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NCERT Solutions for Class 8 Sanskrit Chapter 2 अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका (PDF) – 2027

NCERT Solutions for Class 8 Sanskrit Chapter 2 अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका – step-by-step answers to every exercise and in-text question of the chapter, as per the latest NCERT syllabus for 2027. Read them online or download the free question-answer PDF.

दीपकम् (कक्षा 8) का द्वितीयः पाठः — अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका दो कथाओं को एक में पिरोता है — केदारक्षेत्र की यात्रा में विपत्ति से घिरे छात्रों का संवाद, और उसी संवाद के भीतर सुनाई गई हितोपदेश की चित्रग्रीव-कपोत-हिरण्यक कथा। यहाँ अभ्यासात् जायते सिद्धिः के प्रश्न 1–8, शब्दार्थ-सारिणी, ल्यप्-प्रत्यय और विसर्गसन्धि, योग्यताविस्तर के दो श्लोक तथा परियोजनाकार्य के उत्तर क्रम से दिए गए हैं।

NCERT Solutions for Class 8 Sanskrit Chapter 2 अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका PDF

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पाठ का हिंदी अनुवाद

केदारक्षेत्र की यात्रा — विपत्ति में मित्रों का संवाद
कानिचन मित्राणि विद्यालयस्य ग्रीष्मावकाशे पुण्यक्षेत्रदर्शनाय देवभूमिम् उत्तराखण्डम् अगच्छन्। तदानीं वर्षारम्भकालः आसीत्। सर्वेऽपि गौरीकुण्डनामकं स्थानं प्राप्तवन्तः।
कुछ मित्र विद्यालय की गर्मी की छुट्टियों में पवित्र तीर्थों के दर्शन के लिए देवभूमि उत्तराखण्ड गए। उस समय वर्षा ऋतु का आरम्भ था। सभी गौरीकुण्ड नामक स्थान पर पहुँच गए।
यदा ते श्रीकेदारक्षेत्रम् आरोहन्तः आसन् तदा लक्ष्यप्राप्तेः पूर्वं वेगेन वृष्टिः आरब्धा। सहसा सर्वत्र अन्धकारः प्रसृतः।
जब वे श्रीकेदार क्षेत्र की ओर चढ़ाई कर रहे थे, तब लक्ष्य तक पहुँचने से पहले ही तेज़ वर्षा आरम्भ हो गई। अचानक चारों ओर अँधेरा फैल गया।
नद्याः तीव्रजलवेगेन सेतुः भग्नः। पर्वतस्खलनं सञ्जातम्। सर्वेऽपि उच्चस्वरेण अक्रन्दन् ईश्वरं प्रार्थयन्त च ‘हे भगवन् ! रक्ष अस्मान् रक्ष’ इति।
नदी के जल के तेज़ बहाव से पुल टूट गया। पहाड़ खिसक गया (भूस्खलन हो गया)। सभी ज़ोर-ज़ोर से रोने लगे और ईश्वर से प्रार्थना करने लगे — ‘हे भगवान्! हमारी रक्षा करो, रक्षा करो।’
सर्वेषाम् अधैर्यं दृष्ट्वा नायकः सुधीरः सर्वान् सांत्वयन् प्रेरयन् च अवदत् –
सबकी अधीरता (घबराहट) देखकर नायक सुधीर ने सबको सान्त्वना देते हुए और प्रेरित करते हुए कहा —
नायकः – अयि भोः मित्राणि ! अस्मिन् विपत्काले वयं धैर्यम् अवलम्ब्य कमपि उपायं चिन्तयामः।
नायक — अरे मित्रो! इस विपत्ति के समय हम धैर्य का सहारा लेकर कोई उपाय सोचते हैं।
दिनेशः – (सविषादम्) अरे भ्रातः ! किं वदसि ? अस्माकं मृत्युः एव सन्निकटे अस्ति। एवं चेत् कथम् उपायः चिन्तनीयः ?
दिनेश — (दुःख के साथ) अरे भाई! क्या कह रहे हो? हमारी मृत्यु ही निकट है। ऐसे में उपाय कैसे सोचा जाए?
नायकः – मित्र ! विषादं मा कुरु। यदा वृष्टिः शान्ता, वातावरणं च स्वच्छं भविष्यति तदा वयं सम्भूय सेतुं, मार्गं च निर्माय पुनः स्वलक्ष्यं प्रति गमिष्यामः।
नायक — मित्र! दुःख मत करो। जब वर्षा थम जाएगी और वातावरण साफ़ हो जाएगा, तब हम मिलकर पुल और मार्ग बनाकर फिर से अपने लक्ष्य की ओर जाएँगे।
सुरेशः – एतस्यां स्थितौ वयं किमेतत् अत्यन्तं दुःसाध्यम्, असम्भवं च कार्यं कर्तुं शक्नुमः ?
सुरेश — इस स्थिति में क्या हम यह अत्यन्त कठिन और असम्भव काम कर सकते हैं?
नायकः – प्रियमित्राणि ! वयम् आत्मविश्वासबलेन इदम् असम्भवम् अपि कार्यं सम्भूय अवश्यं साधयितुं शक्नुमः। तेन अस्माकं लक्ष्यप्राप्तिः प्राणरक्षा चापि भविष्यति।
नायक — प्रिय मित्रो! हम आत्मविश्वास के बल से इस असम्भव काम को भी मिलकर अवश्य पूरा कर सकते हैं। उससे हमें लक्ष्य की प्राप्ति भी होगी और हमारे प्राणों की रक्षा भी होगी।
कपिलः – किम् इदं सम्भवति ?
कपिल — क्या यह सम्भव है?
नायकः – नूनं सम्भवति मित्र ! अस्मिन् प्रसङ्गे अहं हितोपदेशस्य एकां कथां श्रावयामि।
नायक — निश्चय ही सम्भव है, मित्र! इस प्रसंग में मैं हितोपदेश की एक कथा सुनाता हूँ।
सर्वेऽपि – (उत्कण्ठया) का कथा ? वद मित्र ! वद।
सभी — (उत्सुकता से) कौन-सी कथा? बताओ मित्र! बताओ।
नायकः – सावधानं शृण्वन्तु।
नायक — ध्यान से सुनिए।
हितोपदेश की कथा — कपोतराज चित्रग्रीव और मूषकराज हिरण्यक
अस्ति गोदावरीतीरे एको विशालः शाल्मलीतरुः। तत्र प्रतिदिनं दूरदेशात् पक्षिणः आगत्य निवसन्ति स्म।
गोदावरी नदी के किनारे सेमल का एक विशाल पेड़ है। वहाँ प्रतिदिन दूर-दूर के देशों से पक्षी आकर रहा करते थे।
अथ कदाचित् तत्र कश्चिद् व्याधस्तण्डुलकणान् विकीर्य जालं विस्तीर्य च प्रच्छन्नो भूत्वा स्थितः।
फिर एक बार वहाँ कोई बहेलिया चावल के दाने बिखेरकर और जाल फैलाकर छिपकर बैठ गया।
तस्मिन्नेव काले चित्रग्रीवनामा कपोतराजः सपरिवारः आकाशमार्गे गच्छति स्म। केचन कपोताः वनमध्ये तण्डुलकणान् अवलोक्य लोभाकृष्टाः अभवन्।
उसी समय चित्रग्रीव नाम का कबूतरों का राजा अपने परिवार के साथ आकाश-मार्ग से जा रहा था। कुछ कबूतर वन के बीच चावल के दाने देखकर लोभ से खिंच गए (ललचा गए)।
ततो चित्रग्रीवः तण्डुलकणलुब्धान् कपोतान् अवदत् – “कुतोऽत्र निर्जने वने तण्डुलकणानां सम्भवः तद् निरूप्यताम्। कश्चिद् व्याधोऽत्र भवेत्। सर्वथा अविचारितं कर्म न कर्तव्यम्।”
तब चित्रग्रीव ने चावल के दानों के लोभी कबूतरों से कहा — “इस सुनसान वन में चावल के दाने कहाँ से आ सकते हैं, यह (पहले) जाँच लो। यहाँ कोई बहेलिया हो सकता है। बिना विचारे कोई काम कभी नहीं करना चाहिए।”
एतद्वचनं श्रुत्वा कश्चित् कपोतः सदर्पम् अवदत् – “आः किमर्थम् एवमुच्यते ?
यह बात सुनकर एक कबूतर घमंड से बोला — “अरे! ऐसा क्यों कहा जा रहा है?
वृद्धानां वचनं ग्राह्यमापत्काले ह्युपस्थिते।
सर्वत्रैवं विचारे तु भोजनेऽप्यप्रवर्तनम्॥ १ ॥”
बड़े-बूढ़ों की बात तो आपत्ति का समय आ पड़ने पर ही माननी चाहिए। यदि हर जगह इसी प्रकार विचार किया जाए, तो भोजन करने में भी प्रवृत्ति नहीं होगी (भोजन भी नहीं किया जा सकेगा)।”
तस्य वचनं श्रुत्वा चित्रग्रीवस्य च अवज्ञां कृत्वा सर्वे कपोताः भूमौ अवतीर्य तण्डुलकणान् भोक्तुं प्रवृत्ताः।
उसकी बात सुनकर और चित्रग्रीव (की बात) का अनादर करके सभी कबूतर धरती पर उतरकर चावल के दाने खाने में लग गए।
अनन्तरं ते सर्वे तेन जालेन बद्धाः अभवन्। ततो यस्य वचनात् कपोतास्तत्र बद्धास्तं सर्वे तिरस्कुर्वन्ति स्म।
इसके बाद वे सब उस जाल में बँध गए। तब जिसकी बात के कारण कबूतर वहाँ बँधे थे, सब उसका तिरस्कार करने लगे।
इदं दृष्ट्वा चित्रग्रीवः अवदत् – “अयम् अस्य दोषो न। अनागतविपत्तिं को वा ज्ञातुं समर्थः।
यह देखकर चित्रग्रीव बोला — “यह इसका दोष नहीं है। आने वाली विपत्ति को भला कौन जान सकता है?
अतोऽस्मिन् विपत्काले अस्माभिः अस्य तिरस्कारम् अकृत्वा कश्चन उपायश्चिन्तनीयः। यतोहि विपत्काले विस्मयः एव कापुरुषलक्षणम्। सत्पुरुषाणां लक्षणं तु —
इसलिए इस विपत्ति के समय हमें इसका तिरस्कार न करके कोई उपाय सोचना चाहिए। क्योंकि विपत्ति के समय घबरा जाना ही कायर पुरुषों का लक्षण है। सज्जनों का लक्षण तो यह है —
विपदि धैर्यमथाभ्युदये क्षमा,
सदसि वाक्पटुता युधि विक्रमः।
यशसि चाभिरुचिर्व्यसनं श्रुतौ
प्रकृतिसिद्धमिदं हि महात्मनाम्॥ २ ॥”
विपत्ति में धैर्य और उन्नति (अच्छे दिनों) में क्षमा, सभा में बोलने की कुशलता, युद्ध में पराक्रम, यश में रुचि और शास्त्रों (वेद) के अध्ययन में लगन — ये गुण महात्माओं में स्वभाव से ही होते हैं।”
अतोऽधुना अस्माभिः धैर्यमवलम्ब्य प्रतीकारश्चिन्त्यताम्। प्रियमित्राणि ! लघूनाम् अपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका भवति इति नीतिवचनं लोकसिद्धम्।
इसलिए अब हमें धैर्य का सहारा लेकर उपाय सोचना चाहिए। प्रिय मित्रो! ‘छोटी-छोटी वस्तुओं का भी मेल (संगठन) काम सिद्ध करने वाला होता है’ — यह नीति-वचन संसार में प्रसिद्ध है।
अतः अस्माभिः सर्वैः एकचित्तीभूय जालमादाय उड्डीयताम्।” एवं विचार्य सर्वे पक्षिणः जालमादाय उत्पतिताः।
इसलिए हम सबको एक चित्त होकर जाल को लेकर उड़ जाना चाहिए।” ऐसा विचार करके सभी पक्षी जाल को लेकर उड़ गए।
अनन्तरं स व्याधः सुदूरात् जालापहारकान् तान् अवलोक्य पश्चात् अधावत्। परं तस्य दृष्टिपथात् दूरं गतेषु पक्षिषु स व्याधो निवृत्तः।
इसके बाद वह बहेलिया बहुत दूर से जाल ले जाने वाले उन (कबूतरों) को देखकर उनके पीछे दौड़ा। परन्तु पक्षियों के उसकी आँखों से ओझल (दूर) हो जाने पर वह बहेलिया लौट गया।
अथ व्याधं निवृत्तं दृष्ट्वा कपोताः उक्तवन्तः – “स्वामिन् ! किमिदानीं कर्तुम् उचितम् ?”
तब बहेलिये को लौटा हुआ देखकर कबूतरों ने कहा — “स्वामी! अब क्या करना उचित है?”
चित्रग्रीव उवाच – “प्रियकपोताः ! अस्माकं मित्रं हिरण्यको नाम मूषकराजः गण्डकीतीरे चित्रवने निवसति। सोऽस्माकं पाशान् दन्तबलेन छेत्स्यति।”
चित्रग्रीव ने कहा — “प्रिय कबूतरो! हमारा मित्र हिरण्यक नाम का चूहों का राजा गण्डकी नदी के किनारे चित्रवन में रहता है। वह अपने दाँतों के बल से हमारे बन्धन काट देगा।”
एतत् आलोच्य सर्वे हिरण्यकस्य विवरसमीपं गताः। हिरण्यकश्च सर्वदा अनिष्टशङ्कया शतद्वारं विवरं कृत्वा निवसति।
यह अच्छी तरह विचार करके सभी हिरण्यक के बिल के पास गए। हिरण्यक किसी अनहोनी (अनिष्ट) की आशंका से सदा सौ दरवाज़ों वाला बिल बनाकर रहता था।
ततो हिरण्यकः कपोतानाम् अवपातभयात् चकितस्तूष्णीं स्थितः। चित्रग्रीव उवाच – “सखे हिरण्यक ! किम् अस्माभिः सह न सम्भाषसे ?”
तब कबूतरों के (अचानक) नीचे उतरने के डर से हिरण्यक चौंककर चुपचाप (बिल में) बैठा रहा। चित्रग्रीव ने कहा — “मित्र हिरण्यक! क्या तुम हमसे बात नहीं करोगे?”
ततो हिरण्यकस्तद्वचनं प्रत्यभिज्ञाय आनन्देन त्वरया बहिः निःसृत्य अब्रवीत् – “आः ! पुण्यवान् अस्मि, मम प्रियसुहृत् चित्रग्रीवः समायातः।”
तब हिरण्यक उसकी आवाज़ पहचानकर आनन्द से जल्दी-जल्दी बाहर निकलकर बोला — “अहा! मैं पुण्यवान् (भाग्यशाली) हूँ, मेरा प्रिय मित्र चित्रग्रीव आया है।”
पाशबद्धान् कपोतान् दृष्ट्वा सविस्मयं क्षणं स्थित्वा अवदत् – “सखे ! किमेतत् ?” चित्रग्रीवोऽवदत् – “सखे ! एतद् अस्माकं विचारहीनतायाः फलम्।”
जाल में बँधे कबूतरों को देखकर वह आश्चर्य से क्षण भर रुककर बोला — “मित्र! यह क्या है?” चित्रग्रीव बोला — “मित्र! यह हमारी विचारहीनता (बिना सोचे काम करने) का फल है।”
तत् श्रुत्वा हिरण्यकः चित्रग्रीवस्य बन्धनं छेत्तुं सत्वरम् उपसर्पति। तदा चित्रग्रीवोऽवदत् – “मित्र ! मा मा एवम्। पूर्वं मदाश्रितानाम् एतेषां पाशान् छिनत्तु, पश्चात् मम।”
यह सुनकर हिरण्यक चित्रग्रीव का बन्धन काटने के लिए तुरन्त उसके पास आता है। तब चित्रग्रीव बोला — “मित्र! नहीं, नहीं, ऐसा मत करो। पहले मेरे आश्रित इन (कबूतरों) के बन्धन काटो, बाद में मेरे।”
एतदाकर्ण्य हिरण्यकः प्रहृष्टमनाः पुलकितः सन् अब्रवीत् – “साधु मित्र ! साधु। अनेन आश्रितवात्सल्येन त्वं त्रैलोक्यस्यापि स्वामित्वं प्राप्तुं योग्योऽसि।”
यह सुनकर हिरण्यक प्रसन्न मन से रोमांचित होकर बोला — “शाबाश मित्र! शाबाश! शरण में आए हुओं के प्रति इस प्रेम के कारण तुम तो तीनों लोकों का स्वामी बनने के भी योग्य हो।”
ततो हिरण्यकः स्वमित्रैः सह सर्वेषां कपोतानां बन्धनानि छिनत्ति स्म। सर्वे कपोताः पाशविमुक्ताः अभवन्।
तब हिरण्यक ने अपने मित्रों के साथ मिलकर सभी कबूतरों के बन्धन काट दिए। सभी कबूतर बन्धन से मुक्त हो गए।
सहर्षं पुनः उड्डीय आकाशमार्गेण गच्छन्तः सर्वे कपोताः राजानं चित्रग्रीवं प्रशंसन्ति – “भवतः नीतिशिक्षया नायकधर्मेण च वयं सर्वे सुरक्षिताः। धन्याः वयम्”।
खुशी-खुशी फिर से उड़कर आकाश-मार्ग से जाते हुए सभी कबूतर राजा चित्रग्रीव की प्रशंसा करते हैं — “आपकी नीति की शिक्षा और नायक के कर्तव्य (के पालन) से हम सब सुरक्षित हैं। हम धन्य हैं।”
कथा के बाद — मिलकर सेतु का निर्माण
कथां श्रावयित्वा नायकः सर्वान् सम्बोधयति – “मित्राणि ! आपद्ग्रस्ताः कपोताः बुद्धिबलेन संघटनसामर्थ्येन च आत्मसंरक्षणं कृतवन्तः। तर्हि किमर्थं वयं संघटिताः भूत्वा आत्मसंरक्षणं कर्तुं न शक्नुमः ?”
कथा सुनाकर नायक सबको सम्बोधित करता है — “मित्रो! विपत्ति में फँसे कबूतरों ने बुद्धि के बल और संगठन की शक्ति से अपनी रक्षा की। तो फिर हम संगठित होकर अपनी रक्षा क्यों नहीं कर सकते?”
नायकस्य प्रेरकवचनैः उत्साहिताः सर्वेऽपि भयं शोकं सन्देहं च विहाय सेतुनिर्माणकार्ये संलग्नाः जाताः। भगीरथप्रयत्नैः सेतुनिर्माणं कृत्वा तैः स्वीयप्राणाः अन्येषां च प्राणाः संरक्षिताः।
नायक के प्रेरणा भरे वचनों से उत्साहित होकर सभी भय, शोक और सन्देह छोड़कर पुल बनाने के काम में जुट गए। भगीरथ जैसे कठिन प्रयत्नों से पुल बनाकर उन्होंने अपने और दूसरों के भी प्राणों की रक्षा की।

NCERT Solutions for Class 8 Sanskrit Chapter 2 अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका – Questions and Answers

All questions of the chapter are answered below, in the order of the book – in-text questions, activities and the end-of-chapter exercises. Each answer is written the way you would write it in the exam.

पाठ्य-प्रश्नाः (संवादः) — पृष्ठ 10–11श्रीकेदारक्षेत्रे विपत्तौ मित्राणां नायकस्य च संवादः — पाठ के संवाद से अभ्यास के लिए जोड़े गए प्रश्न (पुस्तक में ये प्रश्न नहीं हैं)

संवादः
प्र.1दिनेशः – (सविषादम्) अरे भ्रातः ! किं वदसि ? अस्माकं मृत्युः एव सन्निकटे अस्ति । एवं चेत् कथम् उपायः चिन्तनीयः ?
उत्तर

नायकस्य उत्तरम् — मित्र ! विषादं मा कुरु । यदा वृष्टिः शान्ता, वातावरणं च स्वच्छं भविष्यति तदा वयं सम्भूय सेतुं, मार्गं च निर्माय पुनः स्वलक्ष्यं प्रति गमिष्यामः ।

[हिन्दी — दिनेश निराशा में कहता है कि मृत्यु ही पास खड़ी है, ऐसे में उपाय कैसे सोचा जाए? नायक उत्तर देता है — “मित्र! विषाद मत करो। जब वर्षा थम जाएगी और वातावरण साफ़ हो जाएगा, तब हम मिलकर पुल और रास्ता बनाकर फिर अपने लक्ष्य की ओर बढ़ेंगे।”]

प्र.2सुरेशः – एतस्यां स्थितौ वयं किमेतत् अत्यन्तं दुःसाध्यम्, असम्भवं च कार्यं कर्तुं शक्नुमः ?
उत्तर

नायकस्य उत्तरम् — प्रियमित्राणि ! वयम् आत्मविश्वासबलेन इदम् असम्भवम् अपि कार्यं सम्भूय अवश्यं साधयितुं शक्नुमः । तेन अस्माकं लक्ष्यप्राप्तिः प्राणरक्षा चापि भविष्यति ।

[हिन्दी — सुरेश पूछता है — “इस स्थिति में क्या हम यह अत्यन्त कठिन और असम्भव काम कर सकते हैं?” नायक कहता है — “प्रिय मित्रो! हम आत्मविश्वास के बल से मिलकर यह असम्भव काम भी अवश्य कर लेंगे। उससे हमारा लक्ष्य भी मिलेगा और प्राण भी बचेंगे।”]

प्र.3कपिलः – किम् इदं सम्भवति ?
उत्तर

नायकस्य उत्तरम् — नूनं सम्भवति मित्र ! अस्मिन् प्रसङ्गे अहं हितोपदेशस्य एकां कथां श्रावयामि ।

[हिन्दी — कपिल सन्देह करता है — “क्या यह सम्भव है?” नायक कहता है — “निश्चय ही सम्भव है, मित्र! इसी प्रसंग में मैं तुम्हें हितोपदेश की एक कथा सुनाता हूँ।”]

प्र.4सर्वेऽपि – (उत्कण्ठया) का कथा ? वद मित्र ! वद ।
उत्तर

नायकस्य उत्तरम् — सावधानं शृण्वन्तु — इति उक्त्वा सः हितोपदेशस्य ‘मित्रलाभ’-प्रकरणस्य चित्रग्रीव-कपोत-हिरण्यक-कथां श्रावयति ।

[हिन्दी — सब उत्सुकता से पूछते हैं — “कौन-सी कथा? कहो मित्र, कहो!” नायक कहता है — “ध्यान से सुनिए” — और हितोपदेश के ‘मित्रलाभ’ प्रकरण की वह कथा सुनाता है जिसमें कपोतराज चित्रग्रीव, बहेलिया और मूषकराज हिरण्यक आते हैं।]

पाठ्य-प्रश्नाः (कथा-भागः) — पृष्ठ 12–14हितोपदेशस्य कपोत-कथा तथा तत्र प्रयुक्तौ द्वौ श्लोकौ — कथा से अभ्यास के लिए जोड़े गए प्रश्न (पुस्तक में ये प्रश्न नहीं हैं)

कथा
प्र.1चित्रग्रीवः तण्डुलकणलुब्धान् कपोतान् अवदत् – “कुतोऽत्र निर्जने वने तण्डुलकणानां सम्भवः ? तद् निरूप्यताम् ।”
उत्तर

चित्रग्रीवस्य निष्कर्षः — कश्चिद् व्याधोऽत्र भवेत् । सर्वथा अविचारितं कर्म न कर्तव्यम् ।

[हिन्दी — चित्रग्रीव कहता है — “इस निर्जन वन में चावल के दाने भला कहाँ से आ सकते हैं? इस पर विचार किया जाए। यहाँ कोई बहेलिया अवश्य होगा। बिना सोचा हुआ काम किसी भी हाल में नहीं करना चाहिए।”]

प्र.2एतद्वचनं श्रुत्वा कश्चित् कपोतः सदर्पम् अवदत् – “आः किमर्थम् एवमुच्यते ?”
उत्तर

तस्य दर्पस्य फलम् — तस्य वचनं श्रुत्वा चित्रग्रीवस्य अवज्ञां कृत्वा सर्वे कपोताः भूमौ अवतीर्य तण्डुलकणान् भोक्तुं प्रवृत्ताः । अनन्तरं ते सर्वे तेन जालेन बद्धाः अभवन् ।

[हिन्दी — एक कपोत घमण्ड से बोला — “अरे! ऐसा क्यों कहा जा रहा है?” उसकी बात मानकर और चित्रग्रीव की अवज्ञा करके सब कपोत भूमि पर उतर आए और चावल खाने लगे। तुरन्त ही वे सब उस जाल में बँध गए।]

प्र.3वृद्धानां वचनं ग्राह्यमापत्काले ह्युपस्थिते ।
सर्वत्रैवं विचारे तु भोजनेऽप्यप्रवर्तनम्॥ १॥
— अस्य श्लोकस्य पदच्छेदं, अन्वयम्, अर्थं भावं च लिखत ।
उत्तर

पदच्छेदः — वृद्धानाम् वचनम् ग्राह्यम् आपत्-काले हि उपस्थिते । सर्वत्र एवम् विचारे तु भोजने अपि अप्रवर्तनम् ।

अन्वयः — आपत्-काले हि उपस्थिते वृद्धानाम् वचनम् ग्राह्यम् । तु सर्वत्र एवम् विचारे (सति) भोजने अपि अप्रवर्तनम् (भवेत्) ।

अर्थः — आपत्ति आने पर वृद्धों (अनुभवी जनों) का वचन मान लेना चाहिए। किन्तु यदि हर जगह इसी तरह (शंका करते हुए) विचार किया जाए तो भोजन में भी प्रवृत्ति नहीं हो सकेगी।

भावः — यह कपोत का कुतर्क है : हर जगह शंका करोगे तो भोजन भी नहीं कर पाओगे। वह भूल जाता है कि चित्रग्रीव ने सब भोजन का नहीं, केवल निर्जन वन में बिना कारण मिले दानों का निषेध किया था।

प्र.4अथ व्याधं निवृत्तं दृष्ट्वा कपोताः उक्तवन्तः – “स्वामिन् ! किमिदानीं कर्तुम् उचितम् ?”
उत्तर

चित्रग्रीवस्य उत्तरम् — प्रियकपोताः ! अस्माकं मित्रं हिरण्यको नाम मूषकराजः गण्डकीतीरे चित्रवने निवसति । सोऽस्माकं पाशान् दन्तबलेन छेत्स्यति ।

[हिन्दी — बहेलिये को लौटा हुआ देखकर कपोतों ने पूछा — “स्वामी! अब क्या करना उचित है?” चित्रग्रीव ने कहा — “प्रिय कपोतो! हमारा मित्र हिरण्यक नाम का चूहों का राजा गण्डकी नदी के किनारे चित्रवन में रहता है। वह अपने दाँतों के बल से हमारे बन्धन काट देगा।”]

प्र.5कथां श्रावयित्वा नायकः सर्वान् सम्बोधयति – “मित्राणि ! आपद्ग्रस्ताः कपोताः बुद्धिबलेन संघटनसामर्थ्येन च आत्मसंरक्षणं कृतवन्तः । तर्हि किमर्थं वयं संघटिताः भूत्वा आत्मसंरक्षणं कर्तुं न शक्नुमः ?”
उत्तर

उत्तरम् (कथायाः फलम्) — नायकस्य प्रेरकवचनैः उत्साहिताः सर्वेऽपि भयं शोकं सन्देहं च विहाय सेतुनिर्माणकार्ये संलग्नाः जाताः । भगीरथप्रयत्नैः सेतुनिर्माणं कृत्वा तैः स्वीयप्राणाः अन्येषां च प्राणाः संरक्षिताः ।

वयं शब्दार्थान् जानीमः — पृष्ठ 15–16शब्दः / अर्थः / हिन्दी / English तथा ‘मातृभाषया अर्थं लिखत’ — प्र.2 अभ्यास के लिए जोड़ा गया प्रश्न है

शब्दार्थाः
प्र.1

मातृभाषया अर्थं लिखत — (पुस्तक की शब्दार्थ-सारिणी, पृष्ठ 15–16; अन्तिम स्तम्भ भरना है)

शब्दःअर्थःहिन्दीEnglishमातृभाषया अर्थं लिखत
भग्नःनष्टःटूट गयाBroke down……
अक्रन्दन्रुदन्ति स्मरोयेThey cried……
सविषादम्चिन्तापूर्वकम्विषादपूर्वकWith sadness……
सम्भूयमिलित्वामिलकरTogether……
तरुःवृक्षःपेड़Tree……
व्याधःलुब्धकःव्याध (बहेलिया)Hunter……
तण्डुलकणान्तण्डुललवान्चावल के दानों कोRice grains……
विकीर्यविकिरणं कृत्वाबिखेर करHaving scattered……
विस्तीर्यविस्तृतं, विस्तरणं कृत्वाफैलाकरHaving spread……
प्रच्छन्नःगुप्तःछिपा हुआStood secretly……
चित्रग्रीवनामाचित्रग्रीवः नाम यस्यचित्रग्रीव नाम काNamed Chitragriva……
प्रतीकारःप्रतिविधानम्उपायRemedy……
अविचारितम्अचिन्तितम्चिन्तन किये बिनाNot thought of……
अवतीर्यअवतरणं कृत्वा (नीचैः आगत्य)उतर करHaving descended……
अवलोक्यदृष्ट्वादेख करHaving seen……
अप्रवर्तनम्अप्रवृत्तिःन लगना, प्रवृत्त न होनाNo inclination……
प्रवृत्ताःनिरताःलगे हुएEngaged / engrossed……
अवलम्ब्यआश्रित्यआश्रित होकरHaving depended on……
एकचित्तीभूयएकमनसाएक चित्त होकरWith united mind……
कापुरुषलक्षणम्कुत्सितपुरुषाणां चिह्नम्कायर पुरुषों का लक्षणSigns of a coward……
तिरस्कुर्वन्तिअनादरं कुर्वन्तितिरस्कार करते हैंReject……
विस्मयःआश्चर्यम्आश्चर्यAmazement……
विक्रमःअतिपराक्रमःअत्यधिक शक्तियुक्त, पराक्रमValour……
उत्पतिताःउड्डयनं कृतवन्तःउड़ गएFlew away……
चिन्त्यताम्चिन्तनीयःचिन्तन करना चाहिए / सोचिएShould be thought……
आलोच्यविचार्यअच्छी तरह विचार करHaving analysed……
पाशान्बन्धनानिबन्धनों कोCaptivity……
प्रत्यभिज्ञायज्ञात्वाजानकर, समझकरHaving recognized……
त्वरयाशीघ्रम्शीघ्रHurriedly, quickly……
निःसृत्यनिर्गत्यनिकल करComing out……
मेमममेराMine……
छिनत्तुछेदनं कुरुकाट दे(you) Cut……
आकर्ण्यश्रुत्वासुनकरHaving heard……
प्रहृष्टमनाःआनन्दितमनाःप्रसन्न मन वालाGleeful (person)……
पुलकितःरोमाञ्चितःप्रफुल्लित होकरExcited……
सत्वरम्त्वरया सहअति शीघ्रQuickly……
उपसर्पतिसमीपम् आगच्छतिनिकट आता हैApproaches near……
आश्रितवात्सल्येनशरणम् आगतानां कृते स्नेहभावेनशरण में आए हुओं के प्रति प्रेम सेAffection towards people who have taken shelter……
आशङ्क्यशङ्कां कृत्वाशङ्का करकेHaving doubted……
अवज्ञातिरस्कारःनिन्दाDisrespect……
उत्तर

उत्तरम् — जिनकी मातृभाषा हिन्दी है, वे अन्तिम स्तम्भ में ये अर्थ लिखें (दूसरी मातृभाषा वाले उसी शब्द का अपनी भाषा का अर्थ लिखें) —

शब्दःमातृभाषया अर्थः (हिन्दी)
भग्नःटूट गया
अक्रन्दन्रोये
सविषादम्विषादपूर्वक
सम्भूयमिलकर
तरुःपेड़
व्याधःव्याध (बहेलिया)
तण्डुलकणान्चावल के दानों को
विकीर्यबिखेर कर
विस्तीर्यफैलाकर
प्रच्छन्नःछिपा हुआ
चित्रग्रीवनामाचित्रग्रीव नाम का
प्रतीकारःउपाय
अविचारितम्चिन्तन किये बिना
अवतीर्यउतर कर
अवलोक्यदेख कर
अप्रवर्तनम्न लगना, प्रवृत्त न होना
प्रवृत्ताःलगे हुए
अवलम्ब्यआश्रित होकर
एकचित्तीभूयएक चित्त होकर
कापुरुषलक्षणम्कायर पुरुषों का लक्षण
तिरस्कुर्वन्तितिरस्कार करते हैं
विस्मयःआश्चर्य
विक्रमःअत्यधिक शक्तियुक्त, पराक्रम
उत्पतिताःउड़ गए
चिन्त्यताम्चिन्तन करना चाहिए / सोचिए
आलोच्यअच्छी तरह विचार कर
पाशान्बन्धनों को
प्रत्यभिज्ञायजानकर, समझकर
त्वरयाशीघ्र
निःसृत्यनिकल कर
मेमेरा
छिनत्तुकाट दे
आकर्ण्यसुनकर
प्रहृष्टमनाःप्रसन्न मन वाला
पुलकितःप्रफुल्लित होकर
सत्वरम्अति शीघ्र
उपसर्पतिनिकट आता है
आश्रितवात्सल्येनशरण में आए हुओं के प्रति प्रेम से
आशङ्क्यशङ्का करके
अवज्ञानिन्दा
प्र.2उपर्युक्तेषु शब्देषु ये पदानि ल्यप्-प्रत्ययान्तानि सन्ति तानि पृथक् लिखत, तेषां च प्रकृति-प्रत्ययविभागं दर्शयत ।
उत्तर

उत्तरम् — शब्दार्थ-सारिणी में बारह पद ल्यप्-प्रत्ययान्त हैं। सबका अन्त ‘य’ से होता है और (एकचित्तीभूय को छोड़कर) सबमें धातु से पहले उपसर्ग है — यही ल्यप् की पहचान है।

ल्यबन्तपदम्प्रकृति-प्रत्ययविभागःअर्थः
सम्भूयसम् + भू + ल्यप्मिलकर
विकीर्यवि + कॄ + ल्यप्बिखेरकर
विस्तीर्यवि + स्तॄ + ल्यप्फैलाकर
अवतीर्यअव + तॄ + ल्यप्उतरकर
अवलोक्यअव + लोक् + ल्यप्देखकर
अवलम्ब्यअव + लम्ब् + ल्यप्आश्रय लेकर
एकचित्तीभूयएकचित्ती + भू + ल्यप्एक मन होकर
आलोच्यआ + लोच् + ल्यप्विचार करके
प्रत्यभिज्ञायप्रति + अभि + ज्ञा + ल्यप्पहचानकर
निःसृत्यनिस् + सृ + ल्यप्निकलकर
आकर्ण्यआ + कर्ण् + ल्यप्सुनकर
आशङ्क्यआ + शकि + ल्यप्शङ्का करके

अत्र इदम् अवधेयम् — पृष्ठ 17ल्यप्-प्रत्ययः तथा विसर्गसन्धिः — पुस्तक के ‘अवधेयम्’ से अभ्यास के लिए जोड़े गए प्रश्न

व्याकरणम्
प्र.1ल्यप्-प्रत्ययः कदा भवति ? क्त्वा-प्रत्ययात् सः कथं भिन्नः ? उदाहरणैः स्पष्टीकुरुत ।
उत्तर

नियमः — जहाँ एक क्रिया समाप्त होने के बाद दूसरी क्रिया होती है, वहाँ पूर्वकालिक क्रिया में धातु से क्त्वा प्रत्यय होता है। किन्तु यदि उसी धातु से पहले कोई उपसर्ग लगा हो, तो क्त्वा के स्थान पर ल्यप् होता है और ल्यप् में केवल ‘य’ शेष रहता है।

गम् + क्त्वा = गत्वा   (उपसर्ग नहीं)
आ + गम् + ल्यप् = आगत्य   (उपसर्ग ‘आ’ लगते ही क्त्वा → ल्यप्)
कृ + क्त्वा = कृत्वा  →  उप + कृ + ल्यप् = उपकृत्य
भू + क्त्वा = भूत्वा  →  सम् + भू + ल्यप् = सम्भूय

पाठस्य उदाहरणे — तण्डुलकणान् अवलोक्य (अव + लोक् + ल्यप्) कपोतान् प्रति आह। धैर्यम् अवलम्ब्य (अव + लम्ब् + ल्यप्) प्रतीकारः चिन्त्यताम्।

प्र.2विसर्गसन्धेः चत्वारः नियमाः पाठे प्रदत्ताः । तान् उदाहरणैः सह लिखत ।
उत्तर

पाठ में विसर्गसन्धि के चार नियम दिए गए हैं। नीचे प्रत्येक नियम, उसका सूत्र-रूप और पाठ का उदाहरण दिया गया है।

क्रमःनियमःउदाहरणम्
१विसर्ग के बाद च् या छ् हो तो विसर्ग के स्थान पर श् हो जाता हैकः + चित् = कश्चित्
प्रतीकारः + चिन्त्यताम् = प्रतीकारश्चिन्त्यताम्
देवदत्तः + छलेन = देवदत्तश्छलेन
२विसर्ग के बाद त् या थ् हो तो विसर्ग के स्थान पर स् हो जाता हैचकितः + तूष्णीम् = चकितस्तूष्णीम्
नीतिः + तावत् = नीतिस्तावत्
३विसर्ग से पहले अ हो और बाद में किसी वर्ग का तीसरा, चौथा या पाँचवाँ वर्ण अथवा य् र् ल् व् ह् हो, तो ‘अः’ के स्थान पर ओ हो जाता हैहिरण्यकः + नाम = हिरण्यको नाम
ततः + हिरण्यकः = ततो हिरण्यकः
व्याधः + निवृत्तः = व्याधो निवृत्तः
४विसर्ग से पहले और बाद दोनों ओर अ हो, तो ‘अः’ के स्थान पर ओ होता है और आगे वाला ‘अ’ लुप्त होकर ऽ (अवग्रह) लिखा जाता हैकुतः + अत्र = कुतोऽत्र
हितः + अपि = हितोऽपि
सः + अस्माकम् = सोऽस्माकम्

अधः प्रदत्तानि ल्यप्-प्रत्ययान्तानि पदानि ध्यानेन पठत अवगच्छत च — पृष्ठ 18–19लट्-लकारक्रिया / प्रकृति-प्रत्ययविभागः / ल्यबन्तरूपम् / विवरणार्थः / वाक्यानि

व्याकरणम्
प्र.1पुस्तके प्रदत्तां ल्यप्-प्रत्ययान्तपदानां सारिणीं पठत, अवगच्छत च ।
उत्तर

पुस्तक की पूरी सारिणी नीचे दी है। पाँचवें स्तम्भ में वही वाक्य हैं जिनमें ल्यबन्त पद (लाल रंग में) प्रयुक्त हुआ है।

लट्-लकारक्रियाप्रकृति-प्रत्ययविभागःल्यबन्तरूपम्विवरणार्थःवाक्यम्
आगच्छतिआ + गम् + ल्यप्आगत्य / आगम्यआगमनं कृत्वाछात्रः विद्यालयम् आगत्य संस्कृतं पठति।
आनयतिआ + नी + ल्यप्आनीयआनयनं कृत्वासः ग्रन्थालयात् ग्रन्थम् आनीय पठति।
उत्तिष्ठतिउत् + स्था + ल्यप्उत्थायउत्थानं कृत्वासुरेशः प्रातः उत्थाय मातापितरौ नमति।
प्रणमतिप्र + नम् + ल्यप्प्रणम्य / प्रणत्यप्रणामं कृत्वाशिष्यः गुरुं प्रणम्य ग्रन्थं पठति।
उपकरोतिउप + कृ + ल्यप्उपकृत्यउपकारं कृत्वासज्जनः दुःखितजनान् उपकृत्य मोदते।
निर्दिशतिनिर् + दिश् + ल्यप्निर्दिश्यनिर्देशं कृत्वाअध्यापकः चित्रं निर्दिश्य पाठयति।
निश्चिनोतिनिस् + चि + ल्यप्निश्चित्यनिश्चयं कृत्वाछात्रः ध्येयं निश्चित्य अध्ययनं करोति।
विस्मरतिवि + स्मृ + ल्यप्विस्मृत्यविस्मरणं कृत्वाअहं पुस्तकं विस्मृत्य आगतवान्।
परिष्करोतिपरि + कृ + ल्यप्परिष्कृत्यपरिष्कारं कृत्वाछात्रः व्याकरणेन भाषां परिष्कृत्य वदति।
आरभतेआ + रभ् + ल्यप्आरभ्यआरम्भं कृत्वाश्वः आरभ्य अहं योगासनानि करिष्यामि।
स्वीकरोतिस्वी + कृ + ल्यप्स्वीकृत्यस्वीकारं कृत्वामाता वस्तूनि स्वीकृत्य आगच्छति।
विलिखतिवि + लिख् + ल्यप्विलिख्यलेखनं कृत्वाशिक्षकः सुधाखण्डेन श्लोकं विलिख्य पाठयति।
प्रक्षालयतिप्र + क्षल (क्षालि) + ल्यप्प्रक्षाल्यप्रक्षालनं कृत्वामाता वस्त्रं प्रक्षाल्य आपणं गच्छति।
अपकरोतिअप + कृ + ल्यप्अपकृत्यअपकारं कृत्वादुर्जनः सज्जनम् अपकृत्य गच्छति।
अवलोकतेअव + लोक् + ल्यप्अवलोक्यअवलोकनं कृत्वाकपोताः तण्डुलान् अवलोक्य आनन्दन्ति।
आशङ्कतेआ + शकि + ल्यप्आशङ्क्यआशङ्कां कृत्वामनुष्यः निन्दितकर्मणि पापम् आशङ्क्य सत्कर्म कुरुते।
विकिरतिवि + कॄ + ल्यप्विकीर्यविकरणं कृत्वाव्याधः तण्डुलकणान् विकीर्य जालं विस्तारयति।
अवतरतिअव + तॄ + ल्यप्अवतीर्यअवतरणं कृत्वाकपोताः भूमौ अवतीर्य तण्डुलान् भक्षयन्ति।
विस्तृणातिवि + स्तॄ + ल्यप्विस्तीर्यविस्तृतं कृत्वाव्याधः जालं विस्तीर्य प्रच्छन्नो भूत्वा स्थितः।
अवलम्बतेअव + लम्ब् + ल्यप्अवलम्ब्यअवलम्बनं कृत्वामर्कटः वृक्षशाखाम् अवलम्ब्य शयनं करोति।
निर्मातिनिर् + मा + ल्यप्निर्मायनिर्माणं कृत्वाभक्तः मन्दिरं निर्माय देवम् अर्चति।

अभ्यासात् जायते सिद्धिः — प्रश्न 1 — पृष्ठ 19अधोलिखितानां प्रश्नानाम् एकपदेन उत्तरं लिखत

अभ्यासः
प्र.1 (क)मित्राणि ग्रीष्मावकाशे कुत्र गच्छन्ति ?
उत्तर

उत्तरम् — उत्तराखण्डम् । (देवभूमिम् उत्तराखण्डम्)

[हिन्दी — मित्र ग्रीष्मावकाश में उत्तराखण्ड जाते हैं — पाठ में उसे ‘पुण्यक्षेत्रदर्शनाय देवभूमिम् उत्तराखण्डम्’ कहा गया है।]

प्र.1 (ख)सर्वत्र कः प्रसृतः ?
उत्तर

उत्तरम् — अन्धकारः ।

[हिन्दी — सहसा सब ओर अन्धकार फैल गया — ‘सहसा सर्वत्र अन्धकारः प्रसृतः’।]

प्र.1 (ग)कः सर्वान् प्रेरयन् अवदत् ?
उत्तर

उत्तरम् — नायकः । (नायकः सुधीरः)

[हिन्दी — सबका अधैर्य देखकर नायक (सुधीर) ने सबको सान्त्वना देते और प्रेरित करते हुए कहा।]

प्र.1 (घ)कः हितोपदेशस्य कथां श्रावयति ?
उत्तर

उत्तरम् — नायकः । (सुधीरः)

[हिन्दी — नायक (सुधीर) हितोपदेश की कथा सुनाता है — “अस्मिन् प्रसङ्गे अहं हितोपदेशस्य एकां कथां श्रावयामि।”]

प्र.1 (ङ)कपोतराजस्य नाम किम् ?
उत्तर

उत्तरम् — चित्रग्रीवः ।

[हिन्दी — कपोतराज का नाम चित्रग्रीव है — ‘चित्रग्रीवनामा कपोतराजः सपरिवारः आकाशमार्गे गच्छति स्म’।]

प्र.1 (च)व्याधः कान् विकीर्य जालं प्रसारितवान् ?
उत्तर

उत्तरम् — तण्डुलकणान् ।

[हिन्दी — बहेलिये ने चावल के दाने बिखेरकर जाल फैलाया — ‘व्याधः तण्डुलकणान् विकीर्य जालं विस्तीर्य च प्रच्छन्नो भूत्वा स्थितः’।]

प्र.1 (छ)विपत्काले विस्मयः कस्य लक्षणम् ?
उत्तर

उत्तरम् — कापुरुषस्य । (कापुरुषलक्षणम्)

[हिन्दी — विपत्ति के समय घबरा जाना कायर पुरुष का लक्षण है — ‘यतोहि विपत्काले विस्मयः एव कापुरुषलक्षणम्’।]

प्र.1 (ज)चित्रग्रीवस्य मित्रं हिरण्यकः कुत्र निवसति ?
उत्तर

उत्तरम् — चित्रवने । (गण्डकीतीरे चित्रवने)

[हिन्दी — हिरण्यक गण्डकी नदी के तट पर स्थित चित्रवन में रहता है।]

प्र.1 (झ)चित्रग्रीवः हिरण्यकं कथं सम्बोधयति ?
उत्तर

उत्तरम् — ‘सखे’ इति । (सखे हिरण्यक !)

[हिन्दी — चित्रग्रीव हिरण्यक को ‘सखे’ (हे मित्र!) कहकर पुकारता है — “सखे हिरण्यक! किम् अस्माभिः सह न सम्भाषसे?”]

प्र.1 (ञ)पूर्वं केषां पाशान् छिनत्तु इति चित्रग्रीवः वदति ?
उत्तर

उत्तरम् — मदाश्रितानाम् । (एतेषां कपोतानाम्)

[हिन्दी — चित्रग्रीव कहता है — “पहले मेरे आश्रित इन कपोतों के बन्धन काटो, बाद में मेरे।” — “पूर्वं मदाश्रितानाम् एतेषां पाशान् छिनत्तु, पश्चात् मम।”]

अभ्यासात् जायते सिद्धिः — प्रश्न 2 — पृष्ठ 19–20पूर्णवाक्येन उत्तरं लिखत

अभ्यासः
प्र.2 (क)यदा केदारक्षेत्रम् आरोहन्तः आसन् किम् अभवत् ?
उत्तर

उत्तरम् — यदा ते श्रीकेदारक्षेत्रम् आरोहन्तः आसन् तदा लक्ष्यप्राप्तेः पूर्वं वेगेन वृष्टिः आरब्धा, सहसा सर्वत्र अन्धकारः प्रसृतः, नद्याः तीव्रजलवेगेन सेतुः भग्नः, पर्वतस्खलनं च सञ्जातम् ।

[हिन्दी — जब वे श्रीकेदारक्षेत्र चढ़ रहे थे, तब लक्ष्य तक पहुँचने से पहले ही तेज़ वर्षा शुरू हो गई, अचानक सब ओर अँधेरा छा गया, नदी के तीव्र जल-वेग से पुल टूट गया और पर्वत का स्खलन (भूस्खलन) हो गया।]

प्र.2 (ख)सर्वे उच्चस्वरेण किं प्रार्थयन्त ?
उत्तर

उत्तरम् — सर्वे उच्चस्वरेण अक्रन्दन् ईश्वरं प्रार्थयन्त च — ‘हे भगवन् ! रक्ष अस्मान् रक्ष’ इति ।

[हिन्दी — सब ऊँचे स्वर में रोने लगे और ईश्वर से प्रार्थना करने लगे — “हे भगवन्! हमारी रक्षा करो, रक्षा करो।”]

प्र.2 (ग)असम्भवं कार्यं कथं कर्तुं शक्यते इति नायकः उक्तवान् ?
उत्तर

उत्तरम् — नायकः उक्तवान् — वयम् आत्मविश्वासबलेन इदम् असम्भवम् अपि कार्यं सम्भूय अवश्यं साधयितुं शक्नुमः ।

[हिन्दी — नायक ने कहा कि हम आत्मविश्वास के बल से मिलकर यह असम्भव काम भी अवश्य कर सकते हैं; उससे हमें लक्ष्य भी मिलेगा और प्राणों की रक्षा भी होगी।]

प्र.2 (घ)निर्जने वने तण्डुलकणान् दृष्ट्वा चित्रग्रीवः किं निरूपयति ?
उत्तर

उत्तरम् — चित्रग्रीवः निरूपयति — “कुतोऽत्र निर्जने वने तण्डुलकणानां सम्भवः ? तद् निरूप्यताम् । कश्चिद् व्याधोऽत्र भवेत् । सर्वथा अविचारितं कर्म न कर्तव्यम् ।”

[हिन्दी — चित्रग्रीव विचार करता है — “इस निर्जन वन में चावल के दाने कहाँ से आ सकते हैं? इस पर सोचा जाए। यहाँ कोई बहेलिया अवश्य होगा। बिना विचारे कोई काम कभी नहीं करना चाहिए।”]

प्र.2 (ङ)किं नीतिवचनं प्रसिद्धम् ?
उत्तर

उत्तरम् — “लघूनाम् अपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका भवति” इति नीतिवचनं लोकसिद्धं प्रसिद्धं च ।

[हिन्दी — “छोटी-छोटी वस्तुओं का भी संगठन काम पूरा कर देता है” — यही लोकप्रसिद्ध नीतिवचन है। यही वाक्य श्लोक-रूप में पाठ का शीर्षक बना है — अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका।]

प्र.2 (च)व्याधात् रक्षां प्राप्तुं चित्रग्रीवः कम् आदेशं दत्तवान् ?
उत्तर

उत्तरम् — चित्रग्रीवः आदेशं दत्तवान् — “अतः अस्माभिः सर्वैः एकचित्तीभूय जालमादाय उड्डीयताम्” — इति । एवं विचार्य सर्वे पक्षिणः जालमादाय उत्पतिताः ।

[हिन्दी — चित्रग्रीव ने आदेश दिया — “अतः हम सबको एक चित्त होकर, जाल-सहित उड़ जाना चाहिए।” ऐसा विचार कर सब पक्षी जाल लेकर उड़ गए।]

प्र.2 (छ)हिरण्यकः किमर्थं तूष्णीं स्थितः ?
उत्तर

उत्तरम् — हिरण्यकः कपोतानाम् अवपातभयात् चकितः सन् तूष्णीं स्थितः । सः सर्वदा अनिष्टशङ्कया शतद्वारं विवरं कृत्वा निवसति स्म ।

[हिन्दी — हिरण्यक कपोतों के अचानक ऊपर से गिर पड़ने के भय से चकित होकर चुप बैठा रहा। वह सदा अनिष्ट की आशङ्का से सौ द्वारों वाला बिल बनाकर रहता था।]

प्र.2 (ज)पुलकितः हिरण्यकः चित्रग्रीवं कथं प्रशंसति ?
उत्तर

उत्तरम् — हिरण्यकः प्रहृष्टमनाः पुलकितः सन् अब्रवीत् — “साधु मित्र ! साधु । अनेन आश्रितवात्सल्येन त्वं त्रैलोक्यस्यापि स्वामित्वं प्राप्तुं योग्योऽसि ।”

[हिन्दी — प्रसन्न मन और रोमाञ्चित होकर हिरण्यक बोला — “धन्य हो मित्र, धन्य! इस आश्रितवात्सल्य के कारण तुम तीनों लोकों का स्वामित्व पाने के योग्य हो।”]

प्र.2 (झ)कपोताः कथं आत्मरक्षणं कृतवन्तः ?
उत्तर

उत्तरम् — आपद्ग्रस्ताः कपोताः बुद्धिबलेन संघटनसामर्थ्येन च आत्मसंरक्षणं कृतवन्तः ।

[हिन्दी — विपत्ति में फँसे कपोतों ने बुद्धि के बल और संगठन की सामर्थ्य से अपनी रक्षा की।]

प्र.2 (ञ)नायकस्य प्रेरकवचनैः सर्वेऽपि किम् अकुर्वन् ?
उत्तर

उत्तरम् — नायकस्य प्रेरकवचनैः उत्साहिताः सर्वेऽपि भयं शोकं सन्देहं च विहाय सेतुनिर्माणकार्ये संलग्नाः जाताः । भगीरथप्रयत्नैः सेतुनिर्माणं कृत्वा तैः स्वीयप्राणाः अन्येषां च प्राणाः संरक्षिताः ।

[हिन्दी — नायक के प्रेरक वचनों से उत्साहित होकर सब भय, शोक और सन्देह छोड़कर पुल बनाने के काम में जुट गए। भगीरथ जैसे प्रयत्न से पुल बनाकर उन्होंने अपने और दूसरों के भी प्राण बचा लिए।]

अभ्यासात् जायते सिद्धिः — प्रश्न 3 — पृष्ठ 20अधोलिखितानि वाक्यानि पठित्वा ल्यप्-प्रत्ययान्तेषु परिवर्तयत

अभ्यासः
प्र.3 (क)छात्रः कक्षां प्रविशति । संस्कृतं पठति ।
उत्तर

उत्तरम् (पुस्तके प्रदत्तम् उदाहरणम्) — छात्रः कक्षां प्रविश्य संस्कृतं पठति ।

[हिन्दी — छात्र कक्षा में प्रवेश करके संस्कृत पढ़ता है।]

प्र.3 (ख)भक्तः मन्दिरम् आगच्छति । पूजां करोति ।
उत्तर

उत्तरम् — भक्तः मन्दिरम् आगत्य पूजां करोति ।

[हिन्दी — भक्त मन्दिर आकर पूजा करता है।]

प्र.3 (ग)माता भोजनं निर्माति । पुत्राय ददाति ।
उत्तर

उत्तरम् — माता भोजनं निर्माय पुत्राय ददाति ।

[हिन्दी — माता भोजन बनाकर पुत्र को देती है।]

प्र.3 (घ)सुरेशः प्रातः उत्तिष्ठति । देवं नमति ।
उत्तर

उत्तरम् — सुरेशः प्रातः उत्थाय देवं नमति ।

[हिन्दी — सुरेश प्रातः उठकर देव को प्रणाम करता है।]

प्र.3 (ङ)रमा पुस्तकं स्वीकरोति । विद्यालयं गच्छति ।
उत्तर

उत्तरम् — रमा पुस्तकं स्वीकृत्य विद्यालयं गच्छति ।

[हिन्दी — रमा पुस्तक लेकर विद्यालय जाती है।]

प्र.3 (च)अहं गृहम् आगच्छामि । भोजनं करोमि ।
उत्तर

उत्तरम् — अहं गृहम् आगत्य भोजनं करोमि ।

[हिन्दी — मैं घर आकर भोजन करता/करती हूँ।]

प्र.3 (छ)तण्डुलकणान् विकिरति । जालं विस्तारयति ।
उत्तर

उत्तरम् — तण्डुलकणान् विकीर्य जालं विस्तारयति ।

[हिन्दी — (बहेलिया) चावल के दाने बिखेरकर जाल फैलाता है।]

प्र.3 (ज)व्याधः तण्डुलकणान् अवलोकते । भूमौ अवतरति ।
उत्तर

उत्तरम् — व्याधः तण्डुलकणान् अवलोक्य भूमौ अवतरति ।

[हिन्दी — व्याध चावल के दाने देखकर भूमि पर उतरता है।]

अभ्यासात् जायते सिद्धिः — प्रश्न 4 — पृष्ठ 20उदाहरणानुसारम् उपसर्गयोजनेन क्त्वा-स्थाने ल्यप्-प्रत्ययस्य प्रयोगं कृत्वा पदानि परिवर्तयत (सम्, आ, उप, उत्, वि, प्र)

अभ्यासः
प्र.4 (क)छात्रः गृहं गत्वा भोजनं करोति ।
उत्तर

उत्तरम् (पुस्तके प्रदत्तम् उदाहरणम्) — छात्रः गृहम् आगत्य (आ + गम् + ल्यप्) भोजनं करोति ।

[हिन्दी — छात्र घर आकर भोजन करता है।]

प्र.4 (ख)माता वस्त्राणि क्षालयित्वा पचति ।
उत्तर

उत्तरम् — माता वस्त्राणि प्रक्षाल्य (प्र + क्षल् + ल्यप्) पचति ।

[हिन्दी — माता कपड़े धोकर भोजन पकाती है।]

प्र.4 (ग)शिक्षकः श्लोकं लिखित्वा पाठयति ।
उत्तर

उत्तरम् — शिक्षकः श्लोकं विलिख्य (वि + लिख् + ल्यप्) पाठयति ।

[हिन्दी — शिक्षक श्लोक लिखकर पढ़ाते हैं।]

प्र.4 (घ)रमा स्थित्वा गीतं गायति ।
उत्तर

उत्तरम् — रमा उत्थाय (उत् + स्था + ल्यप्) गीतं गायति ।

[हिन्दी — रमा खड़ी होकर गीत गाती है।]

प्र.4 (ङ)शिष्यः सर्वदा गुरुं नत्वा पठति ।
उत्तर

उत्तरम् — शिष्यः सर्वदा गुरुं प्रणम्य (प्र + नम् + ल्यप्) पठति ।

[हिन्दी — शिष्य सदा गुरु को प्रणाम करके पढ़ता है।]

प्र.4 (च)लेखकः आलोचनं कृत्वा लिखति ।
उत्तर

उत्तरम् — लेखकः आलोच्य (आ + लोच् + ल्यप्) लिखति ।

[हिन्दी — लेखक भली-भाँति विचार करके लिखता है।]

अभ्यासात् जायते सिद्धिः — प्रश्न 5 — पृष्ठ 21पाठे प्रयुक्तेन उपयुक्तपदेन रिक्तस्थानं पूरयत

अभ्यासः
प्र.5 (क)सर्वैः एकचित्तीभूय ……………… उड्डीयताम् ।
उत्तर

उत्तरम् — सर्वैः एकचित्तीभूय जालमादाय उड्डीयताम् ।

[हिन्दी — सबको एक चित्त होकर जाल लेकर उड़ जाना चाहिए।]

प्र.5 (ख)जालापहारकान् तान् ……………… पश्चाद् अधावत् ।
उत्तर

उत्तरम् — जालापहारकान् तान् अवलोक्य पश्चाद् अधावत् ।

[हिन्दी — जाल ले जाने वालों को देखकर (बहेलिया) पीछे-पीछे दौड़ा।]

प्र.5 (ग)अस्माकं मित्रं ……………… नाम मूषकराजः गण्डकीतीरे चित्रवने निवसति ।
उत्तर

उत्तरम् — अस्माकं मित्रं हिरण्यको नाम मूषकराजः गण्डकीतीरे चित्रवने निवसति ।

[हिन्दी — हमारा मित्र हिरण्यक नाम का चूहों का राजा गण्डकी नदी के तट पर चित्रवन में रहता है।]

प्र.5 (घ)हिरण्यकः कपोतानाम् ……………… चकितस्तूष्णीं स्थितः ।
उत्तर

उत्तरम् — हिरण्यकः कपोतानाम् अवपातभयात् चकितस्तूष्णीं स्थितः ।

[हिन्दी — हिरण्यक कपोतों के ऊपर से गिर पड़ने के भय से चकित होकर चुप बैठा रहा।]

प्र.5 (ङ)यतोहि विपत्काले ……………… एव कापुरुषलक्षणम् ।
उत्तर

उत्तरम् — यतोहि विपत्काले विस्मयः एव कापुरुषलक्षणम् ।

[हिन्दी — क्योंकि विपत्ति के समय घबरा जाना ही कायर पुरुष का लक्षण है।]

अभ्यासात् जायते सिद्धिः — प्रश्न 6 — पृष्ठ 21पाठे प्रयुक्तेन ल्यप्प्रत्ययान्तपदेन सह उपयुक्तं पदं योजयत

अभ्यासः
प्र.6पाठे प्रयुक्तेन ल्यप्प्रत्ययान्तपदेन सह उपयुक्तं पदं योजयत — (पुस्तक में (घ) अवलोक्य को ‘जालापहारकान्’ से रेखा द्वारा उदाहरण-रूप में जोड़ा गया है।)
ल्यबन्तपदम्पदम्
(क) विकीर्यजालम्
(ख) विस्तीर्यजालापहारकान्
(ग) अवतीर्यउड्डीयताम्
(घ) अवलोक्यतद्वचनम्
(ङ) एकचित्तीभूयभूमौ
(च) प्रत्यभिज्ञायतण्डुलकणान्
उत्तर

पुस्तक में (घ) अवलोक्य का मिलान उदाहरण-रूप में पहले से खींचा हुआ है। शेष पाँच का सही मेल नीचे है — प्रत्येक जोड़ी पाठ के अपने वाक्य से सिद्ध होती है।

क्रमःल्यबन्तपदम्उपयुक्तं पदम्पाठस्य वाक्यम्
(क)विकीर्यतण्डुलकणान्व्याधः तण्डुलकणान् विकीर्य जालं विस्तीर्य च प्रच्छन्नो भूत्वा स्थितः।
(ख)विस्तीर्यजालम्व्याधः जालं विस्तीर्य प्रच्छन्नो भूत्वा स्थितः।
(ग)अवतीर्यभूमौसर्वे कपोताः भूमौ अवतीर्य तण्डुलकणान् भोक्तुं प्रवृत्ताः।
(घ)अवलोक्यजालापहारकान्स व्याधः सुदूरात् जालापहारकान् तान् अवलोक्य पश्चात् अधावत्। (उदाहरणम्)
(ङ)एकचित्तीभूयउड्डीयताम्अस्माभिः सर्वैः एकचित्तीभूय जालमादाय उड्डीयताम्।
(च)प्रत्यभिज्ञायतद्वचनम्ततो हिरण्यकः तद्वचनं प्रत्यभिज्ञाय आनन्देन त्वरया बहिः निःसृत्य अब्रवीत्।

अभ्यासात् जायते सिद्धिः — प्रश्न 7 — पृष्ठ 21समासयुक्तपदेन रिक्तस्थानं पूरयत

अभ्यासः
प्र.7 (क)गण्डक्याः तीरम् = ……………… , तस्मिन् = ………………
उत्तर

उत्तरम् (पुस्तके प्रदत्तम् उदाहरणम्) — गण्डक्याः तीरम् = गण्डकीतीरम् ; तस्मिन् = गण्डकीतीरे ।

[हिन्दी — गण्डकी का तीर = गण्डकीतीर; उसमें = गण्डकीतीरे।]

प्र.7 (ख)तण्डुलानां कणाः = ……………… , तान् = ………………
उत्तर

उत्तरम् — तण्डुलानां कणाः = तण्डुलकणाः ; तान् = तण्डुलकणान् ।

[हिन्दी — चावलों के कण = तण्डुलकण; उनको = तण्डुलकणान्।]

प्र.7 (ग)जालस्य अपहारकाः = ……………… , तान् = ………………
उत्तर

उत्तरम् — जालस्य अपहारकाः = जालापहारकाः ; तान् = जालापहारकान् ।

[हिन्दी — जाल को ले जाने वाले = जालापहारक; उनको = जालापहारकान्।]

प्र.7 (घ)अवपाताद् भयम् = ……………… , तस्मात् = ………………
उत्तर

उत्तरम् — अवपाताद् भयम् = अवपातभयम् ; तस्मात् = अवपातभयात् ।

[हिन्दी — गिर पड़ने से भय = अवपातभय; उससे = अवपातभयात्।]

प्र.7 (ङ)कापुरुषाणां लक्षणम् = ……………… , तस्मिन् = ………………
उत्तर

उत्तरम् — कापुरुषाणां लक्षणम् = कापुरुषलक्षणम् ; तस्मिन् = कापुरुषलक्षणे ।

[हिन्दी — कायर पुरुषों का लक्षण = कापुरुषलक्षण; उसमें = कापुरुषलक्षणे।]

अभ्यासात् जायते सिद्धिः — प्रश्न 8 — पृष्ठ 21–22सार्थकपदं ज्ञात्वा सन्धिविच्छेदं कुरुत

अभ्यासः
प्र.8 (क)इत्याकर्ण्य = ……………… + ………………
उत्तर

उत्तरम् (पुस्तके प्रदत्तम् उदाहरणम्) — इत्याकर्ण्य = इति + आकर्ण्य ।

[हिन्दी — ‘ऐसा सुनकर’। पाठ में इसी प्रकार — ‘एतदाकर्ण्य (एतत् + आकर्ण्य) हिरण्यकः प्रहृष्टमनाः पुलकितः सन् अब्रवीत्।’]

प्र.8 (ख)चित्रग्रीवोऽवदत् = ……………… + ………………
उत्तर

उत्तरम् (पुस्तके प्रदत्तम् उदाहरणम्) — चित्रग्रीवोऽवदत् = चित्रग्रीवः + अवदत् ।

[हिन्दी — ‘चित्रग्रीव ने कहा’।]

प्र.8 (ग)बालकोऽत्र = ……………… + ………………
उत्तर

उत्तरम् — बालकोऽत्र = बालकः + अत्र ।

[हिन्दी — ‘बालक यहाँ’।]

प्र.8 (घ)धैर्यमथाभ्युदये = ……………… + ……………… + ………………
उत्तर

उत्तरम् — धैर्यमथाभ्युदये = धैर्यम् + अथ + अभ्युदये ।

[हिन्दी — ‘धैर्य, और उन्नति में’ — कथा के दूसरे श्लोक ‘विपदि धैर्यमथाभ्युदये क्षमा…’ का अंश।]

प्र.8 (ङ)भोजनेऽप्यप्रवर्तनम् = ……………… + ……………… + ………………
उत्तर

उत्तरम् — भोजनेऽप्यप्रवर्तनम् = भोजने + अपि + अप्रवर्तनम् ।

[हिन्दी — ‘भोजन में भी प्रवृत्ति न होना’ — कथा के पहले श्लोक का अंश।]

प्र.8 (च)नमस्ते = ……………… + ………………
उत्तर

उत्तरम् — नमस्ते = नमः + ते ।

[हिन्दी — ‘तुम्हें नमस्कार’।]

प्र.8 (छ)उपायश्चिन्तनीयः = ……………… + ………………
उत्तर

उत्तरम् — उपायश्चिन्तनीयः = उपायः + चिन्तनीयः ।

[हिन्दी — ‘उपाय सोचा जाना चाहिए’।]

प्र.8 (ज)व्याधस्तत्र = ……………… + ………………
उत्तर

उत्तरम् — व्याधस्तत्र = व्याधः + तत्र ।

[हिन्दी — ‘बहेलिया वहाँ’।]

प्र.8 (झ)हिरण्यकोऽप्याह = ……………… + ……………… + ………………
उत्तर

उत्तरम् — हिरण्यकोऽप्याह = हिरण्यकः + अपि + आह ।

[हिन्दी — ‘हिरण्यक ने भी कहा’।]

प्र.8 (ञ)मूषकराजो गण्डकीतीरे = ……………… + ……………… + ………………
उत्तर

उत्तरम् — मूषकराजो गण्डकीतीरे = मूषकराजः + गण्डकी + तीरे ।

[हिन्दी — ‘चूहों का राजा गण्डकी के तट पर’।]

प्र.8 (ट)अतस्त्वाम् = ……………… + ………………
उत्तर

उत्तरम् — अतस्त्वाम् = अतः + त्वाम् ।

[हिन्दी — ‘इसलिए तुम्हें’।]

प्र.8 (ठ)कश्चित् = ……………… + ………………
उत्तर

उत्तरम् — कश्चित् = कः + चित् ।

[हिन्दी — ‘कोई’। पाठ में — ‘अथ कदाचित् तत्र कश्चिद् व्याधः …’]

योग्यताविस्तरः — पृष्ठ 22–23ग्रन्थपरिचयः तथा हितोपदेशस्य द्वौ श्लोकौ — योग्यताविस्तर से अभ्यास के लिए जोड़े गए प्रश्न

योग्यताविस्तरः
प्र.1ग्रन्थपरिचयः — प्रस्तुतः पाठः कस्मात् ग्रन्थात् स्वीकृतः ? तस्य ग्रन्थस्य परिचयं लिखत ।
उत्तर

उत्तरम् — प्रस्तुतः पाठः हितोपदेशग्रन्थस्य ‘मित्रलाभ’-प्रकरणात् स्वीकृतः । अस्य ग्रन्थस्य लेखकः पण्डितः नारायणशर्मा अस्ति । अस्मिन् ग्रन्थे मूल्ययुक्तानां, नीतियुक्तानां च वचनानां, सुभाषितानां, कथानां च सङ्ग्रहः अस्ति । अतः अयं ग्रन्थः संस्कृतसाहित्ये अत्यन्तं समाद्रियते । अस्मिन् ग्रन्थे चत्वारि प्रकरणानि सन्ति — (१) मित्रलाभः (२) सुहृद्भेदः (३) विग्रहः (४) सन्धिः इति । अस्य अध्ययनेन छात्रः नीतिविद्यायां संस्कृतभाषायां च निपुणो भवति ।

प्र.2अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका ।
तृणैर्गुणत्वमापन्नैर्बध्यन्ते मत्तदन्तिनः ॥ (हितोपदेशः १.३६)
— अस्य श्लोकस्य पदच्छेदम्, अन्वयम्, अर्थं भावं च लिखत ।
उत्तर

पदच्छेदः — अल्पानाम् अपि वस्तूनाम् संहतिः कार्य-साधिका । तृणैः गुणत्वम् आपन्नैः बध्यन्ते मत्त-दन्तिनः ।

अन्वयः — अल्पानाम् अपि वस्तूनां संहतिः कार्य-साधिका (भवति) । गुणत्वम् आपन्नैः तृणैः मत्त-दन्तिनः बध्यन्ते ।

अर्थः — छोटी-छोटी वस्तुओं का भी संगठन कार्य सिद्ध कर देने वाला होता है। रस्सी का रूप ले चुके तिनकों से मतवाले हाथी तक बाँध दिए जाते हैं।

प्र.3विपदि धैर्यमथाभ्युदये क्षमा सदसि वाक्पटुता युधि विक्रमः ।
यशसि चाभिरुचिर्व्यसनं श्रुतौ प्रकृतिसिद्धमिदं हि महात्मनाम् ॥ (हितोपदेशः १.३२)
— अस्य श्लोकस्य पदच्छेदम्, अन्वयम्, अर्थं भावं च लिखत ।
उत्तर

पदच्छेदः — विपदि धैर्यम् अथ अभ्युदये क्षमा सदसि वाक्-पटुता युधि विक्रमः । यशसि च अभिरुचिः व्यसनम् श्रुतौ प्रकृति-सिद्धम् इदम् हि महात्मनाम् ।

अन्वयः — अथ विपदि धैर्यम्, अभ्युदये क्षमा, सदसि वाक्-पटुता, युधि विक्रमः, यशसि अभिरुचिः, श्रुतौ व्यसनं च — इदं हि महात्मनां प्रकृति-सिद्धं भवति ।

अर्थः — विपत्ति में धैर्य, उन्नति के समय क्षमा, सभा में वाणी की कुशलता, युद्ध में पराक्रम, यश में रुचि और शास्त्र-श्रवण में लगन — ये छहों गुण महापुरुषों में स्वभाव से ही सिद्ध होते हैं।

परियोजनाकार्यम् — पृष्ठ 23क्रियापदानां प्रयोगकौशलम् तथा कक्षा-परिचर्चा

परियोजनाकार्यम्
प्र.1 (यथा)पाठात् अधोलिखितानां क्रियापदानां प्रयोगकौशलं ज्ञात्वा तत्समानानि अन्यानि वाक्यानि रचयत — यथा — तिरस्कुर्वन्ति — दुर्जनाः सज्जनं तिरस्कुर्वन्ति ।
उत्तर

यह उदाहरण पुस्तक में दिया हुआ है। इससे विधि समझ लीजिए — पहले क्रियापद का लकार, पुरुष और वचन देखिए, फिर उसी के अनुरूप कर्ता चुनकर एक छोटा-सा नया वाक्य बनाइए।

तिरस्कुर्वन्ति → लट् लकार, प्रथमपुरुष, बहुवचन
अतः कर्ता भी बहुवचन चाहिए → दुर्जनाः
वाक्यम् — दुर्जनाः सज्जनं तिरस्कुर्वन्ति ।
प्र.1 (क)क्रियताम् — ………………
उत्तर

नमूना वाक्यम् — छात्रैः गृहकार्यं सम्यक् क्रियताम् ।

[हिन्दी — छात्रों द्वारा गृहकार्य भली-भाँति किया जाए।]

प्र.1 (ख)निवसति — ………………
उत्तर

नमूना वाक्यम् — मम मित्रं वाराणस्यां निवसति ।

[हिन्दी — मेरा मित्र वाराणसी में रहता है।]

प्र.1 (ग)आह — ………………
उत्तर

नमूना वाक्यम् — गुरुः शिष्यम् आह — “सत्यं वद, धर्मं चर” इति ।

[हिन्दी — गुरु शिष्य से कहते हैं — “सच बोलो, धर्म का आचरण करो।”]

प्र.1 (घ)छेत्स्यति — ………………
उत्तर

नमूना वाक्यम् — कृषकः तीक्ष्णेन शस्त्रेण वृक्षस्य शुष्कां शाखां छेत्स्यति ।

[हिन्दी — किसान तेज़ हथियार से पेड़ की सूखी शाखा काटेगा।]

प्र.1 (ङ)सम्भाषसे — ………………
उत्तर

नमूना वाक्यम् — सखे ! त्वम् अद्य मया सह किमर्थं न सम्भाषसे ?

[हिन्दी — मित्र! तुम आज मेरे साथ बात क्यों नहीं कर रहे?]

प्र.1 (च)अब्रवीत् — ………………
उत्तर

नमूना वाक्यम् — पिता पुत्रम् अब्रवीत् — “परिश्रमेण एव सफलता लभ्यते” इति ।

[हिन्दी — पिता ने पुत्र से कहा — “परिश्रम से ही सफलता मिलती है।”]

प्र.1 (छ)उपसर्पति — ………………
उत्तर

नमूना वाक्यम् — क्षुधार्तः बालकः मातरम् उपसर्पति ।

[हिन्दी — भूख से पीड़ित बालक माता के पास जाता है।]

प्र.1 (ज)युज्यते — ………………
उत्तर

नमूना वाक्यम् — विपत्काले धैर्यम् एव युज्यते, न तु विषादः ।

[हिन्दी — विपत्ति के समय धैर्य ही उचित है, विषाद नहीं।]

प्र.2अनया कथया वयं स्वजीवने कां शिक्षां स्वीकर्तुं शक्नुमः इति अधिकृत्य कक्षायां परिचर्चां कुर्वन्तु ।
उत्तर

नमूना उत्तर (परिचर्चा का सारांश) — “इस कथा से हमें सबसे बड़ी शिक्षा यह मिलती है कि संगठन बल को नहीं, स्वरूप को बदल देता है। तिनका अकेला तिनका है, पर बटकर रस्सी बन जाए तो मतवाले हाथी को बाँध लेता है। कपोत अकेले-अकेले जाल में मरते, पर एक चित्त होकर उन्होंने उसी जाल को उठा लिया। हमारे जीवन में भी अनेक काम ऐसे हैं जो अकेले असम्भव लगते हैं — विद्यालय की स्वच्छता, बाढ़ या भूकम्प में सहायता, मुहल्ले में जल-संरक्षण। इनमें सबसे कठिन भाग शक्ति जुटाना नहीं, एकचित्त होना है। इसलिए हम यह संकल्प लें कि किसी भी सामूहिक कार्य में हम पहले दिशा तय करेंगे, फिर मिलकर एक ही दिशा में शक्ति लगाएँगे।”

Chapter 2 of 13 – Sanskrit

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