Skip to content

NCERT Solutions for Class 8 Sanskrit Chapter 10 सन्निमित्ते वरं त्यागः (क-भागः) (PDF) – 2027

NCERT Solutions for Class 8 Sanskrit Chapter 10 सन्निमित्ते वरं त्यागः – step-by-step answers to every exercise and in-text question of the chapter, as per the latest NCERT syllabus for 2027. Read them online or download the free question-answer PDF.

NCERT कक्षा 8 संस्कृत की पाठ्यपुस्तक दीपकम् के दशमः पाठः — सन्निमित्ते वरं त्यागः (क-भागः) के प्रश्नोत्तर। यह पाठ ‘हितोपदेशः’ कथाग्रन्थ से लिया गया गद्य-नाट्यात्मक कथाभाग है। शोभावती नगरी के राजा शूद्रक की सेवा में नियुक्त कर्तव्यनिष्ठ राजपुत्र वीरवर आधी रात के करुण क्रन्दन का अनुसरण करता है और राजलक्ष्मी से जान लेता है कि राजा को बचाने का एक ही, अत्यन्त दुःसाध्य उपाय है। नीचे पृष्ठ 111 से 123 तक के पाठगत (संवादगत) प्रश्न, ‘वयं शब्दार्थान् जानीमः’, ‘अत्र इदम् अवधेयम्’ (वाक्यान्वयः तथा भूतकालः), अभ्यासात् जायते सिद्धिः के प्रश्न १–७ का प्रत्येक उपभाग, योग्यताविस्तरः (तीन श्लोक तथा ‘जीमूतवाहनस्य कथा’) और परियोजनाकार्यम् क्रमशः हल किए गए हैं — हर प्रश्न में पहले लिखने योग्य संस्कृत उत्तर है; हिन्दी अर्थ, व्याकरण-टिप्पणियाँ और पाठ से प्रमाण ‘विस्तार से समझिए’ में दिए गए हैं।

NCERT Solutions for Class 8 Sanskrit Chapter 10 सन्निमित्ते वरं त्यागः PDF

All the answers are on this page below. The PDF also explains every answer – why it is right and how to check it – so download it for revision.

PDFChapterDownload
Solutions PDFसन्निमित्ते वरं त्यागःView PDF

पाठ का हिंदी अनुवाद

पाठ-परिचय
संस्कृतवाङ्मये कथासाहित्यस्य विशिष्टं स्थानम् अस्ति। कथानां द्वारा अतीव मनोरञ्जकतया जीवनसम्बद्धाः विविधाः उपदेशाः, प्रेरणाः हि एतस्य साहित्यस्य प्रयोजनम्। संस्कृतस्य कथासाहित्यम् अत्यन्तं समृद्धं वैविध्यपूर्णं च अस्ति।
संस्कृत साहित्य में कथा-साहित्य का विशेष स्थान है। कथाओं के द्वारा बहुत मनोरंजक ढंग से जीवन से जुड़े अनेक प्रकार के उपदेश और प्रेरणाएँ देना ही इस साहित्य का प्रयोजन है। संस्कृत का कथा-साहित्य अत्यन्त समृद्ध और विविधता से भरा हुआ है।
प्रस्तुतः पाठः ‘हितोपदेशः’ इत्यस्मात् कथाग्रन्थात् स्वीकृतः। राज्ञः शूद्रकस्य सेवायां नियुक्तस्य कस्यचित् वीरवरनामकस्य कर्तव्यनिष्ठस्य राजपुत्रस्य वैशिष्ट्यस्य वर्णनं कथायामत्र वर्तते।
प्रस्तुत पाठ ‘हितोपदेश’ नामक कथा-ग्रन्थ से लिया गया है। इस कथा में राजा शूद्रक की सेवा में नियुक्त वीरवर नाम के एक कर्तव्यनिष्ठ राजपुत्र की विशेषता का वर्णन है।
सः राज्ञः राष्ट्रस्य च रक्षणाय स्वप्राणान् अपि अर्पयितुम् उद्यतः अभवत्। तस्य स्वामिभक्तिः राष्ट्राय समर्पणभावः च प्रेरणार्हः।
वह राजा और राष्ट्र की रक्षा के लिए अपने प्राण भी अर्पित करने को तैयार हो गया। उसकी स्वामिभक्ति और राष्ट्र के प्रति समर्पण की भावना प्रेरणा लेने योग्य है।
अत्र एषः पाठः भागद्वये अस्ति। पठनीया इयं वीरवरकथा। अनुकरणीयः अयं वीरवरः।
यहाँ यह पाठ दो भागों में है। वीरवर की यह कथा पढ़ने योग्य है। यह वीरवर अनुकरण करने योग्य है।
कथा — राजा शूद्रक और राजपुत्र वीरवर
आसीत् शोभावती नाम काचन नगरी। तत्र शूद्रको नाम महापराक्रमी नानाशास्त्रवित् पूतचरित्रः महीपतिः प्रतिवसति स्म।
शोभावती नाम की एक नगरी थी। वहाँ शूद्रक नाम का एक बहुत बलवान्, अनेक शास्त्रों का ज्ञाता और पवित्र चरित्र वाला राजा रहता था।
अथैकदा वीरवरनामा राजपुत्रः वृत्त्यर्थं कस्मादपि देशाद् राजद्वारमुपागच्छत्। तेन सह वेदरता नाम तस्य पत्नी, शक्तिधरो नाम सुतः, वीरवती नाम कन्या च समायाताः।
फिर एक दिन वीरवर नाम का एक राजपुत्र आजीविका पाने के लिए किसी (दूसरे) देश से (राजा शूद्रक के) राजद्वार पर आया। उसके साथ वेदरता नाम की उसकी पत्नी, शक्तिधर नाम का पुत्र और वीरवती नाम की कन्या भी आए।
वीरवरः – (प्रतिहारं वीक्ष्य) भोः प्रतिहार ! वृत्त्यर्थमागतो राजपुत्रोऽस्मि, तस्मान्नय मां स्वामिनः समीपम्।
वीरवर – (द्वारपाल को देखकर) हे द्वारपाल! मैं आजीविका के लिए आया हुआ राजपुत्र हूँ, इसलिए मुझे स्वामी (राजा) के पास ले चलो।
(ततो दौवारिकः तं प्रभोः समीपम् अनयत्।)
(तब द्वारपाल उसे स्वामी (राजा) के पास ले गया।)
वीरवरः – (प्रणामपुरस्सरं सविनयम्) देव ! यदि सौभाग्येन अहं भवतः सेवायां नियोजितः तर्हि यदादिश्यते तत् श्रद्धया पालयिष्यामि।
वीरवर – (प्रणाम करके विनयपूर्वक) महाराज! यदि सौभाग्य से मैं आपकी सेवा में नियुक्त किया गया, तो जो भी आज्ञा दी जाएगी, उसका श्रद्धा से पालन करूँगा।
राजा – किं ते वर्तनम् ?
राजा – तुम्हारा वेतन क्या (कितना) है?
वीरवरः – प्रतिदिनं सुवर्णशतचतुष्टयं देव !
वीरवर – महाराज! प्रतिदिन चार सौ स्वर्णमुद्राएँ।
राजा – का ते सामग्री ?
राजा – तुम्हारे पास (सेवा का) क्या साधन है?
वीरवरः – इमौ बाहू, एष खड्गश्च।
वीरवर – ये दो भुजाएँ और यह तलवार।
राजा – नैतच्छक्यम् !
राजा – यह सम्भव नहीं है!
(तत् श्रुत्वा वीरवरः राजानं प्रणम्य राजसभातः निर्गतः।)
(यह सुनकर वीरवर राजा को प्रणाम करके राजसभा से बाहर चला गया।)
मन्त्री – (तदालोक्य) देव ! दिनचतुष्टयस्य वेतनार्पणेन प्रथमं परीक्ष्यतां स्वरूपमस्य वेतनार्थिनो राजपुत्रस्य, किमुपपन्नमेतत् वेतनं न वेति।
मन्त्री – (यह देखकर) महाराज! पहले चार दिन का वेतन देकर वेतन चाहने वाले इस राजपुत्र के स्वरूप (योग्यता) की परीक्षा कर ली जाए कि यह वेतन उचित है या नहीं।
अथ मन्त्रिणां वचनात् ताम्बूलदानेन नियोजितोऽसौ राजपुत्रो वीरवरो नरपतिना।
तब मन्त्रियों के कहने से राजा ने पान (का बीड़ा) देकर उस राजपुत्र वीरवर को (सेवा में) नियुक्त कर लिया।
स च राजपुत्रः प्रतिदिनं प्रभाते राजदर्शनादनन्तरं स्ववेतनस्य यच्छति देवेभ्यः अर्धम्। स्थितस्य चार्द्धं दरिद्रेभ्यो ददाति, निक्षिपति च तदवशिष्टं भोज्यविलासव्ययार्थं पत्न्याः हस्ते।
और वह राजपुत्र प्रतिदिन प्रातःकाल राजा के दर्शन के बाद अपने वेतन का आधा भाग देवताओं को दे देता है। बचे हुए (धन) का आधा भाग दरिद्रों को देता है, और उसके बाद शेष बचा (धन) भोजन और सुख-सुविधा के खर्च के लिए पत्नी के हाथ में रख देता है।
ततो धृतायुधः सः राजद्वारमहर्निशं सेवते। यदा राजा स्वयमादिशति तदा याति स्वगृहम्।
उसके बाद वह शस्त्र धारण किए हुए दिन-रात राजद्वार पर सेवा (पहरा) करता है। जब राजा स्वयं आज्ञा देता है, तभी वह अपने घर जाता है।
अथैकदा कृष्णचतुर्दश्यामर्द्धरात्रे स राजा श्रुतवान् करुणरोदनध्वनिं कञ्चन।
फिर एक दिन कृष्णपक्ष की चतुर्दशी की आधी रात को उस राजा ने किसी के करुण रोने की ध्वनि सुनी।
राजा – कोऽत्र द्वारि तिष्ठति ?
राजा – यहाँ द्वार पर कौन है?
वीरवरः – सेवको वीरवरोऽत्र द्वारि वर्त्तते देव !
वीरवर – महाराज! (आपका) सेवक वीरवर यहाँ द्वार पर है।
राजा – क्रन्दनमनुसर राजपुत्र !
राजा – राजपुत्र! इस रोने (की ध्वनि) के पीछे-पीछे जाओ।
वीरवरः – यथादिशति देवः।
वीरवर – जैसी महाराज की आज्ञा।
(ततोऽसौ तद्रोदनस्वरम् अनुसरन् प्रचलितः।)
(तब वह उस रोने के स्वर के पीछे-पीछे चल पड़ा।)
राजा – (स्वगतम्) नैष गन्तुमर्हति राजपुत्र एकाकी सूचिभेद्ये तिमिरेऽस्मिन्। तस्मात् अहमपि गच्छामि पृष्ठतोऽस्य, निरूपयामि च किमेतदिति।
राजा – (मन ही मन) इस घने अन्धकार में इस राजपुत्र का अकेले जाना उचित नहीं है। इसलिए मैं भी इसके पीछे-पीछे जाता हूँ और देखता हूँ कि यह क्या है।
(ततो नरपतिः खड्गपाणिः तस्य अनुसरणक्रमेण बहिः निरगच्छत् नगरीद्वारात्। अथ गच्छता राजपुत्रेण बहिः नगरादालोकिता रोदनपरा कापि सुन्दरी दिव्याभरणभूषिता।)
(तब राजा हाथ में तलवार लेकर उसका पीछा करते हुए नगरी के द्वार से बाहर निकल गया। फिर आगे जाते हुए राजपुत्र ने नगर के बाहर दिव्य आभूषणों से सजी हुई, रोती हुई कोई सुन्दर स्त्री देखी।)
वीरवरः – का त्वमम्ब ! किमर्थं विलपसि ?
वीरवर – माता! तुम कौन हो? किसलिए रो रही हो?
राजलक्ष्मीः – वत्स ! अहमेतस्य भूपालस्य शूद्रकस्य राजलक्ष्मीरस्मि। चिरमेतस्य भुजच्छायायां सुमहता सुखेन निवसामि। साम्प्रतं तु देव्या अपराधेनाद्य प्रभृति तृतीये दिवसे राजा पञ्चत्वं यास्यति, तदाहमनाथा भविष्यामि। तदिदानीं नात्र स्थास्यामीति क्रन्दामि।
राजलक्ष्मी – पुत्र! मैं इस राजा शूद्रक की राजलक्ष्मी हूँ। बहुत समय से इसकी भुजाओं की छाया (संरक्षण) में बड़े सुख से रहती हूँ। परन्तु अब देवी के (प्रति हुए) अपराध के कारण आज से तीसरे दिन राजा की मृत्यु हो जाएगी, तब मैं अनाथ (स्वामी के बिना) हो जाऊँगी। इसलिए अब मैं यहाँ नहीं रहूँगी — इस कारण रो रही हूँ।
वीरवरः – (तदाकर्ण्य प्रणिपत्य) भगवति ! अस्त्यत्र कश्चिदुपायो येन भगवत्याः पुनरिह चिरवासो भवति, सुचिरं जीवति च स्वामी ?
वीरवर – (यह सुनकर और प्रणाम करके) हे देवी! क्या इसका कोई उपाय है, जिससे आपका फिर से यहाँ लम्बे समय तक निवास हो और स्वामी (राजा) भी बहुत समय तक जीवित रहें?
राजलक्ष्मीः – अस्ति वत्स ! एकैवात्र प्रवृत्तिः, सा चातीव दुःसाध्या।
राजलक्ष्मी – है पुत्र! इसके लिए एक ही आचरण (उपाय) है, और वह अत्यन्त कठिन है।
वीरवरः – (साष्टाङ्गं नमस्कृत्य) अम्ब ! कथय, कः सः उपायः दुःसाध्यः ?
वीरवर – (साष्टांग प्रणाम करके) माता! बताइए, वह कठिन उपाय क्या है?
राजलक्ष्मीः – श्रूयतां पुत्र ! यदि त्वया स्वस्य सर्वतः प्रियं वस्तु सहासवदनेन भगवत्यै सर्वमङ्गलायै उपहारः क्रियेत, तदा पुनर्जीविष्यति राजा शूद्रको वर्षाणां शतम्, अहञ्च सुखेन निवत्स्यामि।
राजलक्ष्मी – सुनो पुत्र! यदि तुम अपनी सबसे प्रिय वस्तु हँसते हुए मुख से भगवती सर्वमंगला को भेंट कर दो, तो राजा शूद्रक फिर से सौ वर्ष तक जीवित रहेगा और मैं भी (यहाँ) सुख से रहूँगी।
(ततः सा तत्क्षणादेव गताऽदृश्यतां तत्सम्मुखात्।)
(तब वह उसी क्षण उसके सामने से अदृश्य हो गई।)
अत्र इदम् अवधेयम् — १. वाक्यान्वयः (वाक्य में पदों का क्रम)
संस्कृतभाषायाः अनेकवैशिष्ट्येषु अन्यतमः अस्ति मुक्तः पदविन्यासक्रमः। तन्नाम वाक्ये कर्तृकर्म-क्रियादिपदानि वयं स्वेच्छया भिन्नभिन्नक्रमेण नियोजयितुं शक्नुमः।
संस्कृत भाषा की अनेक विशेषताओं में से एक है — पदों को रखने का मुक्त (स्वतन्त्र) क्रम। अर्थात् वाक्य में कर्ता, कर्म, क्रिया आदि पदों को हम अपनी इच्छा से अलग-अलग क्रम में रख सकते हैं।
तद्यथा –
रामः वनम् अगच्छत्।
अगच्छत् रामः वनम्।
वनम् अगच्छत् रामः।
जैसे — राम वन को गया।
(भाव: तीनों वाक्यों में पदों का क्रम अलग है, पर अर्थ एक ही है।)
साहित्यम् एवं विविध-पदविन्यासेन रमणीयं भवति। अस्मिन् पाठे एवंविधः मुक्तपदविन्यासः पुनः पुनः दृश्यते। तस्य अवलोकनेन संस्कृतवाक्यरचनायाः सौन्दर्यम् अवगच्छामः। पाठात् कानिचन उदाहरणानि पश्यन्तु।
इस प्रकार विविध पद-विन्यास से साहित्य सुन्दर बनता है। इस पाठ में इस तरह का मुक्त पद-विन्यास बार-बार दिखाई देता है। उसे देखकर हम संस्कृत वाक्य-रचना की सुन्दरता को समझते हैं। पाठ से कुछ उदाहरण देखिए।
सामान्यः वाक्यक्रमः
शोभावती नाम काचन नगरी आसीत्।
(पाठे) साहित्ये वाक्यक्रमः
आसीत् शोभावती नाम काचन नगरी।
सामान्य वाक्य-क्रम और (पाठ में) साहित्यिक वाक्य-क्रम — दोनों का अर्थ एक ही है: शोभावती नाम की एक नगरी थी।
सामान्यः वाक्यक्रमः
तदविशिष्टं भोज्यविलासव्ययार्थं पत्न्याः हस्ते निक्षिपति च।
(पाठे) साहित्ये वाक्यक्रमः
निक्षिपति च तदविशिष्टं भोज्यविलासव्ययार्थं पत्न्याः हस्ते।
सामान्य वाक्य-क्रम और (पाठ में) साहित्यिक वाक्य-क्रम — दोनों का अर्थ एक ही है: और (वह) उससे बचा हुआ (धन) भोजन और सुख-सुविधा के खर्च के लिए पत्नी के हाथ में रख देता है।
पाठकः पदानां विभक्तिं सम्यक् आलोच्य तेषाम् अन्वयं कुर्यात्।
पाठक को चाहिए कि पदों की विभक्ति को अच्छी तरह देख-समझकर उनका अन्वय करे।
अत्र इदम् अवधेयम् — २. भूतकालः
कालस्य प्रायः ‘वर्तमानकालः भूतकालः भविष्यत्-कालः’ इति त्रयः भेदाः सन्ति। एतेषु भूतकालः इति ‘अतीतस्य कालस्य’ वाचकं पदम् अस्ति। सामान्यतः भूतकालाय लङ्-लकारस्य प्रयोगः भवति।
काल के प्रायः ‘वर्तमान काल, भूतकाल, भविष्यत् काल’ — ये तीन भेद हैं। इनमें ‘भूतकाल’ बीते हुए समय को बताने वाला शब्द है। सामान्यतः भूतकाल के लिए लङ् लकार का प्रयोग होता है।
यथा, अस्मिन् पाठे ‘उपागच्छत् (उप+अगच्छत्), अनयत्, व्यचिन्तयत् (वि+अचिन्तयत्)’ इत्यादयः।
जैसे, इस पाठ में ‘उपागच्छत् (उप+अगच्छत्) — पास आया, अनयत् — ले गया, व्यचिन्तयत् (वि+अचिन्तयत्) — सोचा’ आदि।
एतदतिरिक्तं लट्-लकारस्य क्रिया-पदेन सह ‘स्म’ इत्यस्य योजनं कृत्वा अपि भूतकालस्य भावः प्रकट्यते। यथा, अस्मिन् पाठे ‘प्रतिवसति स्म’।
इसके अतिरिक्त लट् लकार के क्रिया-पद के साथ ‘स्म’ जोड़कर भी भूतकाल का भाव प्रकट किया जाता है। जैसे, इस पाठ में ‘प्रतिवसति स्म’ (रहता था)।
एवमेव भूतकाले धातुना सह ‘क्तवतु-प्रत्ययः’ अपि योज्यते। यथा, अस्मिन् पाठे ‘श्रुतवान्’ इति प्रयोगः। एतासु परिस्थितिषु वाक्यस्य संरचना कर्तृवाच्ये भवति।
इसी प्रकार भूतकाल में धातु के साथ ‘क्तवतु’ प्रत्यय भी जोड़ा जाता है। जैसे, इस पाठ में ‘श्रुतवान्’ (सुना) का प्रयोग। इन स्थितियों में वाक्य की रचना कर्तृवाच्य में होती है।
एवमेव, भूतकाले ‘क्त-प्रत्ययस्य’ अपि योजनं भवति। यथा, अस्मिन् पाठे ‘निर्गतः, नियोजितः, आलोकिता’ इत्यादयः प्रयोगाः। क्त-प्रत्ययस्य प्रयोगस्य सन्दर्भे वाक्यस्य संरचना कर्तृवाच्ये, कर्मवाच्ये, भाववाच्ये च भवति।
इसी प्रकार भूतकाल में ‘क्त’ प्रत्यय भी जोड़ा जाता है। जैसे, इस पाठ में ‘निर्गतः (निकल गया), नियोजितः (नियुक्त किया गया), आलोकिता (देखी गई)’ आदि प्रयोग। ‘क्त’ प्रत्यय के प्रयोग में वाक्य की रचना कर्तृवाच्य, कर्मवाच्य और भाववाच्य — तीनों में होती है।
कर्तृ-कर्म-भाव-वाच्यानां विषये अग्रिमपाठस्य अवधेयांशे द्रष्टव्यम्
कर्तृवाच्य, कर्मवाच्य और भाववाच्य के विषय में अगले पाठ के ‘अवधेय’ अंश में देखिए।
योग्यताविस्तरः — १. पाठ के भाव के अनुरूप श्लोक
पाठस्य भावानुगुणम् अत्र केचन श्लोकाः प्रदत्ताः सन्ति। एतान् पठत —
पाठ के भाव के अनुरूप यहाँ कुछ श्लोक दिए गए हैं। इन्हें पढ़िए —
कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः।
एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे॥
(यजुर्वेदः ४०.२)
इस संसार में कर्म करते हुए ही (मनुष्य) सौ वर्ष तक जीने की इच्छा करे। इस प्रकार (जीने वाले) तुझ मनुष्य में कर्म का लेप (बन्धन) नहीं होता; इसके अतिरिक्त दूसरा कोई मार्ग नहीं है।
यथा छायातपौ नित्यं सुसंबद्धौ परस्परम्।
एवं कर्म च कर्ता च संश्लिष्टावितरेतरम्॥
(पञ्चतन्त्रम्)
जैसे छाया और धूप सदा आपस में भली-भाँति जुड़े रहते हैं, वैसे ही कर्म और कर्ता (करने वाला) भी एक-दूसरे से जुड़े रहते हैं।
कार्ये कर्मणि निर्वृत्ते यो बहून्यपि साधयेत्।
पूर्वकार्याविरोधेन स कार्यं कर्तुमर्हति॥
(वाल्मीकि-रामायणम्)
जो सौंपा गया कार्य पूरा हो जाने पर, पहले कार्य में बाधा डाले बिना, और भी बहुत-से कार्य सिद्ध कर दे, वही कार्य करने के योग्य है।
योग्यताविस्तरः — २. पठत बोधत: जीमूतवाहनस्य कथा
पुरा विदेहनगरस्य शुद्धकेतुः नाम धर्मात्मा राजा आसीत्। तस्य पुत्रः जीमूतवाहनः बाल्यकालाद् एव धर्मनिष्ठः, त्यागशीलः, परोपकाररतः, दीनानुकम्पी च आसीत्। सः स्वेच्छया धर्माचरणं कर्तुं राज्यं त्यक्त्वा वनं गतवान्।
प्राचीन काल में विदेह नगर का शुद्धकेतु नाम का एक धर्मात्मा राजा था। उसका पुत्र जीमूतवाहन बचपन से ही धर्मनिष्ठ, त्यागी, परोपकार में लगा रहने वाला और दीन-दुखियों पर दया करने वाला था। वह अपनी इच्छा से धर्म का आचरण करने के लिए राज्य छोड़कर वन चला गया।
एकदा सः सागरतीरे भ्रमन्, एकं वृद्धं नागं विलोकयति, यः अत्यन्तं दुःखितः आसीत्। जीमूतवाहनः तं पृष्टवान् – “किं कारणं भवतः दुःखस्य ?”
एक दिन समुद्र के किनारे घूमते हुए उसने एक बूढ़े नाग को देखा, जो बहुत दुःखी था। जीमूतवाहन ने उससे पूछा — “आपके दुःख का क्या कारण है?”
नागः – “हे राजपुत्र ! अस्माकं नागकुलं गरुडेन खाद्यते। प्रतिदिनं एकः नागः तस्मै दातव्यः भवति। अद्य मम पुत्रस्य शङ्खचूडस्य क्रमः अस्ति। अहं कुलविहीनः भविष्यामि इति कारणेन दुःखितोऽस्मि।”
नाग – “हे राजपुत्र! हमारे नाग-कुल को गरुड़ खाता है। प्रतिदिन एक नाग उसे देना पड़ता है। आज मेरे पुत्र शंखचूड की बारी है। मैं कुल-विहीन (वंश-रहित) हो जाऊँगा, इस कारण दुःखी हूँ।”
(तं दुःखितं दृष्ट्वा जीमूतवाहनः अत्यन्तं द्रवितचित्तः जातः। पश्चात् विचिन्त्य)
(उसे दुःखी देखकर जीमूतवाहन का हृदय बहुत पिघल (द्रवित हो) गया। फिर सोच-विचार करके)
जीमूतवाहनः उक्तवान् – “यदि मम शरीरं गरुडस्य क्षुधार्थं पर्याप्तं स्यात्, तर्हि अहं तस्य स्थाने स्वदेहं दास्यामि।”
जीमूतवाहन ने कहा — “यदि मेरा शरीर गरुड़ की भूख (मिटाने) के लिए पर्याप्त हो, तो मैं उसके स्थान पर अपना शरीर दे दूँगा।”
जीमूतवाहनः तं नागं रक्षितुं स्वयं शङ्खचूडनागस्य रूपं धृत्वा गरुडस्य समीपं गतः। गरुडः तं नागं (जीमूतवाहनम्) गृहीत्वा शिलाखण्डे क्षिप्त्वा, भोक्तुं आरब्धवान्।
जीमूतवाहन उस नाग की रक्षा करने के लिए स्वयं शंखचूड नाग का रूप धारण करके गरुड़ के पास गया। गरुड़ ने उस नाग (जीमूतवाहन) को पकड़कर, शिला के टुकड़े पर पटककर खाना आरम्भ कर दिया।
गरुडस्य भोजनकाले जीमूतवाहनः किमपि कष्टं न दर्शितवान्। अत्यन्तं सहिष्णुतया तत्र निश्चलः स्थितवान्।
गरुड़ के खाते समय जीमूतवाहन ने कुछ भी कष्ट प्रकट नहीं किया। वह अत्यन्त सहनशीलता से वहाँ निश्चल पड़ा रहा।
निर्विकारचित्तं तं दृष्ट्वा गरुडः अचिन्तयत् – ‘एषः न कोऽपि सामान्यः नागः, यः स्वमृत्युसमयेऽपि ईदृशं धैर्यं धारयति।’
उसे शान्त (विकार-रहित) मन वाला देखकर गरुड़ ने सोचा — ‘यह कोई साधारण नाग नहीं है, जो अपनी मृत्यु के समय भी ऐसा धैर्य धारण किए हुए है।’
ततः सः भोजनात् विरम्य तस्य वास्तविकं परिचयं ज्ञातुम् इष्टवान्। सर्वं वृत्तान्तं ज्ञात्वा तस्य साहसं, कारुण्यं, परोपकारभावनां च दृष्ट्वा तं साधुवादेन सह मुक्तवान्। सः ‘नागवंशस्य हननात् विरंस्ये’ इति प्रतिज्ञामपि कृतवान्।
तब उसने खाना रोककर उसका वास्तविक परिचय जानना चाहा। सारा वृत्तान्त जानकर और उसका साहस, करुणा तथा परोपकार की भावना देखकर गरुड़ ने उसे साधुवाद (प्रशंसा) के साथ छोड़ दिया। उसने ‘मैं नागवंश को मारना छोड़ दूँगा’ — यह प्रतिज्ञा भी की।
परोपकाराय फलन्ति वृक्षाः परोपकाराय वहन्ति नद्यः।
परोपकाराय दुहन्ति गावः परोपकारार्थमिदं शरीरम्॥
वृक्ष परोपकार के लिए फल देते हैं, नदियाँ परोपकार के लिए बहती हैं, गायें परोपकार के लिए दूध देती हैं — यह शरीर भी परोपकार के लिए ही है।

NCERT Solutions for Class 8 Sanskrit Chapter 10 सन्निमित्ते वरं त्यागः – Questions and Answers

All questions of the chapter are answered below, in the order of the book – in-text questions, activities and the end-of-chapter exercises. Each answer is written the way you would write it in the exam.

पाठे विद्यमानाः प्रश्नाः — पृष्ठ 112राजसभायां राज्ञः शूद्रकस्य, वीरवरस्य, मन्त्रिणश्च संवादः

पाठः
प्र.1राजा — “किं ते वर्तनम् ?” (पृष्ठ 112)
उत्तर
उत्तरम् — वीरवरः — “प्रतिदिनं सुवर्णशतचतुष्टयं देव !”
प्र.2राजा — “का ते सामग्री ?” (पृष्ठ 112)
उत्तर
उत्तरम् — वीरवरः — “इमौ बाहू, एष खड्गश्च।”
प्र.3मन्त्री — (तदालोक्य) “देव ! दिनचतुष्टयस्य वेतनार्पणेन प्रथमं परीक्ष्यतां स्वरूपमस्य वेतनार्थिनो राजपुत्रस्य, किमुपपन्नमेतत् वेतनं न वेति।” — मन्त्री किम् उपायं सूचयति ?
उत्तर
उत्तरम् — मन्त्री सूचयति यत् चतुर्णां दिनानां वेतनं दत्त्वा प्रथमम् अस्य वेतनार्थिनः राजपुत्रस्य स्वरूपं परीक्ष्यताम् — एतत् वेतनम् उपपन्नम् अस्ति न वा इति ज्ञायताम्।

पाठे विद्यमानाः प्रश्नाः — पृष्ठ 113–114अर्धरात्रौ राज्ञः, वीरवरस्य राजलक्ष्म्याश्च संवादः

पाठः
प्र.4राजा — “कोऽत्र द्वारि तिष्ठति ?” (पृष्ठ 113)
उत्तर
उत्तरम् — वीरवरः — “सेवको वीरवरोऽत्र द्वारि वर्त्तते देव !”
प्र.5वीरवरः — “का त्वमम्ब ! किमर्थं विलपसि ?” (पृष्ठ 113)
उत्तर
उत्तरम् — सा स्त्री राज्ञः शूद्रकस्य राजलक्ष्मीः आसीत्। सा अवदत् — “वत्स ! अहमेतस्य भूपालस्य शूद्रकस्य राजलक्ष्मीरस्मि। … साम्प्रतं तु देव्या अपराधेनाद्य प्रभृति तृतीये दिवसे राजा पञ्चत्वं यास्यति, तदाहमनाथा भविष्यामि। तदिदानीं नात्र स्थास्यामीति क्रन्दामि।”
प्र.6वीरवरः — (तदाकर्ण्य प्रणिपत्य) “भगवति ! अस्त्यत्र कश्चिदुपायो येन भगवत्याः पुनरिह चिरवासो भवति, सुचिरं जीवति च स्वामी ?” (पृष्ठ 114)
उत्तर
उत्तरम् — राजलक्ष्मीः — “अस्ति वत्स ! एकैवात्र प्रवृत्तिः, सा चातीव दुःसाध्या।”
प्र.7वीरवरः — (साष्टाङ्गं नमस्कृत्य) “अम्ब ! कथय, कः सः उपायः दुःसाध्यः ?” (पृष्ठ 114)
उत्तर
उत्तरम् — राजलक्ष्मीः — “श्रूयतां पुत्र ! यदि त्वया स्वस्य सर्वतः प्रियं वस्तु सहासवदनेन भगवत्यै सर्वमङ्गलायै उपहारः क्रियेत, तदा पुनर्जीविष्यति राजा शूद्रको वर्षाणां शतम्, अहञ्च सुखेन निवत्स्यामि।”

वयं शब्दार्थान् जानीमः — पृष्ठ 114–116शब्दार्थ-सारणी तथा ‘मातृभाषया अर्थं लिखत’ स्तम्भः

शब्दार्थाः
प्र.8मातृभाषया अर्थं लिखत — पृष्ठ 114–116 की ‘वयं शब्दार्थान् जानीमः’ सारणी का अन्तिम स्तम्भ रिक्त है; उसमें अपनी मातृभाषा में अर्थ लिखिए।
शब्दःअर्थःहिन्दीEnglishमातृभाषया अर्थं लिखत
महीपतिःभूपालःराजाKing……
महापराक्रमीअतिबलशालीबहुत बलवान्Very brave……
नानाशास्त्रवित्अनेकेषां शास्त्राणां ज्ञाताअनेक शास्त्रों का ज्ञाताWho knows many shastras……
पूतचरित्रःपवित्रं चरित्रं यस्यपवित्र चरित्र वालाOf high character……
प्रतिवसति स्मअवसत्रहता थाlived……
वृत्त्यर्थम्आजीविकां प्राप्तुम्आजीविका पाने के लिएTo get livelihood……
समायाताःआगतवन्तःआएCame……
प्रतिहारम्द्वारपालम्द्वारपाल कोTo the door-keeper……
दौवारिकःद्वारपालकःद्वारपालGate-keeper……
वर्तनम्वेतनम्वेतनSalary……
उपपन्नम्उपयुक्तम्उपयुक्तAppropriate……
सुवर्णशत-चतुष्टयम्चतुश्शतसंख्यकाः स्वर्णमुद्राःचार सौ स्वर्णमुद्राएँFour hundred gold coins……
निर्गतःबहिः गतवान्बाहर चला गयाWent out……
आलोक्यदृष्ट्वादेखकरAfter seeing……
नियोजितःसेवायां नियुक्तःनियुक्तAppointed……
उपपन्नम्युक्तियुक्तम्उचितSuitable……
धृतायुधःशस्त्रयुक्तःशस्त्र धारण किए हुएArmed……
अहर्निशम्दिवसः रात्रिः चदिन-रातDay and Night……
करुणरोदनध्वनिम्करुणाजनकं रोदनध्वनिम्करुणाजनक क्रन्दन ध्वनिSorrowful voice……
व्यचिन्तयत्अचिन्तयत्सोचाThought……
सूचिभेद्येगहनेसघनDense……
तिमिरेअन्धकारेअन्धकार मेंIn darkness……
पृष्ठतःपृष्ठभागात्पीछे सेFrom back……
निरूपयामिपश्यामिदेखता हूँI see……
खड्गपाणिःखड्गवान् जनःखड्गधारीOne with sword……
रोदनपरारोदनं कुर्वतीरोती हुईWeeping lady……
विलपसिरोदनं करोषिरो रही हो(You) crying……
क्रन्दामिरोदनं करोमिरो रही हूँCrying……
साष्टाङ्गं नमस्कृत्यअष्टभिः अङ्गैः सह प्रणामं कृत्वाआठों अंगों सहित प्रणाम करकेWith eight parts After bowing……
प्रत्युवाचउत्तरं दत्तवतीउत्तर दियाAnswered……
पञ्चत्वम्मृत्युम्मृत्यु कोTo the death……
अनाथास्वामिनं विनास्वामी के बिनाWithout protector……
प्रवृत्तिःआचरणम्आचरणFollow-up……
सुचिरम्दीर्घकालं यावत्दीर्घ-काल तकFor long time……
दुःसाध्याकाठिन्येन अनुपालनीयाकठिनाई से पालन करने योग्यDifficult to be followed……
सहासवदनेनहास्य-युक्त-मुखेनहास्य युक्त मुख सेWith a smiling face……
निवत्स्यामिवासं करिष्यामिरहूँगीWill stay……
तत्क्षणादेवतत्कालम्उसी क्षणOn the spot……
उत्तर

अन्तिम स्तम्भ — मातृभाषया (हिन्दी) अर्थः —

शब्दःमातृभाषया अर्थः (हिन्दी)
महीपतिःराजा
महापराक्रमीबहुत पराक्रमी, बहुत बलवान्
नानाशास्त्रवित्अनेक शास्त्रों का ज्ञाता
पूतचरित्रःपवित्र चरित्र वाला
प्रतिवसति स्मरहता था
वृत्त्यर्थम्आजीविका (नौकरी) पाने के लिए
समायाताः(साथ) आए
प्रतिहारम्द्वारपाल को
दौवारिकःद्वारपाल
वर्तनम्वेतन
उपपन्नम्उपयुक्त
सुवर्णशत-चतुष्टयम्चार सौ स्वर्णमुद्राएँ
निर्गतःबाहर चला गया
आलोक्यदेखकर
नियोजितःसेवा में नियुक्त
उपपन्नम्उचित
धृतायुधःशस्त्र धारण किए हुए
अहर्निशम्दिन-रात
करुणरोदनध्वनिम्करुणा जगाने वाली रोने की आवाज़ (को)
व्यचिन्तयत्सोचा
सूचिभेद्येसघन (सुई से भेदने योग्य)
तिमिरेअन्धकार में
पृष्ठतःपीछे से
निरूपयामिदेखता हूँ
खड्गपाणिःहाथ में तलवार लिए हुए
रोदनपरारोती हुई
विलपसि(तुम) विलाप कर रही हो
क्रन्दामि(मैं) रो रही हूँ
साष्टाङ्गं नमस्कृत्यआठों अंगों से प्रणाम करके
प्रत्युवाचउत्तर दिया
पञ्चत्वम्मृत्यु को
अनाथाअनाथ (स्वामी के बिना)
प्रवृत्तिःआचरण (उपाय)
सुचिरम्दीर्घ काल तक
दुःसाध्याकठिनाई से पालन करने योग्य
सहासवदनेनहँसते हुए मुख से
निवत्स्यामिरहूँगी
तत्क्षणादेवउसी क्षण

अत्र इदम् अवधेयम् — पृष्ठ 116–117व्याकरण-पेटिका — १. वाक्यान्वयः · २. भूतकालः

व्याकरणम्
प्र.9१. वाक्यान्वयः — संस्कृतभाषायाः ‘मुक्तः पदविन्यासक्रमः’ इति किम् ? पाठात् उदाहरणद्वयं दत्त्वा स्पष्टीकुरुत।
उत्तर
उत्तरम् — संस्कृतभाषायाः अनेकवैशिष्ट्येषु अन्यतमः अस्ति मुक्तः पदविन्यासक्रमः — तन्नाम वाक्ये कर्तृ-कर्म-क्रियादिपदानि वयं स्वेच्छया भिन्नभिन्नक्रमेण नियोजयितुं शक्नुमः।

तद्यथा (पेटिकायाः उदाहरणम्) —

  • रामः वनम् अगच्छत्।
  • अगच्छत् रामः वनम्।
  • वनम् अगच्छत् रामः।

पाठात् उदाहरणे (पुस्तके प्रदत्ते) —

सामान्यः वाक्यक्रमः(पाठे) साहित्ये वाक्यक्रमः
शोभावती नाम काचन नगरी आसीत्।आसीत् शोभावती नाम काचन नगरी।
तदवशिष्टं भोज्यविलासव्ययार्थं पत्न्याः हस्ते निक्षिपति च।निक्षिपति च तदवशिष्टं भोज्यविलासव्ययार्थं पत्न्याः हस्ते।
प्र.10२. भूतकालः — भूतकालस्य भावः संस्कृते कति प्रकारैः प्रकट्यते ? अस्मात् पाठात् उदाहरणानि दत्त्वा लिखत।
उत्तर
उत्तरम् — कालस्य प्रायः त्रयः भेदाः सन्ति — वर्तमानकालः, भूतकालः, भविष्यत्-कालः। एतेषु भूतकालः ‘अतीतस्य कालस्य’ वाचकं पदम् अस्ति। सामान्यतः भूतकालाय लङ्-लकारस्य प्रयोगः भवति।

पाठ के अनुसार भूतकाल चार प्रकार से प्रकट होता है —

प्रकारःनियमःअस्मिन् पाठे उदाहरणम्
१. लङ्-लकारःधातु के आगे ‘अ’ और लङ् के प्रत्ययउपागच्छत् (उप + अगच्छत्), अनयत्, व्यचिन्तयत् (वि + अचिन्तयत्)
२. लट् + ‘स्म’वर्तमानकालिक क्रिया-पद के साथ ‘स्म’ जोड़ने पर अर्थ भूतकाल का हो जाता हैप्रतिवसति स्म (= अवसत्, ‘रहता था’)
३. क्तवतु-प्रत्ययःधातु + क्तवतु; वाक्य की संरचना कर्तृवाच्य में रहती हैश्रुतवान् (= अशृणोत्, ‘सुना’)
४. क्त-प्रत्ययःधातु + क्त; इसके प्रयोग में वाक्य कर्तृवाच्य, कर्मवाच्य तथा भाववाच्य — तीनों में हो सकता हैनिर्गतः, नियोजितः, आलोकिता

अभ्यासात् जायते सिद्धिः — पृष्ठ 118प्रश्नः १ : पाठम् आधृत्य उदाहरणानुगुणं लिखत ‘आम्’ अथवा ‘न’

अभ्यासः
प्र.11(क) किं वीरवरः राजपुत्रः आसीत् ?
उत्तर
उत्तरम् — आम् (हाँ)

पाठे प्रमाणम् — “अथैकदा वीरवरनामा राजपुत्रः वृत्त्यर्थं कस्मादपि देशाद् राजद्वारमुपागच्छत्।”

प्र.12(ख) “किं ते वर्तनम्” ? इति किं शूद्रकः अपृच्छत् ?
उत्तर
उत्तरम् — आम् (हाँ)

पाठे प्रमाणम् — “राजा — किं ते वर्तनम् ?” — यह प्रश्न राजा शूद्रक ने ही पूछा था, और वीरवर ने उत्तर दिया — “प्रतिदिनं सुवर्णशतचतुष्टयं देव !”

प्र.13(ग) किं वीरवरं राज्ञः समीपे दौवारिकः अनयत् ?
उत्तर
उत्तरम् — आम् (हाँ)

पाठे प्रमाणम् — “(ततो दौवारिकः तं प्रभोः समीपम् अनयत्।)”

प्र.14(घ) किं राजा शूद्रकः राजपुत्रं वीरवरं साक्षात् दृष्ट्वा एव वृत्तिम् अयच्छत् ?
उत्तर
उत्तरम् — न (नहीं)

पाठे प्रमाणम् — पहले तो राजा ने साफ़ मना कर दिया — “नैतच्छक्यम् !” (यह सम्भव नहीं) — और वीरवर प्रणाम करके सभा से निकल गया। बाद में मन्त्रियों की सलाह पर ही नियुक्ति हुई — “अथ मन्त्रिणां वचनात् ताम्बूलदानेन नियोजितोऽसौ राजपुत्रो वीरवरो नरपतिना।”

प्र.15(ङ) किं वीरवरः स्ववेतनस्य चतुर्थं भागम् एव पत्न्यै यच्छति स्म ?
उत्तर
उत्तरम् — आम् (हाँ)

पाठे प्रमाणम् — “स च राजपुत्रः प्रतिदिनं प्रभाते राजदर्शनादनन्तरं स्ववेतनस्य यच्छति देवेभ्यः अर्धम्। स्थितस्य चार्द्धं दरिद्रेभ्यो ददाति, निक्षिपति च तदवशिष्टं भोज्यविलासव्ययार्थं पत्न्याः हस्ते।”

गणना —
कुल वेतन = 1
देवेभ्यः = 1/2
शेष = 1 − 1/2 = 1/2; तस्य अर्धं दरिद्रेभ्यः = 1/2 × 1/2 = 1/4
अवशिष्टं पत्न्यै = 1 − 1/2 − 1/4 = 1/4 (चतुर्थः भागः)
प्र.16(च) किं करुण-रोदन-ध्वनिं राजा श्रुतवान् ?
उत्तर
उत्तरम् — आम् (हाँ)

पाठे प्रमाणम् — “अथैकदा कृष्णचतुर्दश्यामर्धरात्रे स राजा श्रुतवान् करुणरोदनध्वनिं कञ्चन।”

प्र.17(छ) किं करुणरोदनध्वनिः दिवसे श्रुतः आसीत् ?
उत्तर
उत्तरम् — न (नहीं)

पाठे प्रमाणम् — “अथैकदा कृष्णचतुर्दश्यामर्धरात्रे स राजा श्रुतवान् करुणरोदनध्वनिं कञ्चन।”

प्र.18(ज) किं राजलक्ष्म्या उक्तः उपायः अतीव दुःसाध्यः आसीत् ?
उत्तर
उत्तरम् — आम् (हाँ)

पाठे प्रमाणम् — “अस्ति वत्स ! एकैवात्र प्रवृत्तिः, सा चातीव दुःसाध्या।”

प्र.19(झ) किं भगवती सर्वमङ्गला उपायं संसूच्य शीघ्रमेव अदृश्या अभवत् ?
उत्तर
उत्तरम् — न (नहीं)

पाठे प्रमाणम् — उपाय बताकर अदृश्य होने वाली राजलक्ष्मी थी, भगवती सर्वमङ्गला नहीं — “(ततः सा तत्क्षणादेव गताऽदृश्यतां तत्सम्मुखात्।)”

अभ्यासात् जायते सिद्धिः — पृष्ठ 118–119प्रश्नः २ : अधोलिखितान् प्रश्नान् पूर्णवाक्येन उत्तरत

अभ्यासः
प्र.20(क) शूद्रकः कीदृशः राजा आसीत् ?
उत्तर
उत्तरम् — शूद्रकः महापराक्रमी नानाशास्त्रवित् पूतचरित्रः च महीपतिः आसीत्।
प्र.21(ख) वीरवरः कस्य समीपं गन्तुम् इच्छति स्म ?
उत्तर
उत्तरम् — वीरवरः स्वामिनः (राज्ञः शूद्रकस्य) समीपं गन्तुम् इच्छति स्म।
प्र.22(ग) राज्ञः शूद्रकस्य ‘का ते सामग्री ?’ इति प्रश्नस्य उत्तरं वीरवरः किम् अयच्छत् ?
उत्तर
उत्तरम् — वीरवरः “इमौ बाहू, एष खड्गश्च।” इति उत्तरम् अयच्छत्।
प्र.23(घ) वीरवरः स्वगृहं कदा गच्छति स्म ?
उत्तर
उत्तरम् — यदा राजा स्वयम् आदिशति स्म, तदा एव वीरवरः स्वगृहं गच्छति स्म।
प्र.24(ङ) वीरवरः स्ववेतनस्य अर्धं केभ्यः यच्छति स्म ?
उत्तर
उत्तरम् — वीरवरः स्ववेतनस्य अर्धं देवेभ्यः यच्छति स्म।
प्र.25(च) राजलक्ष्मीः कुत्र सुखेन अवसत् ?
उत्तर
उत्तरम् — राजलक्ष्मीः राज्ञः शूद्रकस्य भुजच्छायायां सुमहता सुखेन अवसत्।
प्र.26(छ) राजलक्ष्म्याः दुःखस्य कारणं श्रुत्वा बद्धाञ्जलिः वीरवरः किम् अवदत् ?
उत्तर
उत्तरम् — वीरवरः अवदत् — “भगवति ! अस्त्यत्र कश्चिदुपायो येन भगवत्याः पुनरिह चिरवासो भवति, सुचिरं जीवति च स्वामी ?” इति।

अभ्यासात् जायते सिद्धिः — पृष्ठ 119प्रश्नः ३ : उदाहरणानुसारं निम्नलिखितानि वाक्यानि अन्वयरूपेण लिखत

अभ्यासः
प्र.27(क) आसीत् शोभावती नाम काचन नगरी।
उत्तर
अन्वयः — शोभावती नाम काचन नगरी आसीत्।
प्र.28(ख) प्रतिदिनं सुवर्णशतचतुष्टयं देव !
उत्तर
अन्वयः — देव ! (मम वर्तनम्) प्रतिदिनं सुवर्णशतचतुष्टयम् (अस्ति)।
प्र.29(ग) देव ! दिनचतुष्टयस्य वेतनार्पणेन प्रथममवगम्यतां स्वरूपमस्य वेतनार्थिनो राजपुत्रस्य, किमुपपन्नमेतत् वेतनं न वेति।
उत्तर
अन्वयः — देव ! दिनचतुष्टयस्य वेतनार्पणेन अस्य वेतनार्थिनः राजपुत्रस्य स्वरूपं प्रथमम् अवगम्यताम्, एतत् वेतनम् उपपन्नं किम्, न वा — इति।
प्र.30(घ) क्रन्दनमनुसर राजपुत्र !
उत्तर
अन्वयः — राजपुत्र ! क्रन्दनम् अनुसर।
प्र.31(ङ) अथ मन्त्रिणां वचनात् ताम्बूलदानेन नियोजितोऽसौ राजपुत्रो वीरवरो नरपतिना।
उत्तर
अन्वयः — अथ नरपतिना मन्त्रिणां वचनात् असौ राजपुत्रः वीरवरः ताम्बूलदानेन नियोजितः।
प्र.32(च) नैष गन्तुमर्हति राजपुत्र एकाकी सूचिभेद्ये तिमिरेऽस्मिन्।
उत्तर
अन्वयः — एषः राजपुत्रः एकाकी अस्मिन् सूचिभेद्ये तिमिरे गन्तुं न अर्हति।
प्र.33(छ) भगवति ! अस्त्यत्र कश्चिदुपायो येन भगवत्याः पुनरिह चिरवासो भवति, सुचिरं जीवति च स्वामी ?
उत्तर
अन्वयः — भगवति ! अत्र कश्चित् उपायः अस्ति, येन भगवत्याः पुनः इह चिरवासः भवति, स्वामी च सुचिरं जीवति ?
प्र.34(ज) तदा पुनर्जीविष्यति राजा शूद्रको वर्षाणां शतम्।
उत्तर
अन्वयः — तदा राजा शूद्रकः वर्षाणां शतं पुनः जीविष्यति।

अभ्यासात् जायते सिद्धिः — पृष्ठ 120प्रश्नः ४ : उदाहरणानुगुणं पाठगतानि पदानि अधिकृत्य रिक्तस्थानानि पूरयत (सन्धि-विच्छेदः)

अभ्यासः
प्र.35उदाहरणानुगुणं पाठगतानि पदानि अधिकृत्य रिक्तस्थानानि पूरयत —
यथा — अथैकदा=अथ + एकदा
वृत्त्यर्थम्=वृत्ति + ……
कस्मादपि=…… + अपि
कोऽपि=कः + ……
राजपुत्रोऽस्मि=…… + अस्मि
यथेष्टम्=यथा + ……
वेतनार्पणेन=वेतन + ……
तदालोक्य=…… + आलोक्य
ततोऽसौ=ततः + ……
वर्त्तनार्थिनो=…… + अर्थिनः
तदवशिष्टं=…… + अवशिष्टम्
राजदर्शनादनन्तरं=राजदर्शनात् + ……
वेति=…… + इति
राजलक्ष्मीरुवाच=राजलक्ष्मीः + ……
चार्द्धं=…… + अर्धम्
बहिर्नगरादालोकिता=बहिः + …… + आलोकिता
कापि=…… + अपि
प्रत्युवाच=प्रति + ……
राजलक्ष्मीरस्मि=…… + अस्मि
स्थास्यामीति=स्थास्यामि + ……
भुजच्छायायां=…… + छायायाम्
अस्त्यत्र=अस्ति + ……
कश्चिदुपायो=…… + उपायः
उत्तर

रिक्त स्थानों में भरे गए पद मोटे अक्षरों में हैं —

सन्धिपदम्=विच्छेदःसन्धेः नाम
अथैकदा (यथा)=अथ + एकदावृद्धि-सन्धिः (अ + ए = ऐ)
वृत्त्यर्थम्=वृत्ति + अर्थम्यण्-सन्धिः (इ + अ = य्)
कस्मादपि=कस्मात् + अपिजश्त्व-सन्धिः (त् + अ = द्)
कोऽपि=कः + अपिविसर्ग(पूर्वरूप)-सन्धिः
राजपुत्रोऽस्मि=राजपुत्रः + अस्मिविसर्ग(पूर्वरूप)-सन्धिः
यथेष्टम्=यथा + इष्टम्गुण-सन्धिः (आ + इ = ए)
वेतनार्पणेन=वेतन + अर्पणेनदीर्घ-सन्धिः (अ + अ = आ)
तदालोक्य=तत् + आलोक्यजश्त्व-सन्धिः (त् + आ = द्)
ततोऽसौ=ततः + असौविसर्ग(पूर्वरूप)-सन्धिः
वर्त्तनार्थिनो=वर्त्तन + अर्थिनःदीर्घ-सन्धिः (अ + अ = आ)
तदवशिष्टं=तत् + अवशिष्टम्जश्त्व-सन्धिः (त् + अ = द्)
राजदर्शनादनन्तरं=राजदर्शनात् + अनन्तरम्जश्त्व-सन्धिः
वेति=वा + इतिगुण-सन्धिः (आ + इ = ए)
राजलक्ष्मीरुवाच=राजलक्ष्मीः + उवाचविसर्ग-सन्धिः (ः + उ = र्)
चार्द्धं=च + अर्धम्दीर्घ-सन्धिः (अ + अ = आ)
बहिर्नगरादालोकिता=बहिः + नगरात् + आलोकिताविसर्ग-सन्धिः (ः + न् = र्) तथा जश्त्व-सन्धिः
कापि=का + अपिदीर्घ-सन्धिः (आ + अ = आ)
प्रत्युवाच=प्रति + उवाचयण्-सन्धिः (इ + उ = य्)
राजलक्ष्मीरस्मि=राजलक्ष्मीः + अस्मिविसर्ग-सन्धिः (ः + अ = र्)
स्थास्यामीति=स्थास्यामि + इतिदीर्घ-सन्धिः (इ + इ = ई)
भुजच्छायायां=भुज + छायायाम्तुक्-आगमः (‘छ’ से पहले ‘च्’ का आगम)
अस्त्यत्र=अस्ति + अत्रयण्-सन्धिः (इ + अ = य्)
कश्चिदुपायो=कश्चित् + उपायःजश्त्व-सन्धिः (त् + उ = द्)

अभ्यासात् जायते सिद्धिः — पृष्ठ 121प्रश्नः ५ : अधोलिखितेषु वाक्येषु रक्तवर्णीयपदानि केभ्यः प्रयुक्तानि इति उदाहरणानुगुणं लिखत

अभ्यासः
प्र.36यथा — अहं भवतः सेवायां नियोजितः। — राज्ञे
(क) ततः असौ तद्रोदनस्वरानुसरणक्रमेण प्रचलितः।
उत्तर
उत्तरम् — वीरवराय
प्र.37(ख) तत् अहम् अपि गच्छामि पृष्ठतोऽस्य।
उत्तर
उत्तरम् — राज्ञे शूद्रकाय
प्र.38(ग) चिरम् एतस्य भुजच्छायायां सुमहता सुखेन निवसामि।
उत्तर
उत्तरम् — राज्ञे शूद्रकाय
प्र.39(घ) सा चातीव दुःसाध्या।
उत्तर
उत्तरम् — प्रवृत्त्यै (उपायाय)
प्र.40(ङ) किं ते वर्तनम् ?
उत्तर
उत्तरम् — वीरवराय

अभ्यासात् जायते सिद्धिः — पृष्ठ 121प्रश्नः ६ : अधोलिखितानि वाक्यानि पठित्वा तेन सम्बद्धं श्लोकं पाठात् चित्वा लिखत

अभ्यासः
प्र.41(क) राजलक्ष्मीः वदति यत् यदि वीरवरः स्वस्य सर्वप्रियं वस्तु त्यजति तदा सा पुनः शूद्रकस्य समीपे स्थास्यति।
उत्तर
पाठात् सम्बद्धः अंशः — “श्रूयतां पुत्र ! यदि त्वया स्वस्य सर्वतः प्रियं वस्तु सहासवदनेन भगवत्यै सर्वमङ्गलायै उपहारः क्रियेत, तदा पुनर्जीविष्यति राजा शूद्रको वर्षाणां शतम्, अहञ्च सुखेन निवत्स्यामि।”
प्र.42(ख) राजा शूद्रकः प्रथमं वीरवरस्य वृत्त्यर्थं प्रार्थनां न स्वीकरोति।
उत्तर
पाठात् सम्बद्धः अंशः — “राजा — नैतच्छक्यम् !” (तत् श्रुत्वा वीरवरः राजानं प्रणम्य राजसभातः निर्गतः।)
प्र.43(ग) एकदा कोऽपि वीरवरः नाम राजपुत्रः वृत्तिं प्राप्तुं राज्ञः शूद्रकस्य समीपं गच्छति।
उत्तर
पाठात् सम्बद्धः अंशः — “अथैकदा वीरवरनामा राजपुत्रः वृत्त्यर्थं कस्मादपि देशाद् राजद्वारमुपागच्छत्। तेन सह वेदरता नाम तस्य पत्नी, शक्तिधरो नाम सुतः, वीरवती नाम कन्या च समायाताः।”
प्र.44(घ) सः तस्य कर्तव्यनिष्ठां साक्षात् पश्यति।
उत्तर
पाठात् सम्बद्धः अंशः — “राजा — (स्वगतम्) नैष गन्तुमर्हति राजपुत्र एकाकी सूचिभेद्ये तिमिरेऽस्मिन्। तस्मात् अहमपि गच्छामि पृष्ठतोऽस्य, निरूपयामि च किमेतदिति। (ततो नरपतिः खड्गपाणिः तस्य अनुसरणक्रमेण बहिः निरगच्छत् नगरीद्वारात्।)”
प्र.45(ङ) राजा मन्त्रिणां मन्त्रणया वीरवराय वृत्तिं यच्छति।
उत्तर
पाठात् सम्बद्धः अंशः — “मन्त्री — (तदालोक्य) देव ! दिनचतुष्टयस्य वेतनार्पणेन प्रथमं परीक्ष्यतां स्वरूपमस्य वेतनार्थिनो राजपुत्रस्य, किमुपपन्नमेतत् वेतनं न वेति। अथ मन्त्रिणां वचनात् ताम्बूलदानेन नियोजितोऽसौ राजपुत्रो वीरवरो नरपतिना।”

अभ्यासात् जायते सिद्धिः — पृष्ठ 122प्रश्नः ७ : अधोलिखितानां वाक्यानां पदच्छेदं कुरुत

अभ्यासः
प्र.46(क) वृत्त्यर्थमागतो राजपुत्रोऽस्मि।
उत्तर
पदच्छेदः — वृत्त्यर्थम् आगतः राजपुत्रः अस्मि।
प्र.47(ख) अथैकदा कृष्णचतुर्दश्यामर्धरात्रे स राजा श्रुतवान् करुणरोदनध्वनिं कञ्चन।
उत्तर
पदच्छेदः — अथ एकदा कृष्णचतुर्दश्याम् अर्धरात्रे सः राजा श्रुतवान् करुणरोदनध्वनिं कञ्चन।
प्र.48(ग) तदहमपि गच्छामि पृष्ठतोऽस्य निरूपयामि च किमेतदिति।
उत्तर
पदच्छेदः — तत् अहम् अपि गच्छामि पृष्ठतः अस्य, निरूपयामि च किम् एतत् इति।
प्र.49(घ) अस्त्यत्र कश्चिदुपायो येन भगवत्याः पुनरिह चिरवासो भवति।
उत्तर
पदच्छेदः — अस्ति अत्र कश्चित् उपायः येन भगवत्याः पुनः इह चिरवासः भवति।
प्र.50(ङ) एकैवात्र प्रवृत्तिः सा चातीव दुःसाध्या।
उत्तर
पदच्छेदः — एका एव अत्र प्रवृत्तिः, सा च अतीव दुःसाध्या।

योग्यताविस्तरः — पृष्ठ 122प्रश्नः १ : पाठस्य भावानुगुणम् अत्र केचन श्लोकाः प्रदत्ताः सन्ति। एतान् पठत

योग्यताविस्तरः
प्र.51कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः।
एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे॥ (यजुर्वेदः ४०.२)
उत्तर

अन्वयः — इह कर्माणि कुर्वन् एव शतं समाः जिजीविषेत्। एवं (सति) त्वयि नरे कर्म न लिप्यते; इतः अन्यथा (मार्गः) न अस्ति।

अर्थः — इस संसार में कर्म करते हुए ही सौ वर्ष जीने की इच्छा करनी चाहिए। ऐसा करने पर तुझ मनुष्य में कर्म का लेप (बन्धन) नहीं लगता। इससे भिन्न कोई दूसरा मार्ग नहीं है।

प्र.52यथा छायातपौ नित्यं सुसंबद्धौ परस्परम्।
एवं कर्म च कर्ता च संश्लिष्टावितरेतरम्॥ (पञ्चतन्त्रम्)
उत्तर

अन्वयः — यथा छायातपौ नित्यं परस्परं सुसंबद्धौ (स्तः), एवं कर्म च कर्ता च इतरेतरं संश्लिष्टौ (स्तः)।

अर्थः — जैसे छाया और धूप सदा एक-दूसरे से भली प्रकार जुड़े हुए हैं, वैसे ही कर्म और कर्ता भी परस्पर गुँथे हुए हैं।

प्र.53कार्ये कर्मणि निर्वृत्ते यो बहून्यपि साधयेत्।
पूर्वकार्याविरोधेन स कार्यं कर्तुमर्हति॥ (वाल्मीकि-रामायणम्)
उत्तर

अन्वयः — यः कार्ये कर्मणि निर्वृत्ते (सति) पूर्वकार्याविरोधेन बहूनि अपि (कार्याणि) साधयेत्, सः कार्यं कर्तुम् अर्हति।

अर्थः — जो व्यक्ति हाथ में लिया हुआ कार्य पूरा हो जाने पर, पहले किए गए कार्य में बाधा डाले बिना और भी अनेक कार्य सिद्ध कर सके — वही कार्य करने योग्य (सच्चा कार्यकर्ता) है।

योग्यताविस्तरः — पृष्ठ 123प्रश्नः २ : पठत बोधत — ‘जीमूतवाहनस्य कथा’

योग्यताविस्तरः
प्र.54‘जीमूतवाहनस्य कथा’ पठित्वा तस्याः सारं लिखत। कथायाः जीमूतवाहनस्य पाठस्य वीरवरेण सह कः साम्यः ?
उत्तर
कथासारः — पुरा विदेहनगरस्य राज्ञः शुद्धकेतोः पुत्रः जीमूतवाहनः धर्मनिष्ठः, त्यागशीलः, परोपकाररतः च आसीत्। सः राज्यं त्यक्त्वा वनं गतवान्। एकदा सागरतीरे सः एकं दुःखितं वृद्धं नागम् अपश्यत्। नागः अवदत् — “प्रतिदिनम् एकः नागः गरुडाय दातव्यः भवति, अद्य मम पुत्रस्य शङ्खचूडस्य क्रमः अस्ति।” तदा जीमूतवाहनः शङ्खचूडस्य रूपं धृत्वा स्वयं गरुडस्य समीपं गतवान्। गरुडेन भक्ष्यमाणः अपि सः किमपि कष्टं न दर्शितवान्, निश्चलः स्थितवान्। तस्य धैर्यं परोपकारभावनां च दृष्ट्वा गरुडः तं साधुवादेन मुक्तवान्, ‘नागवंशस्य हननात् विरंस्ये’ इति प्रतिज्ञां च कृतवान्।

वीरवरेण सह साम्यम् — उभौ अपि सन्निमित्ते त्यागं कुरुतः। वीरवरः राज्ञः राष्ट्रस्य च रक्षणाय स्वप्राणान् अपि अर्पयितुम् उद्यतः अभवत्; जीमूतवाहनः नागस्य रक्षणाय स्वशरीरम् एव अर्पितवान्। उभौ च प्रसन्नमनसा, कष्टं विना त्यागं कुरुतः।

प्र.55परोपकाराय फलन्ति वृक्षाः परोपकाराय वहन्ति नद्यः।
परोपकाराय दुहन्ति गावः परोपकारार्थमिदं शरीरम्॥ — अस्य श्लोकस्य अन्वयम् अर्थं भावं च लिखत।
उत्तर

अन्वयः — वृक्षाः परोपकाराय फलन्ति, नद्यः परोपकाराय वहन्ति, गावः परोपकाराय दुहन्ति, इदं शरीरम् (अपि) परोपकारार्थम् (अस्ति)।

अर्थः — वृक्ष दूसरों के उपकार के लिए फलते हैं, नदियाँ दूसरों के उपकार के लिए बहती हैं, गाएँ दूसरों के उपकार के लिए दूध देती हैं — यह शरीर भी परोपकार के ही लिए है।

भावः — प्रकृति के सब अङ्ग — वृक्ष, नदियाँ, गाएँ — अपने लिए नहीं, दूसरों के हित के लिए जीते हैं। अतः मनुष्य-शरीर का उद्देश्य भी परोपकार ही होना चाहिए।

परियोजनाकार्यम् — पृष्ठ 123प्रकल्प-कार्यम्

परियोजनाकार्यम्
प्र.56१. कर्तव्यनिष्ठाम् अधिकृत्य दश सूक्तीनां श्लोकानां वा सङ्ग्रहणं कुरुत।
उत्तर

नमूना उत्तर — दश सूक्तयः:

क्रमःसूक्तिः / श्लोकःहिन्दी अर्थस्रोतः
१कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः।कर्म करते हुए ही सौ वर्ष जीने की इच्छा करनी चाहिए।यजुर्वेदः ४०.२
२कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।तेरा अधिकार कर्म में ही है, फलों में कभी नहीं।श्रीमद्भगवद्गीता २.४७
३यथा छायातपौ नित्यं सुसंबद्धौ परस्परम्।जैसे छाया और धूप, वैसे ही कर्म और कर्ता सदा जुड़े रहते हैं।पञ्चतन्त्रम्
४पूर्वकार्याविरोधेन स कार्यं कर्तुमर्हति।पहले के कार्य में बाधा डाले बिना जो काम करे, वही कार्य करने योग्य है।वाल्मीकि-रामायणम्
५उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।काम परिश्रम से सिद्ध होते हैं, केवल इच्छा करने से नहीं।हितोपदेशः
६परोपकारार्थमिदं शरीरम्।यह शरीर परोपकार के लिए ही है।सुभाषितम् (पाठे)
७आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः।आलस्य मनुष्य के शरीर में बैठा हुआ सबसे बड़ा शत्रु है।नीतिशतकम् (भर्तृहरिः)
८क्रियासिद्धिः सत्त्वे भवति महतां नोपकरणे।महापुरुषों की सफलता उनके सत्त्व (आत्मबल) से होती है, साधनों से नहीं।सुभाषितम्
९श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।भली प्रकार किए गए दूसरे के धर्म से, गुणरहित अपना धर्म ही श्रेष्ठ है।श्रीमद्भगवद्गीता ३.३५
१०सन्निमित्ते वरं त्यागः।अच्छे निमित्त के लिए त्याग ही श्रेष्ठ है।अस्य पाठस्य शीर्षकम्
प्र.57२. अस्य पाठस्य कृते कानिचन नूतनानि शीर्षकाणि लिखत।
उत्तर

नमूना उत्तर — नूतनानि शीर्षकाणि:

संस्कृत-शीर्षकम्हिन्दी अर्थक्यों उपयुक्त
कर्तव्यनिष्ठः वीरवरःकर्तव्यनिष्ठ वीरवरपूरा पाठ वीरवर की कर्तव्यनिष्ठा के चारों ओर घूमता है।
इमौ बाहू, एष खड्गश्चये दो भुजाएँ और यह तलवारपाठ का सबसे यादगार संवाद, जो नायक का पूरा चरित्र एक पंक्ति में कह देता है।
राजलक्ष्म्याः क्रन्दनम्राजलक्ष्मी का क्रन्दनकथा का मोड़ यहीं से आता है; यह शीर्षक जिज्ञासा जगाता है।
स्वामिभक्तेः आदर्शःस्वामिभक्ति का आदर्शपाठ की प्रस्तावना स्वयं कहती है — ‘तस्य स्वामिभक्तिः राष्ट्राय समर्पणभावः च प्रेरणार्हः’।
अहर्निशं सेवतेदिन-रात सेवा करता हैपाठ का ही पद; वीरवर की अविराम सेवा को सीधे पकड़ता है।
दुःसाध्यः उपायःकठिन उपायक-भाग यहीं समाप्त होता है — शीर्षक आगे की कथा की ओर संकेत करता है।
वेतनार्थी राजपुत्रःवेतन चाहने वाला राजपुत्रकथा के आरम्भ को पकड़ता है और ‘वेतनार्थी’ पाठ का ही शब्द है।

Chapter 10 of 13 – Sanskrit

Also for This Chapter

NCERT Solutions Class 8 Sanskrit Chapter 10 सन्निमित्ते वरं त्यागः – Overview

ClassClass 8
SubjectSanskrit
Chapter10 – सन्निमित्ते वरं त्यागः
Session2027
FormatFull answers on this page + PDF

NCERT Solutions Class 8 Sanskrit Chapter 10 – FAQs

Where can I download NCERT Solutions Class 8 Sanskrit Chapter 10 सन्निमित्ते वरं त्यागः PDF?

Read every answer on this page, or download the free PDF from the table at the top.

Is this for the 2027 session?

Yes, it follows the latest NCERT Class 8 Sanskrit book for 2027.

How many questions are solved in NCERT Class 8 Sanskrit Chapter 10?

All questions of the chapter – the in-text questions, activities and the end-of-chapter exercises.

How should I use these solutions?

Read the chapter in the NCERT book first, attempt the questions yourself, then check your answers here.

Official website: ncert.nic.inNational Council of Educational Research and Training publishes date sheets, admit cards and results here
Visit

Ask a question

?

Loading comments…