NCERT Solutions for Class 8 Sanskrit Chapter 4 प्रणम्यो देशभक्तोऽयं गोपबन्धुर्महामनाः – step-by-step answers to every exercise and in-text question of the chapter, as per the latest NCERT syllabus for 2027. Read them online or download the free question-answer PDF.
कक्षा 8 संस्कृत (दीपकम्) का चतुर्थः पाठः — प्रणम्यो देशभक्तोऽयं गोपबन्धुर्महामनाः ओडिशा के महान् समाजसेवक, स्वतन्त्रतासङ्ग्रामी और ‘उत्कलमणि’ गोपबन्धुदास का चरित-गद्य है — पाठ चित्रसंवाद से आरम्भ होता है, फिर भोजनसभा की करुण घटना, फिर उनका जीवनवृत्त, और अन्त में उनका प्रसिद्ध श्लोक ‘स्वदेशभूमौ मम लीयतां तनुः’। व्याकरण की दृष्टि से पाठ का केन्द्र है पूर्वरूपसन्धिः (देशभक्तो + अयम् = देशभक्तोऽयम्) तथा क्तवतु-प्रत्ययान्त पदों का स्त्रीलिङ्ग रूप (गतवान् — गतवती)। नीचे पृष्ठ 36 से 48 तक का चित्रसंवाद, वयं शब्दार्थान् जानीमः, पाठगत श्लोक, अत्र इदम् अवधेयम्, अभ्यासात् जायते सिद्धिः के प्रश्न १–८ (हर उपभाग सहित), योग्यताविस्तरः तथा परियोजनाकार्यम् क्रम से हल हैं — पहले संस्कृत उत्तर, फिर कोष्ठक में हिन्दी अर्थ; व्याकरण और अतिरिक्त बातें हर उत्तर के नीचे ‘विस्तार से समझिए’ में हैं।
NCERT Solutions for Class 8 Sanskrit Chapter 4 प्रणम्यो देशभक्तोऽयं गोपबन्धुर्महामनाः PDF
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| Chapter | Download | |
|---|---|---|
| Solutions PDF | प्रणम्यो देशभक्तोऽयं गोपबन्धुर्महामनाः | View PDF |
पाठ का हिंदी अनुवाद
कक्षा में संवाद (पृष्ठ 36–37)
भोजन के समय की घटना (पृष्ठ 38)
तदर्थं भोजनं कुर्याः मा शरीरे दयां कुरु॥
इसलिए भोजन करो, शरीर पर दया मत करो।
(भाव: भोजन करते समय संकोच या लज्जा नहीं करनी चाहिए।)
गोपबन्धुदास का जीवन (पृष्ठ 39)
गोपबन्धु का प्रसिद्ध वचन और उपाधि (पृष्ठ 41)
स्वदेशलोकास्तदनु प्रयान्तु नु।
स्वराज्यमार्गे यदि गर्तमालिका,
ममास्थिमांसैः परिपूरितास्तु सा॥
मेरे देश के लोग उसके बाद (मेरे पीछे-पीछे) चलें।
स्वराज्य के मार्ग में यदि गड्ढों की शृङ्खला हो,
तो वह मेरी हड्डियों और मांस से भर जाए।
मिशु मोर देह ए देश माटिरे,
देशवासी चालि जाआन्तु पिठिरे,
देशर स्वराज्य पथे जेते गाड,
पुरु तहिँ पडि मोर मांस हाड॥
देशवासी (मेरी) पीठ पर से होकर चले जाएँ,
देश के स्वराज्य के पथ में जितने गड्ढे हों,
उनमें पड़कर मेरा मांस और हड्डियाँ उन्हें भर दें।
स्वदेशस्य भूमिभागे मम शरीरं विलीनं भवतु।
देशवासिनः मम अनुसरणं कुर्वन्तु।
देशस्य स्वतन्त्रतानिमित्तं यत्र यत्र प्रतिबन्धकाः गर्ताः सन्ति,
ते सर्वे गर्ताः मम अस्थिभिः मांसैश्च परिपूर्णाः भवन्तु।
अपने देश की भूमि में मेरा शरीर विलीन हो जाए।
देशवासी मेरा अनुसरण करें।
देश की स्वतंत्रता के लिए (उसके मार्ग में) जहाँ-जहाँ रुकावट डालने वाले गड्ढे हैं,
वे सभी गड्ढे मेरी हड्डियों और मांस से भर जाएँ।
प्रणम्यो देशभक्तोऽयं गोपबन्धुर्महामनाः॥
उच्च विचारों वाले ये देशभक्त गोपबन्धु प्रणाम करने योग्य हैं।
अत्र इदम् अवधेयम् — पूर्वरूपसन्धि (पृष्ठ 44)
सर्वे + अपि = सर्वेऽपि
पशवो + अपि = पशवोऽपि
बुभुक्षितो + अस्मि = बुभुक्षितोऽस्मि
अश्रुपूर्णनयनो + अभवत् = अश्रुपूर्णनयनोऽभवत्
सर्वेऽपि (सभी भी)
पशवोऽपि (पशु भी)
बुभुक्षितोऽस्मि (मैं भूखा हूँ)
अश्रुपूर्णनयनोऽभवत् (आँसुओं से भरी आँखों वाला हो गया)
योग्यताविस्तरः — श्लोक का अर्थ (पृष्ठ 47)
तदर्थं भोजनं कुर्याः मा शरीरे दयां कुरु॥
इसलिए भोजन करो, शरीर पर दया मत करो।
उत्कलमणि-गोपबन्धुदासस्य जीवनपरिचयः (पृष्ठ 47–48)
जन्म – ०९/१०/१८७७
जन्मस्थानम् – सुआण्डो-ग्रामः, पुरी-जनपदः, ओडिशाराज्यम्
पिता – दैत्यारिदासः
माता – स्वर्णमयी देवी
पत्नी – मोती देवी
जन्म – ९ अक्टूबर १८७७
जन्मस्थान – सुआण्डो गाँव, पुरी जिला, ओडिशा राज्य
पिता – दैत्यारिदास
माता – स्वर्णमयी देवी
पत्नी – मोती देवी
बी.एल्. उत्तीर्णः – १९०६, कलकत्ता – विश्वविद्यालयः
सत्यवादि-वनविद्यालयस्य प्रतिष्ठा – १९०९
बिहार-ओडिशा व्यवस्थापकसभायाः सदस्यः – १९१७
समाज-साप्ताहिकपत्रिकायाः प्रकाशनम् – १९१९
भारतीय-जातीय-आन्दोलने योगदानम् – १९२०
उत्कलमणिः इति उपाधिना सम्माननम् – १९२४
बी.एल. उत्तीर्ण – १९०६, कलकत्ता विश्वविद्यालय
सत्यवादी वनविद्यालय की स्थापना – १९०९
बिहार-ओडिशा व्यवस्थापक सभा (विधान परिषद्) के सदस्य – १९१७
‘समाज’ साप्ताहिक पत्रिका का प्रकाशन – १९१९
भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में योगदान – १९२०
‘उत्कलमणि’ उपाधि से सम्मान – १९२४
स्वर्गारोहणम् (साक्षी-गोपाले) – १७.०६.१९२८
देहावसान (साक्षीगोपाल में) – १७ जून १९२८
सत्यवादि-वनविद्यालयः (पृष्ठ 48)
NCERT Solutions for Class 8 Sanskrit Chapter 4 प्रणम्यो देशभक्तोऽयं गोपबन्धुर्महामनाः – Questions and Answers
All questions of the chapter are answered below, in the order of the book – in-text questions, activities and the end-of-chapter exercises. Each answer is written the way you would write it in the exam.
पाठारम्भे चित्रसंवादः — पृष्ठ 36–37(एकदा जलप्लावपीडितानां साहाय्यार्थं शिक्षकाः छात्राश्च सभागारे चर्चां कुर्वन्ति।)
हिमानी वदति — नमो नमः आचार्य ! ओडिशा-राज्यस्य केन्द्रापडा-जनपदे महानद्यां भयङ्करः जलप्लावः सम्भूतः । जलप्लावेन तत्र महती हानिः सञ्जाता ।
[नमस्कार आचार्य जी! ओडिशा राज्य के केन्द्रापड़ा जनपद में महानदी में भयङ्कर बाढ़ आ गई। बाढ़ से वहाँ बहुत बड़ी हानि हुई है।]
आचार्यः वदति — सत्यम् अशोक ! ते सर्वे अतिदुःखेन जीवन्ति । अस्माभिः एतादृशानां दुःखितानां सहायता करणीया ।
[सच है अशोक! वे सब बहुत दुःख में जी रहे हैं। हमें ऐसे दुःखी लोगों की सहायता करनी चाहिए।]
आचार्यः वदति — भवन्तः सर्वे एतत् चित्रं पश्यन्तु । एषः अस्ति दीनबन्धुः गोपबन्धुः । सम्प्रति वयं तस्य विषये जानीमः ।
[आप सब यह चित्र देखिए। ये हैं दीनबन्धु गोपबन्धु। अब हम उनके विषय में जानेंगे।]
इसके पहले आचार्य ने उनका परिचय इस प्रकार दिया था — यथा उत्कलमणिः गोपबन्धुः जलप्लावपीडितानाम् अकुण्ठं सेवां कृत्वा अद्यापि जनमानसेषु समादृतोऽस्ति ।
[जैसे उत्कलमणि गोपबन्धु बाढ़-पीड़ितों की मन लगाकर सेवा करके आज भी लोगों के मन में सम्मानित हैं।]
वयं शब्दार्थान् जानीमः — पृष्ठ 42–43शब्दार्थाः — मातृभाषया अर्थं लिखत (पुस्तक की तालिका का अन्तिम स्तम्भ)
जिनकी मातृभाषा हिन्दी है, वे अन्तिम स्तम्भ में नीचे ‘हिन्दी’ स्तम्भ वाले अर्थ लिखें। अन्य भाषा वाले छात्र वही अर्थ अपनी मातृभाषा (ओडिआ, बाङ्ला, मराठी, तमिऴ्, गुजराती …) में लिखें। पूरी सूची (पृष्ठ 42–43) —
| शब्दः | अर्थः (संस्कृतम्) | हिन्दी | English |
|---|---|---|---|
| जलप्लावपीडितानाम् | नद्यां बहुजलप्रवाहेण धनजीवनक्षति-ग्रस्तानाम् | बाढ़ पीड़ितों का | Of flood victims |
| नष्टानि | क्षतिग्रस्तानि | नष्ट हुए | Destroyed |
| अनाहारेण | आहारेण विना | भोजन न करने से | By abstaining from food |
| नदीस्रोतसा | नदीजलप्रवाहेण | नदी के प्रवाह से | By River currents |
| अकुण्ठम् | कुण्ठं विना / साग्रहम् | आग्रहपूर्वक | Generously |
| समादृतः | आदरप्राप्तः | सम्मानित | Honored |
| सुस्वादूनि व्यञ्जनानि | रुचिकराणि सूपशाकादीनि | स्वादिष्ट भोजन | Delicious food |
| दौर्लभ्यम् | कष्टेन लभ्यम् | कष्ट से प्राप्त किया गया | Difficulty in being obtained |
| निःशुल्कम् | धनं विना | निःशुल्क | Without any fees |
| करुणध्वनिः | विकलस्वरः | करुणा युक्त ध्वनि | Weeping words |
| अगुञ्जत् | गुञ्जनम् अकरोत् | गूँजा | Echoes |
| बुभुक्षितः | क्षुधातुरः | भूखा | Hungry |
| दयाविगलितहृदयः | करुणार्द्रहृदयः | दया पूर्ण हृदय वाला / दयालु | Compassionate heart |
| अश्रुपूर्णनयनः | अश्रुयुक्तं नेत्रं यस्य सः | आँसू से भरी हुई आँखों वाला | Eyes filled with tears |
| परिवेषितम् | भोजनार्थं प्रदत्तम् (अन्नम्) | परोसा गया | Served |
| पञ्चमित्रेषु | पञ्चसंख्याकेषु मित्रेषु | पाँच मित्रों में | Among five friends |
| स्वतन्त्रता-सङ्ग्रामी | स्वतन्त्रता-सेनानीः | स्वतन्त्रता सेनानी | Freedom fighter |
| जन्म लब्धवान् | जन्म प्राप्तवान् | जन्म लिया | Was born |
| कारावासम् | कारागृहे बन्धनम् | कारागार में रहना | Living in jail |
| चिन्ताकुलः | चिन्तया व्याकुलः | चिन्ता से व्याकुल | Worried |
| देशसेवा-तत्परस्य | देशसेवां कर्तुं तत्परस्य | देश सेवा हेतु तत्पर का | Of the one who is ready to serve the country |
| सहस्रशः | सहस्राधिकाः | हज़ारों | In thousands |
| लीयताम् | विलीनतां यान्तु | विलीन हो जाएँ | (May it) merge |
| प्रयान्तु | गच्छन्तु | चलें | (May they) walk over |
| गर्तमालिका | गर्तानां शृङ्खला | गड्ढों की शृङ्खला | Series of potholes |
| अस्थिमांसैः | अस्थिभिः मांसैः च | हड्डी और माँस से | With the bones and flesh of the body |
| दैनिक-वार्तापत्रस्य | प्रतिदिनं प्रकाशित-पत्रस्य | दैनिक समाचारपत्र का | Of the daily newspaper |
| असीमम् | अतुलनीयम् | अपार | Immense / Unparallel |
| उत्कलमणिः | उत्कलस्य मणिसदृशः उपाधिविशेषः | उत्कल की मणि (एक उपाधि) | Gem of Odisha (A title) |
| सम्मानितवान् | मानेन प्रशंसितवान् | सम्मानित किया | Honored |
| लोकसेवकः | जनसेवकः | समाज सेवक | Social worker |
| महामनाः | उच्चविचारसम्पन्नः | उच्च विचार वाला | Broad-minded |
पाठगतौ श्लोकौ — पृष्ठ 41पाठ में आए दो श्लोक (पृष्ठ 41) — पुस्तक में इन पर प्रश्न नहीं है; अभ्यास हेतु जोड़े गए प्रश्न
स्वदेशलोकास्तदनु प्रयान्तु नु।
स्वराज्यमार्गे यदि गर्तमालिका,
ममास्थिमांसैः परिपूरितास्तु सा॥
— अस्य श्लोकस्य पदच्छेदम् अन्वयम् अर्थं भावं च लिखत।
पदच्छेदः — स्वदेशभूमौ, मम, लीयताम्, तनुः, स्वदेशलोकाः, तदनु, प्रयान्तु, नु, स्वराज्यमार्गे, यदि, गर्तमालिका, मम, अस्थिमांसैः, परिपूरिता, अस्तु, सा।
अन्वयः — मम तनुः स्वदेशभूमौ लीयताम्। तदनु स्वदेशलोकाः नु प्रयान्तु। यदि स्वराज्यमार्गे गर्तमालिका (अस्ति), सा मम अस्थिमांसैः परिपूरिता अस्तु।
अर्थः — मेरा शरीर अपने देश की मिट्टी में विलीन हो जाए, और उसके बाद (उसी मिट्टी पर चलते हुए) देशवासी आगे बढ़ें। यदि स्वराज्य के मार्ग में गड्ढों की शृङ्खला हो, तो वह मेरी हड्डियों और माँस से भर जाए।
भावः — गोपबन्धु देश के लिए अपना सब कुछ, यहाँ तक कि अपना शरीर भी, अर्पित करना चाहते हैं; स्वतन्त्रता के मार्ग की हर बाधा को वे अपने शरीर से भर देना चाहते हैं, ताकि देशवासी सरलता से आगे बढ़ सकें।
प्रणम्यो देशभक्तोऽयं गोपबन्धुर्महामनाः॥
— अस्य श्लोकस्य पदच्छेदम् अन्वयम् अर्थं भावं च लिखत।
पदच्छेदः — उत्कलमणिः, इति, आख्यः, प्रसिद्धः, लोकसेवकः, प्रणम्यः, देशभक्तः, अयम्, गोपबन्धुः, महामनाः।
अन्वयः — ‘उत्कलमणिः’ इति आख्यः प्रसिद्धः लोकसेवकः महामनाः अयं देशभक्तः गोपबन्धुः प्रणम्यः (अस्ति)।
अर्थः — जिनका नाम ‘उत्कलमणि’ है, जो प्रसिद्ध लोकसेवक और उच्च विचारों वाले हैं — ये देशभक्त गोपबन्धु प्रणाम करने योग्य हैं।
भावः — निःस्वार्थ जनसेवा और देशभक्ति के कारण उत्कलमणि गोपबन्धु केवल स्मरणीय ही नहीं, प्रणाम करने योग्य हैं।
अत्र इदम् अवधेयम् — पृष्ठ 44पूर्वरूपसन्धिः (पृष्ठ 44 का नियम-बॉक्स — पुस्तक में इस पर प्रश्न नहीं है; अभ्यास हेतु जोड़ा गया प्रश्न)
नियमः — जब पहले पद के अन्त में ए या ओ हो और उसके तुरन्त बाद वाले पद का पहला वर्ण अ हो, तब वह ‘अ’ लुप्त हो जाता है और पहला पद ज्यों का त्यों (पूर्वरूप में) बना रहता है। लुप्त हुए ‘अ’ के स्थान पर अवग्रह-चिह्न ‘ऽ’ लिख दिया जाता है। इसीलिए इसे पूर्वरूपसन्धि कहते हैं — क्योंकि सन्धि में ‘पूर्व’ (पहला) रूप ही बचता है।
| पदद्वयम् (विच्छेदः) | सन्धिपदम् | अन्त्यवर्णः | पाठे कुत्र आगतम् |
|---|---|---|---|
| देशभक्तो + अयम् | देशभक्तोऽयम् | ओ + अ | पाठस्य शीर्षकश्लोके |
| सर्वे + अपि | सर्वेऽपि | ए + अ | उदाहरणम् (पृष्ठ 44) |
| पशवो + अपि | पशवोऽपि | ओ + अ | ‘बहवः गृहपालिताः पशवोऽपि …’ |
| बुभुक्षितो + अस्मि | बुभुक्षितोऽस्मि | ओ + अ | भिक्षुकस्य क्रन्दने |
| अश्रुपूर्णनयनो + अभवत् | अश्रुपूर्णनयनोऽभवत् | ओ + अ | गोपबन्धोः वर्णने |
अभ्यासात् जायते सिद्धिः — पृष्ठ 44प्रश्नः १ — अधोलिखितानां प्रश्नानाम् एकपदेन उत्तरं लिखत
गोपबन्धुदासः ।
[‘समाज’ दैनिक पत्रिका के संस्थापक गोपबन्धुदास थे।]
भिक्षुकाय ।
[गोपबन्धु ने अपना भोजन भिखारी को दिया।]
गोपबन्धोः पुत्रः । (एकपदेन — पुत्रः ।)
[गोपबन्धु का अपना पुत्र मरणासन्न था।]
‘उत्कलमणिः’ इति उपाधिना ।
[गोपबन्धु ‘उत्कलमणि’ उपाधि से सम्मानित हुए।]
वर्षद्वयम् । (द्वे वर्षे ।)
[गोपबन्धु ने दो वर्ष का कारावास भोगा।]
अभ्यासात् जायते सिद्धिः — पृष्ठ 44–45प्रश्नः २ — एकवाक्येन उत्तरं लिखत
दिनत्रयात् किमपि अभुक्तवतः बुभुक्षितस्य भिक्षुकस्य करुणध्वनिं श्रुत्वा दयाविगलितहृदयः गोपबन्धुः अश्रुपूर्णनयनः अभवत् ।
[तीन दिन से कुछ भी न खाए हुए भूखे भिखारी की करुण पुकार सुनकर, दया से पिघले हुए हृदय वाले गोपबन्धु की आँखें आँसुओं से भर गईं।]
मरणासन्नं स्वपुत्रं विहाय गोपबन्धुः समाजसेवाम् अकरोत् ।
[मृत्यु के निकट पहुँचे हुए अपने पुत्र को भी छोड़कर गोपबन्धु ने समाजसेवा की।]
समाजसेवायै देशसेवायै च तस्य असीमं त्यागम् अनुभवन् वैज्ञानिकः आचार्यः प्रफुल्लचन्द्ररायः गोपबन्धुम् ‘उत्कलमणिः’ इति उपाधिना सम्मानितवान् ।
[समाजसेवा और देशसेवा के लिए किए गए उनके अपार त्याग को अनुभव करके वैज्ञानिक आचार्य प्रफुल्लचन्द्रराय ने गोपबन्धु को ‘उत्कलमणि’ उपाधि से सम्मानित किया।]
गोपबन्धुः ओडिशाराज्यस्य पुरीजनपदस्य साक्षीगोपालसमीपे सुआण्डो-ग्रामे जन्म लब्धवान् ।
[गोपबन्धु ने ओडिशा राज्य के पुरी जनपद में साक्षीगोपाल के पास सुआण्डो गाँव में जन्म लिया।]
गोपबन्धुः सर्वदा स्वदेशस्यैव वस्त्राणां वस्तूनां च उपयोगं कृतवान् ।
[गोपबन्धु ने सदा अपने ही देश के वस्त्रों और वस्तुओं का उपयोग किया।]
अभ्यासात् जायते सिद्धिः — पृष्ठ 45प्रश्नः ३ — कोष्ठके दत्तानि पदानि उपयुज्य वाक्यानि रचयत (सेवाम्, सुस्वादूनि, सहायताम्, स्वदेशवस्त्राणि, अन्यतमः)
गोपबन्धुः जलप्लावपीडितानाम् अकुण्ठं सेवाम् अकरोत् ।
[गोपबन्धु ने बाढ़-पीड़ितों की मन लगाकर सेवा की।]
कदलीपत्रेषु सुस्वादूनि व्यञ्जनानि परिवेषितानि ।
[केले के पत्तों पर स्वादिष्ट व्यञ्जन परोसे गए।]
वयं दुःखितानां सहायतां कुर्मः ।
[हम दुःखी लोगों की सहायता करते हैं।]
गोपबन्धुः सर्वदा स्वदेशवस्त्राणि एव धारितवान् ।
[गोपबन्धु ने सदा अपने देश के बने वस्त्र ही पहने।]
गोपबन्धुः प्रसिद्धेषु पञ्चमित्रेषु अन्यतमः आसीत् ।
[गोपबन्धु प्रसिद्ध पाँच मित्रों में से एक थे।]
अभ्यासात् जायते सिद्धिः — पृष्ठ 45प्रश्नः ४ — चित्रं दृष्ट्वा पञ्च वाक्यानि रचयत
चित्र-परिचय (पृष्ठ 45): श्वेत वस्त्र पहने, दाढ़ी वाले गोपबन्धु एक अस्वस्थ-से दिखते बालक को बाँह से थामे, उसे सँभालते हुए एक मार्ग पर चल रहे हैं; सामने एक भवन है जिस पर ‘चिकित्सालयः’ लिखा है; आस-पास झाड़ियाँ और पेड़ हैं।
चित्र पर आधारित पाँच वाक्य —
| क्रमः | संस्कृतवाक्यम् | हिन्दी अर्थ |
|---|---|---|
| (क) | चित्रे एकः चिकित्सालयः दृश्यते । | चित्र में एक चिकित्सालय दिखाई देता है। |
| (ख) | एकः बालकः अस्वस्थः अस्ति । | एक बालक अस्वस्थ है। |
| (ग) | गोपबन्धुः तं बालकं चिकित्सालयं नयति । | गोपबन्धु उस बालक को चिकित्सालय ले जा रहे हैं। |
| (घ) | सः बालकं स्वबाहुना धारयति । | वे बालक को अपनी बाँह से सँभाले हुए हैं। |
| (ङ) | चिकित्सालयस्य समीपे वृक्षाः मार्गश्च सन्ति । | चिकित्सालय के पास पेड़ और रास्ता है। |
अभ्यासात् जायते सिद्धिः — पृष्ठ 45प्रश्नः ५ — समुचितेन पदेन श्लोकं पूरयत
स्वदेशभूमौ मम लीयतां तनुः ।
[मेरा शरीर अपने देश की भूमि में विलीन हो जाए।]
उत्कलमणिरित्याख्यः प्रसिद्धो लोकसेवकः ।
[‘उत्कलमणि’ नाम वाले प्रसिद्ध लोकसेवक।]
स्वदेशलोकास्तदनु प्रयान्तु नु ।
[उसके बाद देशवासी (उस मार्ग पर) चलें।]
स्वराज्यमार्गे यदि गर्तमालिका,
[यदि स्वराज्य के मार्ग में गड्ढों की शृङ्खला हो,]
ममास्थिमांसैः परिपूरितास्तु सा ।
[वह (गड्ढों की शृङ्खला) मेरी हड्डियों और माँस से भर जाए।]
अभ्यासात् जायते सिद्धिः — पृष्ठ 46प्रश्नः ६ — उदाहरणानुसारं क्रियापदं स्त्रीलिङ्गे परिवर्तयत (यथा — गतवान् — गतवती)
प्राप्तवान् — प्राप्तवती ।
[(पुरुष ने) प्राप्त किया — (स्त्री ने) प्राप्त किया।]
उपविष्टवान् — उपविष्टवती ।
[(पुरुष) बैठा — (स्त्री) बैठी।]
भुक्तवान् — भुक्तवती ।
[(पुरुष ने) खाया — (स्त्री ने) खाया।]
कृतवान् — कृतवती ।
[(पुरुष ने) किया — (स्त्री ने) किया।]
गृहीतवान् — गृहीतवती ।
[(पुरुष ने) ग्रहण किया — (स्त्री ने) ग्रहण किया।]
अभ्यासात् जायते सिद्धिः — पृष्ठ 46प्रश्नः ७ — समुचितेन पदेन सह स्तम्भौ मेलयत
| ‘अ’ स्तम्भः | ‘इ’ स्तम्भः |
|---|---|
| 1. समाजः | गोपबन्धुः |
| 2. ममास्थिमांसैः | व्यञ्जनानि |
| 3. उत्कलमणिः | क्रन्दनध्वनिः |
| 4. आँ आँ . . इति | दिनपत्रिका |
| 5. सुस्वादूनि | परिपूरितास्तु |
सही मेल इस प्रकार है —
| क्रमः | ‘अ’ स्तम्भः | ‘इ’ स्तम्भः | सन्दर्भः (पाठे कुत्र) |
|---|---|---|---|
| 1. | समाजः | दिनपत्रिका | ‘समाजः’ इति दिनपत्रिका अद्यापि प्रतिदिनं प्रकाश्यते (पृष्ठ 41) |
| 2. | ममास्थिमांसैः | परिपूरितास्तु | ममास्थिमांसैः परिपूरितास्तु सा (श्लोकः, पृष्ठ 41) |
| 3. | उत्कलमणिः | गोपबन्धुः | प्रफुल्लचन्द्ररायेण दत्तः उपाधिः (पृष्ठ 41) |
| 4. | आँ आँ . . इति | क्रन्दनध्वनिः | भिक्षुकस्य क्रन्दनध्वनिः (पृष्ठ 38) |
| 5. | सुस्वादूनि | व्यञ्जनानि | बहूनि सुस्वादूनि व्यञ्जनानि कदलीपत्रेषु परिवेषितानि (पृष्ठ 38) |
अभ्यासात् जायते सिद्धिः — पृष्ठ 46प्रश्नः ८ — घटनाक्रमेण वाक्यानि पुनः लिखत
(क) भिक्षुकञ्च तद्भोजितवान्।
(ख) प्रफुल्लचन्द्ररायः गोपबन्धुम् उत्कलमणिः इति उपाधिना सम्मानितवान्।
(ग) गोपबन्धुः अश्रुपूर्णनयनोऽभवत्।
(घ) अतिथयो हस्तपादं क्षालयित्वा आसनेषु उपविष्टवन्तः।
(ङ) दिनत्रयात् किमपि न भुक्तम्।
सही क्रम: (घ) → (ङ) → (ग) → (क) → (ख)
| क्रमः (मूल अक्षर) | वाक्यम् | क्या हुआ |
|---|---|---|
| १. (घ) | अतिथयो हस्तपादं क्षालयित्वा आसनेषु उपविष्टवन्तः । | भोज में बुलाए गए अतिथि हाथ-पैर धोकर आसनों पर बैठे। |
| २. (ङ) | दिनत्रयात् किमपि न भुक्तम् । | बाहर से भिक्षुक की पुकार — ‘तीन दिन से कुछ नहीं खाया’। |
| ३. (ग) | गोपबन्धुः अश्रुपूर्णनयनोऽभवत् । | वह करुण स्वर सुनते ही गोपबन्धु की आँखें भर आईं। |
| ४. (क) | भिक्षुकञ्च तद्भोजितवान् । | उन्होंने अपना परोसा हुआ भोजन ले जाकर भिक्षुक को खिला दिया। |
| ५. (ख) | प्रफुल्लचन्द्ररायः गोपबन्धुम् उत्कलमणिः इति उपाधिना सम्मानितवान् । | ऐसे त्याग के कारण आगे चलकर उन्हें ‘उत्कलमणि’ उपाधि मिली। |
योग्यताविस्तरः — पृष्ठ 47–48योग्यताविस्तरः (पृष्ठ 47–48) पठन-सामग्री है — इस पर आधारित ये प्रश्न अभ्यास हेतु जोड़े गए हैं: श्लोकव्याख्या, जीवनपरिचयः, सत्यवादि-वनविद्यालयः
तदर्थं भोजनं कुर्याः मा शरीरे दयां कुरु॥
— अस्य श्लोकस्य पदच्छेदम् अन्वयं भावार्थं च लिखत।
पदच्छेदः — भोजनस्य, अतिदौर्लभ्यम्, जीवनाय, सुखप्रदम्, तदर्थम्, भोजनम्, कुर्याः, मा, शरीरे, दयाम्, कुरु।
अन्वयः — भोजनस्य अतिदौर्लभ्यं (विद्यते)। जीवनाय सुखप्रदं भोजनं कुर्याः। तदर्थं शरीरे दयां मा कुरु।
अर्थः — भोजन बहुत कठिनाई से मिलता है। जीवन को आगे ले जाने के लिए सुख देने वाला भोजन करना चाहिए। इसलिए (भोजन करते समय) शरीर पर दया मत कीजिए — अर्थात् संकोच छोड़कर भरपेट भोजन कीजिए।
भावार्थः (पुस्तकानुसारम्) — भोजनम् अतीव दुर्लभं भवति। जीवनम् अग्रे नेतुं सुखप्रदं भोजनं करणीयम्। अतः शरीरस्य कष्टं विचिन्त्य भोजनविषये कदापि सङ्कोचः लज्जा वा न करणीया इति।
पुस्तक के ‘योग्यताविस्तरः’ (पृष्ठ 47) में दिया गया जीवन-परिचय —
| विषयः | विवरणम् | हिन्दी |
|---|---|---|
| नाम | उत्कलमणिः गोपबन्धुदासः | उत्कलमणि गोपबन्धुदास |
| जन्म | ०९/१०/१८७७ | 9 अक्तूबर 1877 |
| जन्मस्थानम् | सुआण्डो-ग्रामः, पुरी-जनपदः, ओडिशाराज्यम् | सुआण्डो गाँव, पुरी ज़िला, ओडिशा |
| पिता | दैत्यारिदासः | दैत्यारि दास |
| माता | स्वर्णमयी देवी | स्वर्णमयी देवी |
| पत्नी | मोती देवी | मोती देवी |
| एफ़्.ए. उत्तीर्णः | १९००, रेभेन्सा महाविद्यालयः, कटकम्, ओडिशा | 1900, रेभेन्सा (Ravenshaw) कॉलेज, कटक |
| बी.एल्. उत्तीर्णः | १९०६, कलकत्ता-विश्वविद्यालयः | 1906, कलकत्ता विश्वविद्यालय |
| सत्यवादि-वनविद्यालयस्य प्रतिष्ठा | १९०९ | 1909 |
| बिहार-ओडिशा व्यवस्थापकसभायाः सदस्यः | १९१७ | 1917 |
| समाज-साप्ताहिकपत्रिकायाः प्रकाशनम् | १९१९ | 1919 |
| भारतीय-जातीय-आन्दोलने योगदानम् | १९२० | 1920 |
| उत्कलमणिः इति उपाधिना सम्माननम् | १९२४ | 1924 |
| रचनाः | अवकाशचिन्ता, बन्दीर आत्मकथा, कारा-कविता, धर्मपद, गो-माहात्म्य, नचिकेता-उपाख्यान | उनकी ओडिआ रचनाएँ |
| स्वर्गारोहणम् (साक्षी-गोपाले) | १७.०६.१९२८ | 17 जून 1928, साक्षीगोपाल में |
सत्यवादि-वनविद्यालयः भारतस्य प्रथमः मुक्तविद्यालयः आसीत् । १९०९ ख्रिस्ताब्दे अगस्तमासस्य १२ दिनाङ्के साक्षीगोपाल-नामके स्थाने सः प्रतिष्ठापितः ।
[सत्यवादि-वनविद्यालय भारत का पहला मुक्त विद्यालय (खुला विद्यालय) था। इसकी स्थापना 12 अगस्त 1909 को साक्षीगोपाल नामक स्थान पर हुई।]
प्रतिष्ठातारः — पण्डितः गोपबन्धुदासः, पण्डितः नीलकण्ठदासः, पण्डितः डा. गोदावरीशमिश्रः, पण्डितः कृपासिन्धुमिश्रः, पण्डितः लिङ्गराजमिश्रः, आचार्यः हरिहरदासः, पण्डितः नन्दकिशोरदासः च — एतेषां देशभक्तानां मिलितप्रयासेन अयं निःशुल्कवनविद्यालयः तदानीम् आभारतं प्रतिष्ठाम् अलभत ।
[इन देशभक्तों के सम्मिलित प्रयास से यह निःशुल्क वनविद्यालय उस समय पूरे भारत में प्रसिद्ध हो गया।]
कार्यम् — पञ्चसखायः मिलित्वा समाजसेवां कुर्वन्तः शिक्षाविकासं च कारयन्तः स्वाधीनतान्दोलनाय जनान् प्रेरयन्ति स्म ।
[पाँचों मित्र मिलकर समाजसेवा करते, शिक्षा का विकास कराते और लोगों को स्वाधीनता-आन्दोलन के लिए प्रेरित करते थे।]
परियोजनाकार्यम् — पृष्ठ 48परियोजनाकार्यम् — १, २
(यह करने का कार्य है — उत्तर आपके अपने प्रदेश के अनुसार होगा; चित्र चिपकाकर लिखिए। नीचे पाठ के ही उदाहरण पर नमूना है।)
| शीर्षकम् | विवरणम् |
|---|---|
| नाम | उत्कलमणिः गोपबन्धुदासः |
| जन्म | ०९/१०/१८७७, सुआण्डो-ग्रामः, पुरी-जनपदः, ओडिशाराज्यम् |
| माता-पिता | माता स्वर्णमयी देवी, पिता दैत्यारिदासः |
| शिक्षा | एफ़्.ए. — १९०० (रेभेन्सा महाविद्यालयः, कटकम्); बी.एल्. — १९०६ (कलकत्ता-विश्वविद्यालयः) |
| कार्यक्षेत्रम् | शिक्षा, समाजसेवा, पत्रकारिता, स्वतन्त्रतान्दोलनम् |
| प्रमुखं योगदानम् | सत्यवादि-वनविद्यालयस्य (१९०९), दरिद्रनारायणसेवा-सङ्घस्य, ‘समाजः’ इति वार्तापत्रस्य च प्रतिष्ठा; जलप्लावपीडितानां सेवा |
| उपाधिः | ‘उत्कलमणिः’ — आचार्यप्रफुल्लचन्द्ररायेण दत्तः (१९२४) |
| स्वर्गारोहणम् | १७.०६.१९२८, साक्षी-गोपाले |
नमूना अनुच्छेदः — गोपबन्धुदासः ओडिशाराज्यस्य महान् समाजसेवकः स्वतन्त्रतासङ्ग्रामी च आसीत्। सः छात्रान् निःशुल्कम् अपाठयत्, दरिद्राणां रोगिणां च सेवाम् अकरोत्, ‘समाजः’ इति दिनपत्रिकां च प्रारभत। महात्मगान्धेः प्रेरणया सः स्वतन्त्रतान्दोलने भागं गृहीतवान् वर्षद्वयं कारावासं च प्राप्तवान्। तस्य त्यागं दृष्ट्वा प्रफुल्लचन्द्ररायः तं ‘उत्कलमणिः’ इति उपाधिना सम्मानितवान्।
(यह अपनी योजना लिखने का कार्य है; नीचे एक नमूना है।)
नमूना उत्तर — ‘जलप्लावपीडितसाहाय्य-योजना’
| क्रमः | कार्यम् (संस्कृतम्) | हिन्दी |
|---|---|---|
| १. | विद्यालये ‘साहाय्यसमितिः’ रचनीया । | विद्यालय में एक सहायता-समिति बनाएँ। |
| २. | छात्राः वस्त्राणि, कम्बलान्, पाठ्यपुस्तकानि च सङ्गृह्णीयुः । | छात्र कपड़े, कम्बल और पाठ्यपुस्तकें एकत्र करें। |
| ३. | शुष्कान्नस्य (चिपिटक-गुड-लवण-जलस्य) पेटिकाः सज्जीकरणीयाः । | सूखा अन्न (चूड़ा, गुड़, नमक, पानी) के पैकेट तैयार करें। |
| ४. | औषधानि प्राथमिकोपचारपेटिकाः च चिकित्सालयस्य सहायतया एकत्रीकरणीयाः । | चिकित्सालय की सहायता से दवाइयाँ और प्राथमिक उपचार पेटी जुटाएँ। |
| ५. | ग्रामे स्वच्छजलस्य पेयजलस्य च व्यवस्था करणीया । | गाँव में स्वच्छ पेयजल की व्यवस्था करें। |
| ६. | विद्यालयभवने अस्थायी-आश्रयस्थलं कल्पनीयम् । | विद्यालय भवन में अस्थायी आश्रय-स्थल बनाएँ। |
| ७. | बालकानां कृते पठनक्रीडयोः व्यवस्था करणीया, येन तेषां भयं न्यूनं भवेत् । | बच्चों के लिए पढ़ाई-खेल की व्यवस्था करें, जिससे उनका डर कम हो। |
| ८. | स्थानीयप्रशासनेन सह सम्पर्कं कृत्वा सामग्री प्रेषणीया । | स्थानीय प्रशासन से सम्पर्क करके सामग्री भिजवाएँ। |
Chapter 4 of 13 – Sanskrit
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NCERT Solutions Class 8 Sanskrit Chapter 4 प्रणम्यो देशभक्तोऽयं गोपबन्धुर्महामनाः – Overview
| Class | Class 8 |
| Subject | Sanskrit |
| Chapter | 4 – प्रणम्यो देशभक्तोऽयं गोपबन्धुर्महामनाः |
| Session | 2027 |
| Format | Full answers on this page + PDF |
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