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NCERT Solutions for Class 8 Sanskrit Chapter 12 सम्यग्वर्णप्रयोगेण ब्रह्मलोके महीयते (PDF) – 2027

NCERT Solutions for Class 8 Sanskrit Chapter 12 सम्यग्वर्णप्रयोगेण ब्रह्मलोके महीयते – step-by-step answers to every exercise and in-text question of the chapter, as per the latest NCERT syllabus for 2027. Read them online or download the free question-answer PDF.

NCERT कक्षा 8 संस्कृत की पाठ्यपुस्तक दीपकम् के द्वादशः पाठः — सम्यग्वर्णप्रयोगेण ब्रह्मलोके महीयते के प्रश्नों के उत्तर तथा पाठ की अध्ययन-सामग्री। यह शिक्षा (वेदाङ्ग) विषय का पद्यात्मक पाठ है, जिसमें पाँच श्लोकों के द्वारा बताया गया है कि वर्णों का उच्चारण न तो अस्पष्ट (अव्यक्त) हो और न ही आवश्यकता से अधिक ज़ोर लगाकर (पीडित) — जैसे बाघिन अपने बच्चों को दाँतों में इस प्रकार पकड़ती है कि वे न गिरें और न घायल हों। पाठ के आरम्भ में आचार्य कक्षा में इन्द्र और वृत्रासुर की कथा सुनाते हैं, जहाँ एक स्वर के बदल जाने से ‘इन्द्रशत्रुः’ का अर्थ ही उलट गया। नीचे पृष्ठ 137 से 145 तक का चित्र-संवाद तथा कथा, पाँचों श्लोकों का पदच्छेद–अन्वय–अर्थ–भाव, वयं शब्दार्थान् जानीमः की पूरी सारणी, अत्र इदम् अवधेयम् (षट् वेदाङ्गानि), अभ्यासात् जायते सिद्धिः के प्रश्न १–६ का प्रत्येक उपभाग, योग्यताविस्तरः (क तथा ख) और परियोजनाकार्यम् क्रमशः दिए गए हैं — पहले संस्कृत उत्तर, फिर कोष्ठक में हिन्दी अर्थ। चित्र-संवाद, श्लोकों, अवधेय-पेटिका तथा योग्यताविस्तर (ख) पर दिए गए प्रश्न पुस्तक में नहीं हैं — वे अतिरिक्त अभ्यास हैं।

NCERT Solutions for Class 8 Sanskrit Chapter 12 सम्यग्वर्णप्रयोगेण ब्रह्मलोके महीयते PDF

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पाठ का हिंदी अनुवाद

चित्र-संवादः और कथा — इन्द्र और वृत्रासुर (पृष्ठ 137)
नमस्ते आचार्य ! अद्य वयम् एकां कथां श्रोतुम् इच्छामः। कृपया कथां श्रावयति वा महोदय !
छात्र — नमस्ते आचार्य जी! आज हम एक कथा सुनना चाहते हैं। महोदय, कृपया (हमें) कथा सुनाइए न!
नमस्ते छात्राः ! भवतां मनोरञ्जनार्थम् आदौ कथाश्रवणम्। अनन्तरं पाठनम्।
आचार्य — नमस्ते छात्रो! आप लोगों के मनोरंजन के लिए पहले कथा सुनना (होगा), उसके बाद पढ़ाई।
तर्हि सावधानं शृण्वन्तु।
आचार्य — तो ध्यान से सुनिए।
देवानां राजा इन्द्रः, असुराणां च राजा आसीत् वृत्रासुरः। देवानाम् असुराणां च मध्ये सर्वदा वैरभावः भवति एव।
देवताओं के राजा इन्द्र थे और असुरों का राजा वृत्रासुर था। देवताओं और असुरों के बीच सदा शत्रुता का भाव रहता ही है।
स्वस्य बलं वर्धयितुम् इन्द्रं जेतुं च वृत्रासुरः यज्ञं कारितवान्। यज्ञे आहुतिमन्त्रः आसीत् — ‘इन्द्रशत्रुर्वर्धस्व’ इति।
अपना बल बढ़ाने के लिए और इन्द्र को जीतने के लिए वृत्रासुर ने यज्ञ करवाया। यज्ञ में आहुति का मन्त्र था — ‘इन्द्रशत्रुर्वर्धस्व’ (अर्थात् इन्द्र का शत्रु बढ़े)।
यज्ञावसाने वृत्रासुरो बली भूत्वा जनान् पीडयिष्यति इति विचार्य ऋत्विजः मन्त्रे स्वरं परिवर्तितवन्तः। स्वरपरिवर्तनेन अर्थः परिवर्तितः।
‘यज्ञ के अन्त में वृत्रासुर बलवान होकर लोगों को सताएगा’ — ऐसा सोचकर पुरोहितों (ऋत्विजों) ने मन्त्र में स्वर बदल दिया। स्वर बदलने से अर्थ बदल गया।
परिणामतः वृत्रासुरस्य स्थाने इन्द्रस्य बलं वर्धितम्। बलवान् इन्द्रः वज्रेण वृत्रासुरं मारितवान्।
परिणामस्वरूप वृत्रासुर के स्थान पर इन्द्र का बल बढ़ गया। बलवान इन्द्र ने वज्र से वृत्रासुर को मार डाला।
(भाव: स्वर बदलने से ‘इन्द्रशत्रुः’ का अर्थ ‘इन्द्र का शत्रु (नाशक)’ न रहकर ‘इन्द्र जिसका शत्रु (नाशक) है’ हो गया।)
बहु सुन्दरी कथा महोदय ! तर्हि वयमपि पठनकाले भाषणकाले च स्पष्टं शुद्धं च उच्चारणं कुर्मः।
हिमानी — महोदय, बहुत सुन्दर कथा है! तो हम भी पढ़ते समय और बोलते समय स्पष्ट और शुद्ध उच्चारण करेंगे।
त्वं यथार्थं भाषसे हिमानि ! शुद्धोच्चारणस्य सन्दर्भे एव अधुना एतं विषयं पठामः।
आचार्य — हिमानी! तुम ठीक कहती हो। शुद्ध उच्चारण के सन्दर्भ में ही अब हम यह विषय पढ़ते हैं।
श्लोकाः और भावार्थः (पृष्ठ 138–140)
यद्यपि बहु नाधीषे तथापि पठ पुत्र व्याकरणम्।
स्वजनः श्वजनो माभूत् सकलं शकलं सकृत् शकृत्॥ १ ॥
हे पुत्र! यद्यपि तुम बहुत (अधिक) नहीं पढ़ते हो, फिर भी व्याकरण (अवश्य) पढ़ो, जिससे (उच्चारण में) ‘स्वजन’ (अपना बन्धु) ‘श्वजन’ (कुत्ता), ‘सकल’ (सम्पूर्ण) ‘शकल’ (टुकड़ा) और ‘सकृत्’ (एक बार) ‘शकृत्’ (विष्ठा) न हो जाए॥ १ ॥
भावार्थः – अयि पुत्र ! यद्यपि भवान् वा बहून् विषयान् पठितुं न पारयति तथापि व्याकरणं तु अवश्यं पठतु। येन उच्चारणसमये स्वजनः (अर्थात् बन्धुः) इत्यस्य स्थाने श्वजनः (अर्थात् शुनकः) इति न भवेत्।
भावार्थ — हे पुत्र! यद्यपि आप बहुत-से विषय पढ़ने में समर्थ नहीं हैं, फिर भी व्याकरण तो अवश्य पढ़िए, जिससे उच्चारण के समय ‘स्वजनः’ (अर्थात् बन्धु) के स्थान पर ‘श्वजनः’ (अर्थात् कुत्ता) न हो जाए।
एवमेव, सकृत् (अर्थात् एकवारम्) इत्यस्य स्थाने शकृत् (अर्थात् विष्ठा) इति, सकलम् (पूर्णम्) इत्यस्य स्थाने शकलं (खण्डम्) इति दोषपूर्णम् उच्चारणं न भवेत्। अत्र स्वजनः इत्यादीनाम् उदाहरणद्वारा एकस्य वर्णस्य उच्चारणस्य दोषेण कथं समग्रपदस्य अर्थः परिवर्तितः भवति इति दर्शितम्।
इसी प्रकार ‘सकृत्’ (अर्थात् एक बार) के स्थान पर ‘शकृत्’ (अर्थात् विष्ठा) और ‘सकलम्’ (पूरा) के स्थान पर ‘शकलम्’ (टुकड़ा) — ऐसा दोषपूर्ण उच्चारण न हो। यहाँ ‘स्वजनः’ आदि उदाहरणों द्वारा दिखाया गया है कि एक वर्ण के उच्चारण के दोष से पूरे पद (शब्द) का अर्थ कैसे बदल जाता है।
व्याघ्री यथा हरेत् पुत्रान् दंष्ट्राभ्यां न च पीडयेत्।
भीता पतनभेदाभ्यां तद्वद् वर्णान् प्रयोजयेत्॥ २ ॥
जैसे (बच्चों के) गिरने और (दाँत से) घायल होने के डर से डरी हुई बाघिन अपने बच्चों को दाँतों से उठाकर ले जाती है, पर उन्हें कष्ट नहीं देती, वैसे ही (मनुष्य को) वर्णों का उच्चारण करना चाहिए॥ २ ॥
भावार्थः – व्याघ्री स्वशिशुं दन्तैः नयति। तस्याः दन्ताः अतीव तीक्ष्णाः भवन्ति। अतः सा शिशुं तथा न गृह्णाति येन शिशुः क्षतः भवेत्।
भावार्थ — बाघिन अपने बच्चे को दाँतों से (पकड़कर) ले जाती है। उसके दाँत बहुत तेज़ (नुकीले) होते हैं। इसलिए वह बच्चे को इस प्रकार नहीं पकड़ती कि बच्चा घायल हो जाए।
एवमेव तथा न गृह्णाति येन शिशुः पतेत्। वर्णानाम् उच्चारणम् अपि तथैव कर्तव्यम्। वर्णोच्चारणम् अतिकठोररूपेण अतिशैथिल्येन वा न कर्तव्यम्।
इसी प्रकार (वह उसे) ऐसे भी नहीं पकड़ती कि बच्चा गिर जाए। वर्णों का उच्चारण भी वैसे ही करना चाहिए। वर्णों का उच्चारण बहुत कठोरता से या बहुत ढीलेपन से नहीं करना चाहिए।
एवं वर्णाः प्रयोक्तव्या नाव्यक्ता न च पीडिताः।
सम्यग्वर्णप्रयोगेण ब्रह्मलोके महीयते॥ ३ ॥
इस प्रकार वर्णों का उच्चारण करना चाहिए कि वे न अस्पष्ट हों और न पीड़ित (आवश्यकता से अधिक ज़ोर लगाकर बोले गए) हों। वर्णों के सही प्रयोग (उच्चारण) से (मनुष्य) ब्रह्मलोक में सम्मानित होता है॥ ३ ॥
भावार्थः – वर्णानाम् उच्चारणसमये इदम् अवधेयं यत् वर्णाः स्पष्टतया स्वाभाविकरूपेण च उच्चारणीयाः। एतेन श्रोता वक्तुः भावान् सम्यक्तया अवगच्छति। एवं सावधानम् उच्चारणशीलः समाजे सम्मानं प्राप्नोति।
भावार्थ — वर्णों का उच्चारण करते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि वर्ण स्पष्ट रूप से और स्वाभाविक ढंग से बोले जाएँ। इससे सुनने वाला बोलने वाले के भावों को ठीक से समझ लेता है। इस प्रकार सावधानी से उच्चारण करने वाला व्यक्ति समाज में सम्मान पाता है।
माधुर्यमक्षरव्यक्तिः पदच्छेदस्तु सुस्वरः।
धैर्यं लयसमर्थं च षडेते पाठका गुणाः॥ ४ ॥
मधुरता, अक्षरों की स्पष्टता, (उचित स्थान पर) पदों को अलग करना (विराम), सुन्दर स्वर, धैर्य (आत्मविश्वास) और लय के साथ (पढ़ने की) सामर्थ्य — ये छह पाठक (पढ़ने वाले) के गुण हैं॥ ४ ॥
भावार्थः – मधुरेण स्पष्टम् उच्चारणम्, अपेक्षितस्थाने पदच्छेदः, सर्वेषां श्रवणयोग्येन समुचितस्वरेण कथनम्, सन्देहं विना पठनाय धैर्यं, विषये च तल्लीनता इति एते उत्तमस्य पाठकस्य षड् गुणाः भवन्ति। पठनम् इति कौशलं सम्पादयितुं वयम् एतान् गुणान् वर्धयामः।
भावार्थ — मधुरता के साथ स्पष्ट उच्चारण, आवश्यक स्थान पर पदच्छेद (रुकना), सबके सुनने योग्य उचित स्वर में बोलना, बिना सन्देह (झिझक) के पढ़ने के लिए धैर्य (आत्मविश्वास) और विषय में तल्लीनता — ये उत्तम पाठक के छह गुण होते हैं। पढ़ने का कौशल प्राप्त करने के लिए हम इन गुणों को बढ़ाते हैं।
गीती शीघ्री शिरःकम्पी तथा लिखितपाठकः।
अनर्थज्ञोऽल्पकण्ठश्च षडेते पाठकाधमाः॥ ५ ॥
गाकर पढ़ने वाला, बहुत जल्दी-जल्दी पढ़ने वाला, सिर हिलाते हुए पढ़ने वाला, तथा लिख-लिखकर पढ़ने वाला, अर्थ न जानने वाला और धीमे (दुर्बल) स्वर वाला — ये छह अधम (निम्न कोटि के) पाठक हैं॥ ५ ॥
भावार्थः – यः जनः गीतगानम् इव पठति, शीघ्रं-शीघ्रं वेगेन वा पठति, मस्तकदोलनं कृत्वा पठति, यः जनः लिखित्वा लिखित्वा पठति, अर्थबोधं विना पठति, मन्दस्वरेण पठति सः अधमपाठकः इति उच्यते।
भावार्थ — जो व्यक्ति गीत गाने की तरह पढ़ता है, जल्दी-जल्दी अथवा तेज़ गति से पढ़ता है, सिर हिलाकर पढ़ता है, जो व्यक्ति लिख-लिखकर पढ़ता है, अर्थ समझे बिना पढ़ता है, धीमे स्वर में पढ़ता है — वह अधम पाठक कहलाता है।
अतः पठनकाले वयम् एतान् दोषान् परिष्कृत्य पठामः चेत् आदर्शपाठकाः भवामः।
इसलिए यदि पढ़ते समय हम इन दोषों को दूर करके पढ़ें, तो हम आदर्श पाठक बन जाते हैं।
अत्र इदम् अवधेयम् — वेदाङ्गानि (पृष्ठ 142)
‘शिक्षा-कल्प-व्याकरण-निरुक्त-छन्दः-ज्योतिषम्’ इति षट् वेदाङ्गानि सन्ति।
‘शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष’ — ये छह वेदाङ्ग हैं।
1. शिक्षा
शिक्षाग्रन्थेषु वर्णानाम् उच्चारणविधिः, स्वराः, विरामः च वर्णिताः सन्ति।
1. शिक्षा — शिक्षा-ग्रन्थों में वर्णों के उच्चारण की विधि, स्वर और विराम (रुकने) का वर्णन है।
2. कल्पः
कल्पग्रन्थेषु यज्ञादीनां क्रियाविधेः वर्णनम् अस्ति।
2. कल्प — कल्प-ग्रन्थों में यज्ञ आदि की क्रिया-विधि का वर्णन है।
3. व्याकरणम्
व्याकरणग्रन्थेषु भाषायाः नियमाः सन्ति।
3. व्याकरण — व्याकरण-ग्रन्थों में भाषा के नियम हैं।
4. निरुक्तम्
अस्मिन् शास्त्रे शब्दानां व्युत्पत्तिः वर्तते।
4. निरुक्त — इस शास्त्र में शब्दों की व्युत्पत्ति (शब्द कैसे बने, उनका मूल) दी गई है।
5. छन्दः
अस्मिन् शास्त्रे मात्रा-ताल-इत्यादिदृष्ट्या गायनसम्बद्धं वर्णनम् अस्ति।
5. छन्द — इस शास्त्र में मात्रा, ताल आदि की दृष्टि से गायन से सम्बन्धित वर्णन है।
6. ज्योतिषम्
अस्मिन् शास्त्रे सूर्य-चन्द्र-इत्यादीनां नक्षत्राणां गतेः एवं तेषां प्रभावस्य वर्णनम् अस्ति।
6. ज्योतिष — इस शास्त्र में सूर्य, चन्द्र आदि नक्षत्रों (ग्रहों) की गति और उनके प्रभाव का वर्णन है।
योग्यताविस्तरः (ख) — स्मरणीय श्लोक (पृष्ठ 145)
आलस्यात् मूर्खसंयोगाद् भयाद् रोगनिपीडनात्।
अत्याशक्त्याच्च मानाच्च षड्भिर्विद्या विनश्यति॥
(माण्डूक्य-शिक्षा)
आलस्य से, मूर्खों की संगति से, भय से, रोग की पीड़ा से, अत्यधिक आसक्ति से और अभिमान से — इन छह (कारणों) से विद्या नष्ट हो जाती है॥
जलमभ्यासयोगेन शैलानां कुरुते क्षयम्।
कर्कशानां मृदुस्पर्शं किमभ्यासात् न साध्यते ?
(याज्ञवल्क्य-शिक्षा)
जल बार-बार (बहने के) अभ्यास से पर्वतों (चट्टानों) को भी घिस देता है और कठोर (खुरदरे) पत्थरों को कोमल स्पर्श वाला (चिकना) बना देता है। अभ्यास से क्या सिद्ध नहीं होता?
येषां तीर्थाऽगता विद्या नित्यमभ्यासवर्तिता।
ते भवन्ति दुराधर्षाः ससिंहाः इव पर्वताः॥
(माण्डूक्य-शिक्षा)
जिनकी विद्या उत्तम गुरु (तीर्थ) से प्राप्त हुई है और नित्य अभ्यास से बनी रहती है, वे सिंहों वाले पर्वतों की भाँति अजेय (जिन्हें कोई दबा न सके) हो जाते हैं॥
काकचेष्टो बकध्यानः श्वाननिद्रस्तथैव च।
अल्पाहारी गृहत्यागी विद्यार्थी पञ्चलक्षणः॥
(लोकप्रचलित-नीतिश्लोकः)
कौए जैसी चेष्टा (सजगता) वाला, बगुले जैसे ध्यान वाला, कुत्ते जैसी (हल्की) नींद वाला, थोड़ा भोजन करने वाला और घर (के मोह) को छोड़ने वाला — विद्यार्थी के ये पाँच लक्षण हैं॥
यथा खनन् खनित्रेण नरो वार्यधिगच्छति।
तथा गुरुगतां विद्यां शुश्रुषुरधिगच्छति॥
(याज्ञवल्यक्य-शिक्षा)
जैसे फावड़े (कुदाल) से खोदता हुआ मनुष्य जल प्राप्त कर लेता है, वैसे ही (गुरु की) सेवा करने वाला शिष्य गुरु में स्थित विद्या को प्राप्त कर लेता है॥
छन्दः पादौ तु वेदस्य हस्तौ कल्पोऽथ पठ्यते ।
ज्योतिषामयनं चक्षुर्निरुक्तं श्रोत्रमुच्यते ॥
छन्द को वेद के दो पैर और कल्प को (वेद के) दो हाथ कहा जाता है। ज्योतिष को (वेद के) नेत्र और निरुक्त को (वेद के) कान कहा जाता है॥
शिक्षा घ्राणं तु वेदस्य मुखं व्याकरणं स्मृतम् ।
तस्मात् साङ्गमधीत्यैव ब्रह्मलोके महीयते ॥
(पाणिनीय-शिक्षा कारिका)
शिक्षा को वेद की नासिका (नाक) और व्याकरण को (वेद का) मुख माना गया है। इसलिए (वेद को) अंगों सहित पढ़कर ही (मनुष्य) ब्रह्मलोक में सम्मानित होता है॥

NCERT Solutions for Class 8 Sanskrit Chapter 12 सम्यग्वर्णप्रयोगेण ब्रह्मलोके महीयते – Questions and Answers

All questions of the chapter are answered below, in the order of the book – in-text questions, activities and the end-of-chapter exercises. Each answer is written the way you would write it in the exam.

चित्र-संवादः तथा कथा — पाठाधारिताः प्रश्नाः — पृष्ठ 137अतिरिक्त अभ्यास (ये प्रश्न पुस्तक में नहीं हैं) — पाठारम्भे कक्षायां आचार्यस्य, छात्राणां हिमान्याश्च संवादः तथा इन्द्र-वृत्रासुर-कथा

चित्र-संवादः
प्र.1छात्राः आचार्यं किम् अवदन् ? आचार्यः च किम् उत्तरम् अयच्छत् ?
उत्तर

छात्राः — ‘नमस्ते आचार्य ! अद्य वयम् एकां कथां श्रोतुम् इच्छामः। कृपया कथां श्रावयति वा महोदय !’
आचार्यः — ‘नमस्ते छात्राः ! भवतां मनोरञ्जनार्थम् आदौ कथाश्रवणम्। अनन्तरं पाठनम्।’

प्र.2वृत्रासुरः किमर्थं यज्ञं कारितवान् ? यज्ञे आहुतिमन्त्रः कः आसीत् ?
उत्तर

उत्तरम् — स्वस्य बलं वर्धयितुम् इन्द्रं जेतुं च वृत्रासुरः यज्ञं कारितवान्। यज्ञे आहुतिमन्त्रः आसीत् — ‘इन्द्रशत्रुर्वर्धस्व’ इति।

प्र.3ऋत्विजः किम् अकुर्वन् ? तस्य परिणामः कः अभवत् ?
उत्तर

उत्तरम् — ऋत्विजः मन्त्रे स्वरं परिवर्तितवन्तः। स्वरपरिवर्तनेन अर्थः परिवर्तितः। परिणामतः वृत्रासुरस्य स्थाने इन्द्रस्य बलं वर्धितम्। बलवान् इन्द्रः वज्रेण वृत्रासुरं मारितवान्।

प्र.4कथाश्रवणानन्तरं हिमानी किम् अवदत् ? आचार्यः किम् उत्तरम् अयच्छत् ? कथायाः शिक्षा का ?
उत्तर

हिमानी — ‘बहु सुन्दरी कथा महोदय ! तर्हि वयमपि पठनकाले भाषणकाले च स्पष्टं शुद्धं च उच्चारणं कुर्मः।’
आचार्यः — ‘त्वं यथार्थं भाषसे हिमानि ! शुद्धोच्चारणस्य सन्दर्भे एव अधुना एतं विषयं पठामः।’
कथायाः शिक्षा — स्वरस्य वर्णस्य वा परिवर्तनेन अर्थः परिवर्तते। अतः पठनकाले भाषणकाले च स्पष्टं शुद्धं च उच्चारणं करणीयम्।

पाठः — पञ्च श्लोकाः (पदच्छेदः · अन्वयः · अर्थः · भावः) — पृष्ठ 138–140अतिरिक्त अभ्यास (यह प्रश्न पुस्तक में नहीं है; प्रत्येक श्लोक का पदच्छेद, अन्वय और भावार्थ पुस्तक में छपा है) — पञ्च श्लोकाः

पाठः
प्र.5श्लोकः १ — यद्यपि बहु नाधीषे तथापि पठ पुत्र व्याकरणम्। स्वजनः श्वजनो माभूत् सकलं शकलं सकृत् शकृत्॥ १॥ — अस्य पदच्छेदम् अन्वयम् अर्थं भावं च लिखत।
उत्तर
पदच्छेदः — यद्यपि · बहु · न · अधीषे · तथापि · पठ · पुत्र · व्याकरणम् · स्वजनः · श्वजनः · मा · अभूत् · सकलम् · शकलम् · सकृत् · शकृत्।
अन्वयः — पुत्र ! यद्यपि बहु न अधीषे तथापि व्याकरणं पठ। येन स्वजनः श्वजनः (इति) सकलं शकलं (इति) सकृत् शकृत् (इति) च मा अभूत्।
भावार्थः (पुस्तकानुसारम्) — अयि पुत्र ! यद्यपि भवान् वा बहून् विषयान् पठितुं न पारयति तथापि व्याकरणं तु अवश्यं पठतु। येन उच्चारणसमये स्वजनः (अर्थात् बन्धुः) इत्यस्य स्थाने श्वजनः (अर्थात् शुनकः) इति न भवेत्। एवमेव, सकृत् (अर्थात् एकवारम्) इत्यस्य स्थाने शकृत् (अर्थात् विष्ठा) इति, सकलम् (पूर्णम्) इत्यस्य स्थाने शकलं (खण्डम्) इति दोषपूर्णम् उच्चारणं न भवेत्।
प्र.6श्लोकः २ — व्याघ्री यथा हरेत् पुत्रान् दंष्ट्राभ्यां न च पीडयेत्। भीता पतनभेदाभ्यां तद्वद् वर्णान् प्रयोजयेत्॥ २॥ — अस्य पदच्छेदम् अन्वयम् अर्थं भावं च लिखत।
उत्तर
पदच्छेदः — व्याघ्री · यथा · हरेत् · पुत्रान् · दंष्ट्राभ्याम् · न · च · पीडयेत् · भीता · पतनभेदाभ्याम् · तद्वद् · वर्णान् · प्रयोजयेत्।
अन्वयः — यथा पतनभेदाभ्यां भीता व्याघ्री दंष्ट्राभ्यां पुत्रान् हरेत् न च पीडयेत् तद्वत् (जनः) वर्णान् प्रयोजयेत्।
भावार्थः (पुस्तकानुसारम्) — व्याघ्री स्वशिशुं दन्तैः नयति। तस्याः दन्ताः अतीव तीक्ष्णाः भवन्ति। अतः सा शिशुं तथा न गृह्णाति येन शिशुः क्षतः भवेत्। एवमेव तथा न गृह्णाति येन शिशुः पतेत्। वर्णानाम् उच्चारणम् अपि तथैव कर्तव्यम्। वर्णोच्चारणम् अतिकठोररूपेण अतिशैथिल्येन वा न कर्तव्यम्।
प्र.7श्लोकः ३ — एवं वर्णाः प्रयोक्तव्या नाव्यक्ता न च पीडिताः। सम्यग्वर्णप्रयोगेण ब्रह्मलोके महीयते॥ ३॥ — अस्य पदच्छेदम् अन्वयम् अर्थं भावं च लिखत।
उत्तर
पदच्छेदः — एवम् · वर्णाः · प्रयोक्तव्याः · न · अव्यक्ताः · न · च · पीडिताः · सम्यग् · वर्णप्रयोगेण · ब्रह्मलोके · महीयते।
अन्वयः — एवम् अव्यक्ताः पीडिताः च वर्णाः न प्रयोक्तव्याः। सम्यक् वर्णप्रयोगेण (सः) ब्रह्मलोके महीयते।
भावार्थः (पुस्तकानुसारम्) — वर्णानाम् उच्चारणसमये इदम् अवधेयं यत् वर्णाः स्पष्टतया स्वाभाविकरूपेण च उच्चारणीयाः। एतेन श्रोता वक्तुः भावान् सम्यक्तया अवगच्छति। एवं सावधानम् उच्चारणशीलः समाजे सम्मानं प्राप्नोति।
प्र.8श्लोकः ४ — माधुर्यमक्षरव्यक्तिः पदच्छेदस्तु सुस्वरः। धैर्यं लयसमर्थं च षडेते पाठका गुणाः॥ ४॥ — अस्य पदच्छेदम् अन्वयम् अर्थं भावं च लिखत।
उत्तर
पदच्छेदः — माधुर्यम् · अक्षरव्यक्तिः · पदच्छेदः · तु · सुस्वरः · धैर्यम् · लयसमर्थम् · च · षट् · एते · पाठका · गुणाः।
अन्वयः — माधुर्यम् अक्षरव्यक्तिः पदच्छेदः तु सुस्वरः धैर्यं लयसमर्थं च एते षट् पाठकाः गुणाः (भवन्ति)।
भावार्थः (पुस्तकानुसारम्) — मधुरेण स्पष्टम् उच्चारणम्, अपेक्षितस्थाने पदच्छेदः, सर्वेषां श्रवणयोग्येन समुचितस्वरेण कथनम्, सन्देहं विना पठनाय धैर्यं, विषये च तल्लीनता इति एते उत्तमस्य पाठकस्य षड् गुणाः भवन्ति। पठनम् इति कौशलं सम्पादयितुं वयम् एतान् गुणान् वर्धयामः।
प्र.9श्लोकः ५ — गीती शीघ्री शिरःकम्पी तथा लिखितपाठकः। अनर्थज्ञोऽल्पकण्ठश्च षडेते पाठकाधमाः॥ ५॥ — अस्य पदच्छेदम् अन्वयम् अर्थं भावं च लिखत।
उत्तर
पदच्छेदः — गीती · शीघ्री · शिरःकम्पी · तथा · लिखितपाठकः · अनर्थज्ञः · अल्पकण्ठः · च · षट् · एते · पाठकाधमाः।
अन्वयः — गीती शीघ्री शिरःकम्पी लिखितपाठकः अनर्थज्ञः अल्पकण्ठः च एते षट् पाठकाधमाः भवन्ति।
भावार्थः (पुस्तकानुसारम्) — यः जनः गीतगानम् इव पठति, शीघ्रं-शीघ्रं वेगेन वा पठति, मस्तकदोलनं कृत्वा पठति, यः जनः लिखित्वा लिखित्वा पठति, अर्थबोधं विना पठति, मन्दस्वरेण पठति सः अधमपाठकः इति उच्यते। अतः पठनकाले वयम् एतान् दोषान् परिष्कृत्य पठामः चेत् आदर्शपाठकाः भवामः।

वयं शब्दार्थान् जानीमः — पृष्ठ 140–141शब्दार्थ-सारणी तथा ‘मातृभाषया अर्थं लिखत’ स्तम्भः

शब्दार्थाः
प्र.10‘वयं शब्दार्थान् जानीमः’ — पृष्ठ 140–141 की पूरी शब्दार्थ-सारणी (शब्दः · अर्थः · हिन्दी · English)।
उत्तर

नीचे पुस्तक की दोनों पृष्ठों की सारणी ज्यों-की-त्यों दी गई है — पहले संस्कृत पर्याय, फिर हिन्दी और अंग्रेज़ी अर्थ।

शब्दःअर्थः (संस्कृतम्)हिन्दीEnglish
ऋत्विजःपुरोहिताःपुरोहितPriests
करतालम्करताडनध्वनिःतालीClap
अधीषेपठसितुम पढ़ते होYou read
श्वजनःशुनकः / कुक्कुरःकुत्ताDog
सकलम्सम्पूर्णम्पूराEntire
शकलम्खण्डम्टुकड़ाFragment
सकृत्एकवारम्एक बारOnce
शकृत्मलम्विष्ठा (मल)Faeces
अव्यक्ताःअस्पष्टाः (अल्पप्रयत्नयुक्ताः)अस्पष्ट (आवश्यकता से कम प्रयत्न करना)Unclear (Usage of less effort as supposed to be used)
पीडिताःबाधिताः (अधिकप्रयत्नयुक्ताः)पीड़ित (आवश्यकता से अधिक प्रयत्न से युक्त)Afflicted (Usage of more effort as supposed to be used)
महीयतेपूज्यते / सम्मानं लभतेसम्मानित होता हैHonoured / respected
व्याघ्रीशार्दूला (स्त्रीव्याघ्रः)बाघिनTigress
दंष्ट्राभ्याम्दन्ताभ्याम्दाँतों सेWith the fangs
पीडयेत्हिंसनं कुर्यात्कष्ट देMay cause pain
भीताभयेन पूरिताडरी हुईAfraid
प्रयोजयेत्उच्चारणं / प्रयोगं कुर्यात्उच्चारण / प्रयोग कर सकता हैMay pronounce / apply
माधुर्यम्मधुरभावःमिठास / माधुर्यSweetness
अक्षरव्यक्तिःअक्षराणां स्फुटतया उच्चारणम्अक्षर स्पष्टताClarity of letters
सुस्वरःशोभनः स्वरःमधुर स्वरPleasant voice
धैर्यम्विश्वासःआत्मविश्वासCourage / Self-Confidence
पाठकाःपठनसम्बन्धिनःपढ़ने से सम्बन्धितRelated to Reading
शीघ्रीयः वेगेन पठतितेज़ गति से पढ़ने वालाFast reader
शिरःकम्पीयः शिरः चालयन् पठतिसिर हिलाकर पढ़ने वालाOne who nods head and reads
अनर्थज्ञःयः अर्थं न जानातिजो अर्थ नहीं जानताWho does not understand meaning
अल्पकण्ठःदुर्बलध्वनियुक्तःधीमे स्वर वालाWeak-voiced
प्र.11मातृभाषया अर्थं लिखत — (सारणी का अन्तिम स्तम्भ रिक्त है; वहाँ अपनी मातृभाषा में अर्थ लिखना है।)
उत्तर

यह स्तम्भ अपनी मातृभाषा में भरना है — हिन्दी, मराठी, बांग्ला, तमिल, गुजराती… जो भी आपकी हो। ऊपर प्रश्न 10 की सारणी में हिन्दी अर्थ पहले ही दे दिए गए हैं, इसलिए हिन्दी-माध्यम के विद्यार्थी वही उतार लें।

नमूना उत्तर (मराठी में) —

शब्दःहिन्दीमराठी (मातृभाषया)
श्वजनःकुत्ताकुत्रा
सकलम्पूरासंपूर्ण
शकलम्टुकड़ातुकडा
व्याघ्रीबाघिनवाघीण
भीताडरी हुईघाबरलेली
माधुर्यम्मिठासगोडवा
धैर्यम्आत्मविश्वासआत्मविश्वास
महीयतेसम्मानित होता हैसन्मानित होतो

अत्र इदम् अवधेयम् — पृष्ठ 142अतिरिक्त अभ्यास (ये प्रश्न पुस्तक में नहीं हैं) — ‘अत्र इदम् अवधेयम्’ पेटिका पर आधारित — ‘शिक्षा-कल्प-व्याकरण-निरुक्त-छन्दः-ज्योतिषम्’ इति षट् वेदाङ्गानि

वेदाङ्गानि
प्र.12षट् वेदाङ्गानि कानि सन्ति ? तेषु प्रत्येकस्य विषयः कः ?
उत्तर

उत्तरम् — ‘शिक्षा-कल्प-व्याकरण-निरुक्त-छन्दः-ज्योतिषम्’ इति षट् वेदाङ्गानि सन्ति। (शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द तथा ज्योतिष — ये छह वेदाङ्ग हैं।)

वेदाङ्गम्पुस्तक का वाक्यहिन्दी में विषय
१. शिक्षाशिक्षाग्रन्थेषु वर्णानाम् उच्चारणविधिः, स्वराः, विरामः च वर्णिताः सन्ति।वर्णों के उच्चारण की विधि, स्वर और विराम (कहाँ रुकें)
२. कल्पःकल्पग्रन्थेषु यज्ञादीनां क्रियाविधेः वर्णनम् अस्ति।यज्ञ आदि की क्रिया-विधि
३. व्याकरणम्व्याकरणग्रन्थेषु भाषायाः नियमाः सन्ति।भाषा के नियम
४. निरुक्तम्अस्मिन् शास्त्रे शब्दानां व्युत्पत्तिः वर्तते।शब्दों की व्युत्पत्ति (शब्द कहाँ से बना)
५. छन्दःअस्मिन् शास्त्रे मात्रा-ताल-इत्यादिदृष्ट्या गायनसम्बद्धं वर्णनम् अस्ति।मात्रा-ताल आदि की दृष्टि से गायन (छन्द-रचना)
६. ज्योतिषम्अस्मिन् शास्त्रे सूर्य-चन्द्र-इत्यादीनां नक्षत्राणां गतेः एवं तेषां प्रभावस्य वर्णनम् अस्ति।सूर्य-चन्द्र आदि नक्षत्रों की गति और उनका प्रभाव
प्र.13‘शिक्षा’ इति वेदाङ्गे किं वर्णितम् ? अस्य पाठस्य तेन सह कः सम्बन्धः ?
उत्तर

उत्तरम् — शिक्षाग्रन्थेषु वर्णानाम् उच्चारणविधिः, स्वराः, विरामः च वर्णिताः सन्ति। (शिक्षा-ग्रन्थों में वर्णों के उच्चारण की विधि, स्वर तथा विराम का वर्णन है।)
अयं पाठः शिक्षा-वेदाङ्गस्य एव विषयः — अत्र वर्णानां शुद्धोच्चारणम् (श्लोकौ २–३), स्वरस्य महत्त्वम् (इन्द्र-वृत्रासुर-कथा), विरामः अर्थात् पदच्छेदः (श्लोकः ४) च वर्णिताः।

प्र.14श्लोकः १ कथयति — ‘तथापि पठ पुत्र व्याकरणम्’। ‘व्याकरणम्’ इति वेदाङ्गं किमर्थम् आवश्यकम् ?
उत्तर

उत्तरम् — व्याकरणग्रन्थेषु भाषायाः नियमाः सन्ति। अतः व्याकरणेन विना शुद्धं भाषणं शुद्धं लेखनं च न सम्भवति।

अभ्यासात् जायते सिद्धिः — पृष्ठ 142प्रश्नः १ : पाठे विद्यमानानां श्लोकानाम् उच्चारणं स्मरणं लेखनं च कुरुत

अभ्यासः
प्र.15पाठे विद्यमानानां श्लोकानाम् उच्चारणं स्मरणं लेखनं च कुरुत।
उत्तर

यह करने का प्रश्न है — तीन काम एक साथ : उच्चारण (बोलकर पढ़ना), स्मरण (कण्ठस्थ करना) और लेखन (लिखकर अभ्यास)। नीचे पाँचों श्लोक दिए गए हैं — इन्हें शुद्ध बोलिए, याद कीजिए और बिना देखे लिखिए।

१. यद्यपि बहु नाधीषे तथापि पठ पुत्र व्याकरणम्।
   स्वजनः श्वजनो माभूत् सकलं शकलं सकृत् शकृत्॥ १॥
२. व्याघ्री यथा हरेत् पुत्रान् दंष्ट्राभ्यां न च पीडयेत्।
   भीता पतनभेदाभ्यां तद्वद् वर्णान् प्रयोजयेत्॥ २॥
३. एवं वर्णाः प्रयोक्तव्या नाव्यक्ता न च पीडिताः।
   सम्यग्वर्णप्रयोगेण ब्रह्मलोके महीयते॥ ३॥
४. माधुर्यमक्षरव्यक्तिः पदच्छेदस्तु सुस्वरः।
   धैर्यं लयसमर्थं च षडेते पाठका गुणाः॥ ४॥
५. गीती शीघ्री शिरःकम्पी तथा लिखितपाठकः।
   अनर्थज्ञोऽल्पकण्ठश्च षडेते पाठकाधमाः॥ ५॥

अभ्यासात् जायते सिद्धिः — पृष्ठ 142प्रश्नः २ : अधोलिखितानां प्रश्नानाम् एकपदेन उत्तराणि लिखत

अभ्यासः
प्र.16(क) पाठकाः केषां सम्यक् प्रयोगं कुर्युः ?
उत्तर

उत्तरम् — वर्णानाम् (वर्णों का)।

प्र.17(ख) किम् अवश्यमेव पठनीयम् ?
उत्तर

उत्तरम् — व्याकरणम् (व्याकरण)।

प्र.18(ग) ब्रह्मलोके केन सम्मानं भवति ?
उत्तर

उत्तरम् — सम्यग्वर्णप्रयोगेण (वर्णों के ठीक-ठीक प्रयोग से)।

प्र.19(घ) अधमाः पाठकाः कति भवन्ति ?
उत्तर

उत्तरम् — षट् (छह)।

प्र.20(ङ) धैर्यं केषां गुणः ?
उत्तर

उत्तरम् — पाठकानाम् (पढ़ने वालों का)।

अभ्यासात् जायते सिद्धिः — पृष्ठ 143प्रश्नः ३ : अधोलिखितानां प्रश्नानाम् पूर्णवाक्येन उत्तराणि लिखत

अभ्यासः
प्र.21(क) व्याघ्री दंष्ट्राभ्यां कान् नयति ?
उत्तर

उत्तरम् — व्याघ्री दंष्ट्राभ्यां स्वपुत्रान् नयति।
(बाघिन अपने दो दाँतों से अपने बच्चों को ले जाती है।)

प्र.22(ख) वर्णाः कथं प्रयोक्तव्याः ?
उत्तर

उत्तरम् — वर्णाः न अव्यक्ताः न च पीडिताः, अपितु स्पष्टतया स्वाभाविकरूपेण च प्रयोक्तव्याः।
(वर्णों का उच्चारण न अस्पष्ट हो और न ज़रूरत से अधिक ज़ोर लगाकर — वे स्पष्ट और स्वाभाविक रूप से बोले जाने चाहिए।)

प्र.23(ग) पाठकानां षड्-गुणाः के भवन्ति ?
उत्तर

उत्तरम् — माधुर्यम्, अक्षरव्यक्तिः, पदच्छेदः, सुस्वरः, धैर्यं लयसमर्थं च — एते षट् पाठकानां गुणाः भवन्ति।

प्र.24(घ) के अधमाः पाठकाः भवन्ति ?
उत्तर

उत्तरम् — गीती, शीघ्री, शिरःकम्पी, लिखितपाठकः, अनर्थज्ञः, अल्पकण्ठः च — एते षट् अधमाः पाठकाः भवन्ति।

प्र.25(ङ) ‘स्वजनः’ ‘श्वजनः’ च इत्यनयोः अर्थदृष्ट्या कः भेदः ?
उत्तर

उत्तरम् — ‘स्वजनः’ इत्यस्य अर्थः बन्धुः, ‘श्वजनः’ इत्यस्य अर्थः तु शुनकः (कुक्कुरः)।
(‘स्वजनः’ का अर्थ है अपना बन्धु, और ‘श्वजनः’ का अर्थ है कुत्ता।)

प्र.26(च) ‘सकलं’ ‘शकलं’ च इत्यनयोः अर्थदृष्ट्या कः भेदः ?
उत्तर

उत्तरम् — ‘सकलम्’ इत्यस्य अर्थः सम्पूर्णम्, ‘शकलम्’ इत्यस्य अर्थः तु खण्डम्।
(‘सकलम्’ का अर्थ है पूरा, और ‘शकलम्’ का अर्थ है टुकड़ा।)

अभ्यासात् जायते सिद्धिः — पृष्ठ 143प्रश्नः ४ : अधोलिखितानि लक्षणानि पाठकस्य गुणाः वा दोषाः वा इति विभजत

अभ्यासः
प्र.27अधोलिखितानि लक्षणानि पाठकस्य गुणाः वा दोषाः वा इति विभजत — अक्षरव्यक्तिः, शीघ्री, लिखितपाठकः, लयसमर्थम्, अनर्थः, अल्पकण्ठः, माधुर्यम्, गीती, पदच्छेदः, शिरःकम्पी, अनर्थज्ञः, धैर्यम्, सुस्वरः। (यथा — गुणाः : अक्षरव्यक्तिः · दोषाः : शीघ्री)
उत्तर
गुणाःदोषाः
यथा — अक्षरव्यक्तिःशीघ्री
माधुर्यम्गीती
पदच्छेदःशिरःकम्पी
सुस्वरःलिखितपाठकः
धैर्यम्अनर्थज्ञः
लयसमर्थम्अल्पकण्ठः

अभ्यासात् जायते सिद्धिः — पृष्ठ 144प्रश्नः ५ : श्लोकानुसारं रिक्तस्थानानि उचितैः शब्दैः पूरयत

अभ्यासः
प्र.28(क) भीता ………………………. तद्वद् वर्णान् प्रयोजयेत्।
उत्तर

उत्तरम् — भीता पतनभेदाभ्यां तद्वद् वर्णान् प्रयोजयेत्।
(श्लोकः २ — बाघिन गिरने और घाव, दोनों से डरती है)

प्र.29(ख) ………………………. लयसमर्थं च षडेते पाठका गुणाः।
उत्तर

उत्तरम् — धैर्यं लयसमर्थं च षडेते पाठका गुणाः।
(श्लोकः ४ — पाठक के छह गुणों में से)

प्र.30(ग) गीती शीघ्री ………………………. तथा लिखितपाठकः।
उत्तर

उत्तरम् — गीती शीघ्री शिरःकम्पी तथा लिखितपाठकः।
(श्लोकः ५ — पाठक के छह दोषों में से)

प्र.31(घ) एवं वर्णाः प्रयोक्तव्या नाव्यक्ता न च ………………………. ।
उत्तर

उत्तरम् — एवं वर्णाः प्रयोक्तव्या नाव्यक्ता न च पीडिताः।
(श्लोकः ३ — अव्यक्त और पीडित, दोनों निषिद्ध)

प्र.32(ङ) स्वजनः ………………………. माभूत् सकलं शकलं सकृत् शकृत्।
उत्तर

उत्तरम् — स्वजनः श्वजनो माभूत् सकलं शकलं सकृत् शकृत्।
(श्लोकः १ — स्वजनः (बन्धु) श्वजनः (कुत्ता) न बने)

अभ्यासात् जायते सिद्धिः — पृष्ठ 144प्रश्नः ६ : अधोलिखितानि वाक्यानि सत्यम् वा असत्यम् वा इति लिखत (यथा — पदच्छेदः पाठकानां गुणः अस्ति। — सत्यम्)

अभ्यासः
प्र.33(क) गानसहितपठनं पाठकानां दोषः भवति।
उत्तर

उत्तरम् — सत्यम् — श्लोक ५ का पहला दोष ‘गीती’ है : यः गीतगानम् इव पठति (जो गाकर पढ़ता है)।

प्र.34(ख) माधुर्यं नाम अक्षराणाम् उच्चारणे स्पष्टता अस्ति।
उत्तर

उत्तरम् — असत्यम्
शुद्ध वाक्य — अक्षरव्यक्तिः नाम अक्षराणाम् उच्चारणे स्पष्टता अस्ति।

प्र.35(ग) शकृत् नाम एकवारम् इति अर्थः अस्ति।
उत्तर

उत्तरम् — असत्यम्
शुद्ध वाक्य — सकृत् नाम एकवारम् इति अर्थः अस्ति।

प्र.36(घ) अव्यक्ताः वर्णाः प्रयोक्तव्याः भवन्ति।
उत्तर

उत्तरम् — असत्यम्
शुद्ध वाक्य — अव्यक्ताः वर्णाः न प्रयोक्तव्याः भवन्ति।

प्र.37(ङ) व्याघ्री यथा पुत्रान् हरति तथा वर्णान् प्रयोजयेत्।
उत्तर

उत्तरम् — सत्यम् — श्लोक २ : ‘व्याघ्री यथा हरेत् पुत्रान्… तद्वद् वर्णान् प्रयोजयेत्’।

योग्यताविस्तरः — पृष्ठ 144(क) अक्षर/मात्रापरिवर्तनेन अर्थपरिवर्तनं भवति — पढ़ने और समझने की सामग्री (पुस्तक में इस पर प्रश्न नहीं है)

योग्यताविस्तरः
प्र.38(क) अक्षर/मात्रापरिवर्तनेन अर्थपरिवर्तनं भवति — यथा : मित्रम् (बन्धुः) – मित्रः (सूर्यः), फलम् (आम्रादिफलम्) – पलम् (मांसः), पुरुषः (जनः) – परुषः (कठोरः), अवदानम् (योगदानम्) – अवधानम् (एकाग्रता), प्रतिपलम् (प्रतिक्षणम्) – प्रतिफलम् (परिणामः), नदति (ध्वनिं करोति) – नुदति (प्रेरयति), ददाति (दानं करोति) – दधाति (धारणं करोति)। — एतान् पठत बोधत च।
उत्तर

पुस्तक के सातों युग्म नीचे हैं। हर युग्म में एक अक्षर या एक मात्रा ही बदली है, फिर भी अर्थ पूरा बदल गया है।

शुद्ध शब्दअर्थःबदला हुआ शब्दअर्थःक्या बदला
मित्रम्बन्धुः (दोस्त)मित्रःसूर्यः (सूर्य)लिङ्ग — नपुंसक से पुंल्लिङ्ग
फलम्आम्रादिफलम् (फल)पलम्मांसः (मांस)फ् → प् (महाप्राण से अल्पप्राण)
पुरुषःजनः (मनुष्य)परुषःकठोरः (कठोर)‘उ’ मात्रा → ‘अ’
अवदानम्योगदानम् (योगदान)अवधानम्एकाग्रता (ध्यान)द् → ध् (अल्पप्राण से महाप्राण)
प्रतिपलम्प्रतिक्षणम् (हर क्षण)प्रतिफलम्परिणामः (परिणाम)प् → फ्
नदतिध्वनिं करोति (गरजता है)नुदतिप्रेरयति (प्रेरित करता है)‘अ’ → ‘उ’ मात्रा
ददातिदानं करोति (देता है)दधातिधारणं करोति (धारण करता है)द् → ध्

योग्यताविस्तरः — पृष्ठ 145अतिरिक्त अभ्यास (पुस्तक का निर्देश केवल ‘स्मरत’ — याद कीजिए — है; पदच्छेद, अन्वय, अर्थ और भाव अभ्यास हेतु दिए गए हैं) — माण्डूक्य-शिक्षा, याज्ञवल्क्य-शिक्षा, नीतिश्लोकः तथा पाणिनीय-शिक्षा कारिका

योग्यताविस्तरः
प्र.39श्लोकः १ — आलस्यात् मूर्खसंयोगाद् भयाद् रोगनिपीडनात्। अत्याशक्त्याच्च मानाच्च षड्भिर्विद्या विनश्यति॥ (माण्डूक्य-शिक्षा) — अस्य पदच्छेदम् अन्वयम् अर्थं भावं च लिखत।
उत्तर
पदच्छेदः — आलस्यात् · मूर्खसंयोगात् · भयात् · रोगनिपीडनात् · अत्यासक्त्या · च · मानात् · च · षड्भिः · विद्या · विनश्यति।
अन्वयः — आलस्यात्, मूर्खसंयोगात्, भयात्, रोगनिपीडनात्, अत्यासक्त्या मानात् च — (एभिः) षड्भिः विद्या विनश्यति।
अर्थः (शब्दशः) — आलस्यात् = आलस्य से · मूर्खसंयोगात् = मूर्खों की संगति से · भयात् = डर से · रोगनिपीडनात् = रोग की पीड़ा से · अत्यासक्त्या = अत्यधिक आसक्ति/लालसा से · मानात् = अभिमान से ‖ षड्भिः = इन छह कारणों से · विद्या विनश्यति = विद्या नष्ट हो जाती है।

भावः — आलस्य, मूर्खों की संगति, भय, रोग, अत्यधिक आसक्ति और अभिमान — ये छह विद्या के शत्रु हैं; इनसे बचकर ही विद्या टिकती है।

प्र.40श्लोकः २ — जलमभ्यासयोगेन शैलानां कुरुते क्षयम्। कर्कशानां मृदुस्पर्शं किमभ्यासात् न साध्यते? (याज्ञवल्क्य-शिक्षा) — अस्य पदच्छेदम् अन्वयम् अर्थं भावं च लिखत।
उत्तर
पदच्छेदः — जलम् · अभ्यासयोगेन · शैलानाम् · कुरुते · क्षयम्। कर्कशानाम् · मृदुस्पर्शम् · किम् · अभ्यासात् · न · साध्यते।
अन्वयः — (यदा) मृदुस्पर्शं जलम् अभ्यासयोगेन कर्कशानां शैलानां क्षयं कुरुते, (तदा) अभ्यासात् किं न साध्यते ?
अर्थः (शब्दशः) — मृदुस्पर्शं जलम् = कोमल स्पर्श वाला पानी · अभ्यासयोगेन = बार-बार गिरते-बहते रहने (अभ्यास) से · कर्कशानां शैलानाम् = कठोर पर्वतों (चट्टानों) का · क्षयं कुरुते = क्षय कर देता है, घिस देता है ‖ अभ्यासात् किं न साध्यते = भला अभ्यास से क्या सिद्ध नहीं होता ?

भावः — निरन्तर अभ्यास से कोमल जल भी कठोर चट्टान को घिस देता है; अभ्यास से सब कुछ सम्भव है।

प्र.41श्लोकः ३ — येषां तीर्थाऽगता विद्या नित्यमभ्यासवर्तिता। ते भवन्ति दुराधर्षाः ससिंहाः इव पर्वताः॥ (माण्डूक्य-शिक्षा) — अस्य पदच्छेदम् अन्वयम् अर्थं भावं च लिखत।
उत्तर
पदच्छेदः — येषाम् · तीर्थागता · विद्या · नित्यम् · अभ्यासवर्तिता · ते · भवन्ति · दुराधर्षाः · ससिंहाः · इव · पर्वताः।
अन्वयः — येषां विद्या तीर्थागता नित्यम् अभ्यासवर्तिता च (अस्ति), ते ससिंहाः पर्वताः इव दुराधर्षाः भवन्ति।
अर्थः (शब्दशः) — येषाम् = जिनकी · विद्या तीर्थागता = विद्या योग्य गुरु/श्रेष्ठ स्रोत से आई हुई है · नित्यम् अभ्यासवर्तिता = और नित्य अभ्यास में बनी रहती है ‖ ते = वे · ससिंहाः पर्वताः इव = सिंहों से भरे पर्वतों की भाँति · दुराधर्षाः भवन्ति = अजेय (जिन्हें कोई दबा न सके) होते हैं।

भावः — सुयोग्य गुरु से पाई और नित्य अभ्यास से जीवित रखी विद्या वाले लोग सिंहों से भरे पर्वत की तरह अजेय होते हैं।

प्र.42श्लोकः ४ — काकचेष्टो बकध्यानः श्वाननिद्रस्तथैव च। अल्पाहारी गृहत्यागी विद्यार्थी पञ्चलक्षणः॥ (लोकप्रचलित-नीतिश्लोकः) — अस्य पदच्छेदम् अन्वयम् अर्थं भावं च लिखत।
उत्तर
पदच्छेदः — काकचेष्टः · बकध्यानः · श्वाननिद्रः · तथा · एव · च · अल्पाहारी · गृहत्यागी · विद्यार्थी · पञ्चलक्षणः।
अन्वयः — काकचेष्टः, बकध्यानः, श्वाननिद्रः तथैव च अल्पाहारी, गृहत्यागी (च) — (एवं) विद्यार्थी पञ्चलक्षणः (भवति)।
लक्षणम्शब्दशः अर्थविद्यार्थी के लिए इसका अर्थ
काकचेष्टःकौए जैसी चेष्टा वालासदा सतर्क और चौकन्ना, हर अवसर पकड़ने वाला
बकध्यानःबगुले जैसे ध्यान वालाएकाग्रता — जब तक लक्ष्य न मिले, दृष्टि हटे नहीं
श्वाननिद्रःकुत्ते जैसी नींद वालाहल्की नींद — पुकारते ही जाग जाना, आलस्य नहीं
अल्पाहारीथोड़ा खाने वालाकम और सन्तुलित भोजन — भरा पेट पढ़ाई नहीं होने देता
गृहत्यागीघर छोड़ने वालाविद्या के लिए घर की सुख-सुविधा छोड़ने को तैयार

भावः — अच्छे विद्यार्थी के पाँच लक्षण हैं — सतर्कता, एकाग्रता, हल्की नींद, थोड़ा भोजन और विद्या के लिए घर का सुख छोड़ने की तत्परता।

प्र.43श्लोकः ५ — यथा खनन् खनित्रेण नरो वार्यधिगच्छति। तथा गुरुगतां विद्यां शुश्रुषुरधिगच्छति॥ (याज्ञवल्क्य-शिक्षा) — अस्य पदच्छेदम् अन्वयम् अर्थं भावं च लिखत।
उत्तर
पदच्छेदः — यथा · खनन् · खनित्रेण · नरः · वारि · अधिगच्छति · तथा · गुरुगताम् · विद्याम् · शुश्रूषुः · अधिगच्छति।
अन्वयः — यथा नरः खनित्रेण खनन् वारि अधिगच्छति, तथा शुश्रूषुः गुरुगतां विद्याम् अधिगच्छति।
अर्थः (शब्दशः) — यथा = जैसे · नरः = मनुष्य · खनित्रेण खनन् = कुदाल से खोदता हुआ · वारि अधिगच्छति = (भूमि से) जल पा लेता है ‖ तथा = वैसे ही · शुश्रूषुः = सेवा करने वाला (शिष्य) · गुरुगतां विद्याम् = गुरु में स्थित विद्या को · अधिगच्छति = प्राप्त कर लेता है।

भावः — जैसे खोदने वाला भूमि से जल पा लेता है, वैसे ही सेवा और श्रद्धा से सुनने वाला शिष्य गुरु की विद्या पा लेता है।

प्र.44श्लोकः ६ — छन्दः पादौ तु वेदस्य हस्तौ कल्पोऽथ पठ्यते। ज्योतिषामयनं चक्षुर्निरुक्तं श्रोत्रमुच्यते॥ शिक्षा घ्राणं तु वेदस्य मुखं व्याकरणं स्मृतम्। तस्मात् साङ्गमधीत्यैव ब्रह्मलोके महीयते॥ (पाणिनीय-शिक्षा कारिका) — अनयोः पदच्छेदम् अन्वयम् अर्थं भावं च लिखत।
उत्तर
पदच्छेदः — छन्दः · पादौ · तु · वेदस्य · हस्तौ · कल्पः · अथ · पठ्यते। ज्योतिषाम् · अयनम् · चक्षुः · निरुक्तम् · श्रोत्रम् · उच्यते। शिक्षा · घ्राणम् · तु · वेदस्य · मुखम् · व्याकरणम् · स्मृतम्। तस्मात् · साङ्गम् · अधीत्य · एव · ब्रह्मलोके · महीयते।
अन्वयः — छन्दः तु वेदस्य पादौ, अथ कल्पः हस्तौ पठ्यते। ज्योतिषाम् अयनं चक्षुः, निरुक्तं श्रोत्रम् उच्यते। शिक्षा तु वेदस्य घ्राणम्, व्याकरणं (च) मुखं स्मृतम्। तस्मात् साङ्गम् (वेदम्) अधीत्य एव (जनः) ब्रह्मलोके महीयते।
वेदाङ्गम्वेद-पुरुष का अङ्गक्यों वही अङ्ग
छन्दःपादौ (दोनों पैर)छन्द पर ही वेद खड़ा और गतिमान है
कल्पःहस्तौ (दोनों हाथ)हाथ से काम होता है — कल्प यज्ञ की क्रिया बताता है
ज्योतिषम्चक्षुः (आँख)आँख से दूर देखते हैं — ज्योतिष काल और नक्षत्र देखता है
निरुक्तम्श्रोत्रम् (कान)कान से शब्द ग्रहण होता है — निरुक्त शब्द का मूल बताता है
शिक्षाघ्राणम् (नाक)नाक श्वास और स्वर का द्वार है — शिक्षा उच्चारण सिखाती है
व्याकरणम्मुखम् (मुख)मुख से बोला जाता है — व्याकरण शुद्ध रूप गढ़ता है

भावः — वेद को एक पुरुष मानकर छहों वेदाङ्गों को उसके अङ्ग कहा गया है; इसलिए छहों अङ्गों सहित वेद पढ़कर ही मनुष्य ब्रह्मलोक में सम्मान पाता है।

परियोजनाकार्यम् — पृष्ठ 145प्रकल्प-कार्यम् : कक्षायां श्लोकोच्चारण-प्रतियोगिता तथा गुण-दोष-अवलोकनम्

परियोजनाकार्यम्
प्र.45कक्षायां श्लोकोच्चारण-प्रतियोगितां स्थापयित्वा निर्मित-सूच्यनुगुणम् उच्चारणम् अवलोकनीयम्।
उत्तर

यह करके सीखने का काम है — कक्षा में श्लोक-उच्चारण की प्रतियोगिता कराइए और पहले से बनाई गई एक सूची (मूल्यांकन-तालिका) के अनुसार सबका उच्चारण परखिए।

नमूना मूल्यांकन-सूची (निर्मित-सूची) —

क्रमःकसौटी (श्लोक ४ अनुसारम्)अङ्काःक्या देखें
१माधुर्यम्5स्वर में मिठास है या रूखापन
२अक्षरव्यक्तिः5‘स’–‘श’, ‘द’–‘ध’, संयुक्ताक्षर साफ़ हैं?
३पदच्छेदः5विराम अर्थ के अनुसार पड़ा या बीच शब्द में
४सुस्वरः5अन्तिम पंक्ति के छात्र तक आवाज़ पहुँची?
५धैर्यम्5बिना अटके, बिना घबराए
६लयसमर्थम्5श्लोक की लय आदि से अन्त तक बनी रही?
—दोषाः (गीती, शीघ्री, शिरःकम्पी, लिखितपाठकः, अनर्थज्ञः, अल्पकण्ठः)–1 प्रति दोषःजो दोष दिखे, उसका नाम लिखिए
प्र.46अत्र के के गुणाः दोषाः च जाताः इति अधः लिखत — (गुणाः / दोषाः — तालिका)
उत्तर

यह तालिका अपनी कक्षा की प्रतियोगिता देखकर भरनी है, इसलिए उत्तर हर कक्षा में अलग होगा। नीचे नमूना दिया गया है — देखिए कि हर पंक्ति में किसने क्या किया यह लिखा गया है, केवल शब्द नहीं।

गुणाःदोषाः
अक्षरव्यक्तिः — रमेशः ‘दंष्ट्राभ्याम्’ इत्यत्र संयुक्ताक्षरं स्पष्टम् उच्चारितवान्।शीघ्री — मोहनः द्वितीयं श्लोकम् अतिवेगेन पठितवान्, पदानि मिलितानि।
पदच्छेदः — सीता ‘नाव्यक्ता · न च पीडिताः’ इत्यत्र उचितस्थाने विरामं कृतवती।अल्पकण्ठः — गीता मन्दस्वरेण अपठत्, अन्तिमपङ्क्तौ न श्रुतम्।
सुस्वरः — अनीता उच्चस्वरेण मधुरं च अपठत्, सर्वैः श्रुतम्।शिरःकम्पी — सुरेशः पठनकाले शिरः चालितवान्।
धैर्यम् — हिमानी विना सङ्कोचं पञ्च श्लोकान् स्मृत्वा अपठत्।गीती — कश्चन छात्रः श्लोकं गीतम् इव अगायत्।
लयसमर्थम् — विनयः श्लोकस्य लयम् अन्तपर्यन्तम् अरक्षत्।अनर्थज्ञः — एकः छात्रः श्लोकस्य अर्थम् अज्ञात्वा अपठत्, अतः अनुचितस्थाने विरामम् अकरोत्।

Chapter 12 of 13 – Sanskrit

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