NCERT Solutions for Class 8 Sanskrit Chapter 2 अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका – step-by-step answers to every exercise and in-text question of the chapter, as per the latest NCERT syllabus for 2027. Read them online or download the free question-answer PDF.
दीपकम् (कक्षा 8) का द्वितीयः पाठः — अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका दो कथाओं को एक में पिरोता है — केदारक्षेत्र की यात्रा में विपत्ति से घिरे छात्रों का संवाद, और उसी संवाद के भीतर सुनाई गई हितोपदेश की चित्रग्रीव-कपोत-हिरण्यक कथा। यहाँ अभ्यासात् जायते सिद्धिः के प्रश्न 1–8, शब्दार्थ-सारिणी, ल्यप्-प्रत्यय और विसर्गसन्धि, योग्यताविस्तर के दो श्लोक तथा परियोजनाकार्य के उत्तर क्रम से दिए गए हैं।
NCERT Solutions for Class 8 Sanskrit Chapter 2 अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका PDF
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|---|---|---|
| Solutions PDF | अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका | View PDF |
पाठ का हिंदी अनुवाद
केदारक्षेत्र की यात्रा — विपत्ति में मित्रों का संवाद
हितोपदेश की कथा — कपोतराज चित्रग्रीव और मूषकराज हिरण्यक
सर्वत्रैवं विचारे तु भोजनेऽप्यप्रवर्तनम्॥ १ ॥”
सदसि वाक्पटुता युधि विक्रमः।
यशसि चाभिरुचिर्व्यसनं श्रुतौ
प्रकृतिसिद्धमिदं हि महात्मनाम्॥ २ ॥”
कथा के बाद — मिलकर सेतु का निर्माण
NCERT Solutions for Class 8 Sanskrit Chapter 2 अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका – Questions and Answers
All questions of the chapter are answered below, in the order of the book – in-text questions, activities and the end-of-chapter exercises. Each answer is written the way you would write it in the exam.
पाठ्य-प्रश्नाः (संवादः) — पृष्ठ 10–11श्रीकेदारक्षेत्रे विपत्तौ मित्राणां नायकस्य च संवादः — पाठ के संवाद से अभ्यास के लिए जोड़े गए प्रश्न (पुस्तक में ये प्रश्न नहीं हैं)
नायकस्य उत्तरम् — मित्र ! विषादं मा कुरु । यदा वृष्टिः शान्ता, वातावरणं च स्वच्छं भविष्यति तदा वयं सम्भूय सेतुं, मार्गं च निर्माय पुनः स्वलक्ष्यं प्रति गमिष्यामः ।
[हिन्दी — दिनेश निराशा में कहता है कि मृत्यु ही पास खड़ी है, ऐसे में उपाय कैसे सोचा जाए? नायक उत्तर देता है — “मित्र! विषाद मत करो। जब वर्षा थम जाएगी और वातावरण साफ़ हो जाएगा, तब हम मिलकर पुल और रास्ता बनाकर फिर अपने लक्ष्य की ओर बढ़ेंगे।”]
नायकस्य उत्तरम् — प्रियमित्राणि ! वयम् आत्मविश्वासबलेन इदम् असम्भवम् अपि कार्यं सम्भूय अवश्यं साधयितुं शक्नुमः । तेन अस्माकं लक्ष्यप्राप्तिः प्राणरक्षा चापि भविष्यति ।
[हिन्दी — सुरेश पूछता है — “इस स्थिति में क्या हम यह अत्यन्त कठिन और असम्भव काम कर सकते हैं?” नायक कहता है — “प्रिय मित्रो! हम आत्मविश्वास के बल से मिलकर यह असम्भव काम भी अवश्य कर लेंगे। उससे हमारा लक्ष्य भी मिलेगा और प्राण भी बचेंगे।”]
नायकस्य उत्तरम् — नूनं सम्भवति मित्र ! अस्मिन् प्रसङ्गे अहं हितोपदेशस्य एकां कथां श्रावयामि ।
[हिन्दी — कपिल सन्देह करता है — “क्या यह सम्भव है?” नायक कहता है — “निश्चय ही सम्भव है, मित्र! इसी प्रसंग में मैं तुम्हें हितोपदेश की एक कथा सुनाता हूँ।”]
नायकस्य उत्तरम् — सावधानं शृण्वन्तु — इति उक्त्वा सः हितोपदेशस्य ‘मित्रलाभ’-प्रकरणस्य चित्रग्रीव-कपोत-हिरण्यक-कथां श्रावयति ।
[हिन्दी — सब उत्सुकता से पूछते हैं — “कौन-सी कथा? कहो मित्र, कहो!” नायक कहता है — “ध्यान से सुनिए” — और हितोपदेश के ‘मित्रलाभ’ प्रकरण की वह कथा सुनाता है जिसमें कपोतराज चित्रग्रीव, बहेलिया और मूषकराज हिरण्यक आते हैं।]
पाठ्य-प्रश्नाः (कथा-भागः) — पृष्ठ 12–14हितोपदेशस्य कपोत-कथा तथा तत्र प्रयुक्तौ द्वौ श्लोकौ — कथा से अभ्यास के लिए जोड़े गए प्रश्न (पुस्तक में ये प्रश्न नहीं हैं)
चित्रग्रीवस्य निष्कर्षः — कश्चिद् व्याधोऽत्र भवेत् । सर्वथा अविचारितं कर्म न कर्तव्यम् ।
[हिन्दी — चित्रग्रीव कहता है — “इस निर्जन वन में चावल के दाने भला कहाँ से आ सकते हैं? इस पर विचार किया जाए। यहाँ कोई बहेलिया अवश्य होगा। बिना सोचा हुआ काम किसी भी हाल में नहीं करना चाहिए।”]
तस्य दर्पस्य फलम् — तस्य वचनं श्रुत्वा चित्रग्रीवस्य अवज्ञां कृत्वा सर्वे कपोताः भूमौ अवतीर्य तण्डुलकणान् भोक्तुं प्रवृत्ताः । अनन्तरं ते सर्वे तेन जालेन बद्धाः अभवन् ।
[हिन्दी — एक कपोत घमण्ड से बोला — “अरे! ऐसा क्यों कहा जा रहा है?” उसकी बात मानकर और चित्रग्रीव की अवज्ञा करके सब कपोत भूमि पर उतर आए और चावल खाने लगे। तुरन्त ही वे सब उस जाल में बँध गए।]
सर्वत्रैवं विचारे तु भोजनेऽप्यप्रवर्तनम्॥ १॥
— अस्य श्लोकस्य पदच्छेदं, अन्वयम्, अर्थं भावं च लिखत ।
पदच्छेदः — वृद्धानाम् वचनम् ग्राह्यम् आपत्-काले हि उपस्थिते । सर्वत्र एवम् विचारे तु भोजने अपि अप्रवर्तनम् ।
अन्वयः — आपत्-काले हि उपस्थिते वृद्धानाम् वचनम् ग्राह्यम् । तु सर्वत्र एवम् विचारे (सति) भोजने अपि अप्रवर्तनम् (भवेत्) ।
अर्थः — आपत्ति आने पर वृद्धों (अनुभवी जनों) का वचन मान लेना चाहिए। किन्तु यदि हर जगह इसी तरह (शंका करते हुए) विचार किया जाए तो भोजन में भी प्रवृत्ति नहीं हो सकेगी।
भावः — यह कपोत का कुतर्क है : हर जगह शंका करोगे तो भोजन भी नहीं कर पाओगे। वह भूल जाता है कि चित्रग्रीव ने सब भोजन का नहीं, केवल निर्जन वन में बिना कारण मिले दानों का निषेध किया था।
चित्रग्रीवस्य उत्तरम् — प्रियकपोताः ! अस्माकं मित्रं हिरण्यको नाम मूषकराजः गण्डकीतीरे चित्रवने निवसति । सोऽस्माकं पाशान् दन्तबलेन छेत्स्यति ।
[हिन्दी — बहेलिये को लौटा हुआ देखकर कपोतों ने पूछा — “स्वामी! अब क्या करना उचित है?” चित्रग्रीव ने कहा — “प्रिय कपोतो! हमारा मित्र हिरण्यक नाम का चूहों का राजा गण्डकी नदी के किनारे चित्रवन में रहता है। वह अपने दाँतों के बल से हमारे बन्धन काट देगा।”]
उत्तरम् (कथायाः फलम्) — नायकस्य प्रेरकवचनैः उत्साहिताः सर्वेऽपि भयं शोकं सन्देहं च विहाय सेतुनिर्माणकार्ये संलग्नाः जाताः । भगीरथप्रयत्नैः सेतुनिर्माणं कृत्वा तैः स्वीयप्राणाः अन्येषां च प्राणाः संरक्षिताः ।
वयं शब्दार्थान् जानीमः — पृष्ठ 15–16शब्दः / अर्थः / हिन्दी / English तथा ‘मातृभाषया अर्थं लिखत’ — प्र.2 अभ्यास के लिए जोड़ा गया प्रश्न है
मातृभाषया अर्थं लिखत — (पुस्तक की शब्दार्थ-सारिणी, पृष्ठ 15–16; अन्तिम स्तम्भ भरना है)
| शब्दः | अर्थः | हिन्दी | English | मातृभाषया अर्थं लिखत |
|---|---|---|---|---|
| भग्नः | नष्टः | टूट गया | Broke down | …… |
| अक्रन्दन् | रुदन्ति स्म | रोये | They cried | …… |
| सविषादम् | चिन्तापूर्वकम् | विषादपूर्वक | With sadness | …… |
| सम्भूय | मिलित्वा | मिलकर | Together | …… |
| तरुः | वृक्षः | पेड़ | Tree | …… |
| व्याधः | लुब्धकः | व्याध (बहेलिया) | Hunter | …… |
| तण्डुलकणान् | तण्डुललवान् | चावल के दानों को | Rice grains | …… |
| विकीर्य | विकिरणं कृत्वा | बिखेर कर | Having scattered | …… |
| विस्तीर्य | विस्तृतं, विस्तरणं कृत्वा | फैलाकर | Having spread | …… |
| प्रच्छन्नः | गुप्तः | छिपा हुआ | Stood secretly | …… |
| चित्रग्रीवनामा | चित्रग्रीवः नाम यस्य | चित्रग्रीव नाम का | Named Chitragriva | …… |
| प्रतीकारः | प्रतिविधानम् | उपाय | Remedy | …… |
| अविचारितम् | अचिन्तितम् | चिन्तन किये बिना | Not thought of | …… |
| अवतीर्य | अवतरणं कृत्वा (नीचैः आगत्य) | उतर कर | Having descended | …… |
| अवलोक्य | दृष्ट्वा | देख कर | Having seen | …… |
| अप्रवर्तनम् | अप्रवृत्तिः | न लगना, प्रवृत्त न होना | No inclination | …… |
| प्रवृत्ताः | निरताः | लगे हुए | Engaged / engrossed | …… |
| अवलम्ब्य | आश्रित्य | आश्रित होकर | Having depended on | …… |
| एकचित्तीभूय | एकमनसा | एक चित्त होकर | With united mind | …… |
| कापुरुषलक्षणम् | कुत्सितपुरुषाणां चिह्नम् | कायर पुरुषों का लक्षण | Signs of a coward | …… |
| तिरस्कुर्वन्ति | अनादरं कुर्वन्ति | तिरस्कार करते हैं | Reject | …… |
| विस्मयः | आश्चर्यम् | आश्चर्य | Amazement | …… |
| विक्रमः | अतिपराक्रमः | अत्यधिक शक्तियुक्त, पराक्रम | Valour | …… |
| उत्पतिताः | उड्डयनं कृतवन्तः | उड़ गए | Flew away | …… |
| चिन्त्यताम् | चिन्तनीयः | चिन्तन करना चाहिए / सोचिए | Should be thought | …… |
| आलोच्य | विचार्य | अच्छी तरह विचार कर | Having analysed | …… |
| पाशान् | बन्धनानि | बन्धनों को | Captivity | …… |
| प्रत्यभिज्ञाय | ज्ञात्वा | जानकर, समझकर | Having recognized | …… |
| त्वरया | शीघ्रम् | शीघ्र | Hurriedly, quickly | …… |
| निःसृत्य | निर्गत्य | निकल कर | Coming out | …… |
| मे | मम | मेरा | Mine | …… |
| छिनत्तु | छेदनं कुरु | काट दे | (you) Cut | …… |
| आकर्ण्य | श्रुत्वा | सुनकर | Having heard | …… |
| प्रहृष्टमनाः | आनन्दितमनाः | प्रसन्न मन वाला | Gleeful (person) | …… |
| पुलकितः | रोमाञ्चितः | प्रफुल्लित होकर | Excited | …… |
| सत्वरम् | त्वरया सह | अति शीघ्र | Quickly | …… |
| उपसर्पति | समीपम् आगच्छति | निकट आता है | Approaches near | …… |
| आश्रितवात्सल्येन | शरणम् आगतानां कृते स्नेहभावेन | शरण में आए हुओं के प्रति प्रेम से | Affection towards people who have taken shelter | …… |
| आशङ्क्य | शङ्कां कृत्वा | शङ्का करके | Having doubted | …… |
| अवज्ञा | तिरस्कारः | निन्दा | Disrespect | …… |
उत्तरम् — जिनकी मातृभाषा हिन्दी है, वे अन्तिम स्तम्भ में ये अर्थ लिखें (दूसरी मातृभाषा वाले उसी शब्द का अपनी भाषा का अर्थ लिखें) —
| शब्दः | मातृभाषया अर्थः (हिन्दी) |
|---|---|
| भग्नः | टूट गया |
| अक्रन्दन् | रोये |
| सविषादम् | विषादपूर्वक |
| सम्भूय | मिलकर |
| तरुः | पेड़ |
| व्याधः | व्याध (बहेलिया) |
| तण्डुलकणान् | चावल के दानों को |
| विकीर्य | बिखेर कर |
| विस्तीर्य | फैलाकर |
| प्रच्छन्नः | छिपा हुआ |
| चित्रग्रीवनामा | चित्रग्रीव नाम का |
| प्रतीकारः | उपाय |
| अविचारितम् | चिन्तन किये बिना |
| अवतीर्य | उतर कर |
| अवलोक्य | देख कर |
| अप्रवर्तनम् | न लगना, प्रवृत्त न होना |
| प्रवृत्ताः | लगे हुए |
| अवलम्ब्य | आश्रित होकर |
| एकचित्तीभूय | एक चित्त होकर |
| कापुरुषलक्षणम् | कायर पुरुषों का लक्षण |
| तिरस्कुर्वन्ति | तिरस्कार करते हैं |
| विस्मयः | आश्चर्य |
| विक्रमः | अत्यधिक शक्तियुक्त, पराक्रम |
| उत्पतिताः | उड़ गए |
| चिन्त्यताम् | चिन्तन करना चाहिए / सोचिए |
| आलोच्य | अच्छी तरह विचार कर |
| पाशान् | बन्धनों को |
| प्रत्यभिज्ञाय | जानकर, समझकर |
| त्वरया | शीघ्र |
| निःसृत्य | निकल कर |
| मे | मेरा |
| छिनत्तु | काट दे |
| आकर्ण्य | सुनकर |
| प्रहृष्टमनाः | प्रसन्न मन वाला |
| पुलकितः | प्रफुल्लित होकर |
| सत्वरम् | अति शीघ्र |
| उपसर्पति | निकट आता है |
| आश्रितवात्सल्येन | शरण में आए हुओं के प्रति प्रेम से |
| आशङ्क्य | शङ्का करके |
| अवज्ञा | निन्दा |
उत्तरम् — शब्दार्थ-सारिणी में बारह पद ल्यप्-प्रत्ययान्त हैं। सबका अन्त ‘य’ से होता है और (एकचित्तीभूय को छोड़कर) सबमें धातु से पहले उपसर्ग है — यही ल्यप् की पहचान है।
| ल्यबन्तपदम् | प्रकृति-प्रत्ययविभागः | अर्थः |
|---|---|---|
| सम्भूय | सम् + भू + ल्यप् | मिलकर |
| विकीर्य | वि + कॄ + ल्यप् | बिखेरकर |
| विस्तीर्य | वि + स्तॄ + ल्यप् | फैलाकर |
| अवतीर्य | अव + तॄ + ल्यप् | उतरकर |
| अवलोक्य | अव + लोक् + ल्यप् | देखकर |
| अवलम्ब्य | अव + लम्ब् + ल्यप् | आश्रय लेकर |
| एकचित्तीभूय | एकचित्ती + भू + ल्यप् | एक मन होकर |
| आलोच्य | आ + लोच् + ल्यप् | विचार करके |
| प्रत्यभिज्ञाय | प्रति + अभि + ज्ञा + ल्यप् | पहचानकर |
| निःसृत्य | निस् + सृ + ल्यप् | निकलकर |
| आकर्ण्य | आ + कर्ण् + ल्यप् | सुनकर |
| आशङ्क्य | आ + शकि + ल्यप् | शङ्का करके |
अत्र इदम् अवधेयम् — पृष्ठ 17ल्यप्-प्रत्ययः तथा विसर्गसन्धिः — पुस्तक के ‘अवधेयम्’ से अभ्यास के लिए जोड़े गए प्रश्न
नियमः — जहाँ एक क्रिया समाप्त होने के बाद दूसरी क्रिया होती है, वहाँ पूर्वकालिक क्रिया में धातु से क्त्वा प्रत्यय होता है। किन्तु यदि उसी धातु से पहले कोई उपसर्ग लगा हो, तो क्त्वा के स्थान पर ल्यप् होता है और ल्यप् में केवल ‘य’ शेष रहता है।
आ + गम् + ल्यप् = आगत्य (उपसर्ग ‘आ’ लगते ही क्त्वा → ल्यप्)
कृ + क्त्वा = कृत्वा → उप + कृ + ल्यप् = उपकृत्य
भू + क्त्वा = भूत्वा → सम् + भू + ल्यप् = सम्भूय
पाठस्य उदाहरणे — तण्डुलकणान् अवलोक्य (अव + लोक् + ल्यप्) कपोतान् प्रति आह। धैर्यम् अवलम्ब्य (अव + लम्ब् + ल्यप्) प्रतीकारः चिन्त्यताम्।
पाठ में विसर्गसन्धि के चार नियम दिए गए हैं। नीचे प्रत्येक नियम, उसका सूत्र-रूप और पाठ का उदाहरण दिया गया है।
| क्रमः | नियमः | उदाहरणम् |
|---|---|---|
| १ | विसर्ग के बाद च् या छ् हो तो विसर्ग के स्थान पर श् हो जाता है | कः + चित् = कश्चित् प्रतीकारः + चिन्त्यताम् = प्रतीकारश्चिन्त्यताम् देवदत्तः + छलेन = देवदत्तश्छलेन |
| २ | विसर्ग के बाद त् या थ् हो तो विसर्ग के स्थान पर स् हो जाता है | चकितः + तूष्णीम् = चकितस्तूष्णीम् नीतिः + तावत् = नीतिस्तावत् |
| ३ | विसर्ग से पहले अ हो और बाद में किसी वर्ग का तीसरा, चौथा या पाँचवाँ वर्ण अथवा य् र् ल् व् ह् हो, तो ‘अः’ के स्थान पर ओ हो जाता है | हिरण्यकः + नाम = हिरण्यको नाम ततः + हिरण्यकः = ततो हिरण्यकः व्याधः + निवृत्तः = व्याधो निवृत्तः |
| ४ | विसर्ग से पहले और बाद दोनों ओर अ हो, तो ‘अः’ के स्थान पर ओ होता है और आगे वाला ‘अ’ लुप्त होकर ऽ (अवग्रह) लिखा जाता है | कुतः + अत्र = कुतोऽत्र हितः + अपि = हितोऽपि सः + अस्माकम् = सोऽस्माकम् |
अधः प्रदत्तानि ल्यप्-प्रत्ययान्तानि पदानि ध्यानेन पठत अवगच्छत च — पृष्ठ 18–19लट्-लकारक्रिया / प्रकृति-प्रत्ययविभागः / ल्यबन्तरूपम् / विवरणार्थः / वाक्यानि
पुस्तक की पूरी सारिणी नीचे दी है। पाँचवें स्तम्भ में वही वाक्य हैं जिनमें ल्यबन्त पद (लाल रंग में) प्रयुक्त हुआ है।
| लट्-लकारक्रिया | प्रकृति-प्रत्ययविभागः | ल्यबन्तरूपम् | विवरणार्थः | वाक्यम् |
|---|---|---|---|---|
| आगच्छति | आ + गम् + ल्यप् | आगत्य / आगम्य | आगमनं कृत्वा | छात्रः विद्यालयम् आगत्य संस्कृतं पठति। |
| आनयति | आ + नी + ल्यप् | आनीय | आनयनं कृत्वा | सः ग्रन्थालयात् ग्रन्थम् आनीय पठति। |
| उत्तिष्ठति | उत् + स्था + ल्यप् | उत्थाय | उत्थानं कृत्वा | सुरेशः प्रातः उत्थाय मातापितरौ नमति। |
| प्रणमति | प्र + नम् + ल्यप् | प्रणम्य / प्रणत्य | प्रणामं कृत्वा | शिष्यः गुरुं प्रणम्य ग्रन्थं पठति। |
| उपकरोति | उप + कृ + ल्यप् | उपकृत्य | उपकारं कृत्वा | सज्जनः दुःखितजनान् उपकृत्य मोदते। |
| निर्दिशति | निर् + दिश् + ल्यप् | निर्दिश्य | निर्देशं कृत्वा | अध्यापकः चित्रं निर्दिश्य पाठयति। |
| निश्चिनोति | निस् + चि + ल्यप् | निश्चित्य | निश्चयं कृत्वा | छात्रः ध्येयं निश्चित्य अध्ययनं करोति। |
| विस्मरति | वि + स्मृ + ल्यप् | विस्मृत्य | विस्मरणं कृत्वा | अहं पुस्तकं विस्मृत्य आगतवान्। |
| परिष्करोति | परि + कृ + ल्यप् | परिष्कृत्य | परिष्कारं कृत्वा | छात्रः व्याकरणेन भाषां परिष्कृत्य वदति। |
| आरभते | आ + रभ् + ल्यप् | आरभ्य | आरम्भं कृत्वा | श्वः आरभ्य अहं योगासनानि करिष्यामि। |
| स्वीकरोति | स्वी + कृ + ल्यप् | स्वीकृत्य | स्वीकारं कृत्वा | माता वस्तूनि स्वीकृत्य आगच्छति। |
| विलिखति | वि + लिख् + ल्यप् | विलिख्य | लेखनं कृत्वा | शिक्षकः सुधाखण्डेन श्लोकं विलिख्य पाठयति। |
| प्रक्षालयति | प्र + क्षल (क्षालि) + ल्यप् | प्रक्षाल्य | प्रक्षालनं कृत्वा | माता वस्त्रं प्रक्षाल्य आपणं गच्छति। |
| अपकरोति | अप + कृ + ल्यप् | अपकृत्य | अपकारं कृत्वा | दुर्जनः सज्जनम् अपकृत्य गच्छति। |
| अवलोकते | अव + लोक् + ल्यप् | अवलोक्य | अवलोकनं कृत्वा | कपोताः तण्डुलान् अवलोक्य आनन्दन्ति। |
| आशङ्कते | आ + शकि + ल्यप् | आशङ्क्य | आशङ्कां कृत्वा | मनुष्यः निन्दितकर्मणि पापम् आशङ्क्य सत्कर्म कुरुते। |
| विकिरति | वि + कॄ + ल्यप् | विकीर्य | विकरणं कृत्वा | व्याधः तण्डुलकणान् विकीर्य जालं विस्तारयति। |
| अवतरति | अव + तॄ + ल्यप् | अवतीर्य | अवतरणं कृत्वा | कपोताः भूमौ अवतीर्य तण्डुलान् भक्षयन्ति। |
| विस्तृणाति | वि + स्तॄ + ल्यप् | विस्तीर्य | विस्तृतं कृत्वा | व्याधः जालं विस्तीर्य प्रच्छन्नो भूत्वा स्थितः। |
| अवलम्बते | अव + लम्ब् + ल्यप् | अवलम्ब्य | अवलम्बनं कृत्वा | मर्कटः वृक्षशाखाम् अवलम्ब्य शयनं करोति। |
| निर्माति | निर् + मा + ल्यप् | निर्माय | निर्माणं कृत्वा | भक्तः मन्दिरं निर्माय देवम् अर्चति। |
अभ्यासात् जायते सिद्धिः — प्रश्न 1 — पृष्ठ 19अधोलिखितानां प्रश्नानाम् एकपदेन उत्तरं लिखत
उत्तरम् — उत्तराखण्डम् । (देवभूमिम् उत्तराखण्डम्)
[हिन्दी — मित्र ग्रीष्मावकाश में उत्तराखण्ड जाते हैं — पाठ में उसे ‘पुण्यक्षेत्रदर्शनाय देवभूमिम् उत्तराखण्डम्’ कहा गया है।]
उत्तरम् — अन्धकारः ।
[हिन्दी — सहसा सब ओर अन्धकार फैल गया — ‘सहसा सर्वत्र अन्धकारः प्रसृतः’।]
उत्तरम् — नायकः । (नायकः सुधीरः)
[हिन्दी — सबका अधैर्य देखकर नायक (सुधीर) ने सबको सान्त्वना देते और प्रेरित करते हुए कहा।]
उत्तरम् — नायकः । (सुधीरः)
[हिन्दी — नायक (सुधीर) हितोपदेश की कथा सुनाता है — “अस्मिन् प्रसङ्गे अहं हितोपदेशस्य एकां कथां श्रावयामि।”]
उत्तरम् — चित्रग्रीवः ।
[हिन्दी — कपोतराज का नाम चित्रग्रीव है — ‘चित्रग्रीवनामा कपोतराजः सपरिवारः आकाशमार्गे गच्छति स्म’।]
उत्तरम् — तण्डुलकणान् ।
[हिन्दी — बहेलिये ने चावल के दाने बिखेरकर जाल फैलाया — ‘व्याधः तण्डुलकणान् विकीर्य जालं विस्तीर्य च प्रच्छन्नो भूत्वा स्थितः’।]
उत्तरम् — कापुरुषस्य । (कापुरुषलक्षणम्)
[हिन्दी — विपत्ति के समय घबरा जाना कायर पुरुष का लक्षण है — ‘यतोहि विपत्काले विस्मयः एव कापुरुषलक्षणम्’।]
उत्तरम् — चित्रवने । (गण्डकीतीरे चित्रवने)
[हिन्दी — हिरण्यक गण्डकी नदी के तट पर स्थित चित्रवन में रहता है।]
उत्तरम् — ‘सखे’ इति । (सखे हिरण्यक !)
[हिन्दी — चित्रग्रीव हिरण्यक को ‘सखे’ (हे मित्र!) कहकर पुकारता है — “सखे हिरण्यक! किम् अस्माभिः सह न सम्भाषसे?”]
उत्तरम् — मदाश्रितानाम् । (एतेषां कपोतानाम्)
[हिन्दी — चित्रग्रीव कहता है — “पहले मेरे आश्रित इन कपोतों के बन्धन काटो, बाद में मेरे।” — “पूर्वं मदाश्रितानाम् एतेषां पाशान् छिनत्तु, पश्चात् मम।”]
अभ्यासात् जायते सिद्धिः — प्रश्न 2 — पृष्ठ 19–20पूर्णवाक्येन उत्तरं लिखत
उत्तरम् — यदा ते श्रीकेदारक्षेत्रम् आरोहन्तः आसन् तदा लक्ष्यप्राप्तेः पूर्वं वेगेन वृष्टिः आरब्धा, सहसा सर्वत्र अन्धकारः प्रसृतः, नद्याः तीव्रजलवेगेन सेतुः भग्नः, पर्वतस्खलनं च सञ्जातम् ।
[हिन्दी — जब वे श्रीकेदारक्षेत्र चढ़ रहे थे, तब लक्ष्य तक पहुँचने से पहले ही तेज़ वर्षा शुरू हो गई, अचानक सब ओर अँधेरा छा गया, नदी के तीव्र जल-वेग से पुल टूट गया और पर्वत का स्खलन (भूस्खलन) हो गया।]
उत्तरम् — सर्वे उच्चस्वरेण अक्रन्दन् ईश्वरं प्रार्थयन्त च — ‘हे भगवन् ! रक्ष अस्मान् रक्ष’ इति ।
[हिन्दी — सब ऊँचे स्वर में रोने लगे और ईश्वर से प्रार्थना करने लगे — “हे भगवन्! हमारी रक्षा करो, रक्षा करो।”]
उत्तरम् — नायकः उक्तवान् — वयम् आत्मविश्वासबलेन इदम् असम्भवम् अपि कार्यं सम्भूय अवश्यं साधयितुं शक्नुमः ।
[हिन्दी — नायक ने कहा कि हम आत्मविश्वास के बल से मिलकर यह असम्भव काम भी अवश्य कर सकते हैं; उससे हमें लक्ष्य भी मिलेगा और प्राणों की रक्षा भी होगी।]
उत्तरम् — चित्रग्रीवः निरूपयति — “कुतोऽत्र निर्जने वने तण्डुलकणानां सम्भवः ? तद् निरूप्यताम् । कश्चिद् व्याधोऽत्र भवेत् । सर्वथा अविचारितं कर्म न कर्तव्यम् ।”
[हिन्दी — चित्रग्रीव विचार करता है — “इस निर्जन वन में चावल के दाने कहाँ से आ सकते हैं? इस पर सोचा जाए। यहाँ कोई बहेलिया अवश्य होगा। बिना विचारे कोई काम कभी नहीं करना चाहिए।”]
उत्तरम् — “लघूनाम् अपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका भवति” इति नीतिवचनं लोकसिद्धं प्रसिद्धं च ।
[हिन्दी — “छोटी-छोटी वस्तुओं का भी संगठन काम पूरा कर देता है” — यही लोकप्रसिद्ध नीतिवचन है। यही वाक्य श्लोक-रूप में पाठ का शीर्षक बना है — अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका।]
उत्तरम् — चित्रग्रीवः आदेशं दत्तवान् — “अतः अस्माभिः सर्वैः एकचित्तीभूय जालमादाय उड्डीयताम्” — इति । एवं विचार्य सर्वे पक्षिणः जालमादाय उत्पतिताः ।
[हिन्दी — चित्रग्रीव ने आदेश दिया — “अतः हम सबको एक चित्त होकर, जाल-सहित उड़ जाना चाहिए।” ऐसा विचार कर सब पक्षी जाल लेकर उड़ गए।]
उत्तरम् — हिरण्यकः कपोतानाम् अवपातभयात् चकितः सन् तूष्णीं स्थितः । सः सर्वदा अनिष्टशङ्कया शतद्वारं विवरं कृत्वा निवसति स्म ।
[हिन्दी — हिरण्यक कपोतों के अचानक ऊपर से गिर पड़ने के भय से चकित होकर चुप बैठा रहा। वह सदा अनिष्ट की आशङ्का से सौ द्वारों वाला बिल बनाकर रहता था।]
उत्तरम् — हिरण्यकः प्रहृष्टमनाः पुलकितः सन् अब्रवीत् — “साधु मित्र ! साधु । अनेन आश्रितवात्सल्येन त्वं त्रैलोक्यस्यापि स्वामित्वं प्राप्तुं योग्योऽसि ।”
[हिन्दी — प्रसन्न मन और रोमाञ्चित होकर हिरण्यक बोला — “धन्य हो मित्र, धन्य! इस आश्रितवात्सल्य के कारण तुम तीनों लोकों का स्वामित्व पाने के योग्य हो।”]
उत्तरम् — आपद्ग्रस्ताः कपोताः बुद्धिबलेन संघटनसामर्थ्येन च आत्मसंरक्षणं कृतवन्तः ।
[हिन्दी — विपत्ति में फँसे कपोतों ने बुद्धि के बल और संगठन की सामर्थ्य से अपनी रक्षा की।]
उत्तरम् — नायकस्य प्रेरकवचनैः उत्साहिताः सर्वेऽपि भयं शोकं सन्देहं च विहाय सेतुनिर्माणकार्ये संलग्नाः जाताः । भगीरथप्रयत्नैः सेतुनिर्माणं कृत्वा तैः स्वीयप्राणाः अन्येषां च प्राणाः संरक्षिताः ।
[हिन्दी — नायक के प्रेरक वचनों से उत्साहित होकर सब भय, शोक और सन्देह छोड़कर पुल बनाने के काम में जुट गए। भगीरथ जैसे प्रयत्न से पुल बनाकर उन्होंने अपने और दूसरों के भी प्राण बचा लिए।]
अभ्यासात् जायते सिद्धिः — प्रश्न 3 — पृष्ठ 20अधोलिखितानि वाक्यानि पठित्वा ल्यप्-प्रत्ययान्तेषु परिवर्तयत
उत्तरम् (पुस्तके प्रदत्तम् उदाहरणम्) — छात्रः कक्षां प्रविश्य संस्कृतं पठति ।
[हिन्दी — छात्र कक्षा में प्रवेश करके संस्कृत पढ़ता है।]
उत्तरम् — भक्तः मन्दिरम् आगत्य पूजां करोति ।
[हिन्दी — भक्त मन्दिर आकर पूजा करता है।]
उत्तरम् — माता भोजनं निर्माय पुत्राय ददाति ।
[हिन्दी — माता भोजन बनाकर पुत्र को देती है।]
उत्तरम् — सुरेशः प्रातः उत्थाय देवं नमति ।
[हिन्दी — सुरेश प्रातः उठकर देव को प्रणाम करता है।]
उत्तरम् — रमा पुस्तकं स्वीकृत्य विद्यालयं गच्छति ।
[हिन्दी — रमा पुस्तक लेकर विद्यालय जाती है।]
उत्तरम् — अहं गृहम् आगत्य भोजनं करोमि ।
[हिन्दी — मैं घर आकर भोजन करता/करती हूँ।]
उत्तरम् — तण्डुलकणान् विकीर्य जालं विस्तारयति ।
[हिन्दी — (बहेलिया) चावल के दाने बिखेरकर जाल फैलाता है।]
उत्तरम् — व्याधः तण्डुलकणान् अवलोक्य भूमौ अवतरति ।
[हिन्दी — व्याध चावल के दाने देखकर भूमि पर उतरता है।]
अभ्यासात् जायते सिद्धिः — प्रश्न 4 — पृष्ठ 20उदाहरणानुसारम् उपसर्गयोजनेन क्त्वा-स्थाने ल्यप्-प्रत्ययस्य प्रयोगं कृत्वा पदानि परिवर्तयत (सम्, आ, उप, उत्, वि, प्र)
उत्तरम् (पुस्तके प्रदत्तम् उदाहरणम्) — छात्रः गृहम् आगत्य (आ + गम् + ल्यप्) भोजनं करोति ।
[हिन्दी — छात्र घर आकर भोजन करता है।]
उत्तरम् — माता वस्त्राणि प्रक्षाल्य (प्र + क्षल् + ल्यप्) पचति ।
[हिन्दी — माता कपड़े धोकर भोजन पकाती है।]
उत्तरम् — शिक्षकः श्लोकं विलिख्य (वि + लिख् + ल्यप्) पाठयति ।
[हिन्दी — शिक्षक श्लोक लिखकर पढ़ाते हैं।]
उत्तरम् — रमा उत्थाय (उत् + स्था + ल्यप्) गीतं गायति ।
[हिन्दी — रमा खड़ी होकर गीत गाती है।]
उत्तरम् — शिष्यः सर्वदा गुरुं प्रणम्य (प्र + नम् + ल्यप्) पठति ।
[हिन्दी — शिष्य सदा गुरु को प्रणाम करके पढ़ता है।]
उत्तरम् — लेखकः आलोच्य (आ + लोच् + ल्यप्) लिखति ।
[हिन्दी — लेखक भली-भाँति विचार करके लिखता है।]
अभ्यासात् जायते सिद्धिः — प्रश्न 5 — पृष्ठ 21पाठे प्रयुक्तेन उपयुक्तपदेन रिक्तस्थानं पूरयत
उत्तरम् — सर्वैः एकचित्तीभूय जालमादाय उड्डीयताम् ।
[हिन्दी — सबको एक चित्त होकर जाल लेकर उड़ जाना चाहिए।]
उत्तरम् — जालापहारकान् तान् अवलोक्य पश्चाद् अधावत् ।
[हिन्दी — जाल ले जाने वालों को देखकर (बहेलिया) पीछे-पीछे दौड़ा।]
उत्तरम् — अस्माकं मित्रं हिरण्यको नाम मूषकराजः गण्डकीतीरे चित्रवने निवसति ।
[हिन्दी — हमारा मित्र हिरण्यक नाम का चूहों का राजा गण्डकी नदी के तट पर चित्रवन में रहता है।]
उत्तरम् — हिरण्यकः कपोतानाम् अवपातभयात् चकितस्तूष्णीं स्थितः ।
[हिन्दी — हिरण्यक कपोतों के ऊपर से गिर पड़ने के भय से चकित होकर चुप बैठा रहा।]
उत्तरम् — यतोहि विपत्काले विस्मयः एव कापुरुषलक्षणम् ।
[हिन्दी — क्योंकि विपत्ति के समय घबरा जाना ही कायर पुरुष का लक्षण है।]
अभ्यासात् जायते सिद्धिः — प्रश्न 6 — पृष्ठ 21पाठे प्रयुक्तेन ल्यप्प्रत्ययान्तपदेन सह उपयुक्तं पदं योजयत
| ल्यबन्तपदम् | पदम् |
|---|---|
| (क) विकीर्य | जालम् |
| (ख) विस्तीर्य | जालापहारकान् |
| (ग) अवतीर्य | उड्डीयताम् |
| (घ) अवलोक्य | तद्वचनम् |
| (ङ) एकचित्तीभूय | भूमौ |
| (च) प्रत्यभिज्ञाय | तण्डुलकणान् |
पुस्तक में (घ) अवलोक्य का मिलान उदाहरण-रूप में पहले से खींचा हुआ है। शेष पाँच का सही मेल नीचे है — प्रत्येक जोड़ी पाठ के अपने वाक्य से सिद्ध होती है।
| क्रमः | ल्यबन्तपदम् | उपयुक्तं पदम् | पाठस्य वाक्यम् |
|---|---|---|---|
| (क) | विकीर्य | तण्डुलकणान् | व्याधः तण्डुलकणान् विकीर्य जालं विस्तीर्य च प्रच्छन्नो भूत्वा स्थितः। |
| (ख) | विस्तीर्य | जालम् | व्याधः जालं विस्तीर्य प्रच्छन्नो भूत्वा स्थितः। |
| (ग) | अवतीर्य | भूमौ | सर्वे कपोताः भूमौ अवतीर्य तण्डुलकणान् भोक्तुं प्रवृत्ताः। |
| (घ) | अवलोक्य | जालापहारकान् | स व्याधः सुदूरात् जालापहारकान् तान् अवलोक्य पश्चात् अधावत्। (उदाहरणम्) |
| (ङ) | एकचित्तीभूय | उड्डीयताम् | अस्माभिः सर्वैः एकचित्तीभूय जालमादाय उड्डीयताम्। |
| (च) | प्रत्यभिज्ञाय | तद्वचनम् | ततो हिरण्यकः तद्वचनं प्रत्यभिज्ञाय आनन्देन त्वरया बहिः निःसृत्य अब्रवीत्। |
अभ्यासात् जायते सिद्धिः — प्रश्न 7 — पृष्ठ 21समासयुक्तपदेन रिक्तस्थानं पूरयत
उत्तरम् (पुस्तके प्रदत्तम् उदाहरणम्) — गण्डक्याः तीरम् = गण्डकीतीरम् ; तस्मिन् = गण्डकीतीरे ।
[हिन्दी — गण्डकी का तीर = गण्डकीतीर; उसमें = गण्डकीतीरे।]
उत्तरम् — तण्डुलानां कणाः = तण्डुलकणाः ; तान् = तण्डुलकणान् ।
[हिन्दी — चावलों के कण = तण्डुलकण; उनको = तण्डुलकणान्।]
उत्तरम् — जालस्य अपहारकाः = जालापहारकाः ; तान् = जालापहारकान् ।
[हिन्दी — जाल को ले जाने वाले = जालापहारक; उनको = जालापहारकान्।]
उत्तरम् — अवपाताद् भयम् = अवपातभयम् ; तस्मात् = अवपातभयात् ।
[हिन्दी — गिर पड़ने से भय = अवपातभय; उससे = अवपातभयात्।]
उत्तरम् — कापुरुषाणां लक्षणम् = कापुरुषलक्षणम् ; तस्मिन् = कापुरुषलक्षणे ।
[हिन्दी — कायर पुरुषों का लक्षण = कापुरुषलक्षण; उसमें = कापुरुषलक्षणे।]
अभ्यासात् जायते सिद्धिः — प्रश्न 8 — पृष्ठ 21–22सार्थकपदं ज्ञात्वा सन्धिविच्छेदं कुरुत
उत्तरम् (पुस्तके प्रदत्तम् उदाहरणम्) — इत्याकर्ण्य = इति + आकर्ण्य ।
[हिन्दी — ‘ऐसा सुनकर’। पाठ में इसी प्रकार — ‘एतदाकर्ण्य (एतत् + आकर्ण्य) हिरण्यकः प्रहृष्टमनाः पुलकितः सन् अब्रवीत्।’]
उत्तरम् (पुस्तके प्रदत्तम् उदाहरणम्) — चित्रग्रीवोऽवदत् = चित्रग्रीवः + अवदत् ।
[हिन्दी — ‘चित्रग्रीव ने कहा’।]
उत्तरम् — बालकोऽत्र = बालकः + अत्र ।
[हिन्दी — ‘बालक यहाँ’।]
उत्तरम् — धैर्यमथाभ्युदये = धैर्यम् + अथ + अभ्युदये ।
[हिन्दी — ‘धैर्य, और उन्नति में’ — कथा के दूसरे श्लोक ‘विपदि धैर्यमथाभ्युदये क्षमा…’ का अंश।]
उत्तरम् — भोजनेऽप्यप्रवर्तनम् = भोजने + अपि + अप्रवर्तनम् ।
[हिन्दी — ‘भोजन में भी प्रवृत्ति न होना’ — कथा के पहले श्लोक का अंश।]
उत्तरम् — नमस्ते = नमः + ते ।
[हिन्दी — ‘तुम्हें नमस्कार’।]
उत्तरम् — उपायश्चिन्तनीयः = उपायः + चिन्तनीयः ।
[हिन्दी — ‘उपाय सोचा जाना चाहिए’।]
उत्तरम् — व्याधस्तत्र = व्याधः + तत्र ।
[हिन्दी — ‘बहेलिया वहाँ’।]
उत्तरम् — हिरण्यकोऽप्याह = हिरण्यकः + अपि + आह ।
[हिन्दी — ‘हिरण्यक ने भी कहा’।]
उत्तरम् — मूषकराजो गण्डकीतीरे = मूषकराजः + गण्डकी + तीरे ।
[हिन्दी — ‘चूहों का राजा गण्डकी के तट पर’।]
उत्तरम् — अतस्त्वाम् = अतः + त्वाम् ।
[हिन्दी — ‘इसलिए तुम्हें’।]
उत्तरम् — कश्चित् = कः + चित् ।
[हिन्दी — ‘कोई’। पाठ में — ‘अथ कदाचित् तत्र कश्चिद् व्याधः …’]
योग्यताविस्तरः — पृष्ठ 22–23ग्रन्थपरिचयः तथा हितोपदेशस्य द्वौ श्लोकौ — योग्यताविस्तर से अभ्यास के लिए जोड़े गए प्रश्न
उत्तरम् — प्रस्तुतः पाठः हितोपदेशग्रन्थस्य ‘मित्रलाभ’-प्रकरणात् स्वीकृतः । अस्य ग्रन्थस्य लेखकः पण्डितः नारायणशर्मा अस्ति । अस्मिन् ग्रन्थे मूल्ययुक्तानां, नीतियुक्तानां च वचनानां, सुभाषितानां, कथानां च सङ्ग्रहः अस्ति । अतः अयं ग्रन्थः संस्कृतसाहित्ये अत्यन्तं समाद्रियते । अस्मिन् ग्रन्थे चत्वारि प्रकरणानि सन्ति — (१) मित्रलाभः (२) सुहृद्भेदः (३) विग्रहः (४) सन्धिः इति । अस्य अध्ययनेन छात्रः नीतिविद्यायां संस्कृतभाषायां च निपुणो भवति ।
तृणैर्गुणत्वमापन्नैर्बध्यन्ते मत्तदन्तिनः ॥ (हितोपदेशः १.३६)
— अस्य श्लोकस्य पदच्छेदम्, अन्वयम्, अर्थं भावं च लिखत ।
पदच्छेदः — अल्पानाम् अपि वस्तूनाम् संहतिः कार्य-साधिका । तृणैः गुणत्वम् आपन्नैः बध्यन्ते मत्त-दन्तिनः ।
अन्वयः — अल्पानाम् अपि वस्तूनां संहतिः कार्य-साधिका (भवति) । गुणत्वम् आपन्नैः तृणैः मत्त-दन्तिनः बध्यन्ते ।
अर्थः — छोटी-छोटी वस्तुओं का भी संगठन कार्य सिद्ध कर देने वाला होता है। रस्सी का रूप ले चुके तिनकों से मतवाले हाथी तक बाँध दिए जाते हैं।
यशसि चाभिरुचिर्व्यसनं श्रुतौ प्रकृतिसिद्धमिदं हि महात्मनाम् ॥ (हितोपदेशः १.३२)
— अस्य श्लोकस्य पदच्छेदम्, अन्वयम्, अर्थं भावं च लिखत ।
पदच्छेदः — विपदि धैर्यम् अथ अभ्युदये क्षमा सदसि वाक्-पटुता युधि विक्रमः । यशसि च अभिरुचिः व्यसनम् श्रुतौ प्रकृति-सिद्धम् इदम् हि महात्मनाम् ।
अन्वयः — अथ विपदि धैर्यम्, अभ्युदये क्षमा, सदसि वाक्-पटुता, युधि विक्रमः, यशसि अभिरुचिः, श्रुतौ व्यसनं च — इदं हि महात्मनां प्रकृति-सिद्धं भवति ।
अर्थः — विपत्ति में धैर्य, उन्नति के समय क्षमा, सभा में वाणी की कुशलता, युद्ध में पराक्रम, यश में रुचि और शास्त्र-श्रवण में लगन — ये छहों गुण महापुरुषों में स्वभाव से ही सिद्ध होते हैं।
परियोजनाकार्यम् — पृष्ठ 23क्रियापदानां प्रयोगकौशलम् तथा कक्षा-परिचर्चा
यह उदाहरण पुस्तक में दिया हुआ है। इससे विधि समझ लीजिए — पहले क्रियापद का लकार, पुरुष और वचन देखिए, फिर उसी के अनुरूप कर्ता चुनकर एक छोटा-सा नया वाक्य बनाइए।
अतः कर्ता भी बहुवचन चाहिए → दुर्जनाः
वाक्यम् — दुर्जनाः सज्जनं तिरस्कुर्वन्ति ।
नमूना वाक्यम् — छात्रैः गृहकार्यं सम्यक् क्रियताम् ।
[हिन्दी — छात्रों द्वारा गृहकार्य भली-भाँति किया जाए।]
नमूना वाक्यम् — मम मित्रं वाराणस्यां निवसति ।
[हिन्दी — मेरा मित्र वाराणसी में रहता है।]
नमूना वाक्यम् — गुरुः शिष्यम् आह — “सत्यं वद, धर्मं चर” इति ।
[हिन्दी — गुरु शिष्य से कहते हैं — “सच बोलो, धर्म का आचरण करो।”]
नमूना वाक्यम् — कृषकः तीक्ष्णेन शस्त्रेण वृक्षस्य शुष्कां शाखां छेत्स्यति ।
[हिन्दी — किसान तेज़ हथियार से पेड़ की सूखी शाखा काटेगा।]
नमूना वाक्यम् — सखे ! त्वम् अद्य मया सह किमर्थं न सम्भाषसे ?
[हिन्दी — मित्र! तुम आज मेरे साथ बात क्यों नहीं कर रहे?]
नमूना वाक्यम् — पिता पुत्रम् अब्रवीत् — “परिश्रमेण एव सफलता लभ्यते” इति ।
[हिन्दी — पिता ने पुत्र से कहा — “परिश्रम से ही सफलता मिलती है।”]
नमूना वाक्यम् — क्षुधार्तः बालकः मातरम् उपसर्पति ।
[हिन्दी — भूख से पीड़ित बालक माता के पास जाता है।]
नमूना वाक्यम् — विपत्काले धैर्यम् एव युज्यते, न तु विषादः ।
[हिन्दी — विपत्ति के समय धैर्य ही उचित है, विषाद नहीं।]
नमूना उत्तर (परिचर्चा का सारांश) — “इस कथा से हमें सबसे बड़ी शिक्षा यह मिलती है कि संगठन बल को नहीं, स्वरूप को बदल देता है। तिनका अकेला तिनका है, पर बटकर रस्सी बन जाए तो मतवाले हाथी को बाँध लेता है। कपोत अकेले-अकेले जाल में मरते, पर एक चित्त होकर उन्होंने उसी जाल को उठा लिया। हमारे जीवन में भी अनेक काम ऐसे हैं जो अकेले असम्भव लगते हैं — विद्यालय की स्वच्छता, बाढ़ या भूकम्प में सहायता, मुहल्ले में जल-संरक्षण। इनमें सबसे कठिन भाग शक्ति जुटाना नहीं, एकचित्त होना है। इसलिए हम यह संकल्प लें कि किसी भी सामूहिक कार्य में हम पहले दिशा तय करेंगे, फिर मिलकर एक ही दिशा में शक्ति लगाएँगे।”
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