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NCERT Solutions for Class 8 Sanskrit Chapter 3 सुभाषितरसं पीत्वा जीवनं सफलं कुरु (PDF) – 2027

NCERT Solutions for Class 8 Sanskrit Chapter 3 सुभाषितरसं पीत्वा जीवनं सफलं कुरु – step-by-step answers to every exercise and in-text question of the chapter, as per the latest NCERT syllabus for 2027. Read them online or download the free question-answer PDF.

दीपकम् (कक्षा 8) के तृतीयः पाठः — सुभाषितरसं पीत्वा जीवनं सफलं कुरु के प्रश्नोत्तर। यह पाठ किसी एक कथा का नहीं, बल्कि आठ सुभाषितों (नीतिश्लोकों) का संग्रह है, जिन्हें विष्णुपुराण, महाभारत, भर्तृहरि के नीतिशतक, हितोपदेश तथा चाणक्यनीति जैसी नीतिपरम्परा से चुना गया है। पाठ का आरम्भ पितामही और पौत्री के चित्र-संवाद से होता है — सुष्ठु भाषितानि इति सुभाषितानि — और फिर प्रत्येक श्लोक के साथ पुस्तक स्वयं पदच्छेदः, अन्वयः तथा भावार्थः देती है। नीचे पृष्ठ 24 से 35 तक के चित्र-संवाद के प्रश्न, आठों श्लोकों का पदच्छेद → अन्वय → अर्थ → भाव (छन्द तथा अलङ्कार सहित), वयं शब्दार्थान् जानीमः, अत्र इदम् अवधेयम्, अभ्यासात् जायते सिद्धिः के प्रश्न १–५ (हर उपभाग सहित), योग्यताविस्तरः तथा परियोजनाकार्यम् क्रम से हल किए गए हैं — पहले संस्कृत उत्तर, फिर कोष्ठक में हिन्दी अर्थ।

NCERT Solutions for Class 8 Sanskrit Chapter 3 सुभाषितरसं पीत्वा जीवनं सफलं कुरु PDF

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पाठ का हिंदी अनुवाद

पाठ का शीर्षक और चित्र-संवाद (पितामही और पौत्री)
सुभाषितरसं पीत्वा जीवनं सफलं कुरु
शीर्षक – सुभाषितों का रस पीकर (अपने) जीवन को सफल बनाओ।
पितामहि! एकां नूतनां कथां कथयतु।
पौत्री – दादी जी! (मुझे) एक नई कहानी सुनाइए।
वत्से! त्वं प्रतिदिनं तु कथां शृणोषि, अद्य नीतिश्लोकान् शृणु।
पितामही – बेटी! तुम प्रतिदिन कहानी तो सुनती ही हो, आज नीतिश्लोक सुनो।
नीतिश्लोकाः …?
पौत्री – नीतिश्लोक…?
आम्। नीतिश्लोकाः। नीतिश्लोकाः नाम सुभाषितानि।
पितामही – हाँ, नीतिश्लोक। नीतिश्लोक अर्थात् सुभाषित।
किं नाम सुभाषितानि?
पौत्री – सुभाषित किसे कहते हैं?
सुष्ठु भाषितानि इति सुभाषितानि अर्थात् शोभनानि वचनानि। तानि सर्वदा जनानां हिताय भवन्ति।
पितामही – जो वचन अच्छी तरह (सुन्दर ढंग से) कहे गए हों, वे सुभाषित हैं, अर्थात् सुन्दर वचन। वे सदा लोगों के हित (भलाई) के लिए होते हैं।
सुभाषितपठनेन कः लाभः?
पौत्री – सुभाषित पढ़ने से क्या लाभ है?
सुभाषितपठनेन आदर्श-मानवजीवन-निर्माणाय प्रेरणा प्राप्यते। मानवजीवनस्य सुखाय समृद्धये च सुभाषितानां पठनस्य आवश्यकता अस्ति। यः सुभाषितानि पठित्वा कार्यक्षेत्रे तस्य ज्ञानस्य प्रयोगं करोति सः बहून् लाभान् प्राप्नोति।
पितामही – सुभाषित पढ़ने से आदर्श मानव-जीवन के निर्माण के लिए प्रेरणा मिलती है। मानव-जीवन के सुख और समृद्धि के लिए सुभाषितों को पढ़ने की आवश्यकता है। जो सुभाषित पढ़कर अपने कार्यक्षेत्र में उस ज्ञान का प्रयोग करता है, वह बहुत-से लाभ प्राप्त करता है।
अहो सुन्दरम्। यदि एवं तर्हि अहं नूनं सुभाषितानि पठिष्यामि।
पौत्री – अरे वाह, सुन्दर! यदि ऐसा है, तो मैं अवश्य सुभाषित पढ़ूँगी।
सुभाषितानि स्वकर्तव्यस्य अकर्तव्यस्य च विषये स्पष्टतया मार्गदर्शनं कुर्वन्ति। अतः सर्वे अवश्यं सुभाषितानि पठन्तु। तानि पठित्वा सर्वे जीवनस्य रहस्यम् अवगच्छन्तु, जीवनं सुखमयं च कुर्वन्तु।
पितामही – सुभाषित अपने कर्तव्य (करने योग्य) और अकर्तव्य (न करने योग्य) कार्यों के विषय में स्पष्ट रूप से मार्गदर्शन करते हैं। इसलिए सब लोग अवश्य सुभाषित पढ़ें। उन्हें पढ़कर सब जीवन का रहस्य समझें और जीवन को सुखमय बनाएँ।
श्लोकः १ — भारतभूमि का गौरव
गायन्ति देवाः किल गीतकानि धन्यास्तु ते भारतभूमिभागे।
स्वर्गापवर्गास्पदमार्गभूते भवन्ति भूयः पुरुषाः सुरत्वात् ॥ १ ॥
देवता निश्चय ही (ये) गीत गाते हैं कि – ‘वे (लोग) धन्य हैं, जो भारतभूमि के भाग में (जन्म लेते) हैं।’ स्वर्ग और मोक्ष (अपवर्ग) के स्थान तक पहुँचाने वाले मार्ग-रूप (इस भारतभूमि) में देवता भी देवत्व (छोड़कर) बार-बार मनुष्य (के रूप में जन्म लेते) हैं।
पदच्छेदः – गायन्ति देवाः किल गीतकानि धन्याः तु ते भारतभूमिभागे स्वर्गापवर्गास्पद-मार्गभूते भवन्ति भूयः पुरुषाः सुरत्वात्।
अन्वयः – भारतभूमिभागे (ये) भवन्ति ते धन्याः इति देवाः गीतकानि गायन्ति किल। स्वर्गापवर्गास्पद-मार्गभूते (भारतभूमिभागे) तु (देवाः) सुरत्वात् भूयः पुरुषाः (भवन्ति)।
अन्वय का अर्थ – ‘जो भारतभूमि के भाग में (जन्म लेते) हैं, वे धन्य हैं’ – ऐसे गीत देवता निश्चय ही गाते हैं। स्वर्ग और मोक्ष के स्थान के मार्ग-रूप (भारतभूमि) में तो (देवता) देवत्व से (हटकर) बार-बार मनुष्य (बनते हैं)।
भावार्थः – ये मानवाः अस्यां भारतभूमौ जन्म प्राप्नुवन्ति ते धन्याः इति भारतभूमेः गुणगानं देवाः कुर्वन्ति। अतः वयं सर्वे भारतीयाः भाग्यशालिनः स्मः।
भावार्थ – ‘जो मनुष्य इस भारतभूमि पर जन्म पाते हैं, वे धन्य हैं’ – ऐसा कहकर देवता भारतभूमि का गुणगान करते हैं। इसलिए हम सब भारतीय भाग्यशाली हैं।
धर्म-अर्थ-काम-मोक्षादिप्राप्तये मार्गभूते अस्मिन् भूखण्डे देवाः अपि देवत्वं विहाय मनुष्यरूपेण जन्मग्रहणार्थम् अभिलषन्ति।
धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष आदि की प्राप्ति के मार्ग-रूप इस भू-भाग (भारत) में देवता भी देवत्व छोड़कर मनुष्य के रूप में जन्म लेने की इच्छा करते हैं।
श्लोकः २ — गुण को गुणी ही पहचानता है
गुणी गुणं वेत्ति न वेत्ति निर्गुणः बली बलं वेत्ति न वेत्ति निर्बलः।
पिको वसन्तस्य गुणं न वायसः करी च सिंहस्य बलं न मूषकः ॥ २ ॥
गुणवान् (व्यक्ति) ही गुण को जानता है, गुणहीन नहीं जानता। बलवान् ही बल को जानता है, निर्बल नहीं जानता। कोयल वसन्त के गुण को (जानती है), कौआ नहीं; और हाथी सिंह के बल को (जानता है), चूहा नहीं।
पदच्छेदः – गुणी गुणम् वेत्ति न वेत्ति निर्गुणः बली बलम् वेत्ति न वेत्ति निर्बलः पिकः वसन्तस्य गुणम् न वायसः करी च सिंहस्य बलम् न मूषकः।
अन्वयः – गुणी गुणं वेत्ति। निर्गुणः (गुणं) न वेत्ति। बली बलं वेत्ति, निर्बलः (बलं) न वेत्ति। पिकः वसन्तस्य गुणं (वेत्ति) वायसः (वसन्तस्य गुणं) न (वेत्ति )। करी च सिंहस्य बलं (वेत्ति)। मूषकः (सिंहस्य बलं) न वेत्ति।
अन्वय का अर्थ – गुणवान् गुण को जानता है। गुणहीन (गुण को) नहीं जानता। बलवान् बल को जानता है, निर्बल (बल को) नहीं जानता। कोयल वसन्त के गुण को (जानती है), कौआ (वसन्त के गुण को) नहीं (जानता)। और हाथी सिंह के बल को (जानता है)। चूहा (सिंह के बल को) नहीं जानता।
भावार्थः – गुणवान् जनः अन्येषां सद्गुणान् ज्ञातुं शक्नोति। परन्तु गुणहीनः जनः अपरेषां सुगुणान् अवगन्तुं समर्थः न भवति।
भावार्थ – गुणवान् व्यक्ति दूसरों के सद्गुणों को जान सकता है। परन्तु गुणहीन व्यक्ति दूसरों के अच्छे गुणों को समझने में समर्थ नहीं होता।
बलवान् जनः यथा अन्येषां बलं ज्ञातुं शक्नोति तथा बलरहितः जनः अन्येषां बलं ज्ञातुं न शक्नोति।
जैसे बलवान् व्यक्ति दूसरों के बल को जान सकता है, वैसे बलहीन व्यक्ति दूसरों के बल को नहीं जान सकता।
वसन्तकाले आगते पिकः वसन्तस्य गुणानुरूपं कुहुतानं करोति। परन्तु काकः मधुरं गातुं न शक्नोति।
वसन्त ऋतु आने पर कोयल वसन्त के गुण के अनुरूप ‘कुहू-कुहू’ की मधुर तान छेड़ती है। परन्तु कौआ मधुर नहीं गा सकता।
गजः पशुराजसिंहस्य बलं जानाति किन्तु मूषकः तस्य बलं ज्ञातुं न पारयति। अतः योग्यः एव महत्त्वं ज्ञातुं समर्थो भवति, न अयोग्यः।
हाथी पशुओं के राजा सिंह के बल को जानता है, किन्तु चूहा उसके बल को नहीं जान पाता। इसलिए योग्य व्यक्ति ही (किसी के) महत्त्व को जानने में समर्थ होता है, अयोग्य नहीं।
श्लोकः ३ — परोपकारियों का स्वभाव
भवन्ति नम्रास्तरवः फलोद्गमैः नवाम्बुभिर्दूरविलम्बिनो घनाः।
अनुद्धताः सत्पुरुषाः समृद्धिभिः स्वभाव एवैष परोपकारिणाम् ॥ ३ ॥
फल लगने पर (फलों के भार से) वृक्ष झुक जाते हैं; नए जल से (भरे) बादल दूर तक नीचे झुक आते हैं; सज्जन लोग समृद्धि (बहुत धन) पाकर भी अभिमान नहीं करते। परोपकारियों का यही स्वभाव होता है।
पदच्छेदः – भवन्ति नम्राः तरवः फलोद्गमैः नवाम्बुभिः दूरविलम्बिनः घनाः अनुद्धताः सत्पुरुषाः समृद्धिभिः स्वभाव एव एषः परोपकारिणाम्।
अन्वयः – तरवः फलोद्गमैः नम्राः भवन्ति। घनाः नवाम्बुभिः दूरविलम्बिनः (भवन्ति)। सत्पुरुषाः समृद्धिभिः अनुद्धताः (भवन्ति)। परोपकारिणाम् एष एव स्वभावः(भवति)।
अन्वय का अर्थ – वृक्ष फलों के भार से झुक जाते हैं। बादल नए जल से (भरकर) दूर तक नीचे झुक आते हैं। सज्जन बहुत धन (पाकर भी) अभिमान से रहित (रहते हैं)। परोपकारियों का यही स्वभाव (होता है)।
भावार्थः – समयानुसारं वृक्षेषु फलानि जायन्ते। फलभारेण ते वृक्षाः नम्राः भवन्ति।
भावार्थ – समय आने पर वृक्षों पर फल लगते हैं। फलों के भार से वे वृक्ष झुक जाते हैं।
तथैव नवजलैः परिपूर्णाः मेघाः अवनताः भवन्ति, भूमिं प्रति आयान्ति वृष्टिं च कुर्वन्ति।
उसी प्रकार नए जल से भरे बादल नीचे झुक जाते हैं, धरती की ओर आते हैं और वर्षा करते हैं।
अस्मिन् संसारे बहवः परोपकारिणः जनाः सन्ति। स्वसमृद्धिकाले ते औद्धत्यं न प्रकटयन्ति।
इस संसार में बहुत-से परोपकारी लोग हैं। अपनी समृद्धि के समय वे घमंड (उद्दंडता) नहीं दिखाते।
ते सहृदयाः विनम्राः च सन्तः सदैव परोपकाराय यत्नशीलाः भवन्ति। ते परोपकारं व्रतरूपेण धारयन्ति।
वे सहृदय और विनम्र होकर सदा परोपकार के लिए प्रयत्न करते रहते हैं। वे परोपकार को व्रत के रूप में धारण करते हैं।
उक्तं च व्यासमहर्षिणा – परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम्।
महर्षि व्यास ने भी कहा है – परोपकार पुण्य के लिए होता है और दूसरों को पीड़ा देना पाप के लिए।
श्लोकः ४ — मनुष्य की चार कसौटियाँ
यथा चतुर्भिः कनकं परीक्ष्यते निघर्षणच्छेदनतापताडनैः।
तथा चतुर्भिः पुरुषः परीक्ष्यते कुलेन शीलेन गुणेन कर्मणा ॥ ४ ॥
जैसे घिसना, काटना, तपाना और पीटना – इन चार (उपायों) से सोने की परीक्षा की जाती है, वैसे ही कुल, शील (स्वभाव), गुण और कर्म – इन चार से मनुष्य की परीक्षा की जाती है।
पदच्छेदः – यथा चतुर्भिः कनकम् परीक्ष्यते निघर्षण-च्छेदन-ताप-ताडनैः तथा चतुर्भिः पुरुषः परीक्ष्यते कुलेन शीलेन गुणेन कर्मणा।
अन्वयः – यथा निघर्षण-छेदन-ताप-ताडनैः चतुर्भिः (उपायैः) कनकं परीक्ष्यते। तथा कुलेन शीलेन गुणेन कर्मणा (च) चतुर्भिः पुरुषः परीक्ष्यते।
अन्वय का अर्थ – जैसे घिसने, काटने, तपाने और पीटने – इन चार (उपायों) से सोने की परीक्षा की जाती है, वैसे ही कुल, स्वभाव, गुण और कर्म – (इन) चार से मनुष्य की परीक्षा की जाती है।
भावार्थः – स्वर्णकारः सुवर्णस्य शुद्धताम् आकलयितुम् आदौ निकषप्रस्तरे निघर्षणं करोति, तदनन्तरं तस्य सुवर्णस्य कर्तनं करोति, ततः अग्निना दाहयति, अन्ते सुवर्णखण्डे प्रहारं करोति।
भावार्थ – सुनार सोने की शुद्धता जाँचने के लिए पहले उसे कसौटी के पत्थर पर घिसता है, उसके बाद उस सोने को काटता है, फिर आग में तपाता है और अन्त में सोने के टुकड़े पर चोट करता है।
एभिः चतुर्भिः प्रकारैः परीक्ष्य सुवर्णस्य पूर्णशुद्धतां ज्ञातुं शक्नोति। तथैव पुरुषः अपि चतुर्भिः उपायैः परीक्षणीयः।
इन चार प्रकारों से परखकर वह सोने की पूरी शुद्धता जान सकता है। उसी प्रकार मनुष्य की भी चार उपायों से परीक्षा करनी चाहिए।
यथा – कस्मिन् परिवारे अयं जनः जन्म अलभत? तस्य स्वभावः कीदृशः अस्ति? सः कीदृशैः गुणैः युक्तः अस्ति? पुनः सः केन कर्मणा सर्वत्र समादृतः भवति? इति।
जैसे – इस व्यक्ति ने किस परिवार में जन्म लिया? उसका स्वभाव कैसा है? वह कैसे गुणों से युक्त है? और वह किस कर्म के कारण सब जगह आदर पाता है?
एषु निकषेषु परीक्ष्य एव तस्य व्यक्तित्वं ज्ञातुं शक्यते।
इन कसौटियों पर परखकर ही उसके व्यक्तित्व को जाना जा सकता है।
श्लोकः ५ — मनुष्य को चमकाने वाले आठ गुण
अष्टौ गुणाः पुरुषं दीपयन्ति प्रज्ञा च कौल्यं च दमः श्रुतं च।
पराक्रमश्चाबहुभाषिता च दानं यथाशक्ति कृतज्ञता च ॥ ५ ॥
आठ गुण मनुष्य को प्रकाशित करते (उसकी शोभा बढ़ाते) हैं – विशिष्ट बुद्धि, अच्छे कुल में जन्म, इन्द्रियों का संयम, शास्त्रों का ज्ञान, वीरता, कम और सार्थक बोलना, शक्ति के अनुसार दान और कृतज्ञता।
पदच्छेदः – अष्टौ गुणाः पुरुषम् दीपयन्ति प्रज्ञा च कौल्यम् च दमः श्रुतम् च। पराक्रमः च अबहुभाषिता च दानम् यथाशक्ति कृतज्ञता च।
अन्वयः – प्रज्ञा कौल्यं दमः श्रुतं पराक्रमः अबहुभाषिता च यथाशक्ति दानं कृतज्ञता च (इत्येते) अष्टौ गुणाः पुरुषं दीपयन्ति।
अन्वय का अर्थ – विशिष्ट बुद्धि, कुलीनता, इन्द्रिय-संयम, शास्त्र-ज्ञान, पराक्रम, कम बोलना, शक्ति के अनुसार दान और कृतज्ञता – (ये) आठ गुण मनुष्य को प्रकाशित करते हैं।
भावार्थः – अष्टभिः गुणैः युक्तः मानवः सर्वदा समाजे सम्मानं प्राप्नोति।
भावार्थ – (इन) आठ गुणों से युक्त मनुष्य समाज में सदा सम्मान पाता है।
विशेषज्ञानं, कुलीनता, संयमः, वेदादीनां शास्त्राणां ज्ञानं, पराक्रमः, अल्पभाषिता, सामर्थ्यानुसारं दानशीलता, कृतज्ञता च इति एते अष्टौ गुणाः सन्ति।
विशेष ज्ञान, कुलीनता, संयम, वेद आदि शास्त्रों का ज्ञान, पराक्रम, कम बोलना, सामर्थ्य के अनुसार दान देने का स्वभाव और कृतज्ञता – ये आठ गुण हैं।
मानवः उत्तमगुणान् आश्रित्य सम्मानितः भवति। अतः उक्तम् – गुणवान् पूज्यते नरः।
मनुष्य उत्तम गुणों के सहारे ही सम्मानित होता है। इसीलिए कहा गया है – गुणवान् मनुष्य पूजा (आदर पाता) है।
श्लोकः ६ — सच्ची सभा का लक्षण
न सा सभा यत्र न सन्ति वृद्धाः वृद्धा न ते ये न वदन्ति धर्मम्।
धर्मः स नो यत्र न सत्यमस्ति सत्यं न तद्यच्छलमभ्युपैति ॥ ६ ॥
वह सभा (सच्ची सभा) नहीं है, जहाँ वृद्ध (अनुभवी) लोग न हों; वे वृद्ध (सच्चे वृद्ध) नहीं हैं, जो धर्म की बात न कहें; वह धर्म नहीं है, जिसमें सत्य न हो; और वह सत्य नहीं है, जो छल (कपट) से युक्त हो।
पदच्छेदः – न सा सभा यत्र न सन्ति वृद्धाः वृद्धाः न ते ये न वदन्ति धर्मम् धर्मः सः नो यत्र न सत्यम् अस्ति सत्यम् न तद् यद् छलम् अभ्युपैति।
अन्वयः – सा सभा न (अस्ति), यत्र वृद्धाः न सन्ति। ते वृद्धाः न (सन्ति), ये धर्मं न वदन्ति। सः धर्मः न उ (अस्ति), यत्र सत्यं न अस्ति। तत् सत्यं न (अस्ति), यत् छलम् अभ्युपैति।
अन्वय का अर्थ – वह सभा नहीं (है), जहाँ वृद्ध नहीं हैं। वे वृद्ध नहीं (हैं), जो धर्म (की बात) नहीं कहते। वह धर्म नहीं (है), जिसमें सत्य नहीं है। वह सत्य नहीं (है), जिसमें छल आ मिलता है।
भावार्थः – अस्मिन् संसारे विविधाः सभाः भवन्ति। सभासु जनसमागमः भवति। बहुभाषणं प्रचलति।
भावार्थ – इस संसार में अनेक प्रकार की सभाएँ होती हैं। सभाओं में लोग इकट्ठे होते हैं। (वहाँ) बहुत बातें (लम्बे भाषण) चलती हैं।
तेन साफल्यं न भवति। वस्तुतः सा एव सभा सफला भवति यत्र वयोवृद्धाः ज्ञानवृद्धाः च जनाः भवेयुः।
उससे सफलता नहीं मिलती। वास्तव में वही सभा सफल होती है, जहाँ आयु में बड़े और ज्ञान में बड़े लोग हों।
पुनरपि ते ज्ञानवृद्धाः धर्मविषये वदेयुः। धर्मसम्बद्धायां चर्चायां सत्यम् एव वक्तव्यं यत् सत्यं तथ्ययुक्तं भवेत् न तु छलनायुक्तम् इति।
फिर वे ज्ञानवृद्ध धर्म के विषय में बोलें। धर्म से जुड़ी चर्चा में सत्य ही बोलना चाहिए – ऐसा सत्य जो तथ्यों से युक्त हो, छल से युक्त नहीं।
श्लोकः ७ — दुर्जन की संगति से बचो
दुर्जनेन समं सख्यं प्रीतिं चापि न कारयेत्।
उष्णो दहति चाङ्गारः शीतः कृष्णायते करम् ॥ ७ ॥
दुष्ट व्यक्ति के साथ मित्रता और प्रेम भी नहीं करना चाहिए। (क्योंकि) अंगारा गरम हो तो (हाथ को) जलाता है और ठंडा हो तो हाथ को काला कर देता है।
पदच्छेदः – दुर्जनेन समम् सख्यम् प्रीतिम् च अपि न कारयेत् उष्णः दहति च अङ्गारः शीतः कृष्णायते करम्।
अन्वयः – दुर्जनेन समं सख्यं प्रीतिं च अपि न कारयेत्। उष्णः अङ्गारः दहति शीतः च करं कृष्णायते।
अन्वय का अर्थ – दुष्ट के साथ मित्रता और प्रेम भी नहीं करना चाहिए। गरम अंगारा जलाता है और ठंडा (अंगारा) हाथ को काला करता है।
भावार्थः – दुर्जनेन सह मैत्री न करणीया। यतो हि दुर्जनः विश्वासयोग्यः न भवति।
भावार्थ – दुष्ट व्यक्ति के साथ मित्रता नहीं करनी चाहिए, क्योंकि दुष्ट व्यक्ति विश्वास के योग्य नहीं होता।
दुर्जनेन सह बन्धुता प्रीतिः न करणीया। यतः तस्य दुर्जनस्य मुखे माधुर्यं परं हृदये कपटता भवति।
दुष्ट के साथ भाईचारा और प्रेम नहीं करना चाहिए, क्योंकि उस दुष्ट के मुख में मिठास होती है, परन्तु हृदय में कपट।
अङ्गारः उष्णः भवति चेत् तापेन करं ज्वालयति। पुनः यदि सः अङ्गारः शीतलः अस्ति तदापि हस्तं मलिनं करोति।
अंगारा यदि गरम हो तो अपनी गरमी से हाथ को जला देता है। और यदि वह अंगारा ठंडा हो, तब भी हाथ को मैला (काला) कर देता है।
तथैव दुर्जनः सर्वदा एव अनिष्टं करोति कारयति च। अतः विद्यया अलङ्कृतोऽपि दुर्जनः परिहर्तव्यः।
उसी प्रकार दुष्ट व्यक्ति सदा बुरा ही करता है और करवाता है। इसलिए विद्या से सुशोभित होने पर भी दुष्ट व्यक्ति से दूर रहना चाहिए।
श्लोकः ८ — पुरुषार्थ के बिना भाग्य नहीं फलता
यथा ह्येकेन चक्रेण न रथस्य गतिर्भवेत्।
एवं पुरुषकारेण विना दैवं न सिध्यति ॥ ८ ॥
जैसे एक पहिये से रथ की गति (चलना) नहीं हो सकती, वैसे ही पुरुषार्थ (परिश्रम) के बिना भाग्य नहीं फलता।
पदच्छेदः – यथा हि एकेन चक्रेण न रथस्य गतिः भवेत् एवम् पुरुषकारेण विना दैवम् न सिध्यति।
अन्वयः – यथा हि एकेन चक्रेण रथस्य गतिः न भवेत् एवं पुरुषकारेण विना दैवं न सिध्यति।
अन्वय का अर्थ – जैसे एक पहिये से रथ की गति नहीं हो सकती, वैसे ही परिश्रम के बिना भाग्य नहीं फलता।
भावार्थः – रथस्य गतिः चक्रद्वयेन एव सम्यक् भवति। एकेन चक्रेण रथस्य गमनं न सम्भवेत्। रथस्य गतिः स्थगिता स्यात्।
भावार्थ – रथ की गति दो पहियों से ही ठीक होती है। एक पहिये से रथ का चलना सम्भव नहीं होगा; रथ की गति रुक जाएगी।
पुरुषार्थेन विना फलं न सिध्यति। भाग्ये स्थितेऽपि उद्योगेन एव फलं लभ्यते।
पुरुषार्थ के बिना फल सिद्ध नहीं होता। भाग्य होने पर भी परिश्रम से ही फल मिलता है।
अत्र अनुभूयते यत् प्रयत्नः भाग्यं च मानवरथस्य द्वे चक्रे स्तः। उक्तम् अपि – उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।
यहाँ अनुभव होता है कि प्रयत्न और भाग्य मानव-रूपी रथ के दो पहिये हैं। कहा भी गया है – कार्य परिश्रम से ही सिद्ध होते हैं, केवल मन की इच्छाओं से नहीं।
अत्र इदम् अवधेयम् (यहाँ यह ध्यान देने योग्य है)
संस्कृतश्लोकेषु प्रतिपद्यं पादचतुष्टयम् अस्ति। छन्दोबद्ध-सस्वरगानशैली अपि अस्ति।
संस्कृत श्लोकों में प्रत्येक पद्य में चार पाद (चरण) होते हैं। (उनमें) छन्द में बँधी, स्वर के साथ गाने की शैली भी होती है।
श्लोकेषु सन्धिसमासयुक्तपदानि भवन्ति। यथा —
नम्रास्तरवः = नम्राः + तरवः।
अभ्युपैति = अभि + उप + एति।
अनुद्धताः = न उद्धताः (नञ् तत्पुरुषसमासः)।
यथाशक्ति = शक्तिम् अनतिक्रम्य (अव्ययीभावः)।
श्लोकों में सन्धि और समास से युक्त पद होते हैं। जैसे —
नम्रास्तरवः = नम्राः + तरवः (झुके हुए वृक्ष)।
अभ्युपैति = अभि + उप + एति (प्राप्त करता है)।
अनुद्धताः = न उद्धताः – जो उद्धत (घमंडी) नहीं हैं (नञ् तत्पुरुष समास)।
यथाशक्ति = शक्ति का उल्लंघन न करके, अर्थात् शक्ति के अनुसार (अव्ययीभाव समास)।
योग्यताविस्तरः (अतिरिक्त जानकारी)
विष्णुपुराणम् – प्रसिद्धेषु अष्टादशसु पुराणेषु विष्णुपुराणम् अन्यतमम्। अस्मिन् पुराणे प्रायेण सप्तसहस्राधिकश्लोकाः सन्ति।
विष्णुपुराण – प्रसिद्ध अठारह पुराणों में विष्णुपुराण एक है। इस पुराण में लगभग सात हज़ार से अधिक श्लोक हैं।
अत्र भगवतः विष्णोः तस्य च अवताराणां विषये वर्णितम्। भारतवर्षस्य गौरवविषये विष्णुपुराणम् अतीव प्रामाणिकं तथ्यं प्रकाशयति।
इसमें भगवान विष्णु और उनके अवतारों के विषय में वर्णन है। भारतवर्ष के गौरव के विषय में विष्णुपुराण अत्यन्त प्रामाणिक तथ्य प्रकट करता है।
महाभारतम् – संस्कृतसाहित्ये महाभारतम् इति इतिहासग्रन्थः पञ्चमवेदरूपेण स्वीकृतः। अस्मिन् ग्रन्थे लक्षाधिकाः श्लोकाः सन्ति।
महाभारत – संस्कृत साहित्य में महाभारत नामक इतिहास-ग्रन्थ को पाँचवें वेद के रूप में स्वीकार किया गया है। इस ग्रन्थ में एक लाख से अधिक श्लोक हैं।
अतः शतसाहस्रीसंहिता इति अस्य अपरं नाम। महाभारते अष्टादश पर्वाणि सन्ति।
इसलिए इसका दूसरा नाम ‘शतसाहस्री संहिता’ (एक लाख श्लोकों वाली संहिता) है। महाभारत में अठारह पर्व हैं।
भर्तृहरिः – भर्तृहरिः संस्कृतकाव्यवाङ्मये महान् कविः अस्ति। नीतिशास्त्रविशारदस्य तस्य कृतयः नीतिशतकं शृङ्गारशतकं वैराग्यशतकं चेति भारतीयज्ञानपरम्परां पोषयन्ति।
भर्तृहरि – भर्तृहरि संस्कृत काव्य-साहित्य के महान कवि हैं। नीतिशास्त्र के विद्वान उन (भर्तृहरि) की रचनाएँ – नीतिशतक, शृङ्गारशतक और वैराग्यशतक – भारतीय ज्ञान-परम्परा को पुष्ट करती हैं।
हितोपदेशः – पण्डितनारायणेन हितोपदेशः कथाग्रन्थः सङ्कलितः। ग्रन्थेऽस्मिन् विविधाः कथाः नीतिश्लोकाः च सन्ति। हितोपदेशः चतुर्धा विभक्तः – मित्रलाभः, सुहृद्भेदः, विग्रहः, सन्धिः।
हितोपदेश – पण्डित नारायण ने हितोपदेश नामक कथा-ग्रन्थ का संकलन किया। इस ग्रन्थ में विविध कथाएँ और नीतिश्लोक हैं। हितोपदेश चार भागों में बँटा है – मित्रलाभ, सुहृद्भेद, विग्रह और सन्धि।
चाणक्यनीतिः – चाणक्यस्य नीतिश्लोकाः माणिक्यसदृशाः सन्ति। बालानां चरित्रनिर्माणाय आदर्शमानवजीवनप्रतिष्ठार्थं च आचार्यस्य चाणक्यस्य नीत्युपदेशाः अत्यन्तम् उपयोगिनः सन्ति।
चाणक्यनीति – चाणक्य के नीतिश्लोक माणिक्य (रत्न) के समान हैं। बालकों के चरित्र-निर्माण के लिए और आदर्श मानव-जीवन की स्थापना के लिए आचार्य चाणक्य के नीति-उपदेश अत्यन्त उपयोगी हैं।

NCERT Solutions for Class 8 Sanskrit Chapter 3 सुभाषितरसं पीत्वा जीवनं सफलं कुरु – Questions and Answers

All questions of the chapter are answered below, in the order of the book – in-text questions, activities and the end-of-chapter exercises. Each answer is written the way you would write it in the exam.

चित्र-संवादः — पृष्ठ 24पाठारम्भे पितामह्याः पौत्र्याः च संवादः

पाठः
प्र.1नीतिश्लोकाः …?
उत्तर

उत्तरम् — आम्। नीतिश्लोकाः। नीतिश्लोकाः नाम सुभाषितानि। (हाँ, नीतिश्लोक। नीतिश्लोक ही सुभाषित कहलाते हैं।)

प्र.2किं नाम सुभाषितानि ?
उत्तर

उत्तरम् — सुष्ठु भाषितानि इति सुभाषितानि, अर्थात् शोभनानि वचनानि। तानि सर्वदा जनानां हिताय भवन्ति। (जो अच्छी तरह कहे गए हों, वे सुभाषित हैं, अर्थात् सुन्दर वचन। वे सदा लोगों के हित के लिए होते हैं।)

प्र.3सुभाषितपठनेन कः लाभः ?
उत्तर

उत्तरम् — सुभाषितपठनेन आदर्श-मानवजीवन-निर्माणाय प्रेरणा प्राप्यते। मानवजीवनस्य सुखाय समृद्ध्ये च सुभाषितानां पठनस्य आवश्यकता अस्ति। यः सुभाषितानि पठित्वा कार्यक्षेत्रे तस्य ज्ञानस्य प्रयोगं करोति सः बहून् लाभान् प्राप्नोति। (सुभाषित पढ़ने से आदर्श मानव-जीवन बनाने की प्रेरणा मिलती है। मानव-जीवन के सुख और समृद्धि के लिए सुभाषितों का पठन आवश्यक है। जो सुभाषित पढ़कर अपने कार्यक्षेत्र में उस ज्ञान का प्रयोग करता है, वह बहुत लाभ पाता है।)

सुभाषितानि — पदच्छेदः, अन्वयः, अर्थः, भावः च — पृष्ठ 25–29पाठे आगतानां अष्टानां सुभाषितानां सम्पूर्णं व्याख्यानम् (छन्दः, अलङ्कारः च सहितम्)

श्लोकव्याख्या
श्लोक 1गायन्ति देवाः किल गीतकानि धन्यास्तु ते भारतभूमिभागे।
स्वर्गापवर्गास्पदमार्गभूते भवन्ति भूयः पुरुषाः सुरत्वात्॥ १॥
इस श्लोक का पदच्छेद, अन्वय, अर्थ तथा भाव लिखिए।
उत्तर
पदच्छेदः — गायन्ति। देवाः। किल। गीतकानि। धन्याः। तु। ते। भारतभूमिभागे।
स्वर्गापवर्गास्पद-मार्गभूते। भवन्ति। भूयः। पुरुषाः। सुरत्वात्।

अन्वयः — भारतभूमिभागे (ये) भवन्ति ते धन्याः इति देवाः गीतकानि गायन्ति किल। स्वर्गापवर्गास्पद-मार्गभूते (भारतभूमिभागे) तु (देवाः) सुरत्वात् भूयः पुरुषाः (भवन्ति)।

अर्थः — देवता निश्चय ही यह गीत गाते हैं कि ‘जो भारतभूमि के भाग में जन्म लेते हैं, वे धन्य हैं’। स्वर्ग और मोक्ष — दोनों की प्राप्ति का मार्ग बनी हुई इस भारतभूमि में तो देवता भी अपना देवत्व छोड़कर बार-बार मनुष्य बनते हैं।

भावः — भारतभूमि में जन्म लेना बड़े सौभाग्य की बात है; स्वर्ग और मोक्ष का मार्ग बनी इस भूमि में जन्म पाने के लिए देवता भी अपना देवत्व छोड़ना चाहते हैं।

श्लोक 2गुणी गुणं वेत्ति न वेत्ति निर्गुणः बली बलं वेत्ति न वेत्ति निर्बलः।
पिको वसन्तस्य गुणं न वायसः करी च सिंहस्य बलं न मूषकः॥ २॥
इस श्लोक का पदच्छेद, अन्वय, अर्थ तथा भाव लिखिए।
उत्तर
पदच्छेदः — गुणी। गुणम्। वेत्ति। न। वेत्ति। निर्गुणः। बली। बलम्। वेत्ति। न। वेत्ति। निर्बलः।
पिकः। वसन्तस्य। गुणम्। न। वायसः। करी। च। सिंहस्य। बलम्। न। मूषकः।

अन्वयः — गुणी गुणं वेत्ति। निर्गुणः (गुणं) न वेत्ति। बली बलं वेत्ति, निर्बलः (बलं) न वेत्ति। पिकः वसन्तस्य गुणं (वेत्ति), वायसः (वसन्तस्य गुणं) न (वेत्ति)। करी च सिंहस्य बलं (वेत्ति)। मूषकः (सिंहस्य बलं) न वेत्ति।

अर्थः — गुणवान् व्यक्ति ही गुण को पहचानता है, गुणहीन नहीं पहचानता। बलवान् ही बल को जानता है, बलहीन नहीं जानता। कोयल ही वसन्त के गुण को जानती है, कौआ नहीं; और हाथी ही सिंह के बल को जानता है, चूहा नहीं।

भावः — योग्य व्यक्ति ही दूसरों की योग्यता का महत्त्व जान सकता है, अयोग्य नहीं।

श्लोक 3भवन्ति नम्रास्तरवः फलोद्गमैर्नवाम्बुभिर्दूरविलम्बिनो घनाः।
अनुद्धताः सत्पुरुषाः समृद्धिभिः स्वभाव एवैष परोपकारिणाम्॥ ३॥
इस श्लोक का पदच्छेद, अन्वय, अर्थ तथा भाव लिखिए।
उत्तर
पदच्छेदः — भवन्ति। नम्राः। तरवः। फलोद्गमैः। नवाम्बुभिः। दूरविलम्बिनः। घनाः।
अनुद्धताः। सत्पुरुषाः। समृद्धिभिः। स्वभावः। एव। एषः। परोपकारिणाम्।

अन्वयः — तरवः फलोद्गमैः नम्राः भवन्ति। घनाः नवाम्बुभिः दूरविलम्बिनः (भवन्ति)। सत्पुरुषाः समृद्धिभिः अनुद्धताः (भवन्ति)। परोपकारिणाम् एष एव स्वभावः (भवति)।

अर्थः — वृक्ष फलों के भार से झुक जाते हैं; बादल नए जल से भरकर नीचे की ओर झुक आते हैं; और सज्जन पुरुष सम्पत्ति बढ़ने पर घमण्ड नहीं करते। परोपकारियों का यही स्वभाव होता है।

भावः — जैसे फलों से लदे वृक्ष और जल से भरे बादल झुकते हैं, वैसे ही सज्जन समृद्धि पाकर भी विनम्र रहते हैं; परोपकारियों का यही स्वभाव है।

श्लोक 4यथा चतुर्भिः कनकं परीक्ष्यते निघर्षणच्छेदनतापताडनैः।
तथा चतुर्भिः पुरुषः परीक्ष्यते कुलेन शीलेन गुणेन कर्मणा॥ ४॥
इस श्लोक का पदच्छेद, अन्वय, अर्थ तथा भाव लिखिए।
उत्तर
पदच्छेदः — यथा। चतुर्भिः। कनकम्। परीक्ष्यते। निघर्षण-च्छेदन-ताप-ताडनैः। तथा।
चतुर्भिः। पुरुषः। परीक्ष्यते। कुलेन। शीलेन। गुणेन। कर्मणा।

अन्वयः — यथा निघर्षण-छेदन-ताप-ताडनैः चतुर्भिः (उपायैः) कनकं परीक्ष्यते, तथा कुलेन शीलेन गुणेन कर्मणा (च) चतुर्भिः पुरुषः परीक्ष्यते।

अर्थः — जैसे घिसना, काटना, तपाना और पीटना — इन चार उपायों से सोने की परीक्षा की जाती है, वैसे ही कुल, शील, गुण और कर्म — इन चार कसौटियों से मनुष्य की परीक्षा की जाती है।

भावः — जैसे सोने की शुद्धता चार प्रकार से परखी जाती है, वैसे ही कुल, शील, गुण और कर्म — इन चार कसौटियों पर परखकर ही मनुष्य का व्यक्तित्व जाना जाता है।

श्लोक 5अष्टौ गुणाः पुरुषं दीपयन्ति प्रज्ञा च कौल्यं च दमः श्रुतं च।
पराक्रमश्चाबहुभाषिता च दानं यथाशक्ति कृतज्ञता च॥ ५॥
इस श्लोक का पदच्छेद, अन्वय, अर्थ तथा भाव लिखिए।
उत्तर
पदच्छेदः — अष्टौ। गुणाः। पुरुषम्। दीपयन्ति। प्रज्ञा। च। कौल्यम्। च। दमः। श्रुतम्। च।
पराक्रमः। च। अबहुभाषिता। च। दानम्। यथाशक्ति। कृतज्ञता। च।

अन्वयः — प्रज्ञा, कौल्यं, दमः, श्रुतं, पराक्रमः, अबहुभाषिता च, यथाशक्ति दानं, कृतज्ञता च (इत्येते) अष्टौ गुणाः पुरुषं दीपयन्ति।

अर्थः — आठ गुण मनुष्य को चमकाते हैं — विशिष्ट बुद्धि, अच्छे कुल में जन्म, इन्द्रियों का संयम, शास्त्रों का ज्ञान, पराक्रम, कम किन्तु सार्थक बोलना, सामर्थ्य के अनुसार दान और कृतज्ञता।

भावः — इन आठ गुणों से युक्त मनुष्य समाज में सदा सम्मान पाता है — गुणवान् पूज्यते नरः।

श्लोक 6न सा सभा यत्र न सन्ति वृद्धाः वृद्धा न ते ये न वदन्ति धर्मम्।
धर्मः स नो यत्र न सत्यमस्ति सत्यं न तद्यच्छलमभ्युपैति॥ ६॥
इस श्लोक का पदच्छेद, अन्वय, अर्थ तथा भाव लिखिए।
उत्तर
पदच्छेदः — न। सा। सभा। यत्र। न। सन्ति। वृद्धाः। वृद्धाः। न। ते। ये। न। वदन्ति। धर्मम्।
धर्मः। सः। नो। यत्र। न। सत्यम्। अस्ति। सत्यम्। न। तद्। यद्। छलम्। अभ्युपैति।

अन्वयः — सा सभा न (अस्ति), यत्र वृद्धाः न सन्ति। ते वृद्धाः न (सन्ति), ये धर्मं न वदन्ति। सः धर्मः न उ (अस्ति), यत्र सत्यं न अस्ति। तत् सत्यं न (अस्ति), यत् छलम् अभ्युपैति।

अर्थः — वह सभा, सभा नहीं जहाँ वृद्ध (अनुभवी एवं ज्ञानी जन) न हों। वे वृद्ध, वृद्ध नहीं जो धर्म की बात न कहें। वह धर्म, धर्म नहीं जिसमें सत्य न हो। और वह सत्य, सत्य नहीं जो छल से युक्त हो।

भावः — वही सभा सफल है जहाँ ज्ञानवृद्ध जन सत्य और छल-रहित धर्म-चर्चा करें।

श्लोक 7दुर्जनेन समं सख्यं प्रीतिं चापि न कारयेत्।
उष्णो दहति चाङ्गारः शीतः कृष्णायते करम्॥ ७॥
इस श्लोक का पदच्छेद, अन्वय, अर्थ तथा भाव लिखिए।
उत्तर
पदच्छेदः — दुर्जनेन। समम्। सख्यम्। प्रीतिम्। च। अपि। न। कारयेत्।
उष्णः। दहति। च। अङ्गारः। शीतः। कृष्णायते। करम्।

अन्वयः — दुर्जनेन समं सख्यं प्रीतिं च अपि न कारयेत्। उष्णः अङ्गारः दहति, शीतः च करं कृष्णायते।

अर्थः — दुष्ट व्यक्ति के साथ न मित्रता करनी चाहिए और न प्रेम। अङ्गारा यदि गरम हो तो हाथ जला देता है, और यदि ठण्डा हो तो हाथ काला कर देता है।

भावः — दुर्जन हर दशा में हानि ही करता है, इसलिए विद्वान् होने पर भी दुर्जन की संगति छोड़ देनी चाहिए।

श्लोक 8यथा ह्येकेन चक्रेण न रथस्य गतिर्भवेत्।
एवं पुरुषकारेण विना दैवं न सिध्यति॥ ८॥
इस श्लोक का पदच्छेद, अन्वय, अर्थ तथा भाव लिखिए।
उत्तर
पदच्छेदः — यथा। हि। एकेन। चक्रेण। न। रथस्य। गतिः। भवेत्।
एवम्। पुरुषकारेण। विना। दैवम्। न। सिध्यति।

अन्वयः — यथा हि एकेन चक्रेण रथस्य गतिः न भवेत्, एवं पुरुषकारेण विना दैवं न सिध्यति।

अर्थः — जैसे एक ही पहिये से रथ नहीं चल सकता, वैसे ही पुरुषार्थ के बिना भाग्य सिद्ध नहीं होता (फल नहीं देता)।

भावः — प्रयत्न और भाग्य मानव-रथ के दो पहिये हैं; भाग्य होने पर भी फल परिश्रम से ही मिलता है — उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।

वयं शब्दार्थान् जानीमः — पृष्ठ 30–31पाठे प्रयुक्तानां पदानां संस्कृत-अर्थः, हिन्दी अर्थः, English अर्थः च

शब्दार्थाः
प्र.1वयं शब्दार्थान् जानीमः — पाठे प्रयुक्तानां पदानाम् अर्थान् लिखत।
उत्तर

पुस्तक ने पृष्ठ 30 और 31 पर पाठ के सभी कठिन पदों की सारणी दी है। नीचे वही पूरी सारणी क्रम से दी गई है — शब्दः → संस्कृत-अर्थः → हिन्दी → English।

शब्दःअर्थः (संस्कृतम्)हिन्दीEnglish
शृङ्खलितम्अनुशासितम्अनुशासितDisciplined
गायन्तिगानं कुर्वन्तिगाते हैंSing
किलनिश्चयेननिश्चय सेWith determination
धन्याःप्रशंसिताःप्रशंसनीयPraiseworthy
अपवर्गःनिर्वाणम्मोक्षLiberation
भूयःपुनः पुनःबार-बारOver and over again
सुरत्वात्देवत्वात्देवत्व सेFrom divinity
वेत्तिजानातिजानता हैKnows
निर्गुणःगुणहीनःगुण रहितWithout virtue
बलीबलवान्बलशालीPowerful
निर्बलःबलरहितःबलहीनWeak
पिकःकोकिलःकोयलCuckoo
वायसःकाकःकौआCrow
करीगजःहाथीElephant
नम्राःअवनताःझुके हुएBent
तरवःपादपाःवृक्षTrees
फलोद्गमैःफलभारैःफलों के भार सेWith weight of fruits
अम्बुभिःजलैःजल से भरे हुएFilled with water
दूरविलम्बिनःदूरात् अधः अवनताःदूर से नीचे झुके हुएCome down from above
घनाःमेघाःबादलClouds
अनुद्धताःगर्वशून्याःअभिमान से रहितPolite
सत्पुरुषाःसज्जनाःअच्छे लोगGood people
समृद्धिभिःप्रचुरैः धनैःबहुत धन सेWith abundance of wealth
कनकम्सुवर्णम्सोनाGold
परीक्ष्यतेपरीक्षितं भवतिउसकी परीक्षा की जाती हैIs tested
निघर्षणम्घर्षणम्घिसनाRubbing
छेदनम्कर्तनम्काटनाCutting
ताडनैःप्रहारैःप्रहार के द्वाराBy hitting
कुलेनवंशेनकुल सेBy the family
शीलेनस्वभावेनस्वभाव सेBy nature
कर्मणाकार्येणकार्य सेBy work
दीपयन्तिप्रकाशयन्तिप्रकाशित करते हैंIlluminate
प्रज्ञाविशेषज्ञानम्विशिष्ट बुद्धिExtra-ordinary intelligence
कौल्यम्कुलीनताअच्छे कुल में जन्मBirth in a good family
दमःइन्द्रियसंयमःइन्द्रियों का संयमControl over senses
श्रुतम्शास्त्रज्ञानम्शास्त्रों का ज्ञानKnowledge of scriptures
पराक्रमःसाहसःवीरताBravery
अबहुभाषितामितभाषिताकम और सार्थक बोलनाSpeaking less but meaningfully
छलम्कपटताछलनाCheating
अभ्युपैतिप्राप्नोतिप्राप्त करता हैAssociates
दुर्जनेनदुष्टजनेनदुष्ट व्यक्ति सेWith wicked people
समम्सहसाथWith
सख्यम्मैत्रीमित्रताFriendship
दहतिज्वलयतिजलाता हैBurns
अङ्गारःदग्धकाष्ठःअङ्गाराCharcoal
कृष्णायतेमलिनं करोतिकाला करता हैBlackens
दैवम्भाग्यम्भाग्यLuck
सिध्यतिसिद्धं भवतिफलता हैFruitifies
प्र.2मातृभाषया अर्थं लिखत।
उत्तर

उत्तरम् — पाँचवाँ स्तम्भ (‘मातृभाषया अर्थं लिखत’) हर विद्यार्थी अपनी मातृभाषा में स्वयं भरेगा। नीचे मराठी का नमूना है; इसी प्रकार सारणी के सभी शब्दों का अर्थ अपनी भाषा में लिखिए।

नमूना उत्तर (मातृभाषा — मराठी):

शब्दःसंस्कृत-अर्थःमातृभाषया अर्थः (मराठी)
पिकःकोकिलःकोकिळा
वायसःकाकःकावळा
तरवःपादपाःझाडे
घनाःमेघाःढग
कनकम्सुवर्णम्सोने
दैवम्भाग्यम्नशीब

अत्र इदम् अवधेयम् — पृष्ठ 32श्लोक-रचना, छन्द तथा पाठगत सन्धि-समासयुक्त पदानि (प्र.3 — अतिरिक्त अभ्यास)

व्याकरणम्
प्र.1संस्कृतश्लोकेषु प्रतिपद्यं पादचतुष्टयम् अस्ति। छन्दोबद्ध-सस्वरगानशैली अपि अस्ति। — इस कथन को उदाहरण देकर समझाइए।
उत्तर

उत्तरम् — प्रत्येक संस्कृत श्लोक में चार पाद (चरण) होते हैं और वह किसी न किसी छन्द में बँधा होता है, इसलिए उसे स्वर लगाकर गाया भी जा सकता है।

पद्यम् (श्लोकः) = चत्वारः पादाः
पादः 1 + पादः 2 = प्रथमा पङ्क्तिः (पूर्वार्धः)
पादः 3 + पादः 4 = द्वितीया पङ्क्तिः (उत्तरार्धः)
पूर्वार्धान्ते ‘।’ तथा श्लोकान्ते ‘॥’ चिह्नम्

उदाहरणम् (सप्तमः श्लोकः) —

पादःपाठःअक्षरसंख्या
1दुर्जनेन समं सख्यं8
2प्रीतिं चापि न कारयेत्8
3उष्णो दहति चाङ्गारः8
4शीतः कृष्णायते करम्8
प्र.2श्लोकेषु सन्धिसमासयुक्तपदानि भवन्ति। यथा — नम्रास्तरवः, अभ्युपैति, अनुद्धताः, यथाशक्ति। — इनका विग्रह कीजिए और नियम बताइए।
उत्तर

पुस्तक ने चार पद उदाहरण के रूप में दिए हैं। इनका विग्रह इस प्रकार है —

पदम्विग्रहःप्रकारःनियमः
नम्रास्तरवःनम्राः + तरवःसन्धिः (विसर्गसन्धिः)विसर्ग के बाद ‘त्’ आने पर विसर्ग ‘स्’ में बदल जाता है
अभ्युपैतिअभि + उप + एतिसन्धिः (यण् + वृद्धि)अभि + उप → अभ्युप (इ के बाद भिन्न स्वर ‘उ’ आने पर इ → य्); उप + एति → उपैति (अ + ए = ऐ)
अनुद्धताःन उद्धताःसमासःनञ् तत्पुरुष समास — निषेधवाचक ‘न’ पूर्वपद में
यथाशक्तिशक्तिम् अनतिक्रम्यसमासःअव्ययीभाव समास — पूर्वपद अव्यय (यथा), पूरा समस्तपद अव्यय बन जाता है
प्र.3(अतिरिक्त अभ्यास) पाठे आगतानाम् अन्येषां सन्धियुक्तपदानां विच्छेदं कुरुत। (पाठ के अन्य सन्धियुक्त पदों का विच्छेद कीजिए।)
उत्तर

अभ्यास के लिए इसी पाठ से लिए गए और भी पद —

पदम्सन्धि-विच्छेदःसन्धिः
धन्यास्तुधन्याः + तुविसर्गसन्धिः
फलोद्गमैर्नवाम्बुभिःफलोद्गमैः + नवाम्बुभिःविसर्गसन्धिः (‘ः’ → ‘र्’)
दूरविलम्बिनो घनाःदूरविलम्बिनः + घनाःविसर्गसन्धिः (‘ः’ → ‘ओ’)
स्वभाव एवैषस्वभावः + एव + एषःविसर्गलोपः + वृद्धिसन्धिः (अ + ए = ऐ)
पराक्रमश्चाबहुभाषितापराक्रमः + च + अबहुभाषिताविसर्गसन्धिः (‘ः’ → ‘श्’) + दीर्घसन्धिः
सत्यमस्तिसत्यम् + अस्तिसन्धि नहीं — ‘म्’ अगले स्वर से मिलकर लिखा गया है
तद्यच्छलमभ्युपैतितत् + यत् + छलम् + अभ्युपैतिव्यञ्जनसन्धिः (त् + य् = द्य्; त् + छ् = च्छ्)
उष्णो दहतिउष्णः + दहतिविसर्गसन्धिः (‘ः’ → ‘ओ’)
चाङ्गारःच + अङ्गारःदीर्घसन्धिः (अ + अ = आ)
ह्येकेनहि + एकेनयण् सन्धिः (इ + ए = य् + ए)
गतिर्भवेत्गतिः + भवेत्विसर्गसन्धिः (‘ः’ → ‘र्’)

अभ्यासात् जायते सिद्धिः — प्रश्न १ — पृष्ठ 32पाठस्य आधारेण अधोलिखितानां प्रश्नानाम् उत्तराणि एकपदेन लिखत

अभ्यासः
प्र.1 (क)गीतानि के गायन्ति ?
उत्तर

उत्तरम् — देवाः। (देवता गीत गाते हैं।)

प्र.1 (ख)कः बलं न वेत्ति ?
उत्तर

उत्तरम् — निर्बलः। (बलहीन व्यक्ति बल को नहीं जानता।)

प्र.1 (ग)कः वसन्तस्य गुणं वेत्ति ?
उत्तर

उत्तरम् — पिकः। (कोयल वसन्त के गुण को जानती है।)

प्र.1 (घ)मूषकः कस्य बलं न वेत्ति ?
उत्तर

उत्तरम् — सिंहस्य। (चूहा सिंह के बल को नहीं जानता।)

प्र.1 (ङ)फलोद्गमैः के नम्राः भवन्ति ?
उत्तर

उत्तरम् — तरवः। (वृक्ष फलों के भार से झुक जाते हैं।)

प्र.1 (च)केन समं सख्यं न करणीयम् ?
उत्तर

उत्तरम् — दुर्जनेन। (दुष्ट व्यक्ति के साथ मित्रता नहीं करनी चाहिए।)

प्र.1 (छ)केन विना दैवं न सिध्यति ?
उत्तर

उत्तरम् — पुरुषकारेण। (पुरुषार्थ के बिना भाग्य नहीं फलता।)

अभ्यासात् जायते सिद्धिः — प्रश्न २ — पृष्ठ 32–33पाठस्य आधारेण अधोलिखितानां प्रश्नानाम् उत्तराणि पूर्णवाक्येन लिखत

अभ्यासः
प्र.2 (क)तरवः कदा नम्राः भवन्ति ?
उत्तर

उत्तरम् — तरवः फलोद्गमैः नम्राः भवन्ति। (वृक्ष तब झुकते हैं जब उन पर फल आ जाते हैं, अर्थात् फलों के भार से वे झुक जाते हैं।)

आधार: श्लोक 3 — भवन्ति नम्रास्तरवः फलोद्गमैः।

प्र.2 (ख)समृद्धिभिः के अनुद्धताः भवन्ति ?
उत्तर

उत्तरम् — समृद्धिभिः सत्पुरुषाः अनुद्धताः भवन्ति। (बहुत धन-सम्पत्ति पाकर भी सज्जन पुरुष अभिमान नहीं करते।)

आधार: श्लोक 3 — अनुद्धताः सत्पुरुषाः समृद्धिभिः।

प्र.2 (ग)सत्पुरुषाणां स्वभावः कीदृशः भवति ?
उत्तर

उत्तरम् — सत्पुरुषाणां स्वभावः अनुद्धतः परोपकारी च भवति। (सज्जनों का स्वभाव अभिमान-रहित तथा परोपकार करने वाला होता है।)

श्लोक के शब्दों में — स्वभाव एवैष परोपकारिणाम् (परोपकारियों का यही स्वभाव होता है)।

प्र.2 (घ)सत्यम् कदा सत्यम् न भवति ?
उत्तर

उत्तरम् — यत् सत्यं छलम् अभ्युपैति तत् सत्यं सत्यं न भवति। (जो सत्य छल से जुड़ जाता है, वह सत्य वास्तव में सत्य नहीं रह जाता।)

आधार: श्लोक 6 — सत्यं न तद्यच्छलमभ्युपैति।

प्र.2 (ङ)दैवं कदा न सिध्यति ?
उत्तर

उत्तरम् — पुरुषकारेण विना दैवं न सिध्यति। (पुरुषार्थ के बिना भाग्य सिद्ध नहीं होता, अर्थात् फल नहीं देता।)

आधार: श्लोक 8 — एवं पुरुषकारेण विना दैवं न सिध्यति।

अभ्यासात् जायते सिद्धिः — प्रश्न ३ — पृष्ठ 33स्तम्भयोः मेलनं कुरुत — (अ) उक्तिः तथा (आ) भावार्थः

अभ्यासः
प्र.3 (क)स्तम्भयोः मेलनं कुरुत —
(अ) उक्तिः(आ) भावार्थः
गायन्ति देवाः किल गीतकानिसत्पुरुषाणां स्वाभाविकी नम्रता
गुणी गुणं वेत्तिसुवर्णं चतुर्भिः प्रकारैः परीक्ष्यते
भवन्ति नम्राः तरवः फलोद्गमैःभारतभूमेः माहात्म्यवर्णनम्
यथा चतुर्भिः कनकं परीक्ष्यतेसज्जनः एव गुणानां मर्मज्ञः
अष्टौ गुणाः पुरुषं दीपयन्तिप्रज्ञा, दमः, दानं, कृतज्ञता इत्यादयः
दुर्जनेन समं सख्यं न कारयेत्केवलं दैवं प्रयत्नं विना असिद्धम्
एकेन चक्रेण न रथस्य गतिःदुष्टसङ्गः उष्णाङ्गारसदृशः
(क) गायन्ति देवाः किल गीतकानि — इसका सही भावार्थ (आ) स्तम्भ से चुनकर मिलाइए।
उत्तर

उत्तरम् — गायन्ति देवाः किल गीतकानि → भारतभूमेः माहात्म्यवर्णनम्।

सम्पूर्ण मेलन-सारणी (सातों उत्तर एक साथ) —

(अ) उक्तिः(आ) भावार्थः
गायन्ति देवाः किल गीतकानिभारतभूमेः माहात्म्यवर्णनम्
गुणी गुणं वेत्तिसज्जनः एव गुणानां मर्मज्ञः
भवन्ति नम्राः तरवः फलोद्गमैःसत्पुरुषाणां स्वाभाविकी नम्रता
यथा चतुर्भिः कनकं परीक्ष्यतेसुवर्णं चतुर्भिः प्रकारैः परीक्ष्यते
अष्टौ गुणाः पुरुषं दीपयन्तिप्रज्ञा, दमः, दानं, कृतज्ञता इत्यादयः
दुर्जनेन समं सख्यं न कारयेत्दुष्टसङ्गः उष्णाङ्गारसदृशः
एकेन चक्रेण न रथस्य गतिःकेवलं दैवं प्रयत्नं विना असिद्धम्
प्र.3 (ख)गुणी गुणं वेत्ति
उत्तर

उत्तरम् — गुणी गुणं वेत्ति → सज्जनः एव गुणानां मर्मज्ञः। (सज्जन ही गुणों का मर्म जानने वाला होता है।)

प्र.3 (ग)भवन्ति नम्राः तरवः फलोद्गमैः
उत्तर

उत्तरम् — भवन्ति नम्राः तरवः फलोद्गमैः → सत्पुरुषाणां स्वाभाविकी नम्रता। (सज्जनों की विनम्रता स्वाभाविक होती है।)

प्र.3 (घ)यथा चतुर्भिः कनकं परीक्ष्यते
उत्तर

उत्तरम् — यथा चतुर्भिः कनकं परीक्ष्यते → सुवर्णं चतुर्भिः प्रकारैः परीक्ष्यते। (सोने की परीक्षा चार प्रकारों से की जाती है।)

प्र.3 (ङ)अष्टौ गुणाः पुरुषं दीपयन्ति
उत्तर

उत्तरम् — अष्टौ गुणाः पुरुषं दीपयन्ति → प्रज्ञा, दमः, दानं, कृतज्ञता इत्यादयः।

प्र.3 (च)दुर्जनेन समं सख्यं न कारयेत्
उत्तर

उत्तरम् — दुर्जनेन समं सख्यं न कारयेत् → दुष्टसङ्गः उष्णाङ्गारसदृशः। (दुष्ट की संगति गरम अङ्गारे के समान है।)

प्र.3 (छ)एकेन चक्रेण न रथस्य गतिः
उत्तर

उत्तरम् — एकेन चक्रेण न रथस्य गतिः → केवलं दैवं प्रयत्नं विना असिद्धम्। (केवल भाग्य, प्रयत्न के बिना, असिद्ध ही रहता है।)

अभ्यासात् जायते सिद्धिः — प्रश्न ४ — पृष्ठ 33अधः प्रदत्तमञ्जूषातः पदानि चित्वा रिक्तस्थानानि पूरयत — मञ्जूषा : फलोद्गमैः, गुणं, कृतज्ञता, सिध्यति, श्रुतम्, शीलेन

अभ्यासः
प्र.4 (क)गुणी ………………….. वेत्ति न वेत्ति निर्गुणः।
उत्तर

उत्तरम् — गुणी गुणं वेत्ति न वेत्ति निर्गुणः। (गुणवान् गुण को जानता है, गुणहीन नहीं जानता।)

प्र.4 (ख)भवन्ति नम्राः तरवः …………………..।
उत्तर

उत्तरम् — भवन्ति नम्राः तरवः फलोद्गमैः। (वृक्ष फलों के भार से झुक जाते हैं।)

प्र.4 (ग)पुरुषः परीक्ष्यते कुलेन, ………………….., गुणेन, कर्मणा।
उत्तर

उत्तरम् — पुरुषः परीक्ष्यते कुलेन, शीलेन, गुणेन, कर्मणा। (मनुष्य कुल, स्वभाव, गुण और कर्म से परखा जाता है।)

प्र.4 (घ)गुणाः पुरुषं दीपयन्ति – प्रज्ञा, कौल्यं, दमः, …………………..।
उत्तर

उत्तरम् — गुणाः पुरुषं दीपयन्ति – प्रज्ञा, कौल्यं, दमः, श्रुतम्। (गुण मनुष्य को चमकाते हैं — बुद्धि, कुलीनता, इन्द्रिय-संयम, शास्त्रज्ञान।)

प्र.4 (ङ)दानं यथाशक्ति ………………….. च।
उत्तर

उत्तरम् — दानं यथाशक्ति कृतज्ञता च। (सामर्थ्य के अनुसार दान और कृतज्ञता।)

प्र.4 (च)एवं पुरुषकारेण विना दैवं न …………………..।
उत्तर

उत्तरम् — एवं पुरुषकारेण विना दैवं न सिध्यति। (इसी प्रकार पुरुषार्थ के बिना भाग्य सिद्ध नहीं होता।)

अभ्यासात् जायते सिद्धिः — प्रश्न ५ — पृष्ठ 34–35समुचितं विकल्पं चिनुत (बहुविकल्पात्मकाः प्रश्नाः)

अभ्यासः
प्र.5 (क)“गायन्ति देवाः किल गीतकानि” — इत्यस्य श्लोकस्य मुख्यविषयः कः ?
(i) वसन्तस्य सौन्दर्यम्
(ii) भारतभूमेः गौरवम्
(iii) कर्मणां फलम्
(iv) दानस्य प्रभावः
उत्तर

उत्तरम् — (ii) भारतभूमेः गौरवम्। (भारतभूमि का गौरव।)

प्र.5 (ख)“गुणी गुणं वेत्ति” — इत्यत्र कः गुणं न जानाति ?
(i) गुणी
(ii) निर्गुणः
(iii) पिकः
(iv) बली
उत्तर

उत्तरम् — (ii) निर्गुणः। (गुणहीन व्यक्ति गुण को नहीं जानता।)

प्र.5 (ग)“पिको वसन्तस्य गुणं न वायसः” — इत्यस्य तात्पर्यं किम् ?
(i) पिकः मधुरं गायति न वायसः
(ii) सुजन एव गुणं जानाति
(iii) वायसः अपि सरसं गानं करोति
(iv) वसन्तः निर्गुणः अस्ति
उत्तर

उत्तरम् — (ii) सुजन एव गुणं जानाति। (सज्जन ही गुण को पहचानता है।)

प्र.5 (घ)“भवन्ति नम्राः तरवः फलोद्गमैः” — इत्यस्य अर्थः कः ?
(i) वृक्षाणां कठोरता
(ii) सत्पुरुषाणाम् उन्नतिः
(iii) फलयुक्ताः वृक्षाः नम्राः भवन्ति
(iv) परोपकारिणां दुर्बलता
उत्तर

उत्तरम् — (iii) फलयुक्ताः वृक्षाः नम्राः भवन्ति। (फलों से लदे वृक्ष झुक जाते हैं।)

प्र.5 (ङ)“न सा सभा यत्र न सन्ति वृद्धाः” — इत्यत्र सभायाः महत्त्वं किम् ?
(i) सभा मनोरञ्जनाय भवति
(ii) सभा धनसम्पत्तिं प्रदातुं शक्नोति
(iii) धर्मोपदेशाय ज्ञानवृद्धाः जनाः आवश्यकाः
(iv) सभा केवलं राजकार्यार्थं भवति
उत्तर

उत्तरम् — (iii) धर्मोपदेशाय ज्ञानवृद्धाः जनाः आवश्यकाः। (धर्म का उपदेश देने के लिए सभा में ज्ञानवृद्ध लोगों का होना आवश्यक है।)

प्र.5 (च)दुर्जनेन सह सख्यं किमर्थं न कार्यम् ?
(i) सः मित्रं भवति
(ii) सः धनं ददाति
(iii) सः शिक्षां ददाति
(iv) सः उष्णाङ्गारवद् हानिकरः भवति
उत्तर

उत्तरम् — (iv) सः उष्णाङ्गारवद् हानिकरः भवति। (वह गरम अङ्गारे की तरह हानि पहुँचाने वाला होता है।)

योग्यताविस्तरः — पृष्ठ 35सुभाषितानां स्रोतग्रन्थाः — विष्णुपुराणम्, महाभारतम्, भर्तृहरिः, हितोपदेशः, चाणक्यनीतिः

योग्यताविस्तरः
प्र.1विष्णुपुराणम् — इसके विषय में पुस्तक क्या बताती है ?
उत्तर

पुस्तक के शब्दों में — प्रसिद्धेषु अष्टादशसु पुराणेषु विष्णुपुराणम् अन्यतमम्। अस्मिन् पुराणे प्रायेण सप्तसहस्राधिकश्लोकाः सन्ति। अत्र भगवतः विष्णोः तस्य च अवताराणां विषये वर्णितम्। भारतवर्षस्य गौरवविषये विष्णुपुराणम् अतीव प्रामाणिकं तथ्यं प्रकाशयति।

बिन्दुःविवरणम्
स्थानप्रसिद्ध अठारह पुराणों में से एक
श्लोक-संख्याप्रायः सात हज़ार से अधिक
विषयभगवान् विष्णु तथा उनके अवतारों का वर्णन
विशेषताभारतवर्ष के गौरव के विषय में अत्यन्त प्रामाणिक तथ्य देता है
प्र.2महाभारतम् — इसके विषय में पुस्तक क्या बताती है ?
उत्तर

पुस्तक के शब्दों में — संस्कृतसाहित्ये महाभारतम् इति इतिहासग्रन्थः पञ्चमवेदरूपेण स्वीकृतः। अस्मिन् ग्रन्थे लक्षाधिकाः श्लोकाः सन्ति। अतः शतसाहस्रीसंहिता इति अस्य अपरं नाम। महाभारते अष्टादश पर्वाणि सन्ति।

  • स्वरूप — इतिहासग्रन्थ, जो पञ्चम वेद के रूप में स्वीकृत है।
  • आकार — एक लाख से अधिक श्लोक।
  • अपर नाम — शतसाहस्री संहिता (‘शत-साहस्री’ अर्थात् एक लाख श्लोकों वाली)।
  • विभाजन — अठारह पर्व।
प्र.3भर्तृहरिः — इनके विषय में पुस्तक क्या बताती है ?
उत्तर

पुस्तक के शब्दों में — भर्तृहरिः संस्कृतकाव्यवाङ्मये महान् कविः अस्ति। नीतिशास्त्रविशारदस्य तस्य कृतयः नीतिशतकं शृङ्गारशतकं वैराग्यशतकं चेति भारतीयज्ञानपरम्परां पोषयन्ति।

कृतिःविषयः
नीतिशतकम्नीति, सदाचार तथा व्यवहार के सौ श्लोक
शृङ्गारशतकम्शृङ्गार-रस के सौ श्लोक
वैराग्यशतकम्वैराग्य तथा संसार की क्षणभंगुरता के सौ श्लोक
प्र.4हितोपदेशः — इसके विषय में पुस्तक क्या बताती है ?
उत्तर

पुस्तक के शब्दों में — पण्डितनारायणेन हितोपदेशः कथाग्रन्थः सङ्कलितः। ग्रन्थेऽस्मिन् विविधाः कथाः नीतिश्लोकाः च सन्ति। हितोपदेशः चतुर्धा विभक्तः — मित्रलाभः, सुहृद्भेदः, विग्रहः, सन्धिः।

  • सङ्कलनकर्ता — पण्डित नारायण।
  • स्वरूप — कथाग्रन्थ, जिसमें कथाएँ और नीतिश्लोक दोनों हैं।
  • चार भाग — मित्रलाभः (मित्र पाना), सुहृद्भेदः (मित्रों में फूट), विग्रहः (युद्ध), सन्धिः (मेल)।
प्र.5चाणक्यनीतिः — इसके विषय में पुस्तक क्या बताती है ?
उत्तर

पुस्तक के शब्दों में — चाणक्यस्य नीतिश्लोकाः माणिक्यसदृशाः सन्ति। बालानां चरित्रनिर्माणाय आदर्शमानवजीवनप्रतिष्ठार्थं च आचार्यस्य चाणक्यस्य नीत्युपदेशाः अत्यन्तम् उपयोगिनः सन्ति।

  • चाणक्य के नीतिश्लोक माणिक्य (रत्न) के समान बहुमूल्य हैं।
  • वे बालकों के चरित्र-निर्माण के लिए उपयोगी हैं।
  • वे आदर्श मानव-जीवन की प्रतिष्ठा के लिए भी अत्यन्त उपयोगी हैं।

परियोजनाकार्यम् — पृष्ठ 35प्रकल्प-कार्यम्

परियोजनाकार्यम्
प्र.1अन्तर्जालात् पुस्तकेभ्यश्च विंशतिसुभाषितानां सङ्ग्रहं कुरुत।
उत्तर

(संग्रह की तीन प्रविष्टियाँ) — इसी प्रकार पुस्तकों और विश्वसनीय वेबसाइटों से बीस सुभाषित एकत्र करके श्लोक, भावार्थ और स्रोत लिखिए।

क्र.सुभाषितम्भावार्थः (हिन्दी)स्रोतः
1उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।
न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः॥
काम परिश्रम से सिद्ध होते हैं, केवल मन के इरादों से नहीं। सोए हुए सिंह के मुँह में हिरण स्वयं नहीं घुसते।हितोपदेशः
2विद्या ददाति विनयं विनयाद्याति पात्रताम्।
पात्रत्वाद्धनमाप्नोति धनाद्धर्मं ततः सुखम्॥
विद्या विनय देती है, विनय से योग्यता आती है, योग्यता से धन, धन से धर्म और धर्म से सुख मिलता है।हितोपदेशः
3काकः कृष्णः पिकः कृष्णः को भेदः पिककाकयोः।
वसन्तसमये प्राप्ते काकः काकः पिकः पिकः॥
कौआ भी काला, कोयल भी काली — फिर भेद क्या? वसन्त आने पर पता चलता है — कौआ कौआ ही रहता है और कोयल कोयल।सुभाषितरत्नभाण्डागारम्
प्र.2किमपि नीतिवाक्यम् अधिकृत्य पञ्चवाक्यानि संस्कृतेन लिखत।
उत्तर

नमूना उत्तर (नीतिवाक्यम् — ‘उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः’):

1. ‘उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः’ इति सुप्रसिद्धं नीतिवाक्यम् अस्ति।
2. अस्य अर्थः अस्ति — कार्याणि परिश्रमेण एव सिध्यन्ति, केवलं चिन्तनेन न सिध्यन्ति।
3. यथा — सुप्तस्य सिंहस्य मुखे मृगाः स्वयं न प्रविशन्ति, सिंहेन उद्यमः करणीयः एव।
4. अतः छात्रैः प्रतिदिनम् अध्ययने परिश्रमः करणीयः, केवलं सफलतायाः स्वप्नः न द्रष्टव्यः।
5. अहम् अपि प्रतिदिनं नियमेन पठामि, यतः उद्यमेन एव लक्ष्यं प्राप्यते।
प्र.3पाठे आगतानि सुभाषितानि कण्ठस्थीकृत्य कक्षायां श्रावयत।
उत्तर

उत्तरम् — यह मौखिक कार्य है। पाठ के आठों सुभाषित अर्थ समझकर कण्ठस्थ कीजिए और कक्षा में शुद्ध उच्चारण तथा लय के साथ सुनाइए; हर श्लोक के बाद एक वाक्य में उसका भाव भी बताइए।

Chapter 3 of 13 – Sanskrit

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