NCERT Solutions for Class 8 Sanskrit Chapter 7 मञ्जुलमञ्जूषा सुन्दरसुरभाषा – step-by-step answers to every exercise and in-text question of the chapter, as per the latest NCERT syllabus for 2027. Read them online or download the free question-answer PDF.
दीपकम् (कक्षा 8) का सप्तमः पाठः — मञ्जुलमञ्जूषा सुन्दरसुरभाषा। यह पाठ एक गीतिकाव्य (चार पद्यों का स्तुति-गीत) है, जिसमें कवि संस्कृतभाषा को ‘माता’ कहकर सम्बोधित करता है और उसे मुनियों-कवियों द्वारा सँवारी हुई सुन्दर शब्द-मञ्जूषा बताता है। पाठ का आरम्भ श्रावणी पूर्णिमा — संस्कृतदिवस के चित्र-संवाद से होता है। नीचे पृष्ठ 75 से 84 तक की सारी सामग्री क्रमशः हल की गई है — चित्र-संवाद के प्रश्न, चारों श्लोकों का पदच्छेदः → अन्वयः → अर्थः → भावः, ‘वयं शब्दार्थान् जानीमः’, ‘अत्र इदम् अवधेयम्’ (समास-प्रकरण), अभ्यासात् जायते सिद्धिः के प्रश्न १–८ प्रत्येक उपभाग सहित, योग्यताविस्तरः की पाँचों संस्कृतप्रशस्तियाँ तथा परियोजनाकार्यम् — हर प्रश्न में पहले लिखने योग्य उत्तर, फिर ‘विस्तार से समझिए’ में हिन्दी अर्थ और व्याख्या।
NCERT Solutions for Class 8 Sanskrit Chapter 7 मञ्जुलमञ्जूषा सुन्दरसुरभाषा PDF
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|---|---|---|
| Solutions PDF | मञ्जुलमञ्जूषा सुन्दरसुरभाषा | View PDF |
पाठ का हिंदी अनुवाद
पाठ का शीर्षक और चित्र-संवाद (ओमिता और उसकी सखी)
पद्यम् १ — मुनियों-कवियों की सँवारी शब्द-मञ्जूषा
मञ्जुलमञ्जूषा, सुन्दरसुरभाषा।
अयि मातस्तव पोषणक्षमता
मम वचनातीता, सुन्दरसुरभाषा ॥ १ ॥
अन्वयः – (त्वं) मुनिवरविकसितकविवरविलसितमञ्जुलमञ्जूषा सुन्दरसुरभाषा (असि)। अयि मातः ! तव पोषणक्षमता मम वचनातीता अस्ति।
पद्यम् २ — मुनियों, कवियों और जन-जन के जीवन की आशा
कालिदास-बाणादिकवीनाम्।
पौराणिक-सामान्य-जनानां
जीवनस्य आशा, सुन्दरसुरभाषा ॥ २ ॥
अन्वयः – (त्वं) वेदव्यासवाल्मीकिमुनीनां कालिदास-बाणादिकवीनां पौराणिक-सामान्यजनानां जीवनस्य आशा (असि)। त्वं सुन्दरसुरभाषा (असि)।
पद्यम् ३ — सुख, आनन्द और बुद्धि देने वाली माता
स्मृतिहितवरदे सरसविनोदे।
गति-मति-प्रेरक-काव्यविशारदे
तव संस्कृतिरेषा, सुन्दरसुरभाषा ॥ ३ ॥
अन्वयः – हे ! श्रुतिसुखनिनदे ! सकलप्रमोदे ! स्मृतिहितवरदे ! सरसविनोदे ! गति-मति-प्रेरक-काव्यविशारदे ! तव एषा संस्कृतिः (अस्ति)। (त्वं) सुन्दरसुरभाषा (असि)।
पद्यम् ४ — धरती पर विजयी देवभाषा
वेदविषय-वेदान्त-विचारा।
वैद्य-व्योम-शास्त्रादि-विहारा
विजयते धरायां, सुन्दरसुरभाषा ॥ ४ ॥
अन्वयः – नवरस-रुचिरा अलङ्कृतिधारा वेदविषयवेदान्तविचारा वैद्यव्योमशास्त्रादिविहारा धरायां सुन्दरसुरभाषा विजयते।
अत्र इदम् अवधेयम् (यहाँ यह ध्यान देने योग्य है) — समासः
योग्यताविस्तरः — संस्कृतप्रशस्तयः (संस्कृत की प्रशंसा के श्लोक)
भारतं मातृभूमिर्नो मातृभाषा हि संस्कृतम् ॥
विहाय संस्कृतं नास्ति संस्कृतिः संस्कृताश्रिता ॥
संस्कृतेन विचारेण राष्ट्रं भातु सुसंस्कृतम् ॥
वेदतत्त्वार्थसञ्जुष्टं लोकालोककरं शिवम् ॥
यावद् गङ्गा च गोदा च तावदेव हि संस्कृतम् ॥
NCERT Solutions for Class 8 Sanskrit Chapter 7 मञ्जुलमञ्जूषा सुन्दरसुरभाषा – Questions and Answers
All questions of the chapter are answered below, in the order of the book – in-text questions, activities and the end-of-chapter exercises. Each answer is written the way you would write it in the exam.
चित्र-संवादः (पाठे विद्यमानाः प्रश्नाः) — पृष्ठ 75पाठारम्भे ओमितायाः तस्याः सख्याः च संवादः — प्र.1 तथा प्र.3 संवाद के अपने प्रश्न हैं; प्र.2, 4–6 संवाद पर आधारित अभ्यासार्थ जोड़े गए प्रश्न हैं
संवादे सखी उत्तरं ददाति — “अहं जानामि अद्य संस्कृतदिवसः अस्ति। वयम् एतम् आसप्ताहम् आचरामः।”
संवादस्य पङ्क्तिः — “वयम् एतम् आसप्ताहम् आचरामः।”
संवादे सा वदति — “आम् ओमिते ! अहं तु गीतगायनप्रतियोगितायां भागं ग्रहीष्यामि।”
संवादः — ओमिता — “भगिनि ! अहमपि आगन्तुम् इच्छामि।” सखी — “अवश्यम्। अहं भवत्याः कृते अधुना एव निमन्त्रणपत्रं यच्छामि।”
श्लोक-व्याख्या (पदच्छेदः · अन्वयः · अर्थः · भावः) — पृष्ठ 76–77गीतस्य प्रथमः द्वितीयश्च पद्यः (पुस्तक के पदच्छेद-अन्वय-भावार्थ के आधार पर)
मञ्जुलमञ्जूषा, सुन्दरसुरभाषा।
अयि मातस्तव पोषणक्षमता
मम वचनातीता, सुन्दरसुरभाषा॥ १॥ — पदच्छेदं, अन्वयम्, अर्थं भावं च लिखत।
अन्वयः — (त्वं) मुनिवरविकसितकविवरविलसितमञ्जुलमञ्जूषा सुन्दरसुरभाषा (असि)। अयि मातः ! तव पोषणक्षमता मम वचनातीता अस्ति।
अर्थः (हिन्दी) — हे सुन्दर देवभाषा (संस्कृत) ! तुम श्रेष्ठ मुनियों द्वारा विकसित और श्रेष्ठ कवियों द्वारा सुशोभित की गई मनोहर शब्द-मञ्जूषा हो। हे माता ! तुम्हारी पोषण करने की क्षमता मेरी वाणी से परे है — मैं उसका वर्णन नहीं कर सकता।
भावः — संस्कृत मुनियों द्वारा विकसित और कवियों द्वारा सजाई गई ज्ञान की सुन्दर पेटी है। वह अपनी शब्दावली से दूसरी भाषाओं का भी पोषण करती है, इसलिए उसका गौरव वर्णन से परे है।
कालिदास-बाणादिकवीनाम्।
पौराणिक-सामान्य-जनानां
जीवनस्य आशा, सुन्दरसुरभाषा॥ २॥ — पदच्छेदं, अन्वयम्, अर्थं भावं च लिखत।
अन्वयः — (त्वं) वेदव्यासवाल्मीकिमुनीनां कालिदास-बाणादिकवीनां पौराणिक-सामान्यजनानां जीवनस्य आशा (असि)। त्वं सुन्दरसुरभाषा (असि)।
अर्थः (हिन्दी) — हे सुन्दर देवभाषा ! तुम वेदव्यास और वाल्मीकि जैसे मुनियों की, कालिदास और बाणभट्ट आदि कवियों की, तथा प्राचीन (पौराणिक) काल से आज तक के सामान्य जनों की — सबके जीवन की आशा हो।
भावः — वाल्मीकि-व्यास जैसे मुनियों और कालिदास-बाण जैसे कवियों ने संस्कृत में महान् ग्रन्थ रचे; प्राचीन काल से आज तक सामान्य जनों का जीवन भी इन्हीं काव्यों से प्रभावित है। इसलिए संस्कृत सबके जीवन की आशा है।
श्लोक-व्याख्या (पदच्छेदः · अन्वयः · अर्थः · भावः) — पृष्ठ 78–79गीतस्य तृतीयः चतुर्थश्च पद्यः (पुस्तक के पदच्छेद-अन्वय-भावार्थ के आधार पर)
स्मृतिहितवरदे सरसविनोदे।
गति-मति-प्रेरक-काव्यविशारदे
तव संस्कृतिरेषा, सुन्दरसुरभाषा॥ ३॥ — पदच्छेदं, अन्वयम्, अर्थं भावं च लिखत।
अन्वयः — हे ! श्रुतिसुखनिनदे ! सकलप्रमोदे ! स्मृतिहितवरदे ! सरसविनोदे ! गति-मति-प्रेरक-काव्यविशारदे ! तव एषा संस्कृतिः (अस्ति)। (त्वं) सुन्दरसुरभाषा (असि)।
अर्थः (हिन्दी) — हे कानों को सुख देने वाली ध्वनि वाली ! हे सबको आनन्द देने वाली ! हे स्मृति को हितकारी वरदान देने वाली ! हे मधुर विनोद करने वाली ! हे गति और बुद्धि को प्रेरणा देने वाले काव्य में पारंगत ! — यह संस्कृति तुम्हारी ही है, हे सुन्दर देवभाषा !
भावः — संस्कृत की ध्वनि कानों को सुख देती है और सबको आनन्दित करती है; वह संस्कारयुक्त ज्ञान तथा उत्तम गति और बुद्धि देती है। वही हमारी संस्कृति की रक्षा और प्रसार करती है।
वेदविषय-वेदान्त-विचारा।
वैद्य-व्योम-शास्त्रादि-विहारा
विजयते धरायां, सुन्दरसुरभाषा॥ ४॥ — पदच्छेदं, अन्वयम्, अर्थं भावं च लिखत।
अन्वयः — नवरस-रुचिरा अलङ्कृतिधारा वेदविषयवेदान्तविचारा वैद्यव्योमशास्त्रादिविहारा धरायां सुन्दरसुरभाषा विजयते।
अर्थः (हिन्दी) — नौ रसों से मनोहर, अलङ्कारों को धारण करने वाली, वेद तथा वेदान्त के विचारों से युक्त और आयुर्वेद, खगोलशास्त्र आदि शास्त्रों में विचरण करने वाली सुन्दर देवभाषा इस धरती पर विजयी होती है।
भावः — संस्कृत में नौ रस, अनेक अलङ्कार, वेद-वेदान्त के विचार तथा चिकित्सा और खगोल जैसे शास्त्र हैं। इसी व्यापकता के कारण वह सारी धरती पर विजयी है।
वयं शब्दार्थान् जानीमः — पृष्ठ 79–80शब्दार्थ-सारणी तथा ‘मातृभाषया अर्थं लिखत’ स्तम्भः
| शब्दः | अर्थः (संस्कृतम्) | हिन्दी | English | मातृभाषया अर्थः (नमूना — हिन्दी) |
|---|---|---|---|---|
| विकसिता | विस्तारिता | विकसित की गई | Progressively developed | बढ़ाई गई / फैलाई गई |
| विलसिता | रञ्जिता | आनन्द देने वाली | That which gives joy | सजाई गई, रस देने वाली |
| मञ्जुला | मनोहरा | मन को हरने वाली | Lovely / Charming | सुन्दर, प्यारी |
| मञ्जूषा | पेटिका | पेटी | Box / Encasement | सन्दूक, डिब्बा |
| पोषणक्षमता | पालनशक्तिः | पोषण की क्षमता | Nurturing capacity | पालने-पोसने की शक्ति |
| मे | मम | मेरे | Mine | मेरा |
| अतीता | अतिक्रान्ता | पार हो | Beyond | जिसे लाँघ चुके |
| वृन्दानाम् | समूहानाम् | समूहों की | Of groups | टोलियों का |
| नवम् | नूतनम् | नई | New | नया |
| वचनातीता | वर्णनातीता | वाणी से परे | Beyond words | जो कहा न जा सके |
| भूयिष्ठानाम् | अधिकतराणाम् | अधिकांश | Mostly | अधिकतर लोगों का |
| शब्दः | अर्थः (संस्कृतम्) | हिन्दी | English | मातृभाषया अर्थः (नमूना — हिन्दी) |
|---|---|---|---|---|
| श्रुतिसुखनिनदे ! | श्रवणसुखध्वनिदात्रि ! | कर्णप्रिय ध्वनि देने वाली ! | Sound of which is pleasant to listen | हे कानों को प्यारी लगने वाली ! |
| सकलप्रमोदे ! | सर्वेभ्यः आनन्दमयि ! | सभी को आनन्द देने वाली | That which gives pleasure to all | हे सबको प्रसन्न करने वाली ! |
| सरसविनोदे | सरसविनोदशीले | मधुर विनोद करने वाली | That which creates pleasant humour | रसभरा मनोरंजन करने वाली |
| काव्यविशारदे ! | काव्यपारङ्गते | काव्य करने में पारंगत | Oh! Proficient in Literature | हे काव्य में निपुण ! |
| रुचिरा | रुचिकरा | आनन्द प्रदान करने वाली | That which gives happiness | सुन्दर, मन को भाने वाली |
| अलङ्कृतिधारा | अलङ्काराणाम् आधात्री | अलंकारों को धारण करने वाली | Well ornamented | अलंकारों से सजी हुई |
| व्योमशास्त्रम् | अन्तरिक्षशास्त्रम् | अन्तरिक्ष विज्ञान | Astronomy | आकाश (ग्रह-नक्षत्रों) का शास्त्र |
| धरायाम् | पृथिव्याम् | धरती पर | On earth | पृथ्वी पर |
अत्र इदम् अवधेयम् — पृष्ठ 80व्याकरणम् — समासः (पुस्तक की पेटी पर आधारित अभ्यासार्थ जोड़े गए प्रश्न)
पुस्तक के उदाहरण —
| विग्रहः (खुला रूप) | समस्तपदम् (जुड़ा रूप) |
|---|---|
| नद्याः तीरम् | नदीतीरम् |
| राज्ञः पुत्रः | राजपुत्रः |
| सुराणां भाषा | सुरभाषा |
| पोषणस्य क्षमता | पोषणक्षमता |
| वचनम् अतीता | वचनातीता |
| नवसंख्याकाः रसाः | नवरसाः |
| नवरसैः रुचिरा | नवरसरुचिरा |
| समासः | नियमः (पुस्तकानुसारम्) | उदाहरणम् |
|---|---|---|
| अव्ययीभावः | प्रायः पूर्वपद अव्यय होता है | रूपस्य योग्यम् = अनुरूपम् |
| तत्पुरुषः | परपद (उत्तरपद) प्रधान होता है | सुराणां भाषा = सुरभाषा |
| कर्मधारयः | विशेषण-विशेष्य का समास (तत्पुरुष का ही भेद) | सुन्दरी सुरभाषा = सुन्दरसुरभाषा * |
| द्विगुः | पूर्वपद संख्यावाचक होता है | पञ्चानां वटानां समाहारः = पञ्चवटी |
| द्वन्द्वः | दोनों पद समान रूप से प्रधान | रामः च कृष्णः च = रामकृष्णौ * |
| बहुव्रीहिः | अन्य पद (बाहर का पद) प्रधान होता है | पीतम् अम्बरं यस्य सः = पीताम्बरः (श्रीविष्णुः) |
* पुस्तक की पेटी में कर्मधारय और द्वन्द्व के उदाहरण नहीं दिए गए; ये दो उदाहरण हमने जोड़े हैं।
| समस्तपदम् | विग्रहः | समासः |
|---|---|---|
| मञ्जुलमञ्जूषा | मञ्जुला मञ्जूषा | कर्मधारयः |
| सुन्दरसुरभाषा | सुन्दरी सुरभाषा | कर्मधारयः |
| सुरभाषा | सुराणां भाषा | षष्ठी तत्पुरुषः |
| पोषणक्षमता | पोषणस्य क्षमता | षष्ठी तत्पुरुषः |
| वचनातीता | वचनम् अतीता | द्वितीया तत्पुरुषः |
| नवरसाः | नवसंख्याकाः रसाः | द्विगुः |
| नवरसरुचिरा | नवरसैः रुचिरा | तृतीया तत्पुरुषः |
| अलङ्कृतिधारा | अलङ्कृतीनां धारा (अलङ्काराणाम् आधात्री) | षष्ठी तत्पुरुषः |
| व्योमशास्त्रम् | व्योम्नः शास्त्रम् | षष्ठी तत्पुरुषः |
अभ्यासात् जायते सिद्धिः — प्रश्नः १ — पृष्ठ 81अधः प्रदत्तानां प्रश्नानां एकपदेन उत्तरं लिखत
श्लोक १ की पङ्क्ति — “अयि मातस्तव पोषणक्षमता मम वचनातीता”। अर्थात् संस्कृतभाषा की पोषण-क्षमता कवि की वाणी से परे है।
श्लोक ४ की अन्तिम पङ्क्ति — “विजयते धरायां, सुन्दरसुरभाषा”।
श्लोक २ की अन्तिम पङ्क्ति — “जीवनस्य आशा, सुन्दरसुरभाषा”।
श्लोक ४ के भावार्थ में पुस्तक स्वयं गिनाती है — शृङ्गार-हास्य-करुण-रौद्र-वीर-भयानक-बीभत्स-अद्भुत-शान्त-प्रभृतयः नवसंख्याकाः रुचिराः रसाः सन्ति।
श्लोक ३ का भावार्थ — “संस्कृतभाषायाः ध्वनिश्रवणेन सुखं वर्धते, सर्वे जनाः आनन्दिताः भवन्ति।”
अभ्यासात् जायते सिद्धिः — प्रश्नः २ — पृष्ठ 81अधः प्रदत्तानां प्रश्नानां पूर्णवाक्येन उत्तरं लिखत
अभ्यासात् जायते सिद्धिः — प्रश्नः ३ — पृष्ठ 81–82रेखाङ्कितपदानि आश्रित्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत
(संस्कृतभाषायाः (षष्ठी, एकवचन, स्त्रीलिङ्ग) → कस्याः)
(काव्यैः (तृतीया, बहुवचन, नपुंसकलिङ्ग) → कैः)
(उपादेयानि (विशेषण, द्वितीया बहुवचन, नपुंसकलिङ्ग) → कीदृशानि)
(पृथिव्याम् (स्थान — सप्तमी) → कुत्र)
(विविधभाषाः (द्वितीया, बहुवचन, स्त्रीलिङ्ग) → काः)
(शास्त्राणि (प्रथमा, बहुवचन, नपुंसकलिङ्ग) → कानि)
अभ्यासात् जायते सिद्धिः — प्रश्नः ४ — पृष्ठ 82अधः प्रदत्तानां पदानाम् उदाहरणानुसारं विभक्तिं वचनं च लिखत
| पदम् | विभक्तिः | वचनम् |
|---|---|---|
| यथा — मातः | सम्बोधनम् | एकवचनम् |
| तव | …………… | …………… |
| मञ्जूषा | …………… | …………… |
| संस्कृतिः | …………… | …………… |
| जनानाम् | …………… | …………… |
| जीवनस्य | …………… | …………… |
| धरायाम् | …………… | …………… |
| शास्त्रेषु | …………… | …………… |
| पदम् | विभक्तिः | वचनम् | लिङ्गम् / मूलशब्दः |
|---|---|---|---|
| यथा — मातः | सम्बोधनम् | एकवचनम् | स्त्रीलिङ्गम् — मातृ |
| तव | षष्ठी | एकवचनम् | सर्वनाम — युष्मद् |
| मञ्जूषा | प्रथमा | एकवचनम् | स्त्रीलिङ्गम् — मञ्जूषा |
| संस्कृतिः | प्रथमा | एकवचनम् | स्त्रीलिङ्गम् — संस्कृति |
| जनानाम् | षष्ठी | बहुवचनम् | पुंलिङ्गम् — जन |
| जीवनस्य | षष्ठी | एकवचनम् | नपुंसकलिङ्गम् — जीवन |
| धरायाम् | सप्तमी | एकवचनम् | स्त्रीलिङ्गम् — धरा |
| शास्त्रेषु | सप्तमी | बहुवचनम् | नपुंसकलिङ्गम् — शास्त्र |
अभ्यासात् जायते सिद्धिः — प्रश्नः ५ — पृष्ठ 82अधोलिखितानां पद्यांशानां यथायोग्यं मेलनं कुरुत
कवर्गः — (क) अयि मातस्तव पोषणक्षमता · (ख) वेदव्यास-वाल्मीकि-मुनीनां · (ग) पौराणिक-सामान्यजनानाम् · (घ) श्रुतिसुखनिनदे सकलप्रमोदे · (ङ) वैद्यव्योम-शास्त्रादिविहारा
खवर्गः — स्मृतिहितवरदे सरसविनोदे · विजयते धरायाम् · मम वचनातीता, सुन्दरसुरभाषा · कालिदासबाणादिकवीनाम् · जीवनस्य आशा, सुन्दरसुरभाषा
| कवर्गः | खवर्गः (सही मेल) | श्लोकः |
|---|---|---|
| (क) अयि मातस्तव पोषणक्षमता | मम वचनातीता, सुन्दरसुरभाषा | १ (दिया गया उदाहरण) |
| (ख) वेदव्यास-वाल्मीकि-मुनीनां | कालिदासबाणादिकवीनाम् | २ |
| (ग) पौराणिक-सामान्यजनानाम् | जीवनस्य आशा, सुन्दरसुरभाषा | २ |
| (घ) श्रुतिसुखनिनदे सकलप्रमोदे | स्मृतिहितवरदे सरसविनोदे | ३ |
| (ङ) वैद्यव्योम-शास्त्रादिविहारा | विजयते धरायाम् | ४ |
अभ्यासात् जायते सिद्धिः — प्रश्नः ६ — पृष्ठ 82–83उदाहरणानुसारम् अधः प्रदत्तानां पदानाम् एकपदेन अर्थं लिखत
(समासः — षष्ठी तत्पुरुषः)
(समासः — कर्मधारयः (विशेषण + विशेष्य))
(समासः — तृतीया तत्पुरुषः)
(समासः — षष्ठी तत्पुरुषः)
(समासः — कर्मधारयः (विशेषण + विशेष्य))
अभ्यासात् जायते सिद्धिः — प्रश्नः ७ — पृष्ठ 83पेटिकातः पदानि चित्वा रिक्तस्थानानि पूरयत
यथा — मुनिवर-विकसित-कविवर-विलसित- मञ्जुलमञ्जूषा सुन्दरसुरभाषा।
— सम्पूर्ण उत्तर-तालिका दीजिए।
| क्रमः | पूर्ण पङ्क्तिः (रिक्तस्थानं पूरितम्) | पेटिकातः पदम् |
|---|---|---|
| यथा | मुनिवर-विकसित-कविवर-विलसित- मञ्जुलमञ्जूषा सुन्दरसुरभाषा। | मञ्जुलमञ्जूषा |
| (क) | अयि मातः तव पोषणक्षमता मम वचनातीता। | मम |
| (ख) | वेदव्यास-वाल्मीकि-मुनीनां कालिदासबाणादि कवीनाम्। | कालिदासबाणादि |
| (ग) | पौराणिक-सामान्य-जनानां जीवनस्य आशा। | आशा |
| (घ) | श्रुतिसुखनिनदे सकलप्रमोदे स्मृतिहितवरदे सरसविनोदे। | सकलप्रमोदे |
| (ङ) | गति-मति-प्रेरक-काव्य-विशारदे, तव संस्कृतिः एषा सुन्दरसुरभाषा। | संस्कृतिः |
| (च) | नवरस-रुचिरालङ्कृतिधारा वेदविषय-वेदान्तविचारा। | वेदविषय |
| (छ) | वैद्य-व्योम-शास्त्रादि-विहारा विजयते धरायाम्, सुन्दरसुरभाषा। | विजयते |
अभ्यासात् जायते सिद्धिः — प्रश्नः ८ — पृष्ठ 83–84अधोलिखितविकल्पेषु प्रसङ्गानुसारम् अर्थं चिनुत
योग्यताविस्तरः — संस्कृतप्रशस्तयः — पृष्ठ 84संस्कृतभाषायाः महिमानं वर्णयन्तः पञ्च श्लोकाः — पुस्तक में केवल श्लोक हैं; अर्थ-भाव अभ्यासार्थ जोड़े गए हैं
भारतं मातृभूमिर्नो मातृभाषा हि संस्कृतम्॥ — अर्थं भावं च लिखत।
अन्वयः — मातृभूमिः सदा सेव्या, तथा एव च मातृभाषा (सेव्या)। नः मातृभूमिः भारतम् (अस्ति), मातृभाषा हि संस्कृतम् (अस्ति)।
अर्थः (हिन्दी) — मातृभूमि की सदा सेवा करनी चाहिए, और उसी प्रकार मातृभाषा की भी। हमारी मातृभूमि भारत है और मातृभाषा संस्कृत है।
भावः — जैसे मातृभूमि की सेवा कर्तव्य है, वैसे ही मातृभाषा की भी; हमारे लिए वह भूमि भारत है और वह भाषा संस्कृत।
विहाय संस्कृतं नास्ति संस्कृतिः संस्कृताश्रिता॥ — अर्थं भावं च लिखत।
अन्वयः — भारतस्य द्वे प्रतिष्ठे — संस्कृतं तथा संस्कृतिः। संस्कृतं विहाय संस्कृतिः न अस्ति, (यतः सा) संस्कृताश्रिता (अस्ति)।
अर्थः (हिन्दी) — भारत की दो प्रतिष्ठाएँ हैं — संस्कृत और संस्कृति। संस्कृत को छोड़कर संस्कृति नहीं रहती, क्योंकि संस्कृति संस्कृत के ही आश्रय पर टिकी है।
भावः — भारत की पहचान संस्कृत और संस्कृति से है। संस्कृति संस्कृत पर ही टिकी है, इसलिए संस्कृत के बिना संस्कृति नहीं बच सकती।
संस्कृतेन विचारेण राष्ट्रं भातु सुसंस्कृतम्॥ — अर्थं भावं च लिखत।
अन्वयः — पुरुषाः संस्कृताः सन्तु, महिलाः (अपि) संस्कृताः सन्तु। संस्कृतेन विचारेण राष्ट्रं सुसंस्कृतं भातु।
अर्थः (हिन्दी) — पुरुष संस्कारवान् हों, महिलाएँ भी संस्कारवान् हों। संस्कारयुक्त विचार से राष्ट्र सुसंस्कृत होकर शोभित हो।
भावः — राष्ट्र तभी सुसंस्कृत बनता है जब उसके पुरुष और महिलाएँ — दोनों — संस्कारवान् हों और अच्छे विचार अपनाएँ।
वेदतत्त्वार्थसञ्जुष्टं लोकालोककरं शिवम्॥ — अर्थं भावं च लिखत।
अन्वयः — संस्कृतं संस्कृतेः मूलम् (अस्ति), ज्ञानविज्ञानवारिधिः (अस्ति)। (तत्) वेदतत्त्वार्थसञ्जुष्टं लोकालोककरं शिवम् (अस्ति)।
अर्थः (हिन्दी) — संस्कृत संस्कृति की जड़ है और ज्ञान-विज्ञान का समुद्र है। वह वेदों के तत्त्वार्थ से भरी हुई, संसार को प्रकाश देने वाली और कल्याणकारी है।
भावः — संस्कृत हमारी संस्कृति की जड़ और ज्ञान-विज्ञान का भण्डार है; वेदों का सार उसी में है और वह संसार को प्रकाश देकर उसका कल्याण करती है।
यावद् गङ्गा च गोदा च तावदेव हि संस्कृतम्॥ — अर्थं भावं च लिखत।
अन्वयः — यावत् भारतवर्षं स्यात्, यावत् विन्ध्यहिमाचलौ (स्याताम्), यावत् गङ्गा च गोदा च (स्याताम्), तावत् एव हि संस्कृतम् (स्यात्)।
अर्थः (हिन्दी) — जब तक भारतवर्ष रहेगा, जब तक विन्ध्याचल और हिमालय रहेंगे, जब तक गङ्गा और गोदावरी बहती रहेंगी — तब तक संस्कृत भी रहेगी।
भावः — संस्कृत भारत की धरती, पर्वतों और नदियों जितनी ही स्थायी है — जब तक भारत है, तब तक संस्कृत रहेगी।
परियोजनाकार्यम् — पृष्ठ 84त्रीणि क्रियाकलाप-कार्याणि
यह क्या माँगता है: ‘संस्कृत से जीवन कैसे समृद्ध होता है’ — इस विषय पर ‘सुन्दरसुरभाषा धरायां विजयते’ नाम की एक छोटी संस्कृत नाटिका तैयार करके सहपाठियों को जागरूक करना।
सूत्रधारः — स्वागतम्। अद्य वयं संस्कृतदिवसम् आचरामः।
छात्रः — आचार्य ! संस्कृतेन अस्माकं जीवनं कथं समृद्धं भवति ?
आचार्यः — शृणु वत्स ! संस्कृते वेदाः सन्ति, आयुर्वेदः अस्ति, ज्योतिःशास्त्रम् अस्ति। एषा भाषा ज्ञानविज्ञानवारिधिः अस्ति।
वैद्यः — आम् ! चरकसंहिता सुश्रुतसंहिता च संस्कृते एव लिखिते।
छात्रा — अहो ! तर्हि संस्कृतं केवलं प्राचीना भाषा नास्ति, अपि तु विज्ञानस्य अपि भाषा अस्ति।
सर्वे (गायन्ति) — विजयते धरायां, सुन्दरसुरभाषा !
यह क्या माँगता है: सरल संस्कृत गीतों का अपना संग्रह बनाइए और कक्षा में गाइए। पुस्तक ने तीन गीतों के नाम स्वयं सुझाए हैं।
| क्रमः | गीतम् | विषयः | भावः (हिन्दी) |
|---|---|---|---|
| १ | सुरससुबोधा विश्वमनोज्ञा | भाषा-महिमा | संस्कृत रसपूर्ण, सरलता से समझ में आने वाली और सारे संसार को प्रिय है |
| २ | मनसा सततं स्मरणीयम् | लोकहित / कर्तव्य | मन से सदा याद रखें, वाणी से कहें — लोकहित ही मेरा कर्तव्य है |
| ३ | मृदपि च चन्दनमस्मिन् देशे | देशभक्ति | इस देश की तो मिट्टी भी चन्दन के समान पवित्र है |
| ४ | मञ्जुलमञ्जूषा सुन्दरसुरभाषा | भाषा-महिमा | अस्माकं पाठस्य गीतम् — संस्कृत मुनि-कवियों की सजाई शब्द-मञ्जूषा है |
यह क्या माँगता है: संस्कृत साहित्य के प्रसिद्ध कवियों और उनकी रचनाओं का एक सूची-संग्रह बनाना। पाठ के श्लोक २ में जिन नामों का उल्लेख है (वेदव्यास, वाल्मीकि, कालिदास, बाणभट्ट), उन्हीं से आरम्भ कीजिए।
| कविः | काव्यम् / ग्रन्थः | प्रकारः |
|---|---|---|
| वाल्मीकिः | रामायणम् | आदिकाव्यम् |
| वेदव्यासः | महाभारतम्, पुराणानि | इतिहासः / पुराणम् |
| कालिदासः | अभिज्ञानशाकुन्तलम्, मेघदूतम्, रघुवंशम्, कुमारसम्भवम् | नाटकम् / खण्डकाव्यम् / महाकाव्यम् |
| बाणभट्टः | कादम्बरी, हर्षचरितम् | गद्यकाव्यम् |
| भासः | स्वप्नवासवदत्तम् | नाटकम् |
| भारविः | किरातार्जुनीयम् | महाकाव्यम् |
| माघः | शिशुपालवधम् | महाकाव्यम् |
| भर्तृहरिः | नीतिशतकम्, शृङ्गारशतकम्, वैराग्यशतकम् | शतककाव्यम् |
| विष्णुशर्मा | पञ्चतन्त्रम् | कथाग्रन्थः / नीतिग्रन्थः |
| जयदेवः | गीतगोविन्दम् | गीतिकाव्यम् |
Chapter 7 of 13 – Sanskrit
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NCERT Solutions Class 8 Sanskrit Chapter 7 मञ्जुलमञ्जूषा सुन्दरसुरभाषा – Overview
| Class | Class 8 |
| Subject | Sanskrit |
| Chapter | 7 – मञ्जुलमञ्जूषा सुन्दरसुरभाषा |
| Session | 2027 |
| Format | Full answers on this page + PDF |
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