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NCERT Solutions for Class 8 Sanskrit Chapter 7 मञ्जुलमञ्जूषा सुन्दरसुरभाषा (PDF) – 2027

NCERT Solutions for Class 8 Sanskrit Chapter 7 मञ्जुलमञ्जूषा सुन्दरसुरभाषा – step-by-step answers to every exercise and in-text question of the chapter, as per the latest NCERT syllabus for 2027. Read them online or download the free question-answer PDF.

दीपकम् (कक्षा 8) का सप्तमः पाठः — मञ्जुलमञ्जूषा सुन्दरसुरभाषा। यह पाठ एक गीतिकाव्य (चार पद्यों का स्तुति-गीत) है, जिसमें कवि संस्कृतभाषा को ‘माता’ कहकर सम्बोधित करता है और उसे मुनियों-कवियों द्वारा सँवारी हुई सुन्दर शब्द-मञ्जूषा बताता है। पाठ का आरम्भ श्रावणी पूर्णिमा — संस्कृतदिवस के चित्र-संवाद से होता है। नीचे पृष्ठ 75 से 84 तक की सारी सामग्री क्रमशः हल की गई है — चित्र-संवाद के प्रश्न, चारों श्लोकों का पदच्छेदः → अन्वयः → अर्थः → भावः, ‘वयं शब्दार्थान् जानीमः’, ‘अत्र इदम् अवधेयम्’ (समास-प्रकरण), अभ्यासात् जायते सिद्धिः के प्रश्न १–८ प्रत्येक उपभाग सहित, योग्यताविस्तरः की पाँचों संस्कृतप्रशस्तियाँ तथा परियोजनाकार्यम् — हर प्रश्न में पहले लिखने योग्य उत्तर, फिर ‘विस्तार से समझिए’ में हिन्दी अर्थ और व्याख्या।

NCERT Solutions for Class 8 Sanskrit Chapter 7 मञ्जुलमञ्जूषा सुन्दरसुरभाषा PDF

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पाठ का हिंदी अनुवाद

पाठ का शीर्षक और चित्र-संवाद (ओमिता और उसकी सखी)
मञ्जुलमञ्जूषा सुन्दरसुरभाषा
शीर्षक – मनोहर (शब्दों की) पेटी, सुन्दर देवभाषा (संस्कृत)।
भगिनि ! अद्य श्रावणी पूर्णिमा अस्ति। वदतु एतस्याः किं वैशिष्ट्यम् ?
ओमिता – बहन! आज श्रावण (मास) की पूर्णिमा है। बताइए, इसकी क्या विशेषता है?
अहं जानामि अद्य संस्कृतदिवसः अस्ति। वयम् एतम् आसप्ताहम् आचरामः।
सखी – मैं जानती हूँ, आज संस्कृत-दिवस है। हम इसे पूरे सप्ताह भर मनाते हैं।
सत्यम्। किं भवत्याः विद्यालये संस्कृतदिवसम् अधिकृत्य केषाञ्चन विशिष्टकार्यक्रमाणां योजना कृता ?
ओमिता – सच है। क्या आपके विद्यालय में संस्कृत-दिवस को लेकर कुछ विशेष कार्यक्रमों की योजना बनाई गई है?
आम् ओमिते ! मम विद्यालये अनेकेषां कार्यक्रमाणां योजना रचिता।
सखी – हाँ ओमिता! मेरे विद्यालय में अनेक कार्यक्रमों की योजना बनाई गई है।
अहो एवम् ! किं तत्र भवती भागं ग्रहीष्यति ?
ओमिता – अरे, ऐसा है! क्या आप वहाँ (किसी कार्यक्रम में) भाग लेंगी?
आम् ओमिते ! अहं तु गीतगायनप्रतियोगितायां भागं ग्रहीष्यामि।
सखी – हाँ ओमिता! मैं तो गीत-गायन प्रतियोगिता में भाग लूँगी।
भगिनि ! अहमपि आगन्तुम् इच्छामि।
ओमिता – बहन! मैं भी (वहाँ) आना चाहती हूँ।
अवश्यम्। अहं भवत्याः कृते अधुना एव निमन्त्रणपत्रं यच्छामि।
सखी – अवश्य। मैं आपके लिए अभी ही निमन्त्रण-पत्र देती हूँ।
भगिनि ! तत्र भवती किं गीतं गास्यति? कृपया मामपि श्रावयतु।
ओमिता – बहन! वहाँ आप कौन-सा गीत गाएँगी? कृपया मुझे भी सुनाइए।
अस्तु अहं गायामि, भवती अनुगायतु।
सखी – ठीक है, मैं गाती हूँ, आप (मेरे) पीछे-पीछे गाइए।
पद्यम् १ — मुनियों-कवियों की सँवारी शब्द-मञ्जूषा
मुनिवरविकसितकविवरविलसित-
मञ्जुलमञ्जूषा, सुन्दरसुरभाषा।
अयि मातस्तव पोषणक्षमता
मम वचनातीता, सुन्दरसुरभाषा ॥ १ ॥
(हे संस्कृत!) तुम श्रेष्ठ मुनियों द्वारा विकसित की गई और श्रेष्ठ कवियों द्वारा सुशोभित (आनन्द देने वाली बनाई गई) मनोहर (शब्दों की) पेटी हो, सुन्दर देवभाषा हो। हे माता! तुम्हारी पोषण करने की क्षमता मेरे वचनों से परे है (मैं उसका वर्णन शब्दों में नहीं कर सकता)। (तुम) सुन्दर देवभाषा (हो)।
पदच्छेदः – मुनिवर-विकसित-कविवर-विलसित-मञ्जुल-मञ्जूषा सुन्दरसुरभाषा। अयि मातः ! तव पोषणक्षमता मम वचनातीता सुन्दरसुरभाषा।
अन्वयः – (त्वं) मुनिवरविकसितकविवरविलसितमञ्जुलमञ्जूषा सुन्दरसुरभाषा (असि)। अयि मातः ! तव पोषणक्षमता मम वचनातीता अस्ति।
अन्वय का अर्थ – (तुम) श्रेष्ठ मुनियों द्वारा विकसित, श्रेष्ठ कवियों द्वारा सुशोभित मनोहर पेटी (और) सुन्दर देवभाषा (हो)। हे माता! तुम्हारी पोषण-क्षमता मेरे वचनों से परे है।
भावार्थः – संस्कृतभाषा अतीव सुन्दरभाषा देवभाषारूपेण च परिचिता अस्ति। मुनयः अस्याः संस्कृतभाषायाः विकासं कृतवन्तः।
भावार्थ – संस्कृत भाषा अत्यन्त सुन्दर भाषा है और देवभाषा के रूप में जानी जाती है। मुनियों ने इस संस्कृत भाषा का विकास किया।
एषा भाषा भूयिष्ठानां भारतीयभाषाणां, तथा विश्वस्य बहूनां भाषाणां च जननी-भाषा (स्रोतो-भाषा) गुरुभाषा (पूरक-भाषा) वा अस्ति।
यह भाषा अधिकांश भारतीय भाषाओं की तथा विश्व की बहुत-सी भाषाओं की जननी-भाषा (स्रोत-भाषा) अथवा गुरु-भाषा (पूरक-भाषा) है।
बहवः कवयः काव्यरचनया अस्याः सौन्दर्यं वर्धितवन्तः। कोमलपदावल्या परिपूर्णा एषा ज्ञानपेटिका अस्ति।
बहुत-से कवियों ने काव्य-रचना द्वारा इसकी सुन्दरता बढ़ाई। कोमल शब्दावली से भरी हुई यह ज्ञान की पेटी है।
संस्कृतभाषा स्वपदावलिभिः अन्याः भाषाः ज्ञानं विज्ञानं च परिपोषयति। संस्कृतभाषायाः गौरवं वर्णनातीतम् अस्ति।
संस्कृत भाषा अपनी शब्दावलियों से दूसरी भाषाओं का तथा ज्ञान और विज्ञान का पोषण करती है। संस्कृत भाषा का गौरव वर्णन से परे है।
पद्यम् २ — मुनियों, कवियों और जन-जन के जीवन की आशा
वेदव्यास-वाल्मीकि-मुनीनां
कालिदास-बाणादिकवीनाम्।
पौराणिक-सामान्य-जनानां
जीवनस्य आशा, सुन्दरसुरभाषा ॥ २ ॥
(हे संस्कृत!) तुम वेदव्यास, वाल्मीकि (जैसे) मुनियों की, कालिदास, बाण आदि कवियों की तथा पौराणिक (प्राचीन काल के) और सामान्य लोगों के जीवन की आशा हो, सुन्दर देवभाषा हो।
पदच्छेदः – वेदव्यास-वाल्मीकि-मुनीनाम् कालिदास-बाणादिकवीनाम् पौराणिक-सामान्य-जनानाम् जीवनस्य आशा सुन्दरसुरभाषा।
अन्वयः – (त्वं) वेदव्यासवाल्मीकिमुनीनां कालिदास-बाणादिकवीनां पौराणिक-सामान्यजनानां जीवनस्य आशा (असि)। त्वं सुन्दरसुरभाषा (असि)।
अन्वय का अर्थ – (तुम) वेदव्यास-वाल्मीकि (आदि) मुनियों की, कालिदास-बाण आदि कवियों की, पौराणिक और सामान्य जनों के जीवन की आशा (हो)। तुम सुन्दर देवभाषा (हो)।
भावार्थः – संस्कृतभाषा अति रमणीया भाषा अस्ति। वाल्मीकि-वेदव्यास-इत्यादयः मुनयः रामायण-महाभारत-पुराणादीन् ग्रन्थान् रचितवन्तः।
भावार्थ – संस्कृत भाषा अत्यन्त सुन्दर भाषा है। वाल्मीकि, वेदव्यास आदि मुनियों ने रामायण, महाभारत, पुराण आदि ग्रन्थों की रचना की।
कालिदास-बाणभट्ट-प्रभृतयः विशिष्टाः कवयः अपि उपादेयानि काव्यानि रचितवन्तः।
कालिदास, बाणभट्ट आदि विशिष्ट कवियों ने भी ग्रहण करने योग्य (उपयोगी) काव्यों की रचना की।
प्राचीनकालाद् आरभ्य इदानीं यावत् सामान्यजनानां जीवनं संस्कृतभाषया रचितैः काव्यैः प्रभावितम् अस्ति।
प्राचीन काल से लेकर अब तक सामान्य लोगों का जीवन संस्कृत भाषा में रचे गए काव्यों से प्रभावित है।
संस्कृतभाषा बहूनां लक्ष्याणां प्रापिका अस्ति। अतः संस्कृतभाषा सुन्दरभाषा अस्ति।
संस्कृत भाषा बहुत-से लक्ष्यों को प्राप्त कराने वाली है। इसलिए संस्कृत भाषा सुन्दर भाषा है।
पद्यम् ३ — सुख, आनन्द और बुद्धि देने वाली माता
श्रुतिसुखनिनदे सकलप्रमोदे
स्मृतिहितवरदे सरसविनोदे।
गति-मति-प्रेरक-काव्यविशारदे
तव संस्कृतिरेषा, सुन्दरसुरभाषा ॥ ३ ॥
हे कानों को सुख देने वाली ध्वनि वाली! हे सबको आनन्द देने वाली! हे स्मृति (स्मरण-शक्ति) के लिए हितकारी वर देने वाली! हे मधुर विनोद करने वाली! हे गति (उन्नति) और बुद्धि को प्रेरणा देने वाली, काव्य में निपुण (माता)! यह संस्कृति तुम्हारी ही है। (तुम) सुन्दर देवभाषा (हो)।
पदच्छेदः – श्रुतिसुखनिनदे सकलप्रमोदे स्मृतिहितवरदे सरसविनोदे गति-मति-प्रेरककाव्यविशारदे तव संस्कृतिः एषा सुन्दरसुरभाषा।
अन्वयः – हे ! श्रुतिसुखनिनदे ! सकलप्रमोदे ! स्मृतिहितवरदे ! सरसविनोदे ! गति-मति-प्रेरक-काव्यविशारदे ! तव एषा संस्कृतिः (अस्ति)। (त्वं) सुन्दरसुरभाषा (असि)।
अन्वय का अर्थ – हे कर्णप्रिय ध्वनि वाली! हे सबको आनन्द देने वाली! हे स्मृति के लिए हितकारी वर देने वाली! हे मधुर विनोद वाली! हे गति और बुद्धि की प्रेरक, काव्य में पारंगत (माता)! यह संस्कृति तुम्हारी (है)। (तुम) सुन्दर देवभाषा (हो)।
भावार्थः – वस्तुतः रमणीया देवत्वविधायिनी संस्कृतभाषा संस्कृतेः जननी सदृशी अस्ति।
भावार्थ – वास्तव में सुन्दर (और) देवत्व प्रदान करने वाली संस्कृत भाषा संस्कृति की माता के समान है।
संस्कृतभाषायाः ध्वनिश्रवणेन सुखं वर्धते, सर्वे जनाः आनन्दिताः भवन्ति।
संस्कृत भाषा की ध्वनि सुनने से सुख बढ़ता है, सब लोग आनन्दित होते हैं।
संस्कृतभाषा वररूपेण संस्कारजन्यं ज्ञानं प्रयच्छति, सरसं विनोदभावं च प्रकाशयति।
संस्कृत भाषा वरदान के रूप में संस्कारों से उत्पन्न ज्ञान देती है और रसपूर्ण (मधुर) विनोद-भाव को प्रकट करती है।
मानवजीवने उत्तमां गतिं बुद्धिं च प्रददाति। काव्यशास्त्रपरिपूर्णा संस्कृतभाषा अस्माकं संस्कृतिं रक्षति प्रसारयति च।
(यह) मानव-जीवन में उत्तम गति (उन्नति) और बुद्धि प्रदान करती है। काव्यशास्त्र से भरी हुई संस्कृत भाषा हमारी संस्कृति की रक्षा करती है और उसे फैलाती है।
पद्यम् ४ — धरती पर विजयी देवभाषा
नवरस-रुचिरालङ्कृति-धारा
वेदविषय-वेदान्त-विचारा।
वैद्य-व्योम-शास्त्रादि-विहारा
विजयते धरायां, सुन्दरसुरभाषा ॥ ४ ॥
नौ रसों से सुन्दर (आनन्द देने वाली), अलंकारों को धारण करने वाली, वेद के विषयों और वेदान्त के विचारों वाली, वैद्यक (आयुर्वेद), व्योम (अन्तरिक्ष) आदि शास्त्रों में विहार करने वाली सुन्दर देवभाषा (संस्कृत) धरती पर विजयी है (सबसे श्रेष्ठ बनकर शोभित है)।
पदच्छेदः – नवरस-रुचिरा अलङ्कृति-धारा वेदविषय-वेदान्त-विचारा। वैद्य-व्योम-शास्त्रादि-विहारा विजयते धरायाम् सुन्दरसुरभाषा।
अन्वयः – नवरस-रुचिरा अलङ्कृतिधारा वेदविषयवेदान्तविचारा वैद्यव्योमशास्त्रादिविहारा धरायां सुन्दरसुरभाषा विजयते।
अन्वय का अर्थ – नौ रसों से सुन्दर, अलंकारों को धारण करने वाली, वेद के विषयों और वेदान्त के विचारों वाली, वैद्यक-अन्तरिक्ष आदि शास्त्रों में विहार करने वाली सुन्दर देवभाषा धरती पर विजयी है।
भावार्थः – संस्कृतकाव्यशास्त्रेषु शृङ्गार-हास्य-करुण-रौद्र-वीर-भयानक-बीभत्स-अद्भुत-शान्त-प्रभृतयः नवसंख्याकाः रुचिराः रसाः सन्ति।
भावार्थ – संस्कृत के काव्यशास्त्रों में शृंगार, हास्य, करुण, रौद्र, वीर, भयानक, बीभत्स, अद्भुत, शान्त आदि नौ सुन्दर रस हैं।
शब्दार्थपूर्णाः विविधाः अलङ्काराः शोभन्ते। वेद-उपनिषद्-वेदान्त-पुराणादीनां विचाराः जनान् अभिप्रेरयन्ति।
(इसमें) शब्द और अर्थ से पूर्ण अनेक प्रकार के अलंकार शोभा पाते हैं। वेद, उपनिषद्, वेदान्त, पुराण आदि के विचार लोगों को प्रेरित करते हैं।
चिकित्साविज्ञान-खगोलशास्त्रादिभिः सह संस्कृतभाषा पृथिव्यां विहरति। एवं संस्कृतभाषा सर्वत्र विजयते।
चिकित्सा-विज्ञान, खगोलशास्त्र आदि के साथ संस्कृत भाषा पृथ्वी पर विचरण करती है। इस प्रकार संस्कृत भाषा सब जगह विजयी है।
अत्र इदम् अवधेयम् (यहाँ यह ध्यान देने योग्य है) — समासः
परस्परसम्बद्धानां सार्थकपदानाम् एकपदीभावः समासः इति कथ्यते। प्रायेण द्वयोः ततोऽधिकानां वा पदानां संक्षिप्तीकरणं नाम समासः।
आपस में सम्बन्ध रखने वाले सार्थक पदों का एक पद बन जाना ‘समास’ कहलाता है। प्रायः दो या उससे अधिक पदों को संक्षिप्त करना ही समास है।
यथा, नद्याः तीरम् – नदीतीरम्, राज्ञः पुत्रः – राजपुत्रः, सुराणां भाषा – सुरभाषा, पोषणस्य क्षमता – पोषणक्षमता, वचनम् अतीता – वचनातीता, नवसंख्याकाः रसाः – नवरसाः, नवरसैः रुचिरा – नवरसरुचिरा।
जैसे, नदी का तट – नदीतीरम्, राजा का पुत्र – राजपुत्रः, देवताओं की भाषा – सुरभाषा, पोषण की क्षमता – पोषणक्षमता, वचन से परे – वचनातीता, नौ संख्या वाले रस – नवरसाः, नौ रसों से सुन्दर – नवरसरुचिरा।
समासानां विविधाः प्रभेदाः सन्ति – अव्ययीभावः, तत्पुरुषः, कर्मधारयः, द्विगुः, द्वन्द्वः, बहुव्रीहिः च इति।
समासों के अनेक भेद हैं – अव्ययीभाव, तत्पुरुष, कर्मधारय, द्विगु, द्वन्द्व और बहुव्रीहि।
अव्ययीभावसमासे प्रायः पूर्वम् अव्ययपदस्य प्रयोगः भवति। यथा – रूपस्य योग्यम् – अनुरूपम्।
अव्ययीभाव समास में प्रायः पहले अव्यय पद का प्रयोग होता है। जैसे – रूप के योग्य – अनुरूपम्।
तत्पुरुषसमासे परपदस्य प्राधान्यं भवति। यथा – सुराणां भाषा – सुरभाषा।
तत्पुरुष समास में बाद वाले (उत्तर) पद की प्रधानता होती है। जैसे – देवताओं की भाषा – सुरभाषा।
द्विगुसमासे पूर्वं संख्यावाचकपदस्य व्यवहारः भवति। यथा, पञ्चानां वटानां समाहारः – पञ्चवटी।
द्विगु समास में पहले संख्यावाचक पद का प्रयोग होता है। जैसे, पाँच वट (बरगद) वृक्षों का समूह – पञ्चवटी।
बहुव्रीहिसमासे अन्यपदस्य प्राधान्यं भवति। यथा, पीतम् अम्बरं यस्य सः – पीताम्बरः (श्रीविष्णुः)।
बहुव्रीहि समास में (दोनों पदों से भिन्न) किसी अन्य पद की प्रधानता होती है। जैसे, पीला है वस्त्र जिसका, वह – पीताम्बर (श्रीविष्णु)।
योग्यताविस्तरः — संस्कृतप्रशस्तयः (संस्कृत की प्रशंसा के श्लोक)
१. मातृभूमिः सदा सेव्या मातृभाषा तथैव च।
भारतं मातृभूमिर्नो मातृभाषा हि संस्कृतम् ॥
मातृभूमि की सदा सेवा करनी चाहिए और उसी प्रकार मातृभाषा की भी। भारत हमारी मातृभूमि है और संस्कृत ही (हमारी) मातृभाषा है।
२. भारतस्य प्रतिष्ठे द्वे संस्कृतं संस्कृतिस्तथा।
विहाय संस्कृतं नास्ति संस्कृतिः संस्कृताश्रिता ॥
भारत की दो प्रतिष्ठाएँ (आधार) हैं – संस्कृत और उसी प्रकार संस्कृति। संस्कृत को छोड़कर संस्कृति नहीं है, (क्योंकि) संस्कृति संस्कृत पर आश्रित है।
३. पुरुषाः संस्कृताः सन्तु महिलाः सन्तु संस्कृताः।
संस्कृतेन विचारेण राष्ट्रं भातु सुसंस्कृतम् ॥
पुरुष संस्कारवान् हों, महिलाएँ संस्कारवान् हों। संस्कारयुक्त विचार से राष्ट्र सुसंस्कृत होकर शोभा पाए।
४. संस्कृतं संस्कृतेर्मूलं ज्ञानविज्ञानवारिधिः।
वेदतत्त्वार्थसञ्जुष्टं लोकालोककरं शिवम् ॥
संस्कृत संस्कृति की जड़ है और ज्ञान-विज्ञान का सागर है। (यह) वेदों के तत्त्व और अर्थ से युक्त, संसार को प्रकाश देने वाली और कल्याणकारी है।
५. यावद् भारतवर्षं स्याद् यावद् विन्ध्यहिमाचलौ।
यावद् गङ्गा च गोदा च तावदेव हि संस्कृतम् ॥
जब तक भारतवर्ष रहेगा, जब तक विन्ध्य और हिमालय (पर्वत) रहेंगे, जब तक गंगा और गोदावरी (नदियाँ) रहेंगी, तब तक निश्चय ही संस्कृत (भी) रहेगी।

NCERT Solutions for Class 8 Sanskrit Chapter 7 मञ्जुलमञ्जूषा सुन्दरसुरभाषा – Questions and Answers

All questions of the chapter are answered below, in the order of the book – in-text questions, activities and the end-of-chapter exercises. Each answer is written the way you would write it in the exam.

चित्र-संवादः (पाठे विद्यमानाः प्रश्नाः) — पृष्ठ 75पाठारम्भे ओमितायाः तस्याः सख्याः च संवादः — प्र.1 तथा प्र.3 संवाद के अपने प्रश्न हैं; प्र.2, 4–6 संवाद पर आधारित अभ्यासार्थ जोड़े गए प्रश्न हैं

चित्र-संवादः
प्र.1“भगिनि ! अद्य श्रावणी पूर्णिमा अस्ति। वदतु एतस्याः किं वैशिष्ट्यम् ?” — अस्य प्रश्नस्य उत्तरं लिखत।
उत्तर
उत्तरम् — अद्य श्रावणी पूर्णिमा अस्ति, अतः अद्य संस्कृतदिवसः अस्ति। एतत् एव अस्याः तिथेः वैशिष्ट्यम्।

संवादे सखी उत्तरं ददाति — “अहं जानामि अद्य संस्कृतदिवसः अस्ति। वयम् एतम् आसप्ताहम् आचरामः।”

प्र.2छात्राः संस्कृतदिवसं कियन्तं कालं आचरन्ति ?
उत्तर
उत्तरम् — छात्राः संस्कृतदिवसम् आसप्ताहम् आचरन्ति। (सप्ताहपर्यन्तम्)

संवादस्य पङ्क्तिः — “वयम् एतम् आसप्ताहम् आचरामः।”

प्र.3“किं भवत्याः विद्यालये संस्कृतदिवसम् अधिकृत्य केषाञ्चन विशिष्टकार्यक्रमाणां योजना कृता ?” — सख्याः उत्तरं किम् ?
उत्तर
उत्तरम् — आम् ओमिते ! मम विद्यालये अनेकेषां कार्यक्रमाणां योजना रचिता।
प्र.4ओमितायाः सखी कस्यां प्रतियोगितायां भागं ग्रहीष्यति ?
उत्तर
उत्तरम् — ओमितायाः सखी गीतगायनप्रतियोगितायां भागं ग्रहीष्यति।

संवादे सा वदति — “आम् ओमिते ! अहं तु गीतगायनप्रतियोगितायां भागं ग्रहीष्यामि।”

प्र.5ओमिता किम् इच्छति ? तस्याः कृते सखी किं यच्छति ?
उत्तर
उत्तरम् — ओमिता अपि तत्र आगन्तुम् इच्छति। तस्याः कृते सखी अधुना एव निमन्त्रणपत्रं यच्छति।

संवादः — ओमिता — “भगिनि ! अहमपि आगन्तुम् इच्छामि।” सखी — “अवश्यम्। अहं भवत्याः कृते अधुना एव निमन्त्रणपत्रं यच्छामि।”

प्र.6संवादस्य अन्ते ओमिता किं प्रार्थयते ? सखी च किं वदति ?
उत्तर
उत्तरम् — ओमिता प्रार्थयते — “भगिनि ! तत्र भवती किं गीतं गास्यति ? कृपया मामपि श्रावयतु।” सखी वदति — “अस्तु, अहं गायामि, भवती अनुगायतु।”

श्लोक-व्याख्या (पदच्छेदः · अन्वयः · अर्थः · भावः) — पृष्ठ 76–77गीतस्य प्रथमः द्वितीयश्च पद्यः (पुस्तक के पदच्छेद-अन्वय-भावार्थ के आधार पर)

श्लोकाः
श्लोकः 1मुनिवरविकसितकविवरविलसित-
मञ्जुलमञ्जूषा, सुन्दरसुरभाषा।
अयि मातस्तव पोषणक्षमता
मम वचनातीता, सुन्दरसुरभाषा॥ १॥ — पदच्छेदं, अन्वयम्, अर्थं भावं च लिखत।
उत्तर
पदच्छेदः — मुनिवर-विकसित-कविवर-विलसित-मञ्जुल-मञ्जूषा सुन्दरसुरभाषा। अयि मातः ! तव पोषणक्षमता मम वचनातीता सुन्दरसुरभाषा।
अन्वयः — (त्वं) मुनिवरविकसितकविवरविलसितमञ्जुलमञ्जूषा सुन्दरसुरभाषा (असि)। अयि मातः ! तव पोषणक्षमता मम वचनातीता अस्ति।

अर्थः (हिन्दी) — हे सुन्दर देवभाषा (संस्कृत) ! तुम श्रेष्ठ मुनियों द्वारा विकसित और श्रेष्ठ कवियों द्वारा सुशोभित की गई मनोहर शब्द-मञ्जूषा हो। हे माता ! तुम्हारी पोषण करने की क्षमता मेरी वाणी से परे है — मैं उसका वर्णन नहीं कर सकता।

भावः — संस्कृत मुनियों द्वारा विकसित और कवियों द्वारा सजाई गई ज्ञान की सुन्दर पेटी है। वह अपनी शब्दावली से दूसरी भाषाओं का भी पोषण करती है, इसलिए उसका गौरव वर्णन से परे है।

श्लोकः 2वेदव्यास-वाल्मीकि-मुनीनां
कालिदास-बाणादिकवीनाम्।
पौराणिक-सामान्य-जनानां
जीवनस्य आशा, सुन्दरसुरभाषा॥ २॥ — पदच्छेदं, अन्वयम्, अर्थं भावं च लिखत।
उत्तर
पदच्छेदः — वेदव्यास-वाल्मीकि-मुनीनाम् कालिदास-बाणादिकवीनाम् पौराणिक-सामान्य-जनानाम् जीवनस्य आशा सुन्दरसुरभाषा।
अन्वयः — (त्वं) वेदव्यासवाल्मीकिमुनीनां कालिदास-बाणादिकवीनां पौराणिक-सामान्यजनानां जीवनस्य आशा (असि)। त्वं सुन्दरसुरभाषा (असि)।

अर्थः (हिन्दी) — हे सुन्दर देवभाषा ! तुम वेदव्यास और वाल्मीकि जैसे मुनियों की, कालिदास और बाणभट्ट आदि कवियों की, तथा प्राचीन (पौराणिक) काल से आज तक के सामान्य जनों की — सबके जीवन की आशा हो।

भावः — वाल्मीकि-व्यास जैसे मुनियों और कालिदास-बाण जैसे कवियों ने संस्कृत में महान् ग्रन्थ रचे; प्राचीन काल से आज तक सामान्य जनों का जीवन भी इन्हीं काव्यों से प्रभावित है। इसलिए संस्कृत सबके जीवन की आशा है।

श्लोक-व्याख्या (पदच्छेदः · अन्वयः · अर्थः · भावः) — पृष्ठ 78–79गीतस्य तृतीयः चतुर्थश्च पद्यः (पुस्तक के पदच्छेद-अन्वय-भावार्थ के आधार पर)

श्लोकाः
श्लोकः 3श्रुतिसुखनिनदे सकलप्रमोदे
स्मृतिहितवरदे सरसविनोदे।
गति-मति-प्रेरक-काव्यविशारदे
तव संस्कृतिरेषा, सुन्दरसुरभाषा॥ ३॥ — पदच्छेदं, अन्वयम्, अर्थं भावं च लिखत।
उत्तर
पदच्छेदः — श्रुतिसुखनिनदे सकलप्रमोदे स्मृतिहितवरदे सरसविनोदे गति-मति-प्रेरककाव्यविशारदे तव संस्कृतिः एषा सुन्दरसुरभाषा।
अन्वयः — हे ! श्रुतिसुखनिनदे ! सकलप्रमोदे ! स्मृतिहितवरदे ! सरसविनोदे ! गति-मति-प्रेरक-काव्यविशारदे ! तव एषा संस्कृतिः (अस्ति)। (त्वं) सुन्दरसुरभाषा (असि)।

अर्थः (हिन्दी) — हे कानों को सुख देने वाली ध्वनि वाली ! हे सबको आनन्द देने वाली ! हे स्मृति को हितकारी वरदान देने वाली ! हे मधुर विनोद करने वाली ! हे गति और बुद्धि को प्रेरणा देने वाले काव्य में पारंगत ! — यह संस्कृति तुम्हारी ही है, हे सुन्दर देवभाषा !

भावः — संस्कृत की ध्वनि कानों को सुख देती है और सबको आनन्दित करती है; वह संस्कारयुक्त ज्ञान तथा उत्तम गति और बुद्धि देती है। वही हमारी संस्कृति की रक्षा और प्रसार करती है।

श्लोकः 4नवरस-रुचिरालङ्कृति-धारा
वेदविषय-वेदान्त-विचारा।
वैद्य-व्योम-शास्त्रादि-विहारा
विजयते धरायां, सुन्दरसुरभाषा॥ ४॥ — पदच्छेदं, अन्वयम्, अर्थं भावं च लिखत।
उत्तर
पदच्छेदः — नवरस-रुचिरा अलङ्कृति-धारा वेदविषय-वेदान्त-विचारा। वैद्य-व्योम-शास्त्रादि-विहारा विजयते धरायाम् सुन्दरसुरभाषा।
अन्वयः — नवरस-रुचिरा अलङ्कृतिधारा वेदविषयवेदान्तविचारा वैद्यव्योमशास्त्रादिविहारा धरायां सुन्दरसुरभाषा विजयते।

अर्थः (हिन्दी) — नौ रसों से मनोहर, अलङ्कारों को धारण करने वाली, वेद तथा वेदान्त के विचारों से युक्त और आयुर्वेद, खगोलशास्त्र आदि शास्त्रों में विचरण करने वाली सुन्दर देवभाषा इस धरती पर विजयी होती है।

भावः — संस्कृत में नौ रस, अनेक अलङ्कार, वेद-वेदान्त के विचार तथा चिकित्सा और खगोल जैसे शास्त्र हैं। इसी व्यापकता के कारण वह सारी धरती पर विजयी है।

वयं शब्दार्थान् जानीमः — पृष्ठ 79–80शब्दार्थ-सारणी तथा ‘मातृभाषया अर्थं लिखत’ स्तम्भः

वयं शब्दार्थान् जानीमः
प्र.1पृष्ठ 79 की शब्दार्थ-सारणी के शब्दों (विकसिता, विलसिता, मञ्जुला, मञ्जूषा, पोषणक्षमता, मे, अतीता, वृन्दानाम्, नवम्, वचनातीता, भूयिष्ठानाम्) के संस्कृत-पर्याय, हिन्दी अर्थ तथा अंग्रेज़ी अर्थ लिखिए और अन्तिम स्तम्भ ‘मातृभाषया अर्थं लिखत’ भरिए।
उत्तर
शब्दःअर्थः (संस्कृतम्)हिन्दीEnglishमातृभाषया अर्थः (नमूना — हिन्दी)
विकसिताविस्तारिताविकसित की गईProgressively developedबढ़ाई गई / फैलाई गई
विलसितारञ्जिताआनन्द देने वालीThat which gives joyसजाई गई, रस देने वाली
मञ्जुलामनोहरामन को हरने वालीLovely / Charmingसुन्दर, प्यारी
मञ्जूषापेटिकापेटीBox / Encasementसन्दूक, डिब्बा
पोषणक्षमतापालनशक्तिःपोषण की क्षमताNurturing capacityपालने-पोसने की शक्ति
मेमममेरेMineमेरा
अतीताअतिक्रान्तापार होBeyondजिसे लाँघ चुके
वृन्दानाम्समूहानाम्समूहों कीOf groupsटोलियों का
नवम्नूतनम्नईNewनया
वचनातीतावर्णनातीतावाणी से परेBeyond wordsजो कहा न जा सके
भूयिष्ठानाम्अधिकतराणाम्अधिकांशMostlyअधिकतर लोगों का
प्र.2पृष्ठ 80 की शब्दार्थ-सारणी के शब्दों (श्रुतिसुखनिनदे, सकलप्रमोदे, सरसविनोदे, काव्यविशारदे, रुचिरा, अलङ्कृतिधारा, व्योमशास्त्रम्, धरायाम्) के संस्कृत-पर्याय, हिन्दी तथा अंग्रेज़ी अर्थ लिखिए और अन्तिम स्तम्भ ‘मातृभाषया अर्थं लिखत’ भरिए।
उत्तर
शब्दःअर्थः (संस्कृतम्)हिन्दीEnglishमातृभाषया अर्थः (नमूना — हिन्दी)
श्रुतिसुखनिनदे !श्रवणसुखध्वनिदात्रि !कर्णप्रिय ध्वनि देने वाली !Sound of which is pleasant to listenहे कानों को प्यारी लगने वाली !
सकलप्रमोदे !सर्वेभ्यः आनन्दमयि !सभी को आनन्द देने वालीThat which gives pleasure to allहे सबको प्रसन्न करने वाली !
सरसविनोदेसरसविनोदशीलेमधुर विनोद करने वालीThat which creates pleasant humourरसभरा मनोरंजन करने वाली
काव्यविशारदे !काव्यपारङ्गतेकाव्य करने में पारंगतOh! Proficient in Literatureहे काव्य में निपुण !
रुचिरारुचिकराआनन्द प्रदान करने वालीThat which gives happinessसुन्दर, मन को भाने वाली
अलङ्कृतिधाराअलङ्काराणाम् आधात्रीअलंकारों को धारण करने वालीWell ornamentedअलंकारों से सजी हुई
व्योमशास्त्रम्अन्तरिक्षशास्त्रम्अन्तरिक्ष विज्ञानAstronomyआकाश (ग्रह-नक्षत्रों) का शास्त्र
धरायाम्पृथिव्याम्धरती परOn earthपृथ्वी पर

अत्र इदम् अवधेयम् — पृष्ठ 80व्याकरणम् — समासः (पुस्तक की पेटी पर आधारित अभ्यासार्थ जोड़े गए प्रश्न)

अत्र इदम् अवधेयम्
प्र.1समासः कः ? पाठे प्रदत्तां परिभाषाम् उदाहरणैः सह लिखत।
उत्तर
परिभाषा (पुस्तकस्य वचनम्) — परस्परसम्बद्धानां सार्थकपदानाम् एकपदीभावः समासः इति कथ्यते। प्रायेण द्वयोः ततोऽधिकानां वा पदानां संक्षिप्तीकरणं नाम समासः।

पुस्तक के उदाहरण —

विग्रहः (खुला रूप)समस्तपदम् (जुड़ा रूप)
नद्याः तीरम्नदीतीरम्
राज्ञः पुत्रःराजपुत्रः
सुराणां भाषासुरभाषा
पोषणस्य क्षमतापोषणक्षमता
वचनम् अतीतावचनातीता
नवसंख्याकाः रसाःनवरसाः
नवरसैः रुचिरानवरसरुचिरा
प्र.2समासानां कति प्रभेदाः सन्ति ? तेषां नामानि उदाहरणैः सह लिखत।
उत्तर
उत्तरम् — समासानां षट् प्रभेदाः सन्ति — अव्ययीभावः, तत्पुरुषः, कर्मधारयः, द्विगुः, द्वन्द्वः, बहुव्रीहिः च।
समासःनियमः (पुस्तकानुसारम्)उदाहरणम्
अव्ययीभावःप्रायः पूर्वपद अव्यय होता हैरूपस्य योग्यम् = अनुरूपम्
तत्पुरुषःपरपद (उत्तरपद) प्रधान होता हैसुराणां भाषा = सुरभाषा
कर्मधारयःविशेषण-विशेष्य का समास (तत्पुरुष का ही भेद)सुन्दरी सुरभाषा = सुन्दरसुरभाषा *
द्विगुःपूर्वपद संख्यावाचक होता हैपञ्चानां वटानां समाहारः = पञ्चवटी
द्वन्द्वःदोनों पद समान रूप से प्रधानरामः च कृष्णः च = रामकृष्णौ *
बहुव्रीहिःअन्य पद (बाहर का पद) प्रधान होता हैपीतम् अम्बरं यस्य सः = पीताम्बरः (श्रीविष्णुः)

* पुस्तक की पेटी में कर्मधारय और द्वन्द्व के उदाहरण नहीं दिए गए; ये दो उदाहरण हमने जोड़े हैं।

प्र.3अस्मिन् पाठे प्रयुक्तानां समस्तपदानां विग्रहं कुरुत — मञ्जुलमञ्जूषा, सुन्दरसुरभाषा, पोषणक्षमता, वचनातीता, नवरसरुचिरा, अलङ्कृतिधारा, व्योमशास्त्रम्।
उत्तर
समस्तपदम्विग्रहःसमासः
मञ्जुलमञ्जूषामञ्जुला मञ्जूषाकर्मधारयः
सुन्दरसुरभाषासुन्दरी सुरभाषाकर्मधारयः
सुरभाषासुराणां भाषाषष्ठी तत्पुरुषः
पोषणक्षमतापोषणस्य क्षमताषष्ठी तत्पुरुषः
वचनातीतावचनम् अतीताद्वितीया तत्पुरुषः
नवरसाःनवसंख्याकाः रसाःद्विगुः
नवरसरुचिरानवरसैः रुचिरातृतीया तत्पुरुषः
अलङ्कृतिधाराअलङ्कृतीनां धारा (अलङ्काराणाम् आधात्री)षष्ठी तत्पुरुषः
व्योमशास्त्रम्व्योम्नः शास्त्रम्षष्ठी तत्पुरुषः

अभ्यासात् जायते सिद्धिः — प्रश्नः १ — पृष्ठ 81अधः प्रदत्तानां प्रश्नानां एकपदेन उत्तरं लिखत

अभ्यासात् जायते सिद्धिः
प्र.1 (क)सुन्दरसुरभाषा कस्य वचनातीता ?
उत्तर
उत्तरम् — मम (कवेः)।

श्लोक १ की पङ्क्ति — “अयि मातस्तव पोषणक्षमता मम वचनातीता”। अर्थात् संस्कृतभाषा की पोषण-क्षमता कवि की वाणी से परे है।

प्र.1 (ख)संस्कृतभाषा कुत्र विजयते ?
उत्तर
उत्तरम् — धरायाम् (पृथिव्याम्)।

श्लोक ४ की अन्तिम पङ्क्ति — “विजयते धरायां, सुन्दरसुरभाषा”।

प्र.1 (ग)संस्कृतभाषा कस्य आशा ?
उत्तर
उत्तरम् — जीवनस्य।

श्लोक २ की अन्तिम पङ्क्ति — “जीवनस्य आशा, सुन्दरसुरभाषा”।

प्र.1 (घ)संस्कृते कति रसाः सन्ति ?
उत्तर
उत्तरम् — नव (नवसंख्याकाः)।

श्लोक ४ के भावार्थ में पुस्तक स्वयं गिनाती है — शृङ्गार-हास्य-करुण-रौद्र-वीर-भयानक-बीभत्स-अद्भुत-शान्त-प्रभृतयः नवसंख्याकाः रुचिराः रसाः सन्ति।

प्र.1 (ङ)कस्याः ध्वनिश्रवणेन सुखं वर्धते ?
उत्तर
उत्तरम् — संस्कृतभाषायाः।

श्लोक ३ का भावार्थ — “संस्कृतभाषायाः ध्वनिश्रवणेन सुखं वर्धते, सर्वे जनाः आनन्दिताः भवन्ति।”

अभ्यासात् जायते सिद्धिः — प्रश्नः २ — पृष्ठ 81अधः प्रदत्तानां प्रश्नानां पूर्णवाक्येन उत्तरं लिखत

अभ्यासात् जायते सिद्धिः
प्र.2 (क)संस्कृतभाषा केषां जीवनस्य आशा अस्ति ?
उत्तर
उत्तरम् — संस्कृतभाषा वेदव्यास-वाल्मीकि-मुनीनां, कालिदास-बाणादिकवीनां, पौराणिक-सामान्यजनानां च जीवनस्य आशा अस्ति।
प्र.2 (ख)केषां विचाराः जनान् अभिप्रेरयन्ति ?
उत्तर
उत्तरम् — वेद-उपनिषद्-वेदान्त-पुराणादीनां विचाराः जनान् अभिप्रेरयन्ति।
प्र.2 (ग)कैः रसैः समृद्धा साहित्यपरम्परा विराजते ?
उत्तर
उत्तरम् — शृङ्गार-हास्य-करुण-रौद्र-वीर-भयानक-बीभत्स-अद्भुत-शान्तैः — इति नवभिः रसैः समृद्धा साहित्यपरम्परा विराजते।
प्र.2 (घ)संस्कृतभाषा केषु शास्त्रेषु विहरति ?
उत्तर
उत्तरम् — संस्कृतभाषा वैद्यशास्त्र-व्योमशास्त्रादिषु शास्त्रेषु विहरति। (चिकित्साविज्ञान-खगोलशास्त्रादिभिः सह संस्कृतभाषा पृथिव्यां विहरति।)
प्र.2 (ङ)संस्कृतभाषायाः कानि कानि सम्बोधनपदानि अत्र प्रयुक्तानि ?
उत्तर
उत्तरम् — अत्र संस्कृतभाषायाः कृते ‘मातः’, ‘श्रुतिसुखनिनदे’, ‘सकलप्रमोदे’, ‘स्मृतिहितवरदे’, ‘सरसविनोदे’, ‘गति-मति-प्रेरक-काव्यविशारदे’ इति सम्बोधनपदानि प्रयुक्तानि।

अभ्यासात् जायते सिद्धिः — प्रश्नः ३ — पृष्ठ 81–82रेखाङ्कितपदानि आश्रित्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत

अभ्यासात् जायते सिद्धिः
प्र.3 (क)मुनिगणाः संस्कृतभाषायाः विकासं कृतवन्तः।
उत्तर
प्रश्नः — मुनिगणाः कस्याः विकासं कृतवन्तः ?

(संस्कृतभाषायाः (षष्ठी, एकवचन, स्त्रीलिङ्ग) → कस्याः)

प्र.3 (ख)सामान्यजनानां जीवनं काव्यैः प्रभावितम् अस्ति।
उत्तर
प्रश्नः — सामान्यजनानां जीवनं कैः प्रभावितम् अस्ति ?

(काव्यैः (तृतीया, बहुवचन, नपुंसकलिङ्ग) → कैः)

प्र.3 (ग)कवयः अपि उपादेयानि काव्यानि रचितवन्तः।
उत्तर
प्रश्नः — कवयः अपि कीदृशानि काव्यानि रचितवन्तः ?

(उपादेयानि (विशेषण, द्वितीया बहुवचन, नपुंसकलिङ्ग) → कीदृशानि)

प्र.3 (घ)संस्कृतभाषा पृथिव्यां विहरति।
उत्तर
प्रश्नः — संस्कृतभाषा कुत्र विहरति ?

(पृथिव्याम् (स्थान — सप्तमी) → कुत्र)

प्र.3 (ङ)संस्कृतभाषा विविधभाषाः परिपोषयति।
उत्तर
प्रश्नः — संस्कृतभाषा काः परिपोषयति ?

(विविधभाषाः (द्वितीया, बहुवचन, स्त्रीलिङ्ग) → काः)

प्र.3 (च)वेद-वेदाङ्गादीनि गभीराणि शास्त्राणि सन्ति।
उत्तर
प्रश्नः — वेद-वेदाङ्गादीनि गभीराणि कानि सन्ति ?

(शास्त्राणि (प्रथमा, बहुवचन, नपुंसकलिङ्ग) → कानि)

अभ्यासात् जायते सिद्धिः — प्रश्नः ४ — पृष्ठ 82अधः प्रदत्तानां पदानाम् उदाहरणानुसारं विभक्तिं वचनं च लिखत

अभ्यासात् जायते सिद्धिः
प्र.4अधः प्रदत्तानां पदानाम् उदाहरणानुसारं विभक्तिं वचनं च लिखत —
पदम्विभक्तिःवचनम्
यथा — मातःसम्बोधनम्एकवचनम्
तव…………………………
मञ्जूषा…………………………
संस्कृतिः…………………………
जनानाम्…………………………
जीवनस्य…………………………
धरायाम्…………………………
शास्त्रेषु…………………………
उत्तर
पदम्विभक्तिःवचनम्लिङ्गम् / मूलशब्दः
यथा — मातःसम्बोधनम्एकवचनम्स्त्रीलिङ्गम् — मातृ
तवषष्ठीएकवचनम्सर्वनाम — युष्मद्
मञ्जूषाप्रथमाएकवचनम्स्त्रीलिङ्गम् — मञ्जूषा
संस्कृतिःप्रथमाएकवचनम्स्त्रीलिङ्गम् — संस्कृति
जनानाम्षष्ठीबहुवचनम्पुंलिङ्गम् — जन
जीवनस्यषष्ठीएकवचनम्नपुंसकलिङ्गम् — जीवन
धरायाम्सप्तमीएकवचनम्स्त्रीलिङ्गम् — धरा
शास्त्रेषुसप्तमीबहुवचनम्नपुंसकलिङ्गम् — शास्त्र

अभ्यासात् जायते सिद्धिः — प्रश्नः ५ — पृष्ठ 82अधोलिखितानां पद्यांशानां यथायोग्यं मेलनं कुरुत

अभ्यासात् जायते सिद्धिः
प्र.5अधोलिखितानां पद्यांशानां यथायोग्यं मेलनं कुरुत —
कवर्गः — (क) अयि मातस्तव पोषणक्षमता · (ख) वेदव्यास-वाल्मीकि-मुनीनां · (ग) पौराणिक-सामान्यजनानाम् · (घ) श्रुतिसुखनिनदे सकलप्रमोदे · (ङ) वैद्यव्योम-शास्त्रादिविहारा
खवर्गः — स्मृतिहितवरदे सरसविनोदे · विजयते धरायाम् · मम वचनातीता, सुन्दरसुरभाषा · कालिदासबाणादिकवीनाम् · जीवनस्य आशा, सुन्दरसुरभाषा
उत्तर
कवर्गःखवर्गः (सही मेल)श्लोकः
(क) अयि मातस्तव पोषणक्षमतामम वचनातीता, सुन्दरसुरभाषा१ (दिया गया उदाहरण)
(ख) वेदव्यास-वाल्मीकि-मुनीनांकालिदासबाणादिकवीनाम्२
(ग) पौराणिक-सामान्यजनानाम्जीवनस्य आशा, सुन्दरसुरभाषा२
(घ) श्रुतिसुखनिनदे सकलप्रमोदेस्मृतिहितवरदे सरसविनोदे३
(ङ) वैद्यव्योम-शास्त्रादिविहाराविजयते धरायाम्४

अभ्यासात् जायते सिद्धिः — प्रश्नः ६ — पृष्ठ 82–83उदाहरणानुसारम् अधः प्रदत्तानां पदानाम् एकपदेन अर्थं लिखत

अभ्यासात् जायते सिद्धिः
प्र.6 (क)यथा, देवस्य आलयः = देवालयः। (क) सुराणां भाषा = ?
उत्तर
उत्तरम् — सुरभाषा।

(समासः — षष्ठी तत्पुरुषः)

प्र.6 (ख)सुन्दरी सुरभाषा = ?
उत्तर
उत्तरम् — सुन्दरसुरभाषा।

(समासः — कर्मधारयः (विशेषण + विशेष्य))

प्र.6 (ग)नवरसैः रुचिरा = ?
उत्तर
उत्तरम् — नवरसरुचिरा।

(समासः — तृतीया तत्पुरुषः)

प्र.6 (घ)पोषणस्य क्षमता = ?
उत्तर
उत्तरम् — पोषणक्षमता।

(समासः — षष्ठी तत्पुरुषः)

प्र.6 (ङ)मञ्जुला भाषा = ?
उत्तर
उत्तरम् — मञ्जुलभाषा।

(समासः — कर्मधारयः (विशेषण + विशेष्य))

अभ्यासात् जायते सिद्धिः — प्रश्नः ७ — पृष्ठ 83पेटिकातः पदानि चित्वा रिक्तस्थानानि पूरयत

अभ्यासात् जायते सिद्धिः
प्र.7 (पेटिका)पेटिका — कालिदासबाणादि, आशा, संस्कृतिः, विजयते, मम, वेदविषय, मञ्जुलमञ्जूषा, सकलप्रमोदे
यथा — मुनिवर-विकसित-कविवर-विलसित- मञ्जुलमञ्जूषा सुन्दरसुरभाषा।
— सम्पूर्ण उत्तर-तालिका दीजिए।
उत्तर
क्रमःपूर्ण पङ्क्तिः (रिक्तस्थानं पूरितम्)पेटिकातः पदम्
यथामुनिवर-विकसित-कविवर-विलसित- मञ्जुलमञ्जूषा सुन्दरसुरभाषा।मञ्जुलमञ्जूषा
(क)अयि मातः तव पोषणक्षमता मम वचनातीता।मम
(ख)वेदव्यास-वाल्मीकि-मुनीनां कालिदासबाणादि कवीनाम्।कालिदासबाणादि
(ग)पौराणिक-सामान्य-जनानां जीवनस्य आशा।आशा
(घ)श्रुतिसुखनिनदे सकलप्रमोदे स्मृतिहितवरदे सरसविनोदे।सकलप्रमोदे
(ङ)गति-मति-प्रेरक-काव्य-विशारदे, तव संस्कृतिः एषा सुन्दरसुरभाषा।संस्कृतिः
(च)नवरस-रुचिरालङ्कृतिधारा वेदविषय-वेदान्तविचारा।वेदविषय
(छ)वैद्य-व्योम-शास्त्रादि-विहारा विजयते धरायाम्, सुन्दरसुरभाषा।विजयते
प्र.7 (क)अयि मातः तव पोषणक्षमता ………………… वचनातीता।
उत्तर
उत्तरम् — अयि मातः तव पोषणक्षमता मम वचनातीता।
प्र.7 (ख)वेदव्यास-वाल्मीकि-मुनीनां ………………… कवीनाम्।
उत्तर
उत्तरम् — वेदव्यास-वाल्मीकि-मुनीनां कालिदासबाणादि कवीनाम्।
प्र.7 (ग)पौराणिक-सामान्य-जनानां जीवनस्य …………………।
उत्तर
उत्तरम् — पौराणिक-सामान्य-जनानां जीवनस्य आशा।
प्र.7 (घ)श्रुतिसुखनिनदे ………………… स्मृतिहितवरदे सरसविनोदे।
उत्तर
उत्तरम् — श्रुतिसुखनिनदे सकलप्रमोदे स्मृतिहितवरदे सरसविनोदे।
प्र.7 (ङ)गति-मति-प्रेरक-काव्य-विशारदे, तव ………………… एषा सुन्दरसुरभाषा।
उत्तर
उत्तरम् — गति-मति-प्रेरक-काव्य-विशारदे, तव संस्कृतिः एषा सुन्दरसुरभाषा।
प्र.7 (च)नवरस-रुचिरालङ्कृतिधारा ………………… -वेदान्तविचारा।
उत्तर
उत्तरम् — नवरस-रुचिरालङ्कृतिधारा वेदविषय-वेदान्तविचारा।
प्र.7 (छ)वैद्य-व्योम-शास्त्रादि-विहारा ………………… धरायाम्, सुन्दरसुरभाषा।
उत्तर
उत्तरम् — वैद्य-व्योम-शास्त्रादि-विहारा विजयते धरायाम्, सुन्दरसुरभाषा।

अभ्यासात् जायते सिद्धिः — प्रश्नः ८ — पृष्ठ 83–84अधोलिखितविकल्पेषु प्रसङ्गानुसारम् अर्थं चिनुत

अभ्यासात् जायते सिद्धिः
प्र.8 (क)“मञ्जुलमञ्जूषा” इत्यस्य अर्थः कः ? (i) कठोरभाषा (ii) शोचनीया भाषा (iii) मनोहररूपेण संकलिता (iv) सामान्यभाषा
उत्तर
उत्तरम् — (iii) मनोहररूपेण संकलिता।
प्र.8 (ख)सुन्दरसुरभाषा केषां जीवनस्य आशा उच्यते ? (i) केवलं कवीनाम् (ii) बालकानाम् (iii) पौराणिक-सामान्यजनानाम् (iv) छात्राणाम्
उत्तर
उत्तरम् — (iii) पौराणिक-सामान्यजनानाम्।
प्र.8 (ग)सुन्दरसुरभाषा कुत्र विजयते ? (i) आकाशे (ii) जलधौ (iii) धरायाम् (iv) पवने
उत्तर
उत्तरम् — (iii) धरायाम्।
प्र.8 (घ)सुन्दरसुरभाषायां किं नास्ति ? (i) शास्त्रज्ञानम् (ii) संस्कृतिः (iii) वेदान्तचिन्तनम् (iv) अशुद्धिः
उत्तर
उत्तरम् — (iv) अशुद्धिः।
प्र.8 (ङ)कविः सुन्दरसुरभाषां केन पदेन सम्बोधयति ? (i) पितः (ii) मातः (iii) भ्रातः (iv) दातः
उत्तर
उत्तरम् — (ii) मातः।

योग्यताविस्तरः — संस्कृतप्रशस्तयः — पृष्ठ 84संस्कृतभाषायाः महिमानं वर्णयन्तः पञ्च श्लोकाः — पुस्तक में केवल श्लोक हैं; अर्थ-भाव अभ्यासार्थ जोड़े गए हैं

योग्यताविस्तरः
प्रशस्तिः 1मातृभूमिः सदा सेव्या मातृभाषा तथैव च।
भारतं मातृभूमिर्नो मातृभाषा हि संस्कृतम्॥ — अर्थं भावं च लिखत।
उत्तर
पदच्छेदः — मातृभूमिः सदा सेव्या मातृभाषा तथा एव च। भारतम् मातृभूमिः नः मातृभाषा हि संस्कृतम्।
अन्वयः — मातृभूमिः सदा सेव्या, तथा एव च मातृभाषा (सेव्या)। नः मातृभूमिः भारतम् (अस्ति), मातृभाषा हि संस्कृतम् (अस्ति)।

अर्थः (हिन्दी) — मातृभूमि की सदा सेवा करनी चाहिए, और उसी प्रकार मातृभाषा की भी। हमारी मातृभूमि भारत है और मातृभाषा संस्कृत है।

भावः — जैसे मातृभूमि की सेवा कर्तव्य है, वैसे ही मातृभाषा की भी; हमारे लिए वह भूमि भारत है और वह भाषा संस्कृत।

प्रशस्तिः 2भारतस्य प्रतिष्ठे द्वे संस्कृतं संस्कृतिस्तथा।
विहाय संस्कृतं नास्ति संस्कृतिः संस्कृताश्रिता॥ — अर्थं भावं च लिखत।
उत्तर
पदच्छेदः — भारतस्य प्रतिष्ठे द्वे संस्कृतम् संस्कृतिः तथा। विहाय संस्कृतम् न अस्ति संस्कृतिः संस्कृत-आश्रिता।
अन्वयः — भारतस्य द्वे प्रतिष्ठे — संस्कृतं तथा संस्कृतिः। संस्कृतं विहाय संस्कृतिः न अस्ति, (यतः सा) संस्कृताश्रिता (अस्ति)।

अर्थः (हिन्दी) — भारत की दो प्रतिष्ठाएँ हैं — संस्कृत और संस्कृति। संस्कृत को छोड़कर संस्कृति नहीं रहती, क्योंकि संस्कृति संस्कृत के ही आश्रय पर टिकी है।

भावः — भारत की पहचान संस्कृत और संस्कृति से है। संस्कृति संस्कृत पर ही टिकी है, इसलिए संस्कृत के बिना संस्कृति नहीं बच सकती।

प्रशस्तिः 3पुरुषाः संस्कृताः सन्तु महिलाः सन्तु संस्कृताः।
संस्कृतेन विचारेण राष्ट्रं भातु सुसंस्कृतम्॥ — अर्थं भावं च लिखत।
उत्तर
पदच्छेदः — पुरुषाः संस्कृताः सन्तु महिलाः सन्तु संस्कृताः। संस्कृतेन विचारेण राष्ट्रम् भातु सुसंस्कृतम्।
अन्वयः — पुरुषाः संस्कृताः सन्तु, महिलाः (अपि) संस्कृताः सन्तु। संस्कृतेन विचारेण राष्ट्रं सुसंस्कृतं भातु।

अर्थः (हिन्दी) — पुरुष संस्कारवान् हों, महिलाएँ भी संस्कारवान् हों। संस्कारयुक्त विचार से राष्ट्र सुसंस्कृत होकर शोभित हो।

भावः — राष्ट्र तभी सुसंस्कृत बनता है जब उसके पुरुष और महिलाएँ — दोनों — संस्कारवान् हों और अच्छे विचार अपनाएँ।

प्रशस्तिः 4संस्कृतं संस्कृतेर्मूलं ज्ञानविज्ञानवारिधिः।
वेदतत्त्वार्थसञ्जुष्टं लोकालोककरं शिवम्॥ — अर्थं भावं च लिखत।
उत्तर
पदच्छेदः — संस्कृतम् संस्कृतेः मूलम् ज्ञान-विज्ञान-वारिधिः। वेद-तत्त्वार्थ-सञ्जुष्टम् लोक-आलोककरम् शिवम्।
अन्वयः — संस्कृतं संस्कृतेः मूलम् (अस्ति), ज्ञानविज्ञानवारिधिः (अस्ति)। (तत्) वेदतत्त्वार्थसञ्जुष्टं लोकालोककरं शिवम् (अस्ति)।

अर्थः (हिन्दी) — संस्कृत संस्कृति की जड़ है और ज्ञान-विज्ञान का समुद्र है। वह वेदों के तत्त्वार्थ से भरी हुई, संसार को प्रकाश देने वाली और कल्याणकारी है।

भावः — संस्कृत हमारी संस्कृति की जड़ और ज्ञान-विज्ञान का भण्डार है; वेदों का सार उसी में है और वह संसार को प्रकाश देकर उसका कल्याण करती है।

प्रशस्तिः 5यावद् भारतवर्षं स्याद् यावद् विन्ध्यहिमाचलौ।
यावद् गङ्गा च गोदा च तावदेव हि संस्कृतम्॥ — अर्थं भावं च लिखत।
उत्तर
पदच्छेदः — यावत् भारतवर्षम् स्यात् यावत् विन्ध्य-हिमाचलौ। यावत् गङ्गा च गोदा च तावत् एव हि संस्कृतम्।
अन्वयः — यावत् भारतवर्षं स्यात्, यावत् विन्ध्यहिमाचलौ (स्याताम्), यावत् गङ्गा च गोदा च (स्याताम्), तावत् एव हि संस्कृतम् (स्यात्)।

अर्थः (हिन्दी) — जब तक भारतवर्ष रहेगा, जब तक विन्ध्याचल और हिमालय रहेंगे, जब तक गङ्गा और गोदावरी बहती रहेंगी — तब तक संस्कृत भी रहेगी।

भावः — संस्कृत भारत की धरती, पर्वतों और नदियों जितनी ही स्थायी है — जब तक भारत है, तब तक संस्कृत रहेगी।

परियोजनाकार्यम् — पृष्ठ 84त्रीणि क्रियाकलाप-कार्याणि

परियोजनाकार्यम्
कार्यम् 1संस्कृतेन जीवनं कथं समृद्धं भवेत् इति अधिकृत्य ‘सुन्दरसुरभाषा धरायां विजयते’ इति संस्कृतनाटिकया छात्राः जागरूकाः करणीयाः।
उत्तर

यह क्या माँगता है: ‘संस्कृत से जीवन कैसे समृद्ध होता है’ — इस विषय पर ‘सुन्दरसुरभाषा धरायां विजयते’ नाम की एक छोटी संस्कृत नाटिका तैयार करके सहपाठियों को जागरूक करना।

नमूना उत्तर (नाटिकायाः आरम्भः):
सूत्रधारः — स्वागतम्। अद्य वयं संस्कृतदिवसम् आचरामः।
छात्रः — आचार्य ! संस्कृतेन अस्माकं जीवनं कथं समृद्धं भवति ?
आचार्यः — शृणु वत्स ! संस्कृते वेदाः सन्ति, आयुर्वेदः अस्ति, ज्योतिःशास्त्रम् अस्ति। एषा भाषा ज्ञानविज्ञानवारिधिः अस्ति।
वैद्यः — आम् ! चरकसंहिता सुश्रुतसंहिता च संस्कृते एव लिखिते।
छात्रा — अहो ! तर्हि संस्कृतं केवलं प्राचीना भाषा नास्ति, अपि तु विज्ञानस्य अपि भाषा अस्ति।
सर्वे (गायन्ति) — विजयते धरायां, सुन्दरसुरभाषा !
कार्यम् 2सरलसंस्कृतगीतानां सङ्ग्रहं कुरुत कक्षायां च गायत। यथा — सुरससुबोधा विश्वमनोज्ञा, मनसा सततं स्मरणीयम्, मृदपि च चन्दनमस्मिन् देशे, इत्यादीनि।
उत्तर

यह क्या माँगता है: सरल संस्कृत गीतों का अपना संग्रह बनाइए और कक्षा में गाइए। पुस्तक ने तीन गीतों के नाम स्वयं सुझाए हैं।

नमूना उत्तर (सङ्ग्रहस्य प्रथमं पृष्ठम्):
क्रमःगीतम्विषयःभावः (हिन्दी)
१सुरससुबोधा विश्वमनोज्ञाभाषा-महिमासंस्कृत रसपूर्ण, सरलता से समझ में आने वाली और सारे संसार को प्रिय है
२मनसा सततं स्मरणीयम्लोकहित / कर्तव्यमन से सदा याद रखें, वाणी से कहें — लोकहित ही मेरा कर्तव्य है
३मृदपि च चन्दनमस्मिन् देशेदेशभक्तिइस देश की तो मिट्टी भी चन्दन के समान पवित्र है
४मञ्जुलमञ्जूषा सुन्दरसुरभाषाभाषा-महिमाअस्माकं पाठस्य गीतम् — संस्कृत मुनि-कवियों की सजाई शब्द-मञ्जूषा है
कार्यम् 3संस्कृतसाहित्ये प्रसिद्धानां कवीनां काव्यानां च सङ्ग्रहः करणीयः।
उत्तर

यह क्या माँगता है: संस्कृत साहित्य के प्रसिद्ध कवियों और उनकी रचनाओं का एक सूची-संग्रह बनाना। पाठ के श्लोक २ में जिन नामों का उल्लेख है (वेदव्यास, वाल्मीकि, कालिदास, बाणभट्ट), उन्हीं से आरम्भ कीजिए।

नमूना उत्तर:
कविःकाव्यम् / ग्रन्थःप्रकारः
वाल्मीकिःरामायणम्आदिकाव्यम्
वेदव्यासःमहाभारतम्, पुराणानिइतिहासः / पुराणम्
कालिदासःअभिज्ञानशाकुन्तलम्, मेघदूतम्, रघुवंशम्, कुमारसम्भवम्नाटकम् / खण्डकाव्यम् / महाकाव्यम्
बाणभट्टःकादम्बरी, हर्षचरितम्गद्यकाव्यम्
भासःस्वप्नवासवदत्तम्नाटकम्
भारविःकिरातार्जुनीयम्महाकाव्यम्
माघःशिशुपालवधम्महाकाव्यम्
भर्तृहरिःनीतिशतकम्, शृङ्गारशतकम्, वैराग्यशतकम्शतककाव्यम्
विष्णुशर्मापञ्चतन्त्रम्कथाग्रन्थः / नीतिग्रन्थः
जयदेवःगीतगोविन्दम्गीतिकाव्यम्

Chapter 7 of 13 – Sanskrit

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ClassClass 8
SubjectSanskrit
Chapter7 – मञ्जुलमञ्जूषा सुन्दरसुरभाषा
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