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NCERT Solutions for Class 8 Sanskrit Chapter 4 प्रणम्यो देशभक्तोऽयं गोपबन्धुर्महामनाः (PDF) – 2027

NCERT Solutions for Class 8 Sanskrit Chapter 4 प्रणम्यो देशभक्तोऽयं गोपबन्धुर्महामनाः – step-by-step answers to every exercise and in-text question of the chapter, as per the latest NCERT syllabus for 2027. Read them online or download the free question-answer PDF.

कक्षा 8 संस्कृत (दीपकम्) का चतुर्थः पाठः — प्रणम्यो देशभक्तोऽयं गोपबन्धुर्महामनाः ओडिशा के महान् समाजसेवक, स्वतन्त्रतासङ्ग्रामी और ‘उत्कलमणि’ गोपबन्धुदास का चरित-गद्य है — पाठ चित्रसंवाद से आरम्भ होता है, फिर भोजनसभा की करुण घटना, फिर उनका जीवनवृत्त, और अन्त में उनका प्रसिद्ध श्लोक ‘स्वदेशभूमौ मम लीयतां तनुः’। व्याकरण की दृष्टि से पाठ का केन्द्र है पूर्वरूपसन्धिः (देशभक्तो + अयम् = देशभक्तोऽयम्) तथा क्तवतु-प्रत्ययान्त पदों का स्त्रीलिङ्ग रूप (गतवान् — गतवती)। नीचे पृष्ठ 36 से 48 तक का चित्रसंवाद, वयं शब्दार्थान् जानीमः, पाठगत श्लोक, अत्र इदम् अवधेयम्, अभ्यासात् जायते सिद्धिः के प्रश्न १–८ (हर उपभाग सहित), योग्यताविस्तरः तथा परियोजनाकार्यम् क्रम से हल हैं — पहले संस्कृत उत्तर, फिर कोष्ठक में हिन्दी अर्थ; व्याकरण और अतिरिक्त बातें हर उत्तर के नीचे ‘विस्तार से समझिए’ में हैं।

NCERT Solutions for Class 8 Sanskrit Chapter 4 प्रणम्यो देशभक्तोऽयं गोपबन्धुर्महामनाः PDF

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Solutions PDFप्रणम्यो देशभक्तोऽयं गोपबन्धुर्महामनाःView PDF

पाठ का हिंदी अनुवाद

कक्षा में संवाद (पृष्ठ 36–37)
(एकदा जलप्लावपीडितानां साहाय्यार्थं शिक्षकाः छात्राश्च सभागारे चर्चां कुर्वन्ति।)
(एक बार बाढ़-पीड़ितों की सहायता के लिए शिक्षक और छात्र सभागार में चर्चा करते हैं।)
आचार्यः — नमस्ते छात्राः ! ह्यस्तनीं वार्तां श्रुतवन्तः किम् ?
आचार्य — नमस्ते छात्रो! क्या तुमने कल का समाचार सुना?
हिमानी — नमो नमः आचार्य ! ओडिशा-राज्यस्य केन्द्रापडा-जनपदे महानद्यां भयङ्करः जलप्लावः सम्भूतः। जलप्लावेन तत्र महती हानिः सञ्जाता।
हिमानी — नमस्कार आचार्य जी! ओडिशा राज्य के केन्द्रापड़ा जिले में महानदी में भयंकर बाढ़ आई है। बाढ़ से वहाँ बहुत बड़ी हानि हुई है।
आचार्यः — आम्, हिमानि ! त्वं सत्यं वदसि। जलप्लावेन वासगृहाणि नष्टानि, केचित् अस्वस्थाः चिकित्सालये मृत्युना सह युध्यन्ते। अन्ये च अनाहारेण कष्टं सहन्ते। बहवः गृहपालिताः पशवोऽपि नदीस्रोतसा प्रवाहिताः मृताश्च।
आचार्य — हाँ, हिमानी! तुम सच कहती हो। बाढ़ से रहने के घर नष्ट हो गए हैं, कुछ बीमार लोग अस्पताल में मृत्यु से लड़ रहे हैं। और दूसरे लोग भोजन न मिलने से कष्ट सह रहे हैं। बहुत-से पालतू पशु भी नदी की धारा में बह गए और मर गए।
अशोकः — महोदय ! ते सम्प्रति अतिदुःखिताः भवेयुः खलु ?
अशोक — महोदय! वे लोग इस समय बहुत दुखी होंगे न?
आचार्यः — सत्यम्, अशोक ! ते सर्वे अतिदुःखेन जीवन्ति। अस्माभिः एतादृशानां दुःखितानां सहायता करणीया। यथा उत्कलमणिः गोपबन्धुः जलप्लावपीडितानाम् अकुण्ठं सेवां कृत्वा अद्यापि जनमानसेषु समादृतोऽस्ति।
आचार्य — सच है, अशोक! वे सब बहुत दुख में जी रहे हैं। हमें ऐसे दुखी लोगों की सहायता करनी चाहिए। जैसे उत्कलमणि गोपबन्धु बाढ़-पीड़ितों की आग्रहपूर्वक (खुले मन से) सेवा करके आज भी लोगों के मन में सम्मानित हैं।
छात्रा — महोदय ! एषः गोपबन्धुः कः ?
छात्रा — महोदय! ये गोपबन्धु कौन हैं?
आचार्यः — भवन्तः सर्वे एतत् चित्रं पश्यन्तु। एषः अस्ति दीनबन्धुः गोपबन्धुः। सम्प्रति वयं तस्य विषये जानीमः।
आचार्य — आप सब यह चित्र देखिए। ये हैं दीनों के बन्धु (सहायक) गोपबन्धु। अब हम उनके विषय में जानते हैं।
भोजन के समय की घटना (पृष्ठ 38)
एकदा आचार्यहरिहरदासः सत्यवादि-वनविद्यालयस्य सर्वान् अध्यापकान् भोजनाय आमन्त्रितवान्।
एक बार आचार्य हरिहरदास ने सत्यवादी वनविद्यालय के सभी अध्यापकों को भोजन के लिए आमंत्रित किया।
आमन्त्रिताः सर्वे अतिथयः हस्तपादं क्षालयित्वा आसनेषु उपविष्टवन्तः। बहूनि सुस्वादूनि व्यञ्जनानि कदलीपत्रेषु परिवेषितानि।
सभी आमंत्रित अतिथि हाथ-पैर धोकर आसनों पर बैठ गए। केले के पत्तों पर बहुत-से स्वादिष्ट व्यंजन परोसे गए।
हसन् गोपबन्धुरवदत् – अरे !
हँसते हुए गोपबन्धु बोले – अरे!
भोजनस्यातिदौर्लभ्यं जीवनाय सुखप्रदम्।
तदर्थं भोजनं कुर्याः मा शरीरे दयां कुरु॥
भोजन अत्यन्त दुर्लभ है (बड़ी कठिनाई से मिलता है), और जीवन के लिए सुख देने वाला है।
इसलिए भोजन करो, शरीर पर दया मत करो।
(भाव: भोजन करते समय संकोच या लज्जा नहीं करनी चाहिए।)
एतच्छ्रुत्वा सर्वे उच्चैः हसितवन्तः।
यह सुनकर सब ज़ोर से हँस पड़े।
तदानीमेव बहिः कश्चन करुणध्वनिः गोपबन्धोः कर्णयोः अगुञ्जत् –
उसी समय बाहर से आती हुई कोई करुण ध्वनि गोपबन्धु के कानों में गूँजी –
“मातः, मातः ! बुभुक्षितोऽस्मि, कृपया किञ्चित् भोजनं देहि। दिनत्रयात् किमपि न भुक्तम्। भोजनं देहि मातः ! भोजनं देहि। आँ आँ . . .”
“माँ, माँ! मैं भूखा हूँ, कृपया थोड़ा भोजन दो। तीन दिन से कुछ भी नहीं खाया है। भोजन दो माँ! भोजन दो। आँ आँ . . .”
इति क्रन्दनध्वनिं श्रुत्वैव दयाविगलितहृदयः गोपबन्धुः अश्रुपूर्णनयनोऽभवत्।
यह रोने की आवाज़ सुनते ही दया से पिघले हृदय वाले गोपबन्धु की आँखें आँसुओं से भर गईं।
किमपि अविचिन्त्य झटिति स्वस्मै परिवेषितं भोजनं हस्ते गृहीत्वा बहिरागतवान्। भिक्षुकञ्च तद्भोजितवान्।
कुछ भी सोचे बिना वे तुरन्त अपने लिए परोसा गया भोजन हाथ में लेकर बाहर आ गए और भिखारी को वह भोजन खिला दिया।
गोपबन्धुदास का जीवन (पृष्ठ 39)
असौ महान् समाजसेवकः आसीत् गोपबन्धुदासः। असौ सत्यवादि-वनविद्यालयस्य अध्यापकः, प्रसिद्धेषु पञ्चमित्रेषु अन्यतमः स्वतन्त्रतासङ्ग्रामी चासीत्।
गोपबन्धुदास एक महान समाजसेवक थे। वे सत्यवादी वनविद्यालय के अध्यापक, प्रसिद्ध पाँच मित्रों (पञ्चसखा) में से एक और स्वतंत्रता सेनानी भी थे।
ओडिशाराज्यस्य पुरीजनपदस्य साक्षीगोपालसमीपे सुआण्डो-ग्रामे जन्म लब्धवान्।
उन्होंने ओडिशा राज्य के पुरी जिले में साक्षीगोपाल के पास सुआण्डो गाँव में जन्म लिया।
अध्ययनकालादेव स दरिद्राणां रोगिणां च सेवामकरोत्। सत्यवादि-वनविद्यालये स छात्रान् निःशुल्कम् अपाठयत्।
पढ़ाई के समय से ही वे गरीबों और रोगियों की सेवा करते थे। सत्यवादी वनविद्यालय में वे छात्रों को निःशुल्क पढ़ाते थे।
निरक्षरतादूरीकरणाय सः सततं यतते स्म। कार्पासवस्त्रनिर्माणाय सः स्वयमेव सूत्रप्रस्तुतिमकरोत्।
निरक्षरता दूर करने के लिए वे लगातार प्रयत्न करते रहते थे। सूती वस्त्र बनाने के लिए वे स्वयं ही सूत तैयार करते (कातते) थे।
जन्मभूमेः दुर्दशामवलोक्य स सर्वदा चिन्ताकुलो भवति स्म। महात्मगान्धेः प्रेरणया भारतीयस्वतन्त्रतान्दोलने गोपबन्धुः भागं गृहीतवान्। सः वर्षद्वयं यावत् कारावासं प्राप्तवान्।
जन्मभूमि की दुर्दशा देखकर वे सदा चिन्ता से व्याकुल रहते थे। महात्मा गांधी की प्रेरणा से गोपबन्धु ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया। वे दो वर्ष तक कारावास में रहे।
कारागारे निवसन् सः ‘बन्दीर आत्मकथा’, ‘कारा-कविता’, ‘धर्मपद’, ‘गो-माहात्म्य’, ‘नचिकेता-उपाख्यान’ इत्यादीनि बहुप्रेरणादायीनि पुस्तकानि ओडिआभाषया विरचितवान्।
कारागार में रहते हुए उन्होंने ‘बन्दीर आत्मकथा’, ‘कारा-कविता’, ‘धर्मपद’, ‘गो-माहात्म्य’, ‘नचिकेता-उपाख्यान’ आदि बहुत प्रेरणा देने वाली पुस्तकें ओडिआ भाषा में लिखीं।
सर्वदा स्वदेशस्यैव वस्त्राणां वस्तूनां च उपयोगं कृतवान्।
उन्होंने सदा अपने देश के ही वस्त्रों और वस्तुओं का उपयोग किया।
मरणासन्नं स्वपुत्रमपि विहाय जलप्लावपीडितान् भारतमातुः सहस्रशः पुत्रान् उद्धर्तुं गृहात् बहिः निर्गतः समाजमसेवत च।
मृत्यु के निकट पहुँचे अपने पुत्र को भी छोड़कर वे बाढ़ से पीड़ित भारत माता के हज़ारों पुत्रों को बचाने के लिए घर से बाहर निकल पड़े और उन्होंने समाज की सेवा की।
देशसेवातत्परस्य गोपबन्धुवर्यस्य प्रसिद्धं प्रेरणादायकं वचनमधुनापि जनमानसेषु राष्ट्रभक्तिं जागरयति।
देश-सेवा में तत्पर श्रेष्ठ गोपबन्धु का प्रसिद्ध और प्रेरणादायक वचन आज भी लोगों के मन में राष्ट्रभक्ति जगाता है।
गोपबन्धु का प्रसिद्ध वचन और उपाधि (पृष्ठ 41)
स्वदेशभूमौ मम लीयतां तनुः,
स्वदेशलोकास्तदनु प्रयान्तु नु।
स्वराज्यमार्गे यदि गर्तमालिका,
ममास्थिमांसैः परिपूरितास्तु सा॥
अपने देश की भूमि में मेरा शरीर विलीन हो जाए,
मेरे देश के लोग उसके बाद (मेरे पीछे-पीछे) चलें।
स्वराज्य के मार्ग में यदि गड्ढों की शृङ्खला हो,
तो वह मेरी हड्डियों और मांस से भर जाए।
(ओडिआ मूल, देवनागरी लिपि में)
मिशु मोर देह ए देश माटिरे,
देशवासी चालि जाआन्तु पिठिरे,
देशर स्वराज्य पथे जेते गाड,
पुरु तहिँ पडि मोर मांस हाड॥
मेरी देह इस देश की मिट्टी में मिल जाए,
देशवासी (मेरी) पीठ पर से होकर चले जाएँ,
देश के स्वराज्य के पथ में जितने गड्ढे हों,
उनमें पड़कर मेरा मांस और हड्डियाँ उन्हें भर दें।
भावार्थः —
स्वदेशस्य भूमिभागे मम शरीरं विलीनं भवतु।
देशवासिनः मम अनुसरणं कुर्वन्तु।
देशस्य स्वतन्त्रतानिमित्तं यत्र यत्र प्रतिबन्धकाः गर्ताः सन्ति,
ते सर्वे गर्ताः मम अस्थिभिः मांसैश्च परिपूर्णाः भवन्तु।
भावार्थ —
अपने देश की भूमि में मेरा शरीर विलीन हो जाए।
देशवासी मेरा अनुसरण करें।
देश की स्वतंत्रता के लिए (उसके मार्ग में) जहाँ-जहाँ रुकावट डालने वाले गड्ढे हैं,
वे सभी गड्ढे मेरी हड्डियों और मांस से भर जाएँ।
असौ सत्यवादि-वनविद्यालयस्य, दरिद्रनारायणसेवा-सङ्घस्य, सत्यवादि-मुद्रणालयस्य, समाजः इति दैनिक-वार्तापत्रस्य च प्रतिष्ठाता आसीत्।
वे सत्यवादी वनविद्यालय, दरिद्रनारायण सेवा संघ, सत्यवादी मुद्रणालय (छापाखाना) और ‘समाज’ नामक दैनिक समाचारपत्र के संस्थापक थे।
समाजः इति दिनपत्रिका शताधिकवर्षेभ्यः अधुनापि प्रतिदिनं प्रकाश्यते।
‘समाज’ नामक दैनिक पत्रिका सौ से अधिक वर्षों से आज भी प्रतिदिन प्रकाशित होती है।
समाजसेवायै देशसेवायै च तस्य असीमं त्यागमनुभवन् वैज्ञानिकः आचार्यः प्रफुल्लचन्द्ररायः गोपबन्धुम् उत्कलमणिः इति उपाधिना सम्मानितवान्।
समाज-सेवा और देश-सेवा के लिए उनके अपार त्याग को अनुभव करते हुए वैज्ञानिक आचार्य प्रफुल्लचन्द्र राय ने गोपबन्धु को ‘उत्कलमणि’ उपाधि से सम्मानित किया।
उत्कलमणिरित्याख्यः प्रसिद्धो लोकसेवकः।
प्रणम्यो देशभक्तोऽयं गोपबन्धुर्महामनाः॥
‘उत्कलमणि’ नाम से विख्यात, प्रसिद्ध लोकसेवक,
उच्च विचारों वाले ये देशभक्त गोपबन्धु प्रणाम करने योग्य हैं।
अत्र इदम् अवधेयम् — पूर्वरूपसन्धि (पृष्ठ 44)
पूर्वरूपसन्धिः – पदस्य अन्ते यदा “ए”कारः अथवा “ओ”कारः भवति, तदनन्तरम् अग्रिमपदस्य प्रथमवर्णः “अ”कारः भवति तदा पूर्वरूपसन्धिः भवति। तत्र “अ”कारस्य स्थाने “ऽ” इति अवग्रहचिह्नस्य प्रयोगः भवति।
पूर्वरूप सन्धि – जब किसी पद के अन्त में ‘ए’ या ‘ओ’ हो और उसके बाद अगले पद का पहला वर्ण ‘अ’ हो, तब पूर्वरूप सन्धि होती है। वहाँ ‘अ’ के स्थान पर ‘ऽ’ (अवग्रह-चिह्न) का प्रयोग होता है।
उदा – देशभक्तो + अयम् = देशभक्तोऽयम्
सर्वे + अपि = सर्वेऽपि
पशवो + अपि = पशवोऽपि
बुभुक्षितो + अस्मि = बुभुक्षितोऽस्मि
अश्रुपूर्णनयनो + अभवत् = अश्रुपूर्णनयनोऽभवत्
उदाहरण – देशभक्तोऽयम् (यह देशभक्त)
सर्वेऽपि (सभी भी)
पशवोऽपि (पशु भी)
बुभुक्षितोऽस्मि (मैं भूखा हूँ)
अश्रुपूर्णनयनोऽभवत् (आँसुओं से भरी आँखों वाला हो गया)
योग्यताविस्तरः — श्लोक का अर्थ (पृष्ठ 47)
भोजनस्यातिदौर्लभ्यं जीवनाय सुखप्रदम्।
तदर्थं भोजनं कुर्याः मा शरीरे दयां कुरु॥
भोजन अत्यन्त दुर्लभ है, और जीवन के लिए सुख देने वाला है।
इसलिए भोजन करो, शरीर पर दया मत करो।
पदच्छेदः – भोजनस्य अतिदौर्लभ्यम् जीवनाय सुखप्रदम् तदर्थम् भोजनम् कुर्याः मा शरीरे दयाम् कुरु।
पदच्छेद (श्लोक के पद अलग-अलग) – भोजन की, अत्यन्त दुर्लभता, जीवन के लिए, सुख देने वाला, उसके लिए, भोजन, करो, मत, शरीर पर, दया, करो।
अन्वयः – भोजनस्य अतिदौर्लभ्यं (विद्यते)। जीवनाय सुखप्रदं भोजनं कुर्याः। तदर्थं शरीरे दयां मा कुरु।
अन्वय – भोजन की अत्यन्त दुर्लभता है (भोजन बड़ी कठिनाई से मिलता है)। जीवन के लिए सुख देने वाला भोजन करो। इसलिए शरीर पर दया मत करो।
भावार्थः – भोजनम् अतीव दुर्लभं भवति। जीवनम् अग्रे नेतुं सुखप्रदं भोजनं करणीयम्। अतः शरीरस्य कष्टं विचिन्त्य भोजनविषये कदापि सङ्कोचः लज्जा वा न करणीया इति।
भावार्थ – भोजन बहुत दुर्लभ होता है। जीवन को आगे बढ़ाने के लिए सुख देने वाला भोजन करना चाहिए। इसलिए शरीर के कष्ट का विचार करके भोजन के विषय में कभी संकोच या लज्जा नहीं करनी चाहिए।
उत्कलमणि-गोपबन्धुदासस्य जीवनपरिचयः (पृष्ठ 47–48)
उत्कलमणिः गोपबन्धुदासः
जन्म – ०९/१०/१८७७
जन्मस्थानम् – सुआण्डो-ग्रामः, पुरी-जनपदः, ओडिशाराज्यम्
पिता – दैत्यारिदासः
माता – स्वर्णमयी देवी
पत्नी – मोती देवी
उत्कलमणि गोपबन्धुदास
जन्म – ९ अक्टूबर १८७७
जन्मस्थान – सुआण्डो गाँव, पुरी जिला, ओडिशा राज्य
पिता – दैत्यारिदास
माता – स्वर्णमयी देवी
पत्नी – मोती देवी
एफ़्.ए. उत्तीर्णः – १९००, रेभेन्सा महाविद्यालयः, कटकम्, ओडिशा
बी.एल्. उत्तीर्णः – १९०६, कलकत्ता – विश्वविद्यालयः
सत्यवादि-वनविद्यालयस्य प्रतिष्ठा – १९०९
बिहार-ओडिशा व्यवस्थापकसभायाः सदस्यः – १९१७
समाज-साप्ताहिकपत्रिकायाः प्रकाशनम् – १९१९
भारतीय-जातीय-आन्दोलने योगदानम् – १९२०
उत्कलमणिः इति उपाधिना सम्माननम् – १९२४
एफ़.ए. उत्तीर्ण – १९००, रेभेन्सा महाविद्यालय, कटक, ओडिशा
बी.एल. उत्तीर्ण – १९०६, कलकत्ता विश्वविद्यालय
सत्यवादी वनविद्यालय की स्थापना – १९०९
बिहार-ओडिशा व्यवस्थापक सभा (विधान परिषद्) के सदस्य – १९१७
‘समाज’ साप्ताहिक पत्रिका का प्रकाशन – १९१९
भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में योगदान – १९२०
‘उत्कलमणि’ उपाधि से सम्मान – १९२४
रचनाः – अवकाशचिन्ता, बन्दीर आत्मकथा, कारा-कविता, धर्मपद, गो-माहात्म्य, नचिकेता-उपाख्यान
स्वर्गारोहणम् (साक्षी-गोपाले) – १७.०६.१९२८
रचनाएँ – अवकाशचिन्ता, बन्दीर आत्मकथा, कारा-कविता, धर्मपद, गो-माहात्म्य, नचिकेता-उपाख्यान
देहावसान (साक्षीगोपाल में) – १७ जून १९२८
सत्यवादि-वनविद्यालयः (पृष्ठ 48)
भारतस्य प्रथमः मुक्तविद्यालयः। १९०९ ख्रिस्ताब्दे अगस्तमासस्य १२ दिनाङ्के साक्षीगोपाल-नामके स्थाने प्रतिष्ठापितः।
(यह) भारत का पहला मुक्त (खुला) विद्यालय था। सन् १९०९ ई. में अगस्त महीने की १२ तारीख को साक्षीगोपाल नामक स्थान पर इसकी स्थापना हुई।
पण्डितः गोपबन्धुदासः, पण्डितः नीलकण्ठदासः, पण्डितः डा. गोदावरीशमिश्रः, पण्डितः कृपासिन्धुमिश्रः, पण्डितः लिङ्गराजमिश्रः, आचार्यः हरिहरदासः, पण्डितः नन्दकिशोरदासः च इत्येषां देशभक्तानां मिलितप्रयासेन अयं निःशुल्कवनविद्यालयः तदानीम् आभारतं प्रतिष्ठाम् अलभत।
पण्डित गोपबन्धुदास, पण्डित नीलकण्ठदास, पण्डित डॉ. गोदावरीश मिश्र, पण्डित कृपासिन्धु मिश्र, पण्डित लिङ्गराज मिश्र, आचार्य हरिहरदास और पण्डित नन्दकिशोरदास – इन देशभक्तों के मिले-जुले प्रयास से इस निःशुल्क वनविद्यालय ने उस समय पूरे भारत में प्रतिष्ठा पाई।
पञ्चसखायः मिलित्वा समाजसेवां कुर्वन्तः शिक्षाविकासं च कारयन्तः स्वाधीनतान्दोलनाय जनान् प्रेरयन्ति स्म।
पञ्चसखा (पाँच मित्र) मिलकर समाज-सेवा करते हुए और शिक्षा का विकास कराते हुए लोगों को स्वाधीनता आंदोलन के लिए प्रेरित करते थे।

NCERT Solutions for Class 8 Sanskrit Chapter 4 प्रणम्यो देशभक्तोऽयं गोपबन्धुर्महामनाः – Questions and Answers

All questions of the chapter are answered below, in the order of the book – in-text questions, activities and the end-of-chapter exercises. Each answer is written the way you would write it in the exam.

पाठारम्भे चित्रसंवादः — पृष्ठ 36–37(एकदा जलप्लावपीडितानां साहाय्यार्थं शिक्षकाः छात्राश्च सभागारे चर्चां कुर्वन्ति।)

चित्रसंवादः
प्र.1आचार्यः — नमस्ते छात्राः ! ह्यस्तनीं वार्तां श्रुतवन्तः किम् ?
उत्तर

हिमानी वदति — नमो नमः आचार्य ! ओडिशा-राज्यस्य केन्द्रापडा-जनपदे महानद्यां भयङ्करः जलप्लावः सम्भूतः । जलप्लावेन तत्र महती हानिः सञ्जाता ।
[नमस्कार आचार्य जी! ओडिशा राज्य के केन्द्रापड़ा जनपद में महानदी में भयङ्कर बाढ़ आ गई। बाढ़ से वहाँ बहुत बड़ी हानि हुई है।]

प्र.2अशोकः — महोदय ! ते सम्प्रति अतिदुःखिताः भवेयुः खलु ?
उत्तर

आचार्यः वदति — सत्यम् अशोक ! ते सर्वे अतिदुःखेन जीवन्ति । अस्माभिः एतादृशानां दुःखितानां सहायता करणीया ।
[सच है अशोक! वे सब बहुत दुःख में जी रहे हैं। हमें ऐसे दुःखी लोगों की सहायता करनी चाहिए।]

प्र.3एका छात्रा — महोदय ! एषः गोपबन्धुः कः ?
उत्तर

आचार्यः वदति — भवन्तः सर्वे एतत् चित्रं पश्यन्तु । एषः अस्ति दीनबन्धुः गोपबन्धुः । सम्प्रति वयं तस्य विषये जानीमः ।
[आप सब यह चित्र देखिए। ये हैं दीनबन्धु गोपबन्धु। अब हम उनके विषय में जानेंगे।]

इसके पहले आचार्य ने उनका परिचय इस प्रकार दिया था — यथा उत्कलमणिः गोपबन्धुः जलप्लावपीडितानाम् अकुण्ठं सेवां कृत्वा अद्यापि जनमानसेषु समादृतोऽस्ति ।
[जैसे उत्कलमणि गोपबन्धु बाढ़-पीड़ितों की मन लगाकर सेवा करके आज भी लोगों के मन में सम्मानित हैं।]

वयं शब्दार्थान् जानीमः — पृष्ठ 42–43शब्दार्थाः — मातृभाषया अर्थं लिखत (पुस्तक की तालिका का अन्तिम स्तम्भ)

शब्दार्थाः
प्र.1मातृभाषया अर्थं लिखत — जलप्लावपीडितानाम्, नष्टानि, अनाहारेण, नदीस्रोतसा, अकुण्ठम्, समादृतः, सुस्वादूनि व्यञ्जनानि, दौर्लभ्यम्, निःशुल्कम्, करुणध्वनिः, अगुञ्जत्, बुभुक्षितः, दयाविगलितहृदयः, अश्रुपूर्णनयनः, परिवेषितम्, पञ्चमित्रेषु, स्वतन्त्रता-सङ्ग्रामी, जन्म लब्धवान्, कारावासम्, चिन्ताकुलः, देशसेवा-तत्परस्य, सहस्रशः, लीयताम्, प्रयान्तु, गर्तमालिका, अस्थिमांसैः, दैनिक-वार्तापत्रस्य, असीमम्, उत्कलमणिः, सम्मानितवान्, लोकसेवकः, महामनाः।
उत्तर

जिनकी मातृभाषा हिन्दी है, वे अन्तिम स्तम्भ में नीचे ‘हिन्दी’ स्तम्भ वाले अर्थ लिखें। अन्य भाषा वाले छात्र वही अर्थ अपनी मातृभाषा (ओडिआ, बाङ्ला, मराठी, तमिऴ्, गुजराती …) में लिखें। पूरी सूची (पृष्ठ 42–43) —

शब्दःअर्थः (संस्कृतम्)हिन्दीEnglish
जलप्लावपीडितानाम्नद्यां बहुजलप्रवाहेण धनजीवनक्षति-ग्रस्तानाम्बाढ़ पीड़ितों काOf flood victims
नष्टानिक्षतिग्रस्तानिनष्ट हुएDestroyed
अनाहारेणआहारेण विनाभोजन न करने सेBy abstaining from food
नदीस्रोतसानदीजलप्रवाहेणनदी के प्रवाह सेBy River currents
अकुण्ठम्कुण्ठं विना / साग्रहम्आग्रहपूर्वकGenerously
समादृतःआदरप्राप्तःसम्मानितHonored
सुस्वादूनि व्यञ्जनानिरुचिकराणि सूपशाकादीनिस्वादिष्ट भोजनDelicious food
दौर्लभ्यम्कष्टेन लभ्यम्कष्ट से प्राप्त किया गयाDifficulty in being obtained
निःशुल्कम्धनं विनानिःशुल्कWithout any fees
करुणध्वनिःविकलस्वरःकरुणा युक्त ध्वनिWeeping words
अगुञ्जत्गुञ्जनम् अकरोत्गूँजाEchoes
बुभुक्षितःक्षुधातुरःभूखाHungry
दयाविगलितहृदयःकरुणार्द्रहृदयःदया पूर्ण हृदय वाला / दयालुCompassionate heart
अश्रुपूर्णनयनःअश्रुयुक्तं नेत्रं यस्य सःआँसू से भरी हुई आँखों वालाEyes filled with tears
परिवेषितम्भोजनार्थं प्रदत्तम् (अन्नम्)परोसा गयाServed
पञ्चमित्रेषुपञ्चसंख्याकेषु मित्रेषुपाँच मित्रों मेंAmong five friends
स्वतन्त्रता-सङ्ग्रामीस्वतन्त्रता-सेनानीःस्वतन्त्रता सेनानीFreedom fighter
जन्म लब्धवान्जन्म प्राप्तवान्जन्म लियाWas born
कारावासम्कारागृहे बन्धनम्कारागार में रहनाLiving in jail
चिन्ताकुलःचिन्तया व्याकुलःचिन्ता से व्याकुलWorried
देशसेवा-तत्परस्यदेशसेवां कर्तुं तत्परस्यदेश सेवा हेतु तत्पर काOf the one who is ready to serve the country
सहस्रशःसहस्राधिकाःहज़ारोंIn thousands
लीयताम्विलीनतां यान्तुविलीन हो जाएँ(May it) merge
प्रयान्तुगच्छन्तुचलें(May they) walk over
गर्तमालिकागर्तानां शृङ्खलागड्ढों की शृङ्खलाSeries of potholes
अस्थिमांसैःअस्थिभिः मांसैः चहड्डी और माँस सेWith the bones and flesh of the body
दैनिक-वार्तापत्रस्यप्रतिदिनं प्रकाशित-पत्रस्यदैनिक समाचारपत्र काOf the daily newspaper
असीमम्अतुलनीयम्अपारImmense / Unparallel
उत्कलमणिःउत्कलस्य मणिसदृशः उपाधिविशेषःउत्कल की मणि (एक उपाधि)Gem of Odisha (A title)
सम्मानितवान्मानेन प्रशंसितवान्सम्मानित कियाHonored
लोकसेवकःजनसेवकःसमाज सेवकSocial worker
महामनाःउच्चविचारसम्पन्नःउच्च विचार वालाBroad-minded

पाठगतौ श्लोकौ — पृष्ठ 41पाठ में आए दो श्लोक (पृष्ठ 41) — पुस्तक में इन पर प्रश्न नहीं है; अभ्यास हेतु जोड़े गए प्रश्न

श्लोकाः
प्र.1स्वदेशभूमौ मम लीयतां तनुः,
स्वदेशलोकास्तदनु प्रयान्तु नु।
स्वराज्यमार्गे यदि गर्तमालिका,
ममास्थिमांसैः परिपूरितास्तु सा॥
— अस्य श्लोकस्य पदच्छेदम् अन्वयम् अर्थं भावं च लिखत।
उत्तर

पदच्छेदः — स्वदेशभूमौ, मम, लीयताम्, तनुः, स्वदेशलोकाः, तदनु, प्रयान्तु, नु, स्वराज्यमार्गे, यदि, गर्तमालिका, मम, अस्थिमांसैः, परिपूरिता, अस्तु, सा।

अन्वयः — मम तनुः स्वदेशभूमौ लीयताम्। तदनु स्वदेशलोकाः नु प्रयान्तु। यदि स्वराज्यमार्गे गर्तमालिका (अस्ति), सा मम अस्थिमांसैः परिपूरिता अस्तु।

अर्थः — मेरा शरीर अपने देश की मिट्टी में विलीन हो जाए, और उसके बाद (उसी मिट्टी पर चलते हुए) देशवासी आगे बढ़ें। यदि स्वराज्य के मार्ग में गड्ढों की शृङ्खला हो, तो वह मेरी हड्डियों और माँस से भर जाए।

भावः — गोपबन्धु देश के लिए अपना सब कुछ, यहाँ तक कि अपना शरीर भी, अर्पित करना चाहते हैं; स्वतन्त्रता के मार्ग की हर बाधा को वे अपने शरीर से भर देना चाहते हैं, ताकि देशवासी सरलता से आगे बढ़ सकें।

प्र.2उत्कलमणिरित्याख्यः प्रसिद्धो लोकसेवकः।
प्रणम्यो देशभक्तोऽयं गोपबन्धुर्महामनाः॥
— अस्य श्लोकस्य पदच्छेदम् अन्वयम् अर्थं भावं च लिखत।
उत्तर

पदच्छेदः — उत्कलमणिः, इति, आख्यः, प्रसिद्धः, लोकसेवकः, प्रणम्यः, देशभक्तः, अयम्, गोपबन्धुः, महामनाः।

अन्वयः — ‘उत्कलमणिः’ इति आख्यः प्रसिद्धः लोकसेवकः महामनाः अयं देशभक्तः गोपबन्धुः प्रणम्यः (अस्ति)।

अर्थः — जिनका नाम ‘उत्कलमणि’ है, जो प्रसिद्ध लोकसेवक और उच्च विचारों वाले हैं — ये देशभक्त गोपबन्धु प्रणाम करने योग्य हैं।

भावः — निःस्वार्थ जनसेवा और देशभक्ति के कारण उत्कलमणि गोपबन्धु केवल स्मरणीय ही नहीं, प्रणाम करने योग्य हैं।

अत्र इदम् अवधेयम् — पृष्ठ 44पूर्वरूपसन्धिः (पृष्ठ 44 का नियम-बॉक्स — पुस्तक में इस पर प्रश्न नहीं है; अभ्यास हेतु जोड़ा गया प्रश्न)

सन्धिः
प्र.1पूर्वरूपसन्धिः — पदस्य अन्ते यदा “ए”कारः अथवा “ओ”कारः भवति, तदनन्तरम् अग्रिमपदस्य प्रथमवर्णः “अ”कारः भवति तदा पूर्वरूपसन्धिः भवति। तत्र “अ”कारस्य स्थाने “ऽ” इति अवग्रहचिह्नस्य प्रयोगः भवति। — नियमम् उदाहरणैः सह स्पष्टीकुरुत।
उत्तर

नियमः — जब पहले पद के अन्त में ए या ओ हो और उसके तुरन्त बाद वाले पद का पहला वर्ण अ हो, तब वह ‘अ’ लुप्त हो जाता है और पहला पद ज्यों का त्यों (पूर्वरूप में) बना रहता है। लुप्त हुए ‘अ’ के स्थान पर अवग्रह-चिह्न ‘ऽ’ लिख दिया जाता है। इसीलिए इसे पूर्वरूपसन्धि कहते हैं — क्योंकि सन्धि में ‘पूर्व’ (पहला) रूप ही बचता है।

पदद्वयम् (विच्छेदः)सन्धिपदम्अन्त्यवर्णःपाठे कुत्र आगतम्
देशभक्तो + अयम्देशभक्तोऽयम्ओ + अपाठस्य शीर्षकश्लोके
सर्वे + अपिसर्वेऽपिए + अउदाहरणम् (पृष्ठ 44)
पशवो + अपिपशवोऽपिओ + अ‘बहवः गृहपालिताः पशवोऽपि …’
बुभुक्षितो + अस्मिबुभुक्षितोऽस्मिओ + अभिक्षुकस्य क्रन्दने
अश्रुपूर्णनयनो + अभवत्अश्रुपूर्णनयनोऽभवत्ओ + अगोपबन्धोः वर्णने

अभ्यासात् जायते सिद्धिः — पृष्ठ 44प्रश्नः १ — अधोलिखितानां प्रश्नानाम् एकपदेन उत्तरं लिखत

एकपदेन उत्तरम्
प्र.1 (क)समाज-दिनपत्रिकायाः प्रतिष्ठाता कः ?
उत्तर

गोपबन्धुदासः ।
[‘समाज’ दैनिक पत्रिका के संस्थापक गोपबन्धुदास थे।]

प्र.1 (ख)गोपबन्धुः कस्मै स्वभोजनं दत्तवान् ?
उत्तर

भिक्षुकाय ।
[गोपबन्धु ने अपना भोजन भिखारी को दिया।]

प्र.1 (ग)मरणासन्नः कः आसीत् ?
उत्तर

गोपबन्धोः पुत्रः । (एकपदेन — पुत्रः ।)
[गोपबन्धु का अपना पुत्र मरणासन्न था।]

प्र.1 (घ)गोपबन्धुः केन उपाधिना सम्मानितः अभवत् ?
उत्तर

‘उत्कलमणिः’ इति उपाधिना ।
[गोपबन्धु ‘उत्कलमणि’ उपाधि से सम्मानित हुए।]

प्र.1 (ङ)गोपबन्धुः कति वर्षाणि कारावासं प्राप्तवान् ?
उत्तर

वर्षद्वयम् । (द्वे वर्षे ।)
[गोपबन्धु ने दो वर्ष का कारावास भोगा।]

अभ्यासात् जायते सिद्धिः — पृष्ठ 44–45प्रश्नः २ — एकवाक्येन उत्तरं लिखत

एकवाक्येन उत्तरम्
प्र.2 (क)गोपबन्धुः किमर्थम् अश्रुपूर्णनयनः अभवत् ?
उत्तर

दिनत्रयात् किमपि अभुक्तवतः बुभुक्षितस्य भिक्षुकस्य करुणध्वनिं श्रुत्वा दयाविगलितहृदयः गोपबन्धुः अश्रुपूर्णनयनः अभवत् ।
[तीन दिन से कुछ भी न खाए हुए भूखे भिखारी की करुण पुकार सुनकर, दया से पिघले हुए हृदय वाले गोपबन्धु की आँखें आँसुओं से भर गईं।]

प्र.2 (ख)कीदृशं पुत्रं विहाय गोपबन्धुः समाजसेवाम् अकरोत् ?
उत्तर

मरणासन्नं स्वपुत्रं विहाय गोपबन्धुः समाजसेवाम् अकरोत् ।
[मृत्यु के निकट पहुँचे हुए अपने पुत्र को भी छोड़कर गोपबन्धु ने समाजसेवा की।]

प्र.2 (ग)गोपबन्धोः कृते उत्कलमणिः इति उपाधिः किमर्थं प्रदत्तः ?
उत्तर

समाजसेवायै देशसेवायै च तस्य असीमं त्यागम् अनुभवन् वैज्ञानिकः आचार्यः प्रफुल्लचन्द्ररायः गोपबन्धुम् ‘उत्कलमणिः’ इति उपाधिना सम्मानितवान् ।
[समाजसेवा और देशसेवा के लिए किए गए उनके अपार त्याग को अनुभव करके वैज्ञानिक आचार्य प्रफुल्लचन्द्रराय ने गोपबन्धु को ‘उत्कलमणि’ उपाधि से सम्मानित किया।]

प्र.2 (घ)गोपबन्धुः कुत्र जन्म लब्धवान् ?
उत्तर

गोपबन्धुः ओडिशाराज्यस्य पुरीजनपदस्य साक्षीगोपालसमीपे सुआण्डो-ग्रामे जन्म लब्धवान् ।
[गोपबन्धु ने ओडिशा राज्य के पुरी जनपद में साक्षीगोपाल के पास सुआण्डो गाँव में जन्म लिया।]

प्र.2 (ङ)गोपबन्धुः सर्वदा केषाम् उपयोगं कृतवान् ?
उत्तर

गोपबन्धुः सर्वदा स्वदेशस्यैव वस्त्राणां वस्तूनां च उपयोगं कृतवान् ।
[गोपबन्धु ने सदा अपने ही देश के वस्त्रों और वस्तुओं का उपयोग किया।]

अभ्यासात् जायते सिद्धिः — पृष्ठ 45प्रश्नः ३ — कोष्ठके दत्तानि पदानि उपयुज्य वाक्यानि रचयत (सेवाम्, सुस्वादूनि, सहायताम्, स्वदेशवस्त्राणि, अन्यतमः)

वाक्यरचना
प्र.3 (क)‘सेवाम्’ इति पदम् उपयुज्य वाक्यं रचयत।
उत्तर

गोपबन्धुः जलप्लावपीडितानाम् अकुण्ठं सेवाम् अकरोत् ।
[गोपबन्धु ने बाढ़-पीड़ितों की मन लगाकर सेवा की।]

प्र.3 (ख)‘सुस्वादूनि’ इति पदम् उपयुज्य वाक्यं रचयत।
उत्तर

कदलीपत्रेषु सुस्वादूनि व्यञ्जनानि परिवेषितानि ।
[केले के पत्तों पर स्वादिष्ट व्यञ्जन परोसे गए।]

प्र.3 (ग)‘सहायताम्’ इति पदम् उपयुज्य वाक्यं रचयत।
उत्तर

वयं दुःखितानां सहायतां कुर्मः ।
[हम दुःखी लोगों की सहायता करते हैं।]

प्र.3 (घ)‘स्वदेशवस्त्राणि’ इति पदम् उपयुज्य वाक्यं रचयत।
उत्तर

गोपबन्धुः सर्वदा स्वदेशवस्त्राणि एव धारितवान् ।
[गोपबन्धु ने सदा अपने देश के बने वस्त्र ही पहने।]

प्र.3 (ङ)‘अन्यतमः’ इति पदम् उपयुज्य वाक्यं रचयत।
उत्तर

गोपबन्धुः प्रसिद्धेषु पञ्चमित्रेषु अन्यतमः आसीत् ।
[गोपबन्धु प्रसिद्ध पाँच मित्रों में से एक थे।]

अभ्यासात् जायते सिद्धिः — पृष्ठ 45प्रश्नः ४ — चित्रं दृष्ट्वा पञ्च वाक्यानि रचयत

चित्रवर्णनम्
प्र.4चित्रं दृष्ट्वा पञ्च वाक्यानि रचयत — (क) … (ख) … (ग) … (घ) … (ङ) …
चित्र-परिचय (पृष्ठ 45): श्वेत वस्त्र पहने, दाढ़ी वाले गोपबन्धु एक अस्वस्थ-से दिखते बालक को बाँह से थामे, उसे सँभालते हुए एक मार्ग पर चल रहे हैं; सामने एक भवन है जिस पर ‘चिकित्सालयः’ लिखा है; आस-पास झाड़ियाँ और पेड़ हैं।
उत्तर

चित्र पर आधारित पाँच वाक्य —

क्रमःसंस्कृतवाक्यम्हिन्दी अर्थ
(क)चित्रे एकः चिकित्सालयः दृश्यते ।चित्र में एक चिकित्सालय दिखाई देता है।
(ख)एकः बालकः अस्वस्थः अस्ति ।एक बालक अस्वस्थ है।
(ग)गोपबन्धुः तं बालकं चिकित्सालयं नयति ।गोपबन्धु उस बालक को चिकित्सालय ले जा रहे हैं।
(घ)सः बालकं स्वबाहुना धारयति ।वे बालक को अपनी बाँह से सँभाले हुए हैं।
(ङ)चिकित्सालयस्य समीपे वृक्षाः मार्गश्च सन्ति ।चिकित्सालय के पास पेड़ और रास्ता है।

अभ्यासात् जायते सिद्धिः — पृष्ठ 45प्रश्नः ५ — समुचितेन पदेन श्लोकं पूरयत

श्लोकपूर्तिः
प्र.5 (क)…………………… मम लीयतां तनुः
उत्तर

स्वदेशभूमौ मम लीयतां तनुः ।
[मेरा शरीर अपने देश की भूमि में विलीन हो जाए।]

प्र.5 (ख)उत्कलमणिरित्याख्यः प्रसिद्धो ……………………
उत्तर

उत्कलमणिरित्याख्यः प्रसिद्धो लोकसेवकः ।
[‘उत्कलमणि’ नाम वाले प्रसिद्ध लोकसेवक।]

प्र.5 (ग)स्वदेशलोकास्तदनु …………………… नु
उत्तर

स्वदेशलोकास्तदनु प्रयान्तु नु ।
[उसके बाद देशवासी (उस मार्ग पर) चलें।]

प्र.5 (घ)स्वराज्यमार्गे यदि ……………………,
उत्तर

स्वराज्यमार्गे यदि गर्तमालिका,
[यदि स्वराज्य के मार्ग में गड्ढों की शृङ्खला हो,]

प्र.5 (ङ)…………………… परिपूरितास्तु सा
उत्तर

ममास्थिमांसैः परिपूरितास्तु सा ।
[वह (गड्ढों की शृङ्खला) मेरी हड्डियों और माँस से भर जाए।]

अभ्यासात् जायते सिद्धिः — पृष्ठ 46प्रश्नः ६ — उदाहरणानुसारं क्रियापदं स्त्रीलिङ्गे परिवर्तयत (यथा — गतवान् — गतवती)

रूपपरिवर्तनम्
प्र.6 (क)प्राप्तवान् — ……………………
उत्तर

प्राप्तवान् — प्राप्तवती ।
[(पुरुष ने) प्राप्त किया — (स्त्री ने) प्राप्त किया।]

प्र.6 (ख)उपविष्टवान् — ……………………
उत्तर

उपविष्टवान् — उपविष्टवती ।
[(पुरुष) बैठा — (स्त्री) बैठी।]

प्र.6 (ग)भुक्तवान् — ……………………
उत्तर

भुक्तवान् — भुक्तवती ।
[(पुरुष ने) खाया — (स्त्री ने) खाया।]

प्र.6 (घ)कृतवान् — ……………………
उत्तर

कृतवान् — कृतवती ।
[(पुरुष ने) किया — (स्त्री ने) किया।]

प्र.6 (ङ)गृहीतवान् — ……………………
उत्तर

गृहीतवान् — गृहीतवती ।
[(पुरुष ने) ग्रहण किया — (स्त्री ने) ग्रहण किया।]

अभ्यासात् जायते सिद्धिः — पृष्ठ 46प्रश्नः ७ — समुचितेन पदेन सह स्तम्भौ मेलयत

मेलनम्
प्र.7समुचितेन पदेन सह स्तम्भौ मेलयत —
‘अ’ स्तम्भः‘इ’ स्तम्भः
1. समाजःगोपबन्धुः
2. ममास्थिमांसैःव्यञ्जनानि
3. उत्कलमणिःक्रन्दनध्वनिः
4. आँ आँ . . इतिदिनपत्रिका
5. सुस्वादूनिपरिपूरितास्तु
उत्तर

सही मेल इस प्रकार है —

क्रमः‘अ’ स्तम्भः‘इ’ स्तम्भःसन्दर्भः (पाठे कुत्र)
1.समाजःदिनपत्रिका‘समाजः’ इति दिनपत्रिका अद्यापि प्रतिदिनं प्रकाश्यते (पृष्ठ 41)
2.ममास्थिमांसैःपरिपूरितास्तुममास्थिमांसैः परिपूरितास्तु सा (श्लोकः, पृष्ठ 41)
3.उत्कलमणिःगोपबन्धुःप्रफुल्लचन्द्ररायेण दत्तः उपाधिः (पृष्ठ 41)
4.आँ आँ . . इतिक्रन्दनध्वनिःभिक्षुकस्य क्रन्दनध्वनिः (पृष्ठ 38)
5.सुस्वादूनिव्यञ्जनानिबहूनि सुस्वादूनि व्यञ्जनानि कदलीपत्रेषु परिवेषितानि (पृष्ठ 38)

अभ्यासात् जायते सिद्धिः — पृष्ठ 46प्रश्नः ८ — घटनाक्रमेण वाक्यानि पुनः लिखत

घटनाक्रमः
प्र.8घटनाक्रमेण वाक्यानि पुनः लिखत —
(क) भिक्षुकञ्च तद्भोजितवान्।
(ख) प्रफुल्लचन्द्ररायः गोपबन्धुम् उत्कलमणिः इति उपाधिना सम्मानितवान्।
(ग) गोपबन्धुः अश्रुपूर्णनयनोऽभवत्।
(घ) अतिथयो हस्तपादं क्षालयित्वा आसनेषु उपविष्टवन्तः।
(ङ) दिनत्रयात् किमपि न भुक्तम्।
उत्तर

सही क्रम: (घ) → (ङ) → (ग) → (क) → (ख)

क्रमः (मूल अक्षर)वाक्यम्क्या हुआ
१. (घ)अतिथयो हस्तपादं क्षालयित्वा आसनेषु उपविष्टवन्तः ।भोज में बुलाए गए अतिथि हाथ-पैर धोकर आसनों पर बैठे।
२. (ङ)दिनत्रयात् किमपि न भुक्तम् ।बाहर से भिक्षुक की पुकार — ‘तीन दिन से कुछ नहीं खाया’।
३. (ग)गोपबन्धुः अश्रुपूर्णनयनोऽभवत् ।वह करुण स्वर सुनते ही गोपबन्धु की आँखें भर आईं।
४. (क)भिक्षुकञ्च तद्भोजितवान् ।उन्होंने अपना परोसा हुआ भोजन ले जाकर भिक्षुक को खिला दिया।
५. (ख)प्रफुल्लचन्द्ररायः गोपबन्धुम् उत्कलमणिः इति उपाधिना सम्मानितवान् ।ऐसे त्याग के कारण आगे चलकर उन्हें ‘उत्कलमणि’ उपाधि मिली।

योग्यताविस्तरः — पृष्ठ 47–48योग्यताविस्तरः (पृष्ठ 47–48) पठन-सामग्री है — इस पर आधारित ये प्रश्न अभ्यास हेतु जोड़े गए हैं: श्लोकव्याख्या, जीवनपरिचयः, सत्यवादि-वनविद्यालयः

श्लोकः
प्र.1भोजनस्यातिदौर्लभ्यं जीवनाय सुखप्रदम्।
तदर्थं भोजनं कुर्याः मा शरीरे दयां कुरु॥
— अस्य श्लोकस्य पदच्छेदम् अन्वयं भावार्थं च लिखत।
उत्तर

पदच्छेदः — भोजनस्य, अतिदौर्लभ्यम्, जीवनाय, सुखप्रदम्, तदर्थम्, भोजनम्, कुर्याः, मा, शरीरे, दयाम्, कुरु।

अन्वयः — भोजनस्य अतिदौर्लभ्यं (विद्यते)। जीवनाय सुखप्रदं भोजनं कुर्याः। तदर्थं शरीरे दयां मा कुरु।

अर्थः — भोजन बहुत कठिनाई से मिलता है। जीवन को आगे ले जाने के लिए सुख देने वाला भोजन करना चाहिए। इसलिए (भोजन करते समय) शरीर पर दया मत कीजिए — अर्थात् संकोच छोड़कर भरपेट भोजन कीजिए।

भावार्थः (पुस्तकानुसारम्) — भोजनम् अतीव दुर्लभं भवति। जीवनम् अग्रे नेतुं सुखप्रदं भोजनं करणीयम्। अतः शरीरस्य कष्टं विचिन्त्य भोजनविषये कदापि सङ्कोचः लज्जा वा न करणीया इति।

प्र.2उत्कलमणि-गोपबन्धुदासस्य जीवनपरिचयं लिखत।
उत्तर

पुस्तक के ‘योग्यताविस्तरः’ (पृष्ठ 47) में दिया गया जीवन-परिचय —

विषयःविवरणम्हिन्दी
नामउत्कलमणिः गोपबन्धुदासःउत्कलमणि गोपबन्धुदास
जन्म०९/१०/१८७७9 अक्तूबर 1877
जन्मस्थानम्सुआण्डो-ग्रामः, पुरी-जनपदः, ओडिशाराज्यम्सुआण्डो गाँव, पुरी ज़िला, ओडिशा
पितादैत्यारिदासःदैत्यारि दास
मातास्वर्णमयी देवीस्वर्णमयी देवी
पत्नीमोती देवीमोती देवी
एफ़्.ए. उत्तीर्णः१९००, रेभेन्सा महाविद्यालयः, कटकम्, ओडिशा1900, रेभेन्सा (Ravenshaw) कॉलेज, कटक
बी.एल्. उत्तीर्णः१९०६, कलकत्ता-विश्वविद्यालयः1906, कलकत्ता विश्वविद्यालय
सत्यवादि-वनविद्यालयस्य प्रतिष्ठा१९०९1909
बिहार-ओडिशा व्यवस्थापकसभायाः सदस्यः१९१७1917
समाज-साप्ताहिकपत्रिकायाः प्रकाशनम्१९१९1919
भारतीय-जातीय-आन्दोलने योगदानम्१९२०1920
उत्कलमणिः इति उपाधिना सम्माननम्१९२४1924
रचनाःअवकाशचिन्ता, बन्दीर आत्मकथा, कारा-कविता, धर्मपद, गो-माहात्म्य, नचिकेता-उपाख्यानउनकी ओडिआ रचनाएँ
स्वर्गारोहणम् (साक्षी-गोपाले)१७.०६.१९२८17 जून 1928, साक्षीगोपाल में
प्र.3सत्यवादि-वनविद्यालयः इति विषये लिखत।
उत्तर

सत्यवादि-वनविद्यालयः भारतस्य प्रथमः मुक्तविद्यालयः आसीत् । १९०९ ख्रिस्ताब्दे अगस्तमासस्य १२ दिनाङ्के साक्षीगोपाल-नामके स्थाने सः प्रतिष्ठापितः ।
[सत्यवादि-वनविद्यालय भारत का पहला मुक्त विद्यालय (खुला विद्यालय) था। इसकी स्थापना 12 अगस्त 1909 को साक्षीगोपाल नामक स्थान पर हुई।]

प्रतिष्ठातारः — पण्डितः गोपबन्धुदासः, पण्डितः नीलकण्ठदासः, पण्डितः डा. गोदावरीशमिश्रः, पण्डितः कृपासिन्धुमिश्रः, पण्डितः लिङ्गराजमिश्रः, आचार्यः हरिहरदासः, पण्डितः नन्दकिशोरदासः च — एतेषां देशभक्तानां मिलितप्रयासेन अयं निःशुल्कवनविद्यालयः तदानीम् आभारतं प्रतिष्ठाम् अलभत ।
[इन देशभक्तों के सम्मिलित प्रयास से यह निःशुल्क वनविद्यालय उस समय पूरे भारत में प्रसिद्ध हो गया।]

कार्यम् — पञ्चसखायः मिलित्वा समाजसेवां कुर्वन्तः शिक्षाविकासं च कारयन्तः स्वाधीनतान्दोलनाय जनान् प्रेरयन्ति स्म ।
[पाँचों मित्र मिलकर समाजसेवा करते, शिक्षा का विकास कराते और लोगों को स्वाधीनता-आन्दोलन के लिए प्रेरित करते थे।]

परियोजनाकार्यम् — पृष्ठ 48परियोजनाकार्यम् — १, २

परियोजना
प्र.1स्वप्रदेशस्य स्वतन्त्रतासङ्ग्रामिणां नामानि सङ्गृह्य तेषु एकस्य सचित्रां संक्षिप्तजीवनीं लिखत।
उत्तर

(यह करने का कार्य है — उत्तर आपके अपने प्रदेश के अनुसार होगा; चित्र चिपकाकर लिखिए। नीचे पाठ के ही उदाहरण पर नमूना है।)

शीर्षकम्विवरणम्
नामउत्कलमणिः गोपबन्धुदासः
जन्म०९/१०/१८७७, सुआण्डो-ग्रामः, पुरी-जनपदः, ओडिशाराज्यम्
माता-पितामाता स्वर्णमयी देवी, पिता दैत्यारिदासः
शिक्षाएफ़्.ए. — १९०० (रेभेन्सा महाविद्यालयः, कटकम्); बी.एल्. — १९०६ (कलकत्ता-विश्वविद्यालयः)
कार्यक्षेत्रम्शिक्षा, समाजसेवा, पत्रकारिता, स्वतन्त्रतान्दोलनम्
प्रमुखं योगदानम्सत्यवादि-वनविद्यालयस्य (१९०९), दरिद्रनारायणसेवा-सङ्घस्य, ‘समाजः’ इति वार्तापत्रस्य च प्रतिष्ठा; जलप्लावपीडितानां सेवा
उपाधिः‘उत्कलमणिः’ — आचार्यप्रफुल्लचन्द्ररायेण दत्तः (१९२४)
स्वर्गारोहणम्१७.०६.१९२८, साक्षी-गोपाले

नमूना अनुच्छेदः — गोपबन्धुदासः ओडिशाराज्यस्य महान् समाजसेवकः स्वतन्त्रतासङ्ग्रामी च आसीत्। सः छात्रान् निःशुल्कम् अपाठयत्, दरिद्राणां रोगिणां च सेवाम् अकरोत्, ‘समाजः’ इति दिनपत्रिकां च प्रारभत। महात्मगान्धेः प्रेरणया सः स्वतन्त्रतान्दोलने भागं गृहीतवान् वर्षद्वयं कारावासं च प्राप्तवान्। तस्य त्यागं दृष्ट्वा प्रफुल्लचन्द्ररायः तं ‘उत्कलमणिः’ इति उपाधिना सम्मानितवान्।

प्र.2जलप्लावपीडितानां साहाय्यार्थं स्वकीयाम् एकां कार्ययोजनां लिखत।
उत्तर

(यह अपनी योजना लिखने का कार्य है; नीचे एक नमूना है।)

नमूना उत्तर — ‘जलप्लावपीडितसाहाय्य-योजना’

क्रमःकार्यम् (संस्कृतम्)हिन्दी
१.विद्यालये ‘साहाय्यसमितिः’ रचनीया ।विद्यालय में एक सहायता-समिति बनाएँ।
२.छात्राः वस्त्राणि, कम्बलान्, पाठ्यपुस्तकानि च सङ्गृह्णीयुः ।छात्र कपड़े, कम्बल और पाठ्यपुस्तकें एकत्र करें।
३.शुष्कान्नस्य (चिपिटक-गुड-लवण-जलस्य) पेटिकाः सज्जीकरणीयाः ।सूखा अन्न (चूड़ा, गुड़, नमक, पानी) के पैकेट तैयार करें।
४.औषधानि प्राथमिकोपचारपेटिकाः च चिकित्सालयस्य सहायतया एकत्रीकरणीयाः ।चिकित्सालय की सहायता से दवाइयाँ और प्राथमिक उपचार पेटी जुटाएँ।
५.ग्रामे स्वच्छजलस्य पेयजलस्य च व्यवस्था करणीया ।गाँव में स्वच्छ पेयजल की व्यवस्था करें।
६.विद्यालयभवने अस्थायी-आश्रयस्थलं कल्पनीयम् ।विद्यालय भवन में अस्थायी आश्रय-स्थल बनाएँ।
७.बालकानां कृते पठनक्रीडयोः व्यवस्था करणीया, येन तेषां भयं न्यूनं भवेत् ।बच्चों के लिए पढ़ाई-खेल की व्यवस्था करें, जिससे उनका डर कम हो।
८.स्थानीयप्रशासनेन सह सम्पर्कं कृत्वा सामग्री प्रेषणीया ।स्थानीय प्रशासन से सम्पर्क करके सामग्री भिजवाएँ।

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