानी विशिष्टता प्रदान की है?
1. वृक्षों की तुलना साधुओं से की गई है।
2. गंगाजल की मिठास की तुलना चीनी से की गई है।
3. हरियाली की तुलना गलीचे से की गई है।
4. नदी की धारा की तुलना राजा भगीरथ के यश (कीर्ति) से की गई है।
पाठ की मूल पंक्तियाँ ये हैं —
| क्रम | लेखक की अपनी पंक्ति | विशिष्टता कहाँ है |
|---|---|---|
| 1. | “बड़े-बड़े वृक्ष भी ऐसे खड़े हैं मानो एक पैर से खड़े तपस्या करते हैं और साधुओं की भाँति घाम, ओस और वर्षा अपने ऊपर सहते हैं।” | केवल ‘वृक्ष साधु जैसे हैं’ नहीं कहा। पहले मुद्रा दिखाई — एक पैर पर खड़ा तपस्वी — फिर तीन कष्ट गिनाए (घाम, ओस, वर्षा)। इससे तुलना एक पूरा चित्र बन गई। |
| 2. | “जल यहाँ का अत्यंत शीतल है और मिष्ट भी वैसा ही है मानो चीनी के पने को बरफ में जमाया है।” | यहाँ एक साथ दो गुण पकड़े गए हैं — ठंडक और मिठास। ‘चीनी का पना’ मिठास देता है, ‘बरफ में जमाना’ ठंडक। एक ही कल्पना में दोनों समा गए। |
| 3. | “वर्षा के कारण सब ओर हरियाली ही दिखाई पड़ती थी मानो हरे गलीचा की जात्रियों के विश्राम के हेतु बिछायत बिछी थी।” | गलीचा केवल सुंदरता के लिए नहीं आया — उसका प्रयोजन भी बताया गया, “जात्रियों के विश्राम के हेतु”। इससे प्रकृति एक मेजबान बन जाती है जो यात्रियों के लिए बिछावन बिछा रही है। |
| 4. | “एक ओर त्रिभुवन पावनी श्री गंगा जी की पवित्र धारा बहती है जो राजा भगीरथ के उज्ज्वल कीर्ति की लता-सी दिखाई देती है।” | सबसे सूक्ष्म तुलना। धारा दिखाई देती है, कीर्ति दिखाई नहीं देती — फिर भी ‘लता-सी’ जोड़कर लेखक ने दोनों को मिला दिया, क्योंकि दोनों दूर तक फैलती हैं। साथ ही यह कथा भी याद दिला दी कि गंगा को भगीरथ ही लाए थे। |
उपर्युक्त पंक्तियों को ध्यान से देखिए, ये आज की हिंदी की तरह नहीं लिखी गई हैं। इसे लेखक ने न केवल अपनी शैली में लिखा है, अपितु इसमें प्राचीन हिंदी भाषा की छवि भी दिखाई देती है। नीचे कुछ पंक्तियाँ दी गई हैं आप इन्हें आज की हिंदी में लिखिए।
1. “इन वृक्षों पर अनेक रंग के पक्षी चहचहाते हैं और नगर के दुष्ट बधिकों से निडर होकर कल्लोल करते हैं।”
2. “वर्षा के कारण सब ओर हरियाली ही दृष्टि पड़ती थी मानो हरे गलीचा की जात्रियों के विश्राम के हेतु बिछायत बिछी थी।”
3. “यह ऐसा निर्मल तीर्थ है कि इच्छा क्रोध की खानि जो मनुष्य हैं सो वहाँ रहते ही नहीं।”
4. “मेरा तो चित्त वहाँ जाते ही ऐसा प्रसन्न और निर्मल हुआ कि वर्णन के बाहर है।”
5. “यहाँ रात्रि को ग्रहण हुआ और हम लोगों ने ग्रहण में बड़े आनंदपूर्वक स्नान किया और दिन में श्री भागवत का पारायण भी किया।”
6. “उस समय के पत्थर पर का भोजन का सुख सोने की थाल के भोजन से कहीं बढ़ के था।”
7. “निश्चय है कि आप इस पत्र को स्थानदान दीजिएगा।”
आज की हिंदी में —
| क्रम | आज की हिंदी में |
|---|---|
| 1. | इन पेड़ों पर रंग-बिरंगे पक्षी चहचहाते हैं और शहर के क्रूर शिकारियों का डर छोड़कर मस्ती से चहकते-खेलते रहते हैं। |
| 2. | बारिश की वजह से चारों ओर हरियाली ही दिखाई देती थी, मानो यात्रियों के आराम के लिए हरे रंग का कालीन बिछा दिया गया हो। |
| 3. | यह तीर्थ इतना पवित्र है कि लालच और गुस्से से भरे हुए लोग वहाँ टिक ही नहीं पाते। |
| 4. | वहाँ पहुँचते ही मेरा मन इतना प्रसन्न और शांत हो गया कि उसका वर्णन किया ही नहीं जा सकता। |
| 5. | यहाँ रात में ग्रहण लगा और हम सबने ग्रहण के समय बड़े आनंद से स्नान किया तथा दिन में श्रीमद्भागवत का पूरा पाठ भी किया। |
| 6. | उस समय पत्थर पर बैठकर खाए गए भोजन का सुख सोने की थाली में खाए गए भोजन से कहीं अधिक था। |
| 7. | मुझे विश्वास है कि आप इस पत्र को अपनी पत्रिका में जगह देंगे (छापेंगे)। |
पाठ में मिलने वाली प्राचीन वर्तनी और आज का रूप —
| पाठ में (प्राचीन वर्तनी) | आज हम ऐसे लिखते हैं | अंतर किस तरह का है |
|---|---|---|
| शिषर | शिखर | ‘ख’ के स्थान पर ‘ष’ |
| जात्रियों | यात्रियों | ‘य’ के स्थान पर ‘ज’ |
| मनोर्थ | मनोरथ | ‘रथ’ के स्थान पर ‘र्थ’ (र आधा होकर रेफ बन गया) |
| ठंढे-ठंढे | ठंडे-ठंडे | ‘ड’ के स्थान पर ‘ढ’ |
| बरफ | बर्फ | ‘र’ पर रेफ न लगाकर पूरा ‘र’ लिखना |
| प्रगट | प्रकट | ‘क’ के स्थान पर ‘ग’ |
| कुशावर्त्त | कुशावर्त | दोहरा ‘त्त’, आज एक ‘त’ |
| चण्डिका | चंडिका | आधे ‘ण्’ के स्थान पर अनुस्वार (ं) |
| धारों | धाराओं | बहुवचन बनाने का पुराना ढंग |
| कनों | कणों | ‘ण’ के स्थान पर ‘न’ |
| खानि | खान | शब्द का पुराना रूप (अंत में ‘इ’) |
| विल्वपर्वत, विल्वेश्वर | बिल्वपर्वत, बिल्वेश्वर | ‘ब’ के स्थान पर ‘व’ |
| साक्षात | साक्षात् | अंत का हलंत (्) आज लगाया जाता है |
आपकी बात — पृष्ठ 58पाठ से आगे
क्या आपने कभी खुले वातावरण में या प्रकृति के पास भोजन किया है? वह अनुभव घर के खाने से कैसे भिन्न था?
हाँ, पिछले वर्ष हमारी कक्षा भ्रमण पर बाँध के किनारे गई थी। दोपहर में हम सब पीपल के नीचे बैठे, पत्तल बिछाई और सबने अपने टिफिन बीच में रखकर मिल-जुलकर खाया। ऊपर से पत्तों में छनकर धूप आ रही थी, सामने पानी हिल रहा था और पक्षी बोल रहे थे। घर में मैं जल्दी-जल्दी खाता हूँ, पर उस दिन सबने आराम से, हँसते-बोलते खाया। वही साधारण रोटी उस दिन बहुत स्वादिष्ट लगी — खुली हवा, भूख और साथियों के साथ ने स्वाद बढ़ा दिया।
आपके जीवन में ऐसा कोई क्षण आया, जब किसी सामान्य-सी वस्तु ने आपको गहरा सुख दिया हो? उसके बारे में बताइए।
हाँ, पिछली गर्मियों में एक दोपहर मैं साइकिल से लौट रहा था। लू चल रही थी और मेरी बोतल का पानी खत्म हो चुका था। रास्ते में एक बुजुर्ग दुकानदार ने मिट्टी की सुराही से मुझे एक गिलास पानी दिया। वह साधारण पानी उस समय मुझे किसी भी ठंडे पेय से अधिक सुख दे गया। तब समझ आया कि वस्तु वही थी; अंतर मेरी जरूरत और उस व्यक्ति के अपनेपन का था।
आपको किस स्थान पर पवित्रता और प्रसन्नता का अनुभव होता है? क्या कोई ऐसा स्थान है जहाँ जाते ही मन शांत हो गया हो? उस स्थान की कौन-सी बातें आपको अच्छी लगीं?
हमारे मोहल्ले के पीछे एक पुराना बगीचा है जिसमें एक बड़ा बरगद है। शाम को उसकी जड़ों पर बैठते ही सड़क का शोर दूर लगने लगता है। ऊपर पत्तों की सरसराहट और लौटते पक्षियों की आवाज आती है, पानी छिड़की मिट्टी की गंध उठती है। वहाँ कोई कुछ नहीं पूछता, कोई काम याद नहीं दिलाता, इसलिए मन शांत हो जाता है। मुझे वहाँ की शांति, हरियाली और पक्षियों की आवाज सबसे अच्छी लगती है।
क्या आपके जीवन में कोई पेड़, फूल या प्राकृतिक वस्तु है जिससे आप विशेष जुड़ाव महसूस करते हैं? क्यों?
हाँ, हमारे आँगन का अमरूद का पेड़, जिसे दादा जी ने मेरे जन्म के वर्ष लगाया था। मैं और वह पेड़ साथ-साथ बड़े हुए हैं। गर्मियों में उसकी छाया में चारपाई डलती है और सर्दियों में उसके फल पूरे मोहल्ले में बँटते हैं। पिछले वर्ष आँधी में उसकी एक डाल टूटी तो मुझे लगा जैसे घर का कोई सदस्य घायल हो गया हो। मेरा उससे जुड़ाव इसलिए है कि वह बिना कुछ माँगे हमेशा देता रहता है।
प्रकृति का सौंदर्य और संरक्षण — पृष्ठ 58–59पाठ से आगे
आपने पत्र में पढ़ा कि हरिद्वार का प्राकृतिक सौंदर्य अद्भुत है। इस सौंदर्य को बनाए रखने में प्रत्येक मानव की महत्वपूर्ण भूमिका है। इस विषय में अपने समूह में चर्चा कीजिए। इसके बाद अपने समूह के साथ मिलकर “तीर्थ ही नहीं, पृथ्वी भी पावन हो!” विषय पर जन-जागरूकता पोस्टर बनाइए।
चर्चा के मुख्य बिंदु: तीर्थों पर प्लास्टिक, नदी में बहाई गई पूजा-सामग्री, भीड़, धुआँ और अनियोजित निर्माण प्रकृति को हानि पहुँचाते हैं। पवित्रता केवल तीर्थ की नहीं, पूरी पृथ्वी की रक्षा से आती है। हर व्यक्ति कचरा वापस लाकर, कपड़े का थैला अपनाकर, पानी बचाकर और पौधे लगाकर योगदान दे सकता है।
नमूना पोस्टर (सामग्री)
(चित्र: बीच में एक नदी और उसके किनारे पर्वत; एक ओर कचरा-मुक्त स्वच्छ घाट, दूसरी ओर कूड़े से भरा घाट)
• जो साथ लाए हैं, वही वापस ले जाएँ
• नदी को भेंट फूल चढ़ाइए, पॉलीथिन नहीं
• एक यात्रा, एक पौधा
• पवित्रता जल में नहीं, व्यवहार में है
— कक्षा 8, पर्यावरण मंडल
स्वास्थ्य और योग — पृष्ठ 59पाठ से आगे
(क) 5 मिनट ध्यान लगाकर या मौन बैठकर अपने आस-पास की ध्वनियों को सुनिए, अपनी श्वास पर ध्यान दीजिए तथा ध्यान को केंद्रित करने का प्रयास कीजिए। इस अनुभव के विषय में एक अनुच्छेद लिखिए।
नमूना अनुच्छेद: जब मैं आँखें बंद करके बैठा तो पहले मिनट में मन इधर-उधर भागता रहा — कभी गृहकार्य याद आया, कभी खेल। फिर मैंने ध्यान साँस पर लगाया; भीतर जाती हवा ठंडी और बाहर आती हवा हल्की गरम लगी। धीरे-धीरे आवाजें अलग-अलग सुनाई देने लगीं — पंखे की घरघराहट, दूर गाड़ी का हॉर्न, पेड़ पर चिड़िया की चहचहाहट। ये आवाजें पहले भी थीं, पर मैंने कभी ध्यान से नहीं सुनी थीं। पाँच मिनट बाद शरीर हल्का और मन शांत लगा।
नमूना सूचना
सूचना
दिनांक: 14 जून 20XX
विषय — अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के कार्यक्रम
समस्त विद्यार्थियों को सूचित किया जाता है कि 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के अवसर पर विद्यालय में निम्नलिखित कार्यक्रम आयोजित किए जाएँगे —
1. सामूहिक योगाभ्यास — प्रातः 6:30 से 7:30 बजे तक, विद्यालय प्रांगण में
2. ‘योग और स्वस्थ जीवन’ विषय पर व्याख्यान — प्रातः 8:00 बजे, सभागार में
3. पोस्टर एवं निबंध प्रतियोगिता — प्रातः 9:00 बजे, कक्षा-कक्षों में
सभी विद्यार्थी सफेद वेशभूषा में उपस्थित हों तथा अपने साथ योग-मैट या चादर अवश्य लाएँ। नाम 19 जून तक कक्षाध्यापक के पास लिखवा दें।
कु. मीरा वर्मा
सचिव, विद्यार्थी परिषद्
सज्जन वृक्ष — पृष्ठ 59पाठ से आगे
(क) एक पौधा लगाइए और उसकी देखभाल कीजिए ताकि वह कुछ वर्षों में बड़ा पेड़ बन सके। उसे एक नाम दीजिए और उसका मित्र बनिए।
यह करके देखने की गतिविधि है। क्रम: (1) अपने क्षेत्र का स्थानीय पौधा चुनिए — नीम, पीपल, अमरूद, जामुन आदि। (2) धूप वाली खुली जगह चुनिए। (3) गड्ढे में खाद डालकर पौधा लगाइए, मिट्टी दबाकर पानी दीजिए और घेरा बनाइए। (4) शुरू में रोज, फिर सप्ताह में दो-तीन बार पानी दीजिए; खरपतवार हटाइए। (5) पौधे को नाम दीजिए — जैसे ‘सज्जन’।
| मेरा पौधा | विवरण |
|---|---|
| नाम | सज्जन |
| प्रकार | नीम |
| लगाने का दिनांक | 5 जुलाई 20XX |
| स्थान | विद्यालय के मैदान का उत्तरी कोना |
| देखभाल का दिन | प्रत्येक मंगलवार और शनिवार |
नमूना प्रविष्टियाँ
5 जुलाई, शनिवार — आज ‘सज्जन’ (नीम) को मैदान के उत्तरी कोने में लगाया। ऊँचाई लगभग एक बित्ता। दो लोटा पानी दिया और बाँस का घेरा बनाया।
19 जुलाई, शनिवार — दो नई, हल्की हरी पत्तियाँ निकलीं। बारिश के कारण पानी नहीं देना पड़ा। नीचे उगी घास हटाई।
16 अगस्त, शनिवार — ऊँचाई लगभग डेढ़ फुट। कुछ पत्तियाँ कटी मिलीं; माली काका ने नीम के पत्तों का पानी छिड़कने को कहा। आज पहली बार एक गौरैया घेरे पर आकर बैठी।
अपने शब्द — पृष्ठ 59–60पाठ से आगे
आइए, एक रोचक गतिविधि करते हैं। ‘शीतल’ शब्द को केंद्र में रखिए और उसके चारों ओर ये चार बातें लिखिए—
‘शीतल’ का शब्द-चित्र
| खाना | भरिए |
|---|---|
| अर्थ | ठंडा; जिसे छूने या पास होने से ठंडक और सुख मिले |
| समानार्थी शब्द | ठंडा, शीत, सर्द |
| विपरीतार्थक शब्द | उष्ण, गरम, तप्त |
| वाक्य प्रयोग | पर्वतों से आती शीतल वायु ने दोपहर की सारी थकान मिटा दी। |
यात्रा के व्यय की गणना — पृष्ठ 60पाठ से आगे
(क) मान लीजिए कि यात्रा के लिए आपको ₹1000 दिए गए हैं। यात्रा, खाना आदि सब मिलाकर एक व्यय विवरण बनाइए।
चुना गया स्थान: अपने शहर से लगभग 60 किलोमीटर दूर एक पुराना किला और उसके पास का तालाब — एक दिन की यात्रा, चार मित्रों के साथ।
| क्रम | मद | ब्योरा | राशि (₹) |
|---|---|---|---|
| 1. | बस का किराया (आना-जाना) | ₹120 एक ओर × 2 | 240 |
| 2. | प्रवेश शुल्क | किला — विद्यार्थी टिकट | 40 |
| 3. | सुबह का नाश्ता | बस अड्डे पर | 80 |
| 4. | दोपहर का भोजन | स्थानीय भोजनालय में थाली | 150 |
| 5. | पानी और पेय | बोतल तथा नींबू-पानी | 60 |
| 6. | स्थानीय ऑटो/रिक्शा | बस अड्डे से किले तक और वापस | 120 |
| 7. | स्मृति चिह्न | छोटी वस्तु (प्रश्न ख देखिए) | 100 |
| 8. | आपात के लिए बचत | देर हो जाने, दवा या बस छूटने की स्थिति के लिए | 210 |
| कुल | 1000 |
240 + 40 = 280
280 + 80 = 360
360 + 150 = 510
510 + 60 = 570
570 + 120 = 690
690 + 100 = 790
790 + 210 = 1000 ✔
(संकेत — सोचिए, क्या वह आवश्यक है? बजट कैसे संभालेंगे?)
मैं उस स्थान के कारीगरों की बनाई एक छोटी वस्तु — जैसे हाथ से बुना कपड़े का थैला — लगभग ₹100 में खरीदूँगा। कारण: यह उसी जगह की पहचान है, पैसा स्थानीय कारीगर तक पहुँचता है और थैला रोज काम आएगा (पॉलीथिन भी कम होगी)।
यह आवश्यक वस्तु नहीं है, इसलिए इसे बजट में सबसे अंत में रखूँगा: पहले ₹100 की सीमा तय करूँगा, दो-तीन दुकानों पर दाम देखूँगा और लौटते समय, बचे पैसे देखकर ही खरीदूँगा।
यात्रा सबके लिए — पृष्ठ 60–61पाठ से आगे
गाइड के रूप में मैं इन बातों का ध्यान रखूँगा —
- पहले से: हर व्यक्ति से पूछूँगा कि उसे क्या सहायता चाहिए; दवाइयाँ, पानी, कान की मशीन की बैटरी आदि की सूची बनवाऊँगा।
- पहुँचने में: रैंप या नीची सीढ़ी वाली गाड़ी; पहियेदार कुर्सी वाली महिला और शिशु वाली माता के लिए दरवाजे के पास सीट।
- घूमने में: ढलान वाले रास्ते, सबसे धीमे व्यक्ति की चाल से चलना; दृष्टिबाधित साथी को दृश्य शब्दों में और श्रवणबाधित को लिखकर या संकेत से बताना।
- भोजन में: हल्का भोजन, सबकी पसंद और एलर्जी का ध्यान, पास में शौचालय और पानी।
- सुरक्षा: सबके पास मेरा नंबर, मिलने का तय स्थान और प्राथमिक चिकित्सा पेटी।
संकेतों से बात करने पर सरल बातें तो कही जा सकती हैं, पर नई जानकारी (जैसे ‘गाड़ी देर से आएगी’) देना कठिन होता है — यही कठिनाई श्रवणबाधित यात्री के सामने आती है।
उनके लिए आवश्यक होगा: सूचनाएँ लिखकर या मोबाइल पर दिखाना; आमने-सामने, रोशनी में, धीरे और साफ बोलना ताकि वे होंठ पढ़ सकें; सांकेतिक भाषा या पहले से तय संकेत; नक्शे, चित्र और डिस्प्ले बोर्ड जैसे दृश्य संकेत; कान की मशीन की अतिरिक्त बैटरी; और बराबरी का, सम्मानपूर्ण व्यवहार।
ऐतिहासिक धरोहरों की सुरक्षा के लिए मैं —
- दीवारों पर नाम नहीं लिखूँगा, न खुरचूँगा;
- मूर्तियों, नक्काशी और भित्तिचित्रों को नहीं छूऊँगा;
- कचरा केवल कूड़ेदान में डालूँगा;
- दीवारों-रेलिंग पर नहीं चढ़ूँगा, जहाँ मना हो वहाँ फ्लैश से फोटो नहीं लूँगा;
- कोई पत्थर या टुकड़ा ‘निशानी’ के रूप में नहीं ले जाऊँगा;
- निर्धारित रास्ते पर चलूँगा, सूचना-पटों और कर्मचारियों की बात मानूँगा, और नुकसान दिखे तो उसकी सूचना दूँगा।
आज की पहेली — पृष्ठ 61पाठ से आगे
1. एक मसाले का नाम ____________
2. कपास से जुड़ा एक शब्द ____________
3. जहाँ स्नान होता है ____________
4. वृक्ष के किसी अंग का नाम ____________
5. एक नगर या तीर्थ का नाम ____________
6. व्यापार से जुड़ा स्थान ____________
7. एक नदी का नाम ____________
8. एक पर्वत का नाम ____________
9. एक धार्मिक ग्रंथ का नाम ____________
- दालचीनी (या जावित्री)
- जनेऊ
- घाट (हरि की पैड़ी)
- छाल (या पत्ते, जड़, बीज)
- कनखल (या हरिद्वार, ज्वालापुर)
- दुकान
- गंगा
- विल्वपर्वत
- भागवत
झरोखे से — हरिद्वार के मार्ग में — पृष्ठ 61पाठ से आगे
हरिद्वार के मार्ग में — “हरिद्वार के मार्ग में अनेक प्रकार के वृक्ष और पक्षी देखने में आए। एक पीले रंग का पक्षी छोटा बहुत मनोहर देखा गया। बया एक छोटी चिड़िया है उसके घोंसले बहुत मिले। ये घोंसले सूखे बबूल काँटे के वृक्ष में हैं और एक-एक डाल में लड़ी की भाँति बीस-बीस, तीस-तीस लटकते हैं। इन पक्षियों की शिल्पविद्या तो प्रसिद्ध ही है, लिखने का कुछ काम नहीं है। इसी से इनका सब चातुर्य प्रगट है कि सब वृक्ष छोड़ के काँटे के वृक्ष में घर बनाया है। इसके आगे ज्वालापुर और कनखल और हरिद्वार हैं, जिसका वृत्तांत अगले नंबरों में लिखूँगा।”
अंश का सार: हरिद्वार के रास्ते में लेखक ने अनेक वृक्ष और पक्षी देखे — एक छोटा, मनोहर पीला पक्षी और बया चिड़िया के बहुत-से घोंसले। ये घोंसले सूखे बबूल के काँटेदार पेड़ पर एक-एक डाल में लड़ी की तरह बीस-तीस लटके थे। लेखक कहते हैं कि बया की शिल्पविद्या प्रसिद्ध है और उसकी चतुराई इसी से दिखती है कि उसने सब पेड़ छोड़कर काँटेदार पेड़ पर घर बनाया, जहाँ शत्रु आसानी से नहीं पहुँच पाते। आगे के स्थानों का वृत्तांत वे पत्रिका के अगले अंकों (‘नंबरों’) में लिखने की बात कहते हैं।
खोजबीन के लिए — पृष्ठ 62पाठ से आगे
यह पढ़कर चर्चा करने की परियोजना है। नाटक-परिचय: ‘अंधेर नगरी’ (1881) भारतेंदु का छह अंकों का हास्य-व्यंग्य नाटक (प्रहसन) है। महंत और उनका चेला गोबरधनदास एक ऐसे नगर में पहुँचते हैं जहाँ हर चीज ‘टके सेर’ बिकती है। महंत वहाँ से चले जाते हैं, पर लालची गोबरधनदास रुक जाता है और मूर्ख राजा के अन्याय से फाँसी चढ़ने वाला होता है; अंत में महंत उसे बचाते हैं।
चर्चा का मुख्य बिंदु: मूर्ख शासक के राज्य में न्याय नहीं होता, और लालच मनुष्य को संकट में डालता है।
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NCERT Solutions Class 8 Hindi Chapter 4 हरिद्वार – Overview
| Class | Class 8 |
| Subject | Hindi |
| Chapter | 4 – हरिद्वार |
| Session | 2027 |
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NCERT Solutions Class 8 Hindi Chapter 4 – FAQs
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