NCERT Solutions for Class 8 Sanskrit Chapter 10 सन्निमित्ते वरं त्यागः – step-by-step answers to every exercise and in-text question of the chapter, as per the latest NCERT syllabus for 2027. Read them online or download the free question-answer PDF.
NCERT कक्षा 8 संस्कृत की पाठ्यपुस्तक दीपकम् के दशमः पाठः — सन्निमित्ते वरं त्यागः (क-भागः) के प्रश्नोत्तर। यह पाठ ‘हितोपदेशः’ कथाग्रन्थ से लिया गया गद्य-नाट्यात्मक कथाभाग है। शोभावती नगरी के राजा शूद्रक की सेवा में नियुक्त कर्तव्यनिष्ठ राजपुत्र वीरवर आधी रात के करुण क्रन्दन का अनुसरण करता है और राजलक्ष्मी से जान लेता है कि राजा को बचाने का एक ही, अत्यन्त दुःसाध्य उपाय है। नीचे पृष्ठ 111 से 123 तक के पाठगत (संवादगत) प्रश्न, ‘वयं शब्दार्थान् जानीमः’, ‘अत्र इदम् अवधेयम्’ (वाक्यान्वयः तथा भूतकालः), अभ्यासात् जायते सिद्धिः के प्रश्न १–७ का प्रत्येक उपभाग, योग्यताविस्तरः (तीन श्लोक तथा ‘जीमूतवाहनस्य कथा’) और परियोजनाकार्यम् क्रमशः हल किए गए हैं — हर प्रश्न में पहले लिखने योग्य संस्कृत उत्तर है; हिन्दी अर्थ, व्याकरण-टिप्पणियाँ और पाठ से प्रमाण ‘विस्तार से समझिए’ में दिए गए हैं।
NCERT Solutions for Class 8 Sanskrit Chapter 10 सन्निमित्ते वरं त्यागः PDF
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| Chapter | Download | |
|---|---|---|
| Solutions PDF | सन्निमित्ते वरं त्यागः | View PDF |
पाठ का हिंदी अनुवाद
पाठ-परिचय
कथा — राजा शूद्रक और राजपुत्र वीरवर
अत्र इदम् अवधेयम् — १. वाक्यान्वयः (वाक्य में पदों का क्रम)
रामः वनम् अगच्छत्।
अगच्छत् रामः वनम्।
वनम् अगच्छत् रामः।
(भाव: तीनों वाक्यों में पदों का क्रम अलग है, पर अर्थ एक ही है।)
शोभावती नाम काचन नगरी आसीत्।
(पाठे) साहित्ये वाक्यक्रमः
आसीत् शोभावती नाम काचन नगरी।
तदविशिष्टं भोज्यविलासव्ययार्थं पत्न्याः हस्ते निक्षिपति च।
(पाठे) साहित्ये वाक्यक्रमः
निक्षिपति च तदविशिष्टं भोज्यविलासव्ययार्थं पत्न्याः हस्ते।
अत्र इदम् अवधेयम् — २. भूतकालः
योग्यताविस्तरः — १. पाठ के भाव के अनुरूप श्लोक
एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे॥
(यजुर्वेदः ४०.२)
एवं कर्म च कर्ता च संश्लिष्टावितरेतरम्॥
(पञ्चतन्त्रम्)
पूर्वकार्याविरोधेन स कार्यं कर्तुमर्हति॥
(वाल्मीकि-रामायणम्)
योग्यताविस्तरः — २. पठत बोधत: जीमूतवाहनस्य कथा
परोपकाराय दुहन्ति गावः परोपकारार्थमिदं शरीरम्॥
NCERT Solutions for Class 8 Sanskrit Chapter 10 सन्निमित्ते वरं त्यागः – Questions and Answers
All questions of the chapter are answered below, in the order of the book – in-text questions, activities and the end-of-chapter exercises. Each answer is written the way you would write it in the exam.
पाठे विद्यमानाः प्रश्नाः — पृष्ठ 112राजसभायां राज्ञः शूद्रकस्य, वीरवरस्य, मन्त्रिणश्च संवादः
पाठे विद्यमानाः प्रश्नाः — पृष्ठ 113–114अर्धरात्रौ राज्ञः, वीरवरस्य राजलक्ष्म्याश्च संवादः
वयं शब्दार्थान् जानीमः — पृष्ठ 114–116शब्दार्थ-सारणी तथा ‘मातृभाषया अर्थं लिखत’ स्तम्भः
| शब्दः | अर्थः | हिन्दी | English | मातृभाषया अर्थं लिखत |
|---|---|---|---|---|
| महीपतिः | भूपालः | राजा | King | …… |
| महापराक्रमी | अतिबलशाली | बहुत बलवान् | Very brave | …… |
| नानाशास्त्रवित् | अनेकेषां शास्त्राणां ज्ञाता | अनेक शास्त्रों का ज्ञाता | Who knows many shastras | …… |
| पूतचरित्रः | पवित्रं चरित्रं यस्य | पवित्र चरित्र वाला | Of high character | …… |
| प्रतिवसति स्म | अवसत् | रहता था | lived | …… |
| वृत्त्यर्थम् | आजीविकां प्राप्तुम् | आजीविका पाने के लिए | To get livelihood | …… |
| समायाताः | आगतवन्तः | आए | Came | …… |
| प्रतिहारम् | द्वारपालम् | द्वारपाल को | To the door-keeper | …… |
| दौवारिकः | द्वारपालकः | द्वारपाल | Gate-keeper | …… |
| वर्तनम् | वेतनम् | वेतन | Salary | …… |
| उपपन्नम् | उपयुक्तम् | उपयुक्त | Appropriate | …… |
| सुवर्णशत-चतुष्टयम् | चतुश्शतसंख्यकाः स्वर्णमुद्राः | चार सौ स्वर्णमुद्राएँ | Four hundred gold coins | …… |
| निर्गतः | बहिः गतवान् | बाहर चला गया | Went out | …… |
| आलोक्य | दृष्ट्वा | देखकर | After seeing | …… |
| नियोजितः | सेवायां नियुक्तः | नियुक्त | Appointed | …… |
| उपपन्नम् | युक्तियुक्तम् | उचित | Suitable | …… |
| धृतायुधः | शस्त्रयुक्तः | शस्त्र धारण किए हुए | Armed | …… |
| अहर्निशम् | दिवसः रात्रिः च | दिन-रात | Day and Night | …… |
| करुणरोदनध्वनिम् | करुणाजनकं रोदनध्वनिम् | करुणाजनक क्रन्दन ध्वनि | Sorrowful voice | …… |
| व्यचिन्तयत् | अचिन्तयत् | सोचा | Thought | …… |
| सूचिभेद्ये | गहने | सघन | Dense | …… |
| तिमिरे | अन्धकारे | अन्धकार में | In darkness | …… |
| पृष्ठतः | पृष्ठभागात् | पीछे से | From back | …… |
| निरूपयामि | पश्यामि | देखता हूँ | I see | …… |
| खड्गपाणिः | खड्गवान् जनः | खड्गधारी | One with sword | …… |
| रोदनपरा | रोदनं कुर्वती | रोती हुई | Weeping lady | …… |
| विलपसि | रोदनं करोषि | रो रही हो | (You) crying | …… |
| क्रन्दामि | रोदनं करोमि | रो रही हूँ | Crying | …… |
| साष्टाङ्गं नमस्कृत्य | अष्टभिः अङ्गैः सह प्रणामं कृत्वा | आठों अंगों सहित प्रणाम करके | With eight parts After bowing | …… |
| प्रत्युवाच | उत्तरं दत्तवती | उत्तर दिया | Answered | …… |
| पञ्चत्वम् | मृत्युम् | मृत्यु को | To the death | …… |
| अनाथा | स्वामिनं विना | स्वामी के बिना | Without protector | …… |
| प्रवृत्तिः | आचरणम् | आचरण | Follow-up | …… |
| सुचिरम् | दीर्घकालं यावत् | दीर्घ-काल तक | For long time | …… |
| दुःसाध्या | काठिन्येन अनुपालनीया | कठिनाई से पालन करने योग्य | Difficult to be followed | …… |
| सहासवदनेन | हास्य-युक्त-मुखेन | हास्य युक्त मुख से | With a smiling face | …… |
| निवत्स्यामि | वासं करिष्यामि | रहूँगी | Will stay | …… |
| तत्क्षणादेव | तत्कालम् | उसी क्षण | On the spot | …… |
अन्तिम स्तम्भ — मातृभाषया (हिन्दी) अर्थः —
| शब्दः | मातृभाषया अर्थः (हिन्दी) |
|---|---|
| महीपतिः | राजा |
| महापराक्रमी | बहुत पराक्रमी, बहुत बलवान् |
| नानाशास्त्रवित् | अनेक शास्त्रों का ज्ञाता |
| पूतचरित्रः | पवित्र चरित्र वाला |
| प्रतिवसति स्म | रहता था |
| वृत्त्यर्थम् | आजीविका (नौकरी) पाने के लिए |
| समायाताः | (साथ) आए |
| प्रतिहारम् | द्वारपाल को |
| दौवारिकः | द्वारपाल |
| वर्तनम् | वेतन |
| उपपन्नम् | उपयुक्त |
| सुवर्णशत-चतुष्टयम् | चार सौ स्वर्णमुद्राएँ |
| निर्गतः | बाहर चला गया |
| आलोक्य | देखकर |
| नियोजितः | सेवा में नियुक्त |
| उपपन्नम् | उचित |
| धृतायुधः | शस्त्र धारण किए हुए |
| अहर्निशम् | दिन-रात |
| करुणरोदनध्वनिम् | करुणा जगाने वाली रोने की आवाज़ (को) |
| व्यचिन्तयत् | सोचा |
| सूचिभेद्ये | सघन (सुई से भेदने योग्य) |
| तिमिरे | अन्धकार में |
| पृष्ठतः | पीछे से |
| निरूपयामि | देखता हूँ |
| खड्गपाणिः | हाथ में तलवार लिए हुए |
| रोदनपरा | रोती हुई |
| विलपसि | (तुम) विलाप कर रही हो |
| क्रन्दामि | (मैं) रो रही हूँ |
| साष्टाङ्गं नमस्कृत्य | आठों अंगों से प्रणाम करके |
| प्रत्युवाच | उत्तर दिया |
| पञ्चत्वम् | मृत्यु को |
| अनाथा | अनाथ (स्वामी के बिना) |
| प्रवृत्तिः | आचरण (उपाय) |
| सुचिरम् | दीर्घ काल तक |
| दुःसाध्या | कठिनाई से पालन करने योग्य |
| सहासवदनेन | हँसते हुए मुख से |
| निवत्स्यामि | रहूँगी |
| तत्क्षणादेव | उसी क्षण |
अत्र इदम् अवधेयम् — पृष्ठ 116–117व्याकरण-पेटिका — १. वाक्यान्वयः · २. भूतकालः
तद्यथा (पेटिकायाः उदाहरणम्) —
- रामः वनम् अगच्छत्।
- अगच्छत् रामः वनम्।
- वनम् अगच्छत् रामः।
पाठात् उदाहरणे (पुस्तके प्रदत्ते) —
| सामान्यः वाक्यक्रमः | (पाठे) साहित्ये वाक्यक्रमः |
|---|---|
| शोभावती नाम काचन नगरी आसीत्। | आसीत् शोभावती नाम काचन नगरी। |
| तदवशिष्टं भोज्यविलासव्ययार्थं पत्न्याः हस्ते निक्षिपति च। | निक्षिपति च तदवशिष्टं भोज्यविलासव्ययार्थं पत्न्याः हस्ते। |
पाठ के अनुसार भूतकाल चार प्रकार से प्रकट होता है —
| प्रकारः | नियमः | अस्मिन् पाठे उदाहरणम् |
|---|---|---|
| १. लङ्-लकारः | धातु के आगे ‘अ’ और लङ् के प्रत्यय | उपागच्छत् (उप + अगच्छत्), अनयत्, व्यचिन्तयत् (वि + अचिन्तयत्) |
| २. लट् + ‘स्म’ | वर्तमानकालिक क्रिया-पद के साथ ‘स्म’ जोड़ने पर अर्थ भूतकाल का हो जाता है | प्रतिवसति स्म (= अवसत्, ‘रहता था’) |
| ३. क्तवतु-प्रत्ययः | धातु + क्तवतु; वाक्य की संरचना कर्तृवाच्य में रहती है | श्रुतवान् (= अशृणोत्, ‘सुना’) |
| ४. क्त-प्रत्ययः | धातु + क्त; इसके प्रयोग में वाक्य कर्तृवाच्य, कर्मवाच्य तथा भाववाच्य — तीनों में हो सकता है | निर्गतः, नियोजितः, आलोकिता |
अभ्यासात् जायते सिद्धिः — पृष्ठ 118प्रश्नः १ : पाठम् आधृत्य उदाहरणानुगुणं लिखत ‘आम्’ अथवा ‘न’
पाठे प्रमाणम् — “अथैकदा वीरवरनामा राजपुत्रः वृत्त्यर्थं कस्मादपि देशाद् राजद्वारमुपागच्छत्।”
पाठे प्रमाणम् — “राजा — किं ते वर्तनम् ?” — यह प्रश्न राजा शूद्रक ने ही पूछा था, और वीरवर ने उत्तर दिया — “प्रतिदिनं सुवर्णशतचतुष्टयं देव !”
पाठे प्रमाणम् — “(ततो दौवारिकः तं प्रभोः समीपम् अनयत्।)”
पाठे प्रमाणम् — पहले तो राजा ने साफ़ मना कर दिया — “नैतच्छक्यम् !” (यह सम्भव नहीं) — और वीरवर प्रणाम करके सभा से निकल गया। बाद में मन्त्रियों की सलाह पर ही नियुक्ति हुई — “अथ मन्त्रिणां वचनात् ताम्बूलदानेन नियोजितोऽसौ राजपुत्रो वीरवरो नरपतिना।”
पाठे प्रमाणम् — “स च राजपुत्रः प्रतिदिनं प्रभाते राजदर्शनादनन्तरं स्ववेतनस्य यच्छति देवेभ्यः अर्धम्। स्थितस्य चार्द्धं दरिद्रेभ्यो ददाति, निक्षिपति च तदवशिष्टं भोज्यविलासव्ययार्थं पत्न्याः हस्ते।”
कुल वेतन = 1
देवेभ्यः = 1/2
शेष = 1 − 1/2 = 1/2; तस्य अर्धं दरिद्रेभ्यः = 1/2 × 1/2 = 1/4
अवशिष्टं पत्न्यै = 1 − 1/2 − 1/4 = 1/4 (चतुर्थः भागः)
पाठे प्रमाणम् — “अथैकदा कृष्णचतुर्दश्यामर्धरात्रे स राजा श्रुतवान् करुणरोदनध्वनिं कञ्चन।”
पाठे प्रमाणम् — “अथैकदा कृष्णचतुर्दश्यामर्धरात्रे स राजा श्रुतवान् करुणरोदनध्वनिं कञ्चन।”
पाठे प्रमाणम् — “अस्ति वत्स ! एकैवात्र प्रवृत्तिः, सा चातीव दुःसाध्या।”
पाठे प्रमाणम् — उपाय बताकर अदृश्य होने वाली राजलक्ष्मी थी, भगवती सर्वमङ्गला नहीं — “(ततः सा तत्क्षणादेव गताऽदृश्यतां तत्सम्मुखात्।)”
अभ्यासात् जायते सिद्धिः — पृष्ठ 118–119प्रश्नः २ : अधोलिखितान् प्रश्नान् पूर्णवाक्येन उत्तरत
अभ्यासात् जायते सिद्धिः — पृष्ठ 119प्रश्नः ३ : उदाहरणानुसारं निम्नलिखितानि वाक्यानि अन्वयरूपेण लिखत
अभ्यासात् जायते सिद्धिः — पृष्ठ 120प्रश्नः ४ : उदाहरणानुगुणं पाठगतानि पदानि अधिकृत्य रिक्तस्थानानि पूरयत (सन्धि-विच्छेदः)
| यथा — अथैकदा | = | अथ + एकदा |
| वृत्त्यर्थम् | = | वृत्ति + …… |
| कस्मादपि | = | …… + अपि |
| कोऽपि | = | कः + …… |
| राजपुत्रोऽस्मि | = | …… + अस्मि |
| यथेष्टम् | = | यथा + …… |
| वेतनार्पणेन | = | वेतन + …… |
| तदालोक्य | = | …… + आलोक्य |
| ततोऽसौ | = | ततः + …… |
| वर्त्तनार्थिनो | = | …… + अर्थिनः |
| तदवशिष्टं | = | …… + अवशिष्टम् |
| राजदर्शनादनन्तरं | = | राजदर्शनात् + …… |
| वेति | = | …… + इति |
| राजलक्ष्मीरुवाच | = | राजलक्ष्मीः + …… |
| चार्द्धं | = | …… + अर्धम् |
| बहिर्नगरादालोकिता | = | बहिः + …… + आलोकिता |
| कापि | = | …… + अपि |
| प्रत्युवाच | = | प्रति + …… |
| राजलक्ष्मीरस्मि | = | …… + अस्मि |
| स्थास्यामीति | = | स्थास्यामि + …… |
| भुजच्छायायां | = | …… + छायायाम् |
| अस्त्यत्र | = | अस्ति + …… |
| कश्चिदुपायो | = | …… + उपायः |
रिक्त स्थानों में भरे गए पद मोटे अक्षरों में हैं —
| सन्धिपदम् | = | विच्छेदः | सन्धेः नाम |
|---|---|---|---|
| अथैकदा (यथा) | = | अथ + एकदा | वृद्धि-सन्धिः (अ + ए = ऐ) |
| वृत्त्यर्थम् | = | वृत्ति + अर्थम् | यण्-सन्धिः (इ + अ = य्) |
| कस्मादपि | = | कस्मात् + अपि | जश्त्व-सन्धिः (त् + अ = द्) |
| कोऽपि | = | कः + अपि | विसर्ग(पूर्वरूप)-सन्धिः |
| राजपुत्रोऽस्मि | = | राजपुत्रः + अस्मि | विसर्ग(पूर्वरूप)-सन्धिः |
| यथेष्टम् | = | यथा + इष्टम् | गुण-सन्धिः (आ + इ = ए) |
| वेतनार्पणेन | = | वेतन + अर्पणेन | दीर्घ-सन्धिः (अ + अ = आ) |
| तदालोक्य | = | तत् + आलोक्य | जश्त्व-सन्धिः (त् + आ = द्) |
| ततोऽसौ | = | ततः + असौ | विसर्ग(पूर्वरूप)-सन्धिः |
| वर्त्तनार्थिनो | = | वर्त्तन + अर्थिनः | दीर्घ-सन्धिः (अ + अ = आ) |
| तदवशिष्टं | = | तत् + अवशिष्टम् | जश्त्व-सन्धिः (त् + अ = द्) |
| राजदर्शनादनन्तरं | = | राजदर्शनात् + अनन्तरम् | जश्त्व-सन्धिः |
| वेति | = | वा + इति | गुण-सन्धिः (आ + इ = ए) |
| राजलक्ष्मीरुवाच | = | राजलक्ष्मीः + उवाच | विसर्ग-सन्धिः (ः + उ = र्) |
| चार्द्धं | = | च + अर्धम् | दीर्घ-सन्धिः (अ + अ = आ) |
| बहिर्नगरादालोकिता | = | बहिः + नगरात् + आलोकिता | विसर्ग-सन्धिः (ः + न् = र्) तथा जश्त्व-सन्धिः |
| कापि | = | का + अपि | दीर्घ-सन्धिः (आ + अ = आ) |
| प्रत्युवाच | = | प्रति + उवाच | यण्-सन्धिः (इ + उ = य्) |
| राजलक्ष्मीरस्मि | = | राजलक्ष्मीः + अस्मि | विसर्ग-सन्धिः (ः + अ = र्) |
| स्थास्यामीति | = | स्थास्यामि + इति | दीर्घ-सन्धिः (इ + इ = ई) |
| भुजच्छायायां | = | भुज + छायायाम् | तुक्-आगमः (‘छ’ से पहले ‘च्’ का आगम) |
| अस्त्यत्र | = | अस्ति + अत्र | यण्-सन्धिः (इ + अ = य्) |
| कश्चिदुपायो | = | कश्चित् + उपायः | जश्त्व-सन्धिः (त् + उ = द्) |
अभ्यासात् जायते सिद्धिः — पृष्ठ 121प्रश्नः ५ : अधोलिखितेषु वाक्येषु रक्तवर्णीयपदानि केभ्यः प्रयुक्तानि इति उदाहरणानुगुणं लिखत
(क) ततः असौ तद्रोदनस्वरानुसरणक्रमेण प्रचलितः।
अभ्यासात् जायते सिद्धिः — पृष्ठ 121प्रश्नः ६ : अधोलिखितानि वाक्यानि पठित्वा तेन सम्बद्धं श्लोकं पाठात् चित्वा लिखत
अभ्यासात् जायते सिद्धिः — पृष्ठ 122प्रश्नः ७ : अधोलिखितानां वाक्यानां पदच्छेदं कुरुत
योग्यताविस्तरः — पृष्ठ 122प्रश्नः १ : पाठस्य भावानुगुणम् अत्र केचन श्लोकाः प्रदत्ताः सन्ति। एतान् पठत
एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे॥ (यजुर्वेदः ४०.२)
अन्वयः — इह कर्माणि कुर्वन् एव शतं समाः जिजीविषेत्। एवं (सति) त्वयि नरे कर्म न लिप्यते; इतः अन्यथा (मार्गः) न अस्ति।
अर्थः — इस संसार में कर्म करते हुए ही सौ वर्ष जीने की इच्छा करनी चाहिए। ऐसा करने पर तुझ मनुष्य में कर्म का लेप (बन्धन) नहीं लगता। इससे भिन्न कोई दूसरा मार्ग नहीं है।
एवं कर्म च कर्ता च संश्लिष्टावितरेतरम्॥ (पञ्चतन्त्रम्)
अन्वयः — यथा छायातपौ नित्यं परस्परं सुसंबद्धौ (स्तः), एवं कर्म च कर्ता च इतरेतरं संश्लिष्टौ (स्तः)।
अर्थः — जैसे छाया और धूप सदा एक-दूसरे से भली प्रकार जुड़े हुए हैं, वैसे ही कर्म और कर्ता भी परस्पर गुँथे हुए हैं।
पूर्वकार्याविरोधेन स कार्यं कर्तुमर्हति॥ (वाल्मीकि-रामायणम्)
अन्वयः — यः कार्ये कर्मणि निर्वृत्ते (सति) पूर्वकार्याविरोधेन बहूनि अपि (कार्याणि) साधयेत्, सः कार्यं कर्तुम् अर्हति।
अर्थः — जो व्यक्ति हाथ में लिया हुआ कार्य पूरा हो जाने पर, पहले किए गए कार्य में बाधा डाले बिना और भी अनेक कार्य सिद्ध कर सके — वही कार्य करने योग्य (सच्चा कार्यकर्ता) है।
योग्यताविस्तरः — पृष्ठ 123प्रश्नः २ : पठत बोधत — ‘जीमूतवाहनस्य कथा’
वीरवरेण सह साम्यम् — उभौ अपि सन्निमित्ते त्यागं कुरुतः। वीरवरः राज्ञः राष्ट्रस्य च रक्षणाय स्वप्राणान् अपि अर्पयितुम् उद्यतः अभवत्; जीमूतवाहनः नागस्य रक्षणाय स्वशरीरम् एव अर्पितवान्। उभौ च प्रसन्नमनसा, कष्टं विना त्यागं कुरुतः।
परोपकाराय दुहन्ति गावः परोपकारार्थमिदं शरीरम्॥ — अस्य श्लोकस्य अन्वयम् अर्थं भावं च लिखत।
अन्वयः — वृक्षाः परोपकाराय फलन्ति, नद्यः परोपकाराय वहन्ति, गावः परोपकाराय दुहन्ति, इदं शरीरम् (अपि) परोपकारार्थम् (अस्ति)।
अर्थः — वृक्ष दूसरों के उपकार के लिए फलते हैं, नदियाँ दूसरों के उपकार के लिए बहती हैं, गाएँ दूसरों के उपकार के लिए दूध देती हैं — यह शरीर भी परोपकार के ही लिए है।
भावः — प्रकृति के सब अङ्ग — वृक्ष, नदियाँ, गाएँ — अपने लिए नहीं, दूसरों के हित के लिए जीते हैं। अतः मनुष्य-शरीर का उद्देश्य भी परोपकार ही होना चाहिए।
परियोजनाकार्यम् — पृष्ठ 123प्रकल्प-कार्यम्
नमूना उत्तर — दश सूक्तयः:
| क्रमः | सूक्तिः / श्लोकः | हिन्दी अर्थ | स्रोतः |
|---|---|---|---|
| १ | कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः। | कर्म करते हुए ही सौ वर्ष जीने की इच्छा करनी चाहिए। | यजुर्वेदः ४०.२ |
| २ | कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। | तेरा अधिकार कर्म में ही है, फलों में कभी नहीं। | श्रीमद्भगवद्गीता २.४७ |
| ३ | यथा छायातपौ नित्यं सुसंबद्धौ परस्परम्। | जैसे छाया और धूप, वैसे ही कर्म और कर्ता सदा जुड़े रहते हैं। | पञ्चतन्त्रम् |
| ४ | पूर्वकार्याविरोधेन स कार्यं कर्तुमर्हति। | पहले के कार्य में बाधा डाले बिना जो काम करे, वही कार्य करने योग्य है। | वाल्मीकि-रामायणम् |
| ५ | उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः। | काम परिश्रम से सिद्ध होते हैं, केवल इच्छा करने से नहीं। | हितोपदेशः |
| ६ | परोपकारार्थमिदं शरीरम्। | यह शरीर परोपकार के लिए ही है। | सुभाषितम् (पाठे) |
| ७ | आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः। | आलस्य मनुष्य के शरीर में बैठा हुआ सबसे बड़ा शत्रु है। | नीतिशतकम् (भर्तृहरिः) |
| ८ | क्रियासिद्धिः सत्त्वे भवति महतां नोपकरणे। | महापुरुषों की सफलता उनके सत्त्व (आत्मबल) से होती है, साधनों से नहीं। | सुभाषितम् |
| ९ | श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्। | भली प्रकार किए गए दूसरे के धर्म से, गुणरहित अपना धर्म ही श्रेष्ठ है। | श्रीमद्भगवद्गीता ३.३५ |
| १० | सन्निमित्ते वरं त्यागः। | अच्छे निमित्त के लिए त्याग ही श्रेष्ठ है। | अस्य पाठस्य शीर्षकम् |
नमूना उत्तर — नूतनानि शीर्षकाणि:
| संस्कृत-शीर्षकम् | हिन्दी अर्थ | क्यों उपयुक्त |
|---|---|---|
| कर्तव्यनिष्ठः वीरवरः | कर्तव्यनिष्ठ वीरवर | पूरा पाठ वीरवर की कर्तव्यनिष्ठा के चारों ओर घूमता है। |
| इमौ बाहू, एष खड्गश्च | ये दो भुजाएँ और यह तलवार | पाठ का सबसे यादगार संवाद, जो नायक का पूरा चरित्र एक पंक्ति में कह देता है। |
| राजलक्ष्म्याः क्रन्दनम् | राजलक्ष्मी का क्रन्दन | कथा का मोड़ यहीं से आता है; यह शीर्षक जिज्ञासा जगाता है। |
| स्वामिभक्तेः आदर्शः | स्वामिभक्ति का आदर्श | पाठ की प्रस्तावना स्वयं कहती है — ‘तस्य स्वामिभक्तिः राष्ट्राय समर्पणभावः च प्रेरणार्हः’। |
| अहर्निशं सेवते | दिन-रात सेवा करता है | पाठ का ही पद; वीरवर की अविराम सेवा को सीधे पकड़ता है। |
| दुःसाध्यः उपायः | कठिन उपाय | क-भाग यहीं समाप्त होता है — शीर्षक आगे की कथा की ओर संकेत करता है। |
| वेतनार्थी राजपुत्रः | वेतन चाहने वाला राजपुत्र | कथा के आरम्भ को पकड़ता है और ‘वेतनार्थी’ पाठ का ही शब्द है। |
Chapter 10 of 13 – Sanskrit
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NCERT Solutions Class 8 Sanskrit Chapter 10 सन्निमित्ते वरं त्यागः – Overview
| Class | Class 8 |
| Subject | Sanskrit |
| Chapter | 10 – सन्निमित्ते वरं त्यागः |
| Session | 2027 |
| Format | Full answers on this page + PDF |
NCERT Solutions Class 8 Sanskrit Chapter 10 – FAQs
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