Skip to content

NCERT Solutions for Class 8 Sanskrit Chapter 13 वर्णोच्चारण-शिक्षा १ (PDF) – 2027

NCERT Solutions for Class 8 Sanskrit Chapter 13 वर्णोच्चारण-शिक्षा १ – step-by-step answers to every exercise and in-text question of the chapter, as per the latest NCERT syllabus for 2027. Read them online or download the free question-answer PDF.

दीपकम् (कक्षा 8) का त्रयोदशः पाठः — वर्णोच्चारण-शिक्षा १। यह पुस्तक का अन्तिम पाठ है और शिक्षा (वेदाङ्ग) का व्यावहारिक भाग — इसमें बताया गया है कि मुँह के भीतर वर्ण बनता कैसे है। नाभि-प्रदेश → उरः → कण्ठ-बिलः → आस्यम् — इन चार अङ्गों से चलकर वायु आस्य में पहुँचती है और वहाँ षट् स्थानानि — कण्ठः, तालु, मूर्धा, दन्तः, ओष्ठः, नासिका में वर्ण-रूप में प्रकट होती है। पाठ स्थानम् (जहाँ वर्ण बनता है) और करणम् (जो अङ्ग उसे छूता है) — इन दो तत्त्वों की चर्चा करता है; तीसरा तत्त्व आभ्यन्तर-प्रयत्नः अगली कक्षा के लिए छोड़ा गया है। नीचे पृष्ठ 146 से 158 तक का पूरा पाठ, मुरली का दृष्टान्त, पारिभाषिक-शब्दार्थान् जानीमः तथा वयं शब्दार्थान् जानीमः की पूरी सारणियाँ, अभ्यासात् जायते सिद्धिः के प्रश्न १–५ का प्रत्येक उपभाग, अत्र इदम् अवधेयम् (स्वर तथा व्यञ्जन की परिभाषा), योग्यताविस्तरः के पाणिनीय-शिक्षा-सूत्र (करण-प्रकरणम्) तथा पृष्ठ 158 का षट् स्थानानि–षट् करणानि वर्ण-चक्र क्रमशः हल किए गए हैं — पहले संस्कृत उत्तर, फिर कोष्ठक में हिन्दी अर्थ।

NCERT Solutions for Class 8 Sanskrit Chapter 13 वर्णोच्चारण-शिक्षा १ PDF

All the answers are on this page below. The PDF also explains every answer – why it is right and how to check it – so download it for revision.

PDFChapterDownload
Solutions PDFवर्णोच्चारण-शिक्षा १View PDF

पाठ का हिंदी अनुवाद

पाठ-प्रवेशः (पृष्ठ 146)
शब्दानां सम्यक् शुद्धं च उच्चारणं नितान्तं महत्त्वपूर्णम् अस्ति इति वयं पूर्वस्मिन् पाठे दृष्टवन्तः।
शब्दों का ठीक और शुद्ध उच्चारण अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है — यह हमने पिछले पाठ में देखा।
कस्यचित् शब्दस्य सम्यग्-उच्चारणार्थं, तस्य शब्दस्य प्रत्येक-वर्णस्य शुद्धं निर्दुष्टम् उच्चारणं भवेत्। अतः प्रत्येक-वर्णस्य शुद्धम् उच्चारणं कथं भवतीति अत्र ज्ञास्यामः।
किसी शब्द के ठीक उच्चारण के लिए उस शब्द के प्रत्येक वर्ण का शुद्ध और दोष-रहित उच्चारण होना चाहिए। इसलिए प्रत्येक वर्ण का शुद्ध उच्चारण कैसे होता है — यह हम यहाँ जानेंगे।
वर्णानां स्वर-व्यञ्जनादीनां विविध-भेद-उपभेदानां विषये वयं पूर्वासु कक्षासु ज्ञातवन्तः। तत्र आस्ये षट् उच्चारण-स्थानानि अपि वयं दृष्टवन्तः।
वर्णों के स्वर, व्यञ्जन आदि अनेक भेदों और उपभेदों के विषय में हम पिछली कक्षाओं में जान चुके हैं। वहाँ हमने आस्य (मस्तक का मुख और नासिका वाला भाग) में छह उच्चारण-स्थान भी देखे थे।
परन्तु, वर्णानाम् उच्चारणे केवलम् आस्यस्य एव उपयोगः भवति इति – न। वर्णानाम् उच्चारणार्थम् आस्येन सह शरीरस्य इतरेषाम् अपि अङ्गानाम् उपयोगः भवति, यथा —
परन्तु ऐसा नहीं है कि वर्णों के उच्चारण में केवल आस्य का ही उपयोग होता है। वर्णों के उच्चारण के लिए आस्य के साथ शरीर के दूसरे अंगों का भी उपयोग होता है, जैसे —
वाणी के उत्पन्न होने में शरीर के चार अङ्ग
१. नाभि-प्रदेशः (Navel-region – Abdominal Muscles)
मांसपेशी-बल–तन्त्रम् – (Muscular-pressure System)
१. नाभि-प्रदेश (नाभि के आसपास का भाग – पेट की मांसपेशियाँ) — मांसपेशी-बल तन्त्र (मांसपेशियों के दबाव की प्रणाली)
२. उरः (Chest – Lungs & Diaphragm)
वायु-बल–तन्त्रम् – (Air-pressure System)
२. उरः (छाती – फेफड़े और उरःप्राचीर अर्थात् छाती और पेट के बीच की पेशी-परत) — वायु-बल तन्त्र (वायु के दबाव की प्रणाली)
३. कण्ठ-बिलः (Voice-box – Larynx / Vocal-cords)
ध्वनि–तन्त्रम् – (Phonatory & Resonatory System)
३. कण्ठ-बिल (स्वर-यन्त्र – स्वरतन्त्रियाँ) — ध्वनि तन्त्र (ध्वनि उत्पन्न करने और उसे गुँजाने वाली प्रणाली)
४. आस्यम् (Head – Mouth & Nose)
उच्चारण–तन्त्रम् – (Articulatory System)
४. आस्य (मस्तक – मुख और नाक) — उच्चारण तन्त्र (वर्णों को बोलने की प्रणाली)
आस्यस्य अभ्यन्तरे — (क) मुखम् – (Mouth / Oral cavity),
(ख) नासिका – (Nose / Nasal cavity) – च उभौ भवतः।
आस्य के भीतर (क) मुख (मुँह का भीतरी खोखला भाग) और (ख) नासिका (नाक का भीतरी खोखला भाग) — ये दोनों होते हैं।
वायु का मार्ग — उच्चारण की प्रक्रिया
यदा वयं कञ्चित् शब्दं वर्णं वा उच्चारयितुम् इच्छामः, तदा —
जब हम किसी शब्द या वर्ण का उच्चारण करना चाहते हैं, तब —
१. सर्वप्रथमं नाभि-प्रदेशे स्थिताः मांसपेश्यः उरः नोदयन्ति।
१. सबसे पहले नाभि-प्रदेश में स्थित मांसपेशियाँ छाती को दबाती हैं।
२. उरः पुनः श्वासकोश-स्थितं वायुम् ऊर्ध्वं निःसारयति।
२. फिर छाती फेफड़ों में स्थित वायु को ऊपर की ओर बाहर निकालती है।
३. सः वायुः ऊर्ध्वं सरन् कण्ठ-बिलं प्राप्नोति।
३. वह वायु ऊपर की ओर बढ़ती हुई कण्ठ-बिल (स्वर-यन्त्र) तक पहुँचती है।
४. ततः, सः वायुः पुनः ऊर्ध्वं सरन् आस्यं प्रविशति।
४. उसके बाद वह वायु फिर ऊपर की ओर बढ़ती हुई आस्य में प्रवेश करती है।
आस्यस्य अभ्यन्तरं प्रविश्य, मुखे, नासिकायां च स्थितेषु षट्सु उच्चारण-स्थानेषु वर्णानुसारं स्वकीयं स्थानं प्राप्य, सः वायुः तस्मिन् स्थाने वर्णरूपेण प्रकटीभवति।
आस्य के भीतर प्रवेश करके, मुख और नासिका में स्थित छह उच्चारण-स्थानों में से वर्ण के अनुसार अपना स्थान पाकर, वह वायु उस स्थान पर वर्ण के रूप में प्रकट होती है।
चित्रम् — मनुष्येषु वाग्-उत्पत्ति-प्रक्रिया (Voice Production Mechanism in Humans) — पृष्ठ 147
नासिका (Nose / Nasal cavity)
मुखम् (Mouth / Oral cavity)
जिह्वा (Tongue)
गल-बिलः (Lower Pharynx)
कण्ठ-बिलः (Larynx/Vocal-cords)
नासिका – नाक (का भीतरी खोखला भाग)
मुख – मुँह (का भीतरी खोखला भाग)
जिह्वा – जीभ
गल-बिल – गले का निचला भाग (अधो-ग्रसनी)
कण्ठ-बिल – स्वर-यन्त्र / स्वरतन्त्रियाँ
श्वास-नालः (Trachea)
श्वासकोशः (Lungs)
पार्श्वास्थि-पञ्जरम् (Rib-cage)
उरःप्राचीरम् (Diaphragm)
श्वास-नाल – श्वास-नली
श्वासकोश – फेफड़े
पार्श्वास्थि-पञ्जर – पसलियों का ढाँचा
उरःप्राचीर – छाती और पेट के बीच की पेशी-परत
नाभि-प्रदेशस्थ-मांसपेश्यः (Abdominal Muscles)
नाभिः (Navel)
नाभि-प्रदेश में स्थित मांसपेशियाँ – पेट की मांसपेशियाँ
नाभि – नाभि (पेट के बीच का छोटा गड्ढा)
वर्णों की उत्पत्ति के तीन तत्त्व
‘आस्यस्य अभ्यन्तरे स्थितेषु षट्सु स्थानेषु सः वायुः वर्णरूपेण कथं प्रकटीभवति ?’ इति अग्रे ज्ञास्यामः।
‘आस्य के भीतर स्थित छह स्थानों में वह वायु वर्ण के रूप में कैसे प्रकट होती है?’ — यह हम आगे जानेंगे।
आस्यस्य अभ्यन्तरे वर्णानाम् उत्पत्त्यर्थं वस्तुतः त्रीणि तत्त्वानि आवश्यकानि भवन्ति —
(क) प्रथमम् – स्थानम्
(ख) द्वितीयम् – करणम्
(ग) तृतीयम् – आभ्यन्तर-प्रयत्नः
आस्य के भीतर वर्णों की उत्पत्ति के लिए वास्तव में तीन तत्त्व आवश्यक होते हैं —
(क) पहला – स्थान
(ख) दूसरा – करण
(ग) तीसरा – आभ्यन्तर-प्रयत्न (मुख के भीतर किया जाने वाला प्रयत्न)
अस्मिन् पाठे ‘स्थानस्य’, ‘करणस्य’ च चर्चां कुर्मः। ‘आभ्यन्तर-प्रयत्नस्य’ विषये अग्रिमायां कक्षायां ज्ञास्यामः।
इस पाठ में हम ‘स्थान’ और ‘करण’ की चर्चा करते हैं। ‘आभ्यन्तर-प्रयत्न’ के विषय में हम अगली कक्षा में जानेंगे।
(क) स्थानम् — पृष्ठ 148–149
वर्णस्य उच्चारण-समये, श्वासकोशतः ऊर्ध्वं सरन् वायुः, कण्ठ-बिल-माध्यमेन आस्यस्य अभ्यन्तरं प्रविश्य, तत्र मुखे नासिकायां वा यस्मिन् स्थले वर्णरूपेण प्रकटीभवति, तत् — ‘स्थानम्’ इति उच्यते।
वर्ण के उच्चारण के समय फेफड़ों से ऊपर की ओर बढ़ती हुई वायु, कण्ठ-बिल के माध्यम से आस्य के भीतर प्रवेश करके, वहाँ मुख में या नासिका में जिस जगह पर वर्ण के रूप में प्रकट होती है, वह (जगह) ‘स्थान’ कहलाती है।
आस्ये – षट् स्थानानि वयं दृष्टवन्तः, यथा —
आस्य में छह स्थान हम देख चुके हैं, जैसे —
आस्यम् –
नासिकायां – नासिका – इत्येव षष्ठं स्थानम्।
मुखे – कण्ठः, तालु, मूर्धा, दन्तः, ओष्ठः च – इति पञ्च स्थानानि।
आस्य में —
नासिका में — नासिका — यही छठा स्थान है।
मुख में — कण्ठ, तालु, मूर्धा, दन्त और ओष्ठ — ये पाँच स्थान हैं।
आस्ये वर्णानां षट् उच्चारण-स्थानानि
१. कण्ठः
२. तालु
३. मूर्धा
४. दन्तः
५. ओष्ठः
६. नासिका
आस्य में वर्णों के छह उच्चारण-स्थान (चित्र)
१. कण्ठ (गला)
२. तालु (मुँह के भीतर ऊपर का कठोर भाग)
३. मूर्धा (दाँतों के पीछे तालु का उठा हुआ भाग)
४. दन्त (दाँत)
५. ओष्ठ (होंठ)
६. नासिका (नाक)
स्थानस्य सम्यक् कार्य-निदर्शनार्थं ‘मुरली’ समुचितम् उदाहरणम् अस्ति। मुरल्याः ‘अङ्गुलिच्छिद्राणि’ आस्यस्य ‘स्थानानि’ इव व्यवहरन्ति।
स्थान के कार्य को अच्छी तरह दिखाने के लिए ‘मुरली’ (बाँसुरी) उचित उदाहरण है। बाँसुरी के ‘उँगलियों वाले छेद’ आस्य के ‘स्थानों’ की तरह काम करते हैं।
मुरली-नलिकया आगच्छन् वायुः अङ्गुलिच्छिद्रेषु एव विविध-ध्वनि-रूपेण प्रकटीभवति।
बाँसुरी की नली से आती हुई वायु उँगलियों वाले छेदों पर ही तरह-तरह की ध्वनियों के रूप में प्रकट होती है।
अङ्गुलिच्छिद्राणि → स्थानानि इव
उँगलियों वाले छेद → स्थानों की तरह
(ख) करणम् — पृष्ठ 150–151
वर्णस्य उच्चारण-समये, आस्यस्य यः भागः स्थानं स्पृशति, स्थानस्य समीपं वा याति, सः भागः — ‘करणम्’ इति कथ्यते।
वर्ण के उच्चारण के समय आस्य का जो भाग स्थान को छूता है, या स्थान के पास जाता है, वह भाग ‘करण’ कहलाता है।
यथा निदर्शने – मुरलीं वादयन्त्यः ‘अङ्गुलयः’ – आस्यस्य करणानि इव व्यवहरन्ति।
जैसे उदाहरण में — मुरली बजाती हुई ‘उँगलियाँ’ आस्य के करणों की तरह काम करती हैं।
अङ्गुलयः यदा अङ्गुलिच्छिद्राणि विविधरूपेण स्पृशन्ति, तेषां समीपं वा यान्ति; तदा तेषु अङ्गुलिच्छिद्रेषु विविध-ध्वनयः प्रकटीभवन्ति।
उँगलियाँ जब छेदों को अलग-अलग ढंग से छूती हैं, या उनके पास जाती हैं, तब उन छेदों पर तरह-तरह की ध्वनियाँ प्रकट होती हैं।
तालु, मूर्धा, दन्तः च – एतेषु त्रिषु स्थानेषु → ‘जिह्वा’ करणं भवति।
तालु, मूर्धा और दन्त — इन तीन स्थानों में ‘जिह्वा’ (जीभ) करण होती है।
तालव्यानां, मूर्धन्यानां, दन्त्यानां च वर्णानाम् उच्चारणार्थं → जिह्वा – यथाक्रमं तालु, मूर्धानं, दन्तं च स्थानं स्पृशति, समीपं वा याति, येन यथाक्रमं तत्-तद्-वर्णानाम् उत्पत्तिः भवति।
तालव्य, मूर्धन्य और दन्त्य वर्णों के उच्चारण के लिए जीभ क्रम से तालु, मूर्धा और दन्त स्थान को छूती है, या उनके पास जाती है, जिससे क्रम से उन-उन वर्णों की उत्पत्ति होती है।
अतः, एतेषां त्रिविधानां वर्णानाम् उच्चारणार्थं → जिह्वा – ‘करणम्’, अर्थात् ‘उपकरणं’ भवति —
इसलिए इन तीन प्रकार के वर्णों के उच्चारण के लिए जीभ ‘करण’ अर्थात् ‘उपकरण’ (साधन) होती है —
तालव्याः वर्णाः
तालु – स्थानम्
जिह्वा – करणम्
[जिह्वा-मध्यः]
तालव्य वर्ण — तालु स्थान है, जीभ करण है [जीभ का मध्य भाग]।
मूर्धन्याः वर्णाः
मूर्धा – स्थानम्
जिह्वा – करणम्
[जिह्वा-उपाग्रः]
मूर्धन्य वर्ण — मूर्धा स्थान है, जीभ करण है [जीभ के अग्र भाग से थोड़ा पहले का भाग]।
दन्त्याः वर्णाः
दन्तः – स्थानम्
जिह्वा – करणम्
[जिह्वा-अग्रः]
दन्त्य वर्ण — दन्त स्थान है, जीभ करण है [जीभ का अग्र भाग]।
अङ्गुलयः → करणानि इव
उँगलियाँ → करणों की तरह
कण्ठः, ओष्ठः, नासिका च – एतेषु त्रिषु स्थानेषु → ‘स्व-स्थानम्’ एव करणं भवति।
कण्ठ, ओष्ठ और नासिका — इन तीन स्थानों में ‘स्व-स्थान’ (अपना ही स्थान) करण होता है।
कण्ठ्यानाम्, ओष्ठ्यानां, नासिक्यानां च वर्णानाम् उच्चारणे जिह्वा प्रायः निष्क्रिया भवति।
कण्ठ्य, ओष्ठ्य और नासिक्य वर्णों के उच्चारण में जीभ प्रायः निष्क्रिय (बिना काम किए) रहती है।
एतेषां वर्णानाम् उच्चारणार्थं → तत्-तत्-स्थानस्य एव कश्चित् पर-भागः तत्-तत्-स्थानस्य पूर्व-भागं स्पृशति, समीपं वा याति।
इन वर्णों के उच्चारण के लिए उस-उस स्थान का ही कोई पर-भाग (दूसरा भाग) उसी स्थान के पूर्व-भाग को छूता है, या उसके पास जाता है।
अतः, एतेषां त्रिविधानां वर्णानाम् उच्चारणार्थं → स्व-स्थानं – ‘करणम्’, अर्थात् ‘उपकरणं’ भवति —
इसलिए इन तीन प्रकार के वर्णों के उच्चारण के लिए स्व-स्थान (अपना ही स्थान) ‘करण’ अर्थात् ‘उपकरण’ होता है —
कण्ठ्याः वर्णाः
[कण्ठस्य पृष्ठ-भागः]
कण्ठः – स्थानम्
कण्ठः – करणम्
[कण्ठस्य अग्र-भागः]
कण्ठ्य वर्ण — कण्ठ स्थान है [कण्ठ का पिछला भाग]; कण्ठ ही करण है [कण्ठ का अगला भाग]।
ओष्ठ्याः वर्णाः
[उत्तरोष्ठः]
ओष्ठः – स्थानम्
ओष्ठः – करणम्
[अधरोष्ठः]
ओष्ठ्य वर्ण — ओष्ठ स्थान है [ऊपर का होंठ]; ओष्ठ ही करण है [नीचे का होंठ]।
नासिक्याः वर्णाः
[नासिका-मूलस्य उपरि-भागः]
नासिका – स्थानम्
नासिका – करणम्
[नासिका-मूलस्य अधो-भागः]
नासिक्य वर्ण — नासिका स्थान है [नाक की जड़ का ऊपरी भाग]; नासिका ही करण है [नाक की जड़ का निचला भाग]।
अत्र इदम् अवधेयम् — पृष्ठ 157
परिभाषा —
‘स्वरः’ इत्यस्य परिभाषा-वाक्यम् —
स्वयं राजन्ते इति स्वराः।
परिभाषा —
‘स्वर’ का परिभाषा-वाक्य —
जो स्वयं (स्वतन्त्र रूप से) उच्चारित होते हैं, वे स्वर हैं।
अर्थः – ये वर्णाः (स्वयं) स्वतन्त्ररूपेण (राजन्ते) उच्चार्यन्ते, ते → स्वराः भवन्ति।
अर्थ – जो वर्ण (स्वयं) स्वतन्त्र रूप से (राजन्ते) उच्चारित होते हैं, वे स्वर होते हैं।
‘व्यञ्जनम्’ इत्यस्य परिभाषा-वाक्यम् —
अन्वग् भवति व्यञ्जनम्।
‘व्यञ्जन’ का परिभाषा-वाक्य —
व्यञ्जन (स्वर के) पीछे-पीछे चलने वाला (उस पर आश्रित) होता है।
अर्थः – उच्चारणार्थं यः वर्णः अचं (स्वरं) प्रति पराश्रितः भवति, सः वर्णः → ‘व्यञ्जनं’ भवति।
अर्थ – उच्चारण के लिए जो वर्ण अच् (स्वर) पर आश्रित होता है, वह वर्ण ‘व्यञ्जन’ होता है।
योग्यताविस्तरः — पाणिनीय-शिक्षा-सूत्राणि (करण-प्रकरणम्) — पृष्ठ 157
षष्ठ-कक्षायां ‘स्थान-प्रकरणस्य’ सूत्राणि दृष्टवन्तः। अधुना ‘करण-प्रकरणस्य’ सूत्राणि —
छठी कक्षा में हमने ‘स्थान-प्रकरण’ के सूत्र देखे थे। अब ‘करण-प्रकरण’ के सूत्र (दिए जा रहे हैं) —
करणम् अपि।
अधुना (वर्णोच्चारणस्य) ‘करणं’ जानीमः।
सूत्र — अब करण भी (बताया जाता है)।
अर्थ — अब हम (वर्णों के उच्चारण का) ‘करण’ जानते हैं।
तालव्य-मूर्धन्य-दन्त्यानां – जिह्वा करणम्।
तालव्यानां मूर्धन्यानां दन्त्यानां च वर्णानाम् उच्चारणे → ‘जिह्वा’ करणं भवति।
सूत्र — तालव्य, मूर्धन्य और दन्त्य वर्णों का करण जीभ है।
अर्थ — तालव्य, मूर्धन्य और दन्त्य वर्णों के उच्चारण में ‘जीभ’ करण होती है।
जिह्वामध्येन – तालव्यानाम्।
तालव्य-वर्णानाम् उच्चारणे → जिह्वायाः ‘मध्य-भागः’ करणं भवति।
सूत्र — जीभ के मध्य भाग से तालव्य वर्णों का (उच्चारण होता है)।
अर्थ — तालव्य वर्णों के उच्चारण में जीभ का ‘मध्य भाग’ करण होता है।
जिह्वोपाग्रेण – मूर्धन्यानाम्।
मूर्धन्य-वर्णानाम् उच्चारणे → जिह्वायाः ‘उपाग्र-भागः’ करणं भवति।
सूत्र — जीभ के उपाग्र भाग से मूर्धन्य वर्णों का (उच्चारण होता है)।
अर्थ — मूर्धन्य वर्णों के उच्चारण में जीभ का ‘उपाग्र भाग’ (अग्र भाग से थोड़ा पहले का भाग) करण होता है।
जिह्वाग्रेण – दन्त्यानाम्।
दन्त्य-वर्णानाम् उच्चारणे → जिह्वायाः ‘अग्र-भागः’ करणं भवति।
सूत्र — जीभ के अग्र भाग से दन्त्य वर्णों का (उच्चारण होता है)।
अर्थ — दन्त्य वर्णों के उच्चारण में जीभ का ‘अग्र भाग’ करण होता है।
शेषाः – स्वस्थानकरणाः।
शेषाणां (कण्ठ्य-ओष्ठ्य-नासिक्यानां) वर्णानाम् उच्चारणे → ‘स्वस्थानं’ (स्वस्य स्थानस्य कश्चिद् भागविशेषः) एव → करणं भवति।
सूत्र — शेष (वर्ण) स्वस्थान-करण वाले होते हैं।
अर्थ — शेष (कण्ठ्य, ओष्ठ्य और नासिक्य) वर्णों के उच्चारण में ‘स्वस्थान’ (अपने ही स्थान का कोई विशेष भाग) ही करण होता है।
इत्येतत् करणम्।
अत्र पर्यन्तम् एतत् उच्चारणस्य ‘करणं’ चर्चितम्।
सूत्र — यह करण (का विषय पूरा हुआ)।
अर्थ — यहाँ तक उच्चारण के इस ‘करण’ की चर्चा की गई।

NCERT Solutions for Class 8 Sanskrit Chapter 13 वर्णोच्चारण-शिक्षा १ – Questions and Answers

All questions of the chapter are answered below, in the order of the book – in-text questions, activities and the end-of-chapter exercises. Each answer is written the way you would write it in the exam.

पाठः — मनुष्येषु वाग्-उत्पत्ति-प्रक्रिया (पाठे विद्यमानः प्रश्नः) — पृष्ठ 146–147अतिरिक्त अभ्यास (प्र.3 पाठ का अपना प्रश्न है; शेष प्रश्न पुस्तक में नहीं हैं) — वर्णोच्चारणे शरीरस्य चत्वारि अङ्गानि, वायोः मार्गः तथा त्रीणि तत्त्वानि

पाठः
प्र.1वर्णानाम् उच्चारणार्थम् आस्येन सह शरीरस्य कानि अङ्गानि उपयुज्यन्ते ? तेषां तन्त्राणि च कानि ?
उत्तर

उत्तरम् — वर्णानाम् उच्चारणे केवलम् आस्यस्य एव उपयोगः न भवति; आस्येन सह शरीरस्य चत्वारि अङ्गानि उपयुज्यन्ते। (वर्णों के उच्चारण में केवल मुख का ही उपयोग नहीं होता; मुख के साथ शरीर के चार अङ्ग काम करते हैं।)

क्रमःअङ्गम् (संस्कृतम्)तन्त्रम्हिन्दी मेंEnglish
१.नाभि-प्रदेशःमांसपेशी-बल-तन्त्रम्नाभि-भाग की मांसपेशियाँ — पेशी-दाब तन्त्रNavel-region — Abdominal Muscles (Muscular-pressure System)
२.उरःवायु-बल-तन्त्रम्छाती — फेफड़े और उरःप्राचीर (डायाफ्राम) — वायु-दाब तन्त्रChest — Lungs & Diaphragm (Air-pressure System)
३.कण्ठ-बिलःध्वनि-तन्त्रम्स्वर-यन्त्र / स्वरतन्त्रियाँ — ध्वनि तन्त्रVoice-box — Larynx / Vocal-cords (Phonatory & Resonatory System)
४.आस्यम्उच्चारण-तन्त्रम्मस्तक — मुख और नाक — उच्चारण तन्त्रHead — Mouth & Nose (Articulatory System)
प्र.2यदा वयं कञ्चित् शब्दं वर्णं वा उच्चारयितुम् इच्छामः, तदा का प्रक्रिया भवति ? क्रमेण लिखत।
उत्तर

उत्तरम् — चत्वारि सोपानानि भवन्ति —

  1. सर्वप्रथमं नाभि-प्रदेशे स्थिताः मांसपेश्यः उरः नोदयन्ति। (सबसे पहले नाभि-भाग की मांसपेशियाँ छाती को दबाती हैं।)
  2. उरः पुनः श्वासकोश-स्थितं वायुम् ऊर्ध्वं निःसारयति। (फिर छाती फेफड़ों में भरी वायु को ऊपर की ओर बाहर निकालती है।)
  3. सः वायुः ऊर्ध्वं सरन् कण्ठ-बिलं प्राप्नोति। (वह वायु ऊपर चलती हुई कण्ठ-बिल — स्वर-यन्त्र — तक पहुँचती है।)
  4. ततः, सः वायुः पुनः ऊर्ध्वं सरन् आस्यं प्रविशति। (उसके बाद वह वायु फिर ऊपर चलकर आस्य में प्रवेश करती है।)

आस्य में प्रवेश करने के बाद — मुखे, नासिकायां च स्थितेषु षट्सु उच्चारण-स्थानेषु वर्णानुसारं स्वकीयं स्थानं प्राप्य, सः वायुः तस्मिन् स्थाने वर्ण-रूपेण प्रकटीभवति। (मुख और नाक में स्थित छह उच्चारण-स्थानों में से वर्ण के अनुसार अपना स्थान पाकर वही वायु उस स्थान पर वर्ण के रूप में प्रकट होती है।)

प्र.3‘आस्यस्य अभ्यन्तरे स्थितेषु षट्सु स्थानेषु सः वायुः वर्णरूपेण कथं प्रकटीभवति ?’ — (पाठे पृष्ठे 147 उपस्थितः प्रश्नः)
उत्तर

उत्तरम् — आस्यस्य अभ्यन्तरं प्रविश्य सः वायुः वर्णानुसारं स्वकीयं स्थानं प्राप्नोति। तत्र करणम् (जिह्वा, स्व-स्थानं वा) तत् स्थानं स्पृशति, समीपं वा याति। एवं स्थानस्य, करणस्य, आभ्यन्तर-प्रयत्नस्य च योगेन सः वायुः तस्मिन् स्थाने वर्णरूपेण प्रकटीभवति। (आस्य में प्रवेश करके वह वायु वर्ण के अनुसार अपना स्थान पाती है। वहाँ करण — जीभ या उसी स्थान का कोई भाग — उस स्थान को छूता है या उसके पास जाता है। इस प्रकार स्थान, करण और आभ्यन्तर-प्रयत्न — इन तीन तत्त्वों के मेल से वायु उस स्थान पर वर्ण के रूप में प्रकट होती है।)

प्र.4आस्यस्य अभ्यन्तरे वर्णानाम् उत्पत्त्यर्थं कति तत्त्वानि आवश्यकानि ? कानि च तानि ? अस्मिन् पाठे केषां चर्चा भवति ?
उत्तर

उत्तरम् — त्रीणि तत्त्वानि आवश्यकानि भवन्ति — (क) प्रथमम् — स्थानम्, (ख) द्वितीयम् — करणम्, (ग) तृतीयम् — आभ्यन्तर-प्रयत्नः। (तीन तत्त्व आवश्यक हैं — पहला स्थान, दूसरा करण, तीसरा आभ्यन्तर-प्रयत्न।)

पुस्तक स्वयं कहती है — ‘अस्मिन् पाठे स्थानस्य, करणस्य च चर्चां कुर्मः। आभ्यन्तर-प्रयत्नस्य विषये अग्रिमायां कक्षायां ज्ञास्यामः।’ (इस पाठ में हम ‘स्थान’ और ‘करण’ की ही चर्चा करेंगे; ‘आभ्यन्तर-प्रयत्न’ के विषय में अगली कक्षा में जानेंगे।)

(क) स्थानम् — पृष्ठ 148–149अतिरिक्त अभ्यास (ये प्रश्न पुस्तक में नहीं हैं) — ‘स्थानम्’ इत्यस्य परिभाषा, आस्ये षट् उच्चारण-स्थानानि तथा मुरली-दृष्टान्तः

स्थानम्
प्र.5‘स्थानम्’ इति किम् उच्यते ? पाठस्य परिभाषा-वाक्यं लिखत।
उत्तर

उत्तरम् (पुस्तकस्य वाक्यम्) — वर्णस्य उच्चारण-समये, श्वासकोशतः ऊर्ध्वं सरन् वायुः, कण्ठ-बिल-माध्यमेन आस्यस्य अभ्यन्तरं प्रविश्य, तत्र मुखे नासिकायां वा यस्मिन् स्थले वर्णरूपेण प्रकटीभवति, तत् — ‘स्थानम्’ इति उच्यते।

(हिन्दी अर्थ — वर्ण के उच्चारण के समय फेफड़ों से ऊपर चलती हुई वायु, कण्ठ-बिल के रास्ते आस्य के भीतर प्रवेश करके, वहाँ मुख में या नाक में जिस स्थल पर वर्ण के रूप में प्रकट होती है, वही ‘स्थान’ कहलाता है।)

प्र.6आस्ये कति उच्चारण-स्थानानि सन्ति ? तानि कानि च ? (चित्रानुसारं लिखत।)
(चित्र-परिचयः — पृष्ठ 148 के चित्र ‘आस्ये वर्णानां षट् उच्चारण-स्थानानि’ में सिर का भीतरी पार्श्व-चित्र है; उस पर छह स्थान १ से ६ क्रमाङ्कों सहित रेखाओं द्वारा चिह्नित हैं — पाँच मुख के भीतर और एक नासिका में।)
उत्तर

उत्तरम् — आस्ये षट् स्थानानि सन्ति — मुखे पञ्च, नासिकायाम् एकम्। (आस्य में छह स्थान हैं — मुख में पाँच और नाक में एक।)

  • मुखे — कण्ठः, तालु, मूर्धा, दन्तः, ओष्ठः — इति पञ्च स्थानानि।
  • नासिकायाम् — नासिका — इत्येव षष्ठं स्थानम्।

पृष्ठ 148 का चित्र ‘आस्ये वर्णानां षट् उच्चारण-स्थानानि’ इन्हें इसी क्रम में अङ्कित करता है —

चित्रे अङ्कःस्थानम्कुत्रहिन्दीEnglish
१.कण्ठःमुखे (सर्वान्तः)गला / कण्ठ-स्थानThroat / Glottis / Soft Palate
२.तालुमुखेतालु-स्थानHard Palate
३.मूर्धामुखेमूर्धा-स्थानAlveolar Ridge
४.दन्तःमुखेदाँत / दन्त-स्थान(Base of) Tooth
५.ओष्ठःमुखे (सर्वबहिः)होंठ / ओष्ठ-स्थानLip
६.नासिकानासिकायाम्नाक / नासिका-स्थानNose / Nasal cavity
प्र.7स्थानस्य कार्य-निदर्शनार्थं ‘मुरली’ इति उदाहरणं पुस्तकं कथं प्रयुङ्क्ते ?
उत्तर

उत्तरम् (पुस्तकस्य वाक्यम्) — स्थानस्य सम्यक् कार्य-निदर्शनार्थं ‘मुरली’ समुचितम् उदाहरणम् अस्ति। मुरल्याः ‘अङ्गुलिच्छिद्राणि’ आस्यस्य ‘स्थानानि’ इव व्यवहरन्ति। मुरली-नलिकया आगच्छन् वायुः अङ्गुलिच्छिद्रेषु एव विविध-ध्वनि-रूपेण प्रकटीभवति।

(हिन्दी अर्थ — ‘स्थान’ का काम अच्छी तरह दिखाने के लिए बाँसुरी उपयुक्त उदाहरण है। बाँसुरी के छिद्र आस्य के स्थानों की तरह काम करते हैं। बाँसुरी की नली से आती हुई हवा उन्हीं छिद्रों पर तरह-तरह की ध्वनि के रूप में प्रकट होती है।)

मुरल्याम्आस्येक्या समझाता है
मुरली-नलिकया आगच्छन् वायुःश्वासकोशात् ऊर्ध्वं सरन् वायुःदोनों में मूल कारण एक ही है — वायु
अङ्गुलिच्छिद्राणिस्थानानि (कण्ठ, तालु, मूर्धा, दन्त, ओष्ठ, नासिका)जहाँ ध्वनि/वर्ण प्रकट होता है
अङ्गुलयः (मुरलीं वादयन्त्यः)करणानि (जिह्वा, स्व-स्थानम्)जो छूता है या पास जाता है (पृष्ठ 150–151)

(ख) करणम् — पृष्ठ 150–151अतिरिक्त अभ्यास (ये प्रश्न पुस्तक में नहीं हैं) — ‘करणम्’ इत्यस्य परिभाषा, जिह्वा-करणम् (तालव्य-मूर्धन्य-दन्त्य) तथा स्व-स्थानं करणम् (कण्ठ्य-ओष्ठ्य-नासिक्य)

करणम्
प्र.8‘करणम्’ इति किम् उच्यते ? मुरली-निदर्शने करणानि कानि ?
उत्तर

उत्तरम् (पुस्तकस्य वाक्यम्) — वर्णस्य उच्चारण-समये, आस्यस्य यः भागः स्थानं स्पृशति, स्थानस्य समीपं वा याति, सः भागः — ‘करणम्’ इति कथ्यते।

(हिन्दी अर्थ — वर्ण के उच्चारण के समय आस्य का जो भाग स्थान को छूता है या स्थान के पास तक जाता है, वही भाग ‘करण’ कहलाता है।)

मुरली-निदर्शने — मुरलीं वादयन्त्यः ‘अङ्गुलयः’ — आस्यस्य करणानि इव व्यवहरन्ति। अङ्गुलयः यदा अङ्गुलिच्छिद्राणि विविधरूपेण स्पृशन्ति, तेषां समीपं वा यान्ति; तदा तेषु अङ्गुलिच्छिद्रेषु विविध-ध्वनयः प्रकटीभवन्ति। (बाँसुरी बजाती हुई अङ्गुलियाँ आस्य के करणों की तरह काम करती हैं। अङ्गुलियाँ जब छिद्रों को भाँति-भाँति से छूती हैं या उनके पास जाती हैं, तब उन छिद्रों पर अलग-अलग ध्वनियाँ प्रकट होती हैं।)

प्र.9तालु, मूर्धा, दन्तः — एतेषु त्रिषु स्थानेषु किं करणं भवति ? प्रत्येकस्य विशेष-करणं च किम् ?
उत्तर

उत्तरम् (पुस्तकस्य पेटिका-वाक्यम्) — तालु, मूर्धा, दन्तः च — एतेषु त्रिषु स्थानेषु → ‘जिह्वा’ करणं भवति। (तालु, मूर्धा और दन्त — इन तीनों स्थानों में करण जीभ होती है।)

पुस्तक विस्तार से कहती है — तालव्यानां, मूर्धन्यानां, दन्त्यानां च वर्णानाम् उच्चारणार्थं → जिह्वा — यथाक्रमं तालु, मूर्धानं, दन्तं च स्थानं स्पृशति, समीपं वा याति, येन यथाक्रमं तत्-तद्-वर्णानाम् उत्पत्तिः भवति। अतः एतेषां त्रिविधानां वर्णानाम् उच्चारणार्थं → जिह्वा — ‘करणम्’, अर्थात् ‘उपकरणं’ भवति।

किन्तु प्रत्येक वर्ग में जीभ का अलग-अलग भाग काम करता है — यही विशेष-करणम् है —

वर्णाःस्थानम्सामान्य-करणम्विशेष-करणम् (जिह्वायाः भागः)पाणिनीय-सूत्रम्
तालव्याः वर्णाःतालुजिह्वाजिह्वा-मध्यः (जीभ का मध्य भाग)जिह्वामध्येन – तालव्यानाम्।
मूर्धन्याः वर्णाःमूर्धाजिह्वाजिह्वा-उपाग्रः (जीभ के अग्र भाग से थोड़ा पहले का भाग)जिह्वोपाग्रेण – मूर्धन्यानाम्।
दन्त्याः वर्णाःदन्तःजिह्वाजिह्वा-अग्रः (जीभ का अग्र भाग / नोक)जिह्वाग्रेण – दन्त्यानाम्।
प्र.10कण्ठः, ओष्ठः, नासिका — एतेषु त्रिषु स्थानेषु किं करणं भवति ? एतेषां वर्णानाम् उच्चारणे जिह्वायाः का स्थितिः ?
उत्तर

उत्तरम् (पुस्तकस्य पेटिका-वाक्यम्) — कण्ठः, ओष्ठः, नासिका च — एतेषु त्रिषु स्थानेषु → ‘स्व-स्थानम्’ एव करणं भवति। (कण्ठ, ओष्ठ और नासिका — इन तीनों स्थानों में करण वही स्थान स्वयं होता है।)

पुस्तक का विस्तार — कण्ठ्यानाम्, ओष्ठ्यानाम्, नासिक्यानां च वर्णानाम् उच्चारणे जिह्वा प्रायः निष्क्रिया भवति। एतेषां वर्णानाम् उच्चारणार्थं → तत्-तत्-स्थानस्य एव कश्चित् पर-भागः, तत्-तत्-स्थानस्य पूर्व-भागं स्पृशति, समीपं वा याति। अतः एतेषां त्रिविधानां वर्णानाम् उच्चारणार्थं → स्व-स्थानं — ‘करणम्’, अर्थात् ‘उपकरणं’ भवति।

(हिन्दी अर्थ — कण्ठ्य, ओष्ठ्य और नासिक्य वर्णों के उच्चारण में जीभ प्रायः निष्क्रिय रहती है। इनके लिए उसी स्थान का कोई पर-भाग उसी स्थान के पूर्व-भाग को छूता है या उसके पास जाता है। इसीलिए इनमें ‘स्व-स्थान’ ही करण बन जाता है।)

वर्णाःविशेष-स्थानम् (जिसे छुआ जाता है)विशेष-करणम् (जो छूता है)
कण्ठ्याः वर्णाःकण्ठस्य पृष्ठ-भागःकण्ठस्य अग्र-भागः
ओष्ठ्याः वर्णाःउत्तरोष्ठः (ऊपर का होंठ)अधरोष्ठः (नीचे का होंठ)
नासिक्याः वर्णाःनासिका-मूलस्य उपरि-भागःनासिका-मूलस्य अधो-भागः

पारिभाषिक-शब्दार्थान् जानीमः — पृष्ठ 152–154अतिरिक्त अभ्यास (ये प्रश्न पुस्तक में नहीं हैं) — शिक्षा-शास्त्र की पूरी पारिभाषिक शब्दावली — शब्दः · अर्थः · हिन्दी · English

शब्दार्थाः
प्र.11‘शिक्षा’ तथा वाग्-उत्पत्ति से जुड़े पारिभाषिक शब्द (पृष्ठ 152) — शब्दः, अर्थः, हिन्दी तथा English सहित लिखिए।
उत्तर

पुस्तक की सारणी ज्यों-की-त्यों —

शब्दःअर्थःहिन्दीEnglish
शिक्षावर्णोच्चारण-शास्त्रम्वर्णों के शुद्ध उच्चारण का विधान एवं विज्ञानPhonetics (& Phonology)
उच्चारणम्कथनम् / वाङ्-निष्पत्तिःकथनArticulation (Speech) / Pronunciation
ध्वनिःध्वानःध्वनिSound / Phonation / Resonation
शब्दःपदम्शब्दWord
वाक्यम्वचः / परस्परान्वित-पद-समूहःवाक्यSentence
वाक्वाणी / गीःवाणीSpeech / Spoken words
वर्णःशब्दस्य अवयवभूतः लघुतमः ध्वनिःवर्णLetter / Phoneme / Grapheme
आस्यम्शिरः / मस्तकम्मस्तकHead
मुखम्वक्त्रम् / वदनम्मुँहMouth / Oral cavity
नासिकानासानाक / नासिका-स्थानNose / Nasal cavity
कण्ठ-बिलम्स्वरयन्त्रम् / ध्वनियन्त्रम् / कण्ठ-कूपः / कुहरम्स्वरतन्त्री / घोषतन्त्रीVoice-box / Larynx [Vocal-cords]
गल-बिलम्अधो-ग्रसनीअधो-ग्रसनीLower Pharynx / Hypopharynx / Laryngopharynx
उरःवक्षःछातीChest
श्वासकोशःफुप्फुसःफेफड़ेLungs
नाभि-प्रदेशःतुन्दकूपी-क्षेत्रःनाभि-भागNavel-region / Abdominal Muscles
मांसपेश्यःस्नायवःस्नायुMuscles
बलम्प्रणोदः / अभिपीडनम्दबावPressure
तन्त्रम्प्रणालीप्रणाली(Anatomy) System / System (of Human Body)
प्र.12वर्णमाला तथा वर्ण-भेदों से जुड़े पारिभाषिक शब्द (पृष्ठ 152–153) — शब्दः, अर्थः, हिन्दी तथा English सहित लिखिए।
उत्तर
शब्दःअर्थःहिन्दीEnglish
वर्णमालावर्णानां क्रम-पूर्वक-व्यवस्थावर्णों की क्रम-पूर्वक व्यवस्थाAlphabet / Sequence of Letters
स्वरःअच् / अच्-वर्णःस्वर (स्वतन्त्र-वर्ण)Vowel [V]
अक्षरम्स्वरः, एक-स्वर-केन्द्रित-वर्ण-समूहः वास्वर या एक-स्वर-केन्द्रित-वर्ण-समूहSyllable / A Single Vowel or group of letters comprising a single Vowel
समानाक्षरम्सिम्सामान्य-स्वरSimple-Vowel / Monophthong [V]
सन्ध्यक्षरम्सन्धि-स्वरःसन्धि-स्वरCompound-Vowel / Diphthong [V]
व्यञ्जनम्हल्, हल्-वर्णःव्यञ्जनConsonant [C]
स्पर्शःवर्गीय-वर्णःस्पर्श-वर्णStop / Plosive [C], (Touch)
वर्गीयःस्पर्श-वर्णःवर्गीय-वर्णClass-Consonants / Grouped [C]
अन्तःस्थःवर्णमालायां स्पर्शानाम् ऊष्मणां च मध्ये स्थितः व्यञ्जन-वर्णःवर्णमाला में स्पर्श एवं ऊष्मा वर्णों के मध्य स्थित व्यञ्जन-वर्णGlide (Situated In-between)
अर्ध-स्वरःस्वरस्य किञ्चिद्-गुण-सदृशः व्यञ्जन-वर्णःस्वर के समान कुछ गुण वाले व्यञ्जन-वर्णSemivowel / Semiconsonant [C]
ऊष्मासंघर्षी / वायुप्रधानम्वाष्प / भाप निःसृत करने वाले संघर्षी वर्णFricative [C]; Sibilant (श, ष, स); Aspirate (ह)
अयोगवाहःसंयोगवाहः / प्रत्याहार-सूत्रेभ्यः बहिर्भूतः विशिष्टः व्यञ्जन-वर्णःमाहेश्वर-सूत्रों में अपठित विशिष्ट व्यञ्जन-वर्णAfter-sound [C] (Special Consonant that is not enumerated in Śiva-sūtras)
अनुस्वारःस्वरानुगःबिन्दु / स्वर के बाद उच्चारित शुद्ध नासिक्य व्यञ्जन वर्ण [ ं ]Nasalised Resonant sound uttered after a Vowel [C] (Following the vowel)
विसर्गःविसर्जनीयःविसर्ग [ ः ]Released “h” like sound (ḥ) [C] (To send out / To release)
अनुनासिकःस्वस्थानेन सह नासिकया अपि उच्चारितः वर्णःचन्द्र-बिन्दु [ ँ ]Nasalised Letter
सानुनासिकःअनुनासिक-गुण-सहितःअनुनासिक गुण के सहितLetter with Nasalisation
निरनुनासिकःअनुनासिक-गुण-रहितःअनुनासिक गुण के रहितLetter without Nasalisation
संयुक्त-व्यञ्जनानिसंयोगःस्वर-रहित व्यञ्जनों का समूहConjunct Consonants [C]
प्र.13‘स्थानम्’ से जुड़े पारिभाषिक शब्द (पृष्ठ 153–154) — कण्ठः से लेकर दन्त्योष्ठ्यः तक — सारणी-रूप में लिखिए।
उत्तर

पुस्तक इस खण्ड का शीर्षक-वाक्य देती है — स्थानम् = आस्ये उच्चारणस्य स्थलम् (मस्तक में उच्चारण का ‘स्थल’) — ‘Place’ of Articulation (in the head)।

शब्दःअर्थःहिन्दीEnglish
कण्ठःगलः (जिह्वामूलः)गला / कण्ठ-स्थानThroat / Glottis / Soft Palate / Velum (Uvula, Upper-Pharynx / Oropharynx)
कण्ठ्यःकण्ठ-स्थानोत्पन्नः वर्णःकण्ठ-स्थान में उत्पन्न वर्णGuttural / Velar (Letter) (Uvular, Pharyngeal)
तालुतालुकम् / काकुदम्तालु-स्थानHard Palate
तालव्यःतालु-स्थानोत्पन्नः वर्णःतालु-स्थान में उत्पन्न वर्णPalatal (Letter)
मूर्धामूर्द्ध्वा / मूर्द्धामूर्धा-स्थानAlveolar Ridge
मूर्धन्यःमूर्ध-स्थानोत्पन्नः वर्णःमूर्धा-स्थान में उत्पन्न वर्णRetroflex / Alveolar / Cerebral
दन्तःरदनः / दशनःदाँत / दन्त-स्थान(Base of) Tooth
दन्त्यःदन्त-स्थानोत्पन्नः वर्णःदन्त-स्थान में उत्पन्न वर्णDental (Letter)
ओष्ठःदन्तवासः / दशनवासःहोंठ / ओष्ठ-स्थानLip
ओष्ठ्यःओष्ठ-स्थानोत्पन्नः वर्णःओष्ठ-स्थान में उत्पन्न वर्णLabial / Bilabial (Letter)
नासिक्यःनासा-स्थानोत्पन्नः वर्णःनासिका-स्थान में उत्पन्न वर्णNasal (Letter)
कण्ठ-तालव्यःकण्ठ-तालु-स्थानयोः उत्पन्नः वर्णःकण्ठ एवं तालु स्थानों में उत्पन्न वर्णVelar-palatal / Palato-velar
कण्ठौष्ठ्यःकण्ठ-ओष्ठ-स्थानयोः उत्पन्नः वर्णःकण्ठ एवं ओष्ठ स्थानों में उत्पन्न वर्णVelar-labial / Labio-velar
दन्त्योष्ठ्यःदन्त-ओष्ठ-स्थानयोः उत्पन्नः वर्णःदन्त एवं ओष्ठ स्थानों में उत्पन्न वर्णDento-labial / Labio-dental
प्र.14‘करणम्’ से जुड़े पारिभाषिक शब्द (पृष्ठ 154) — उपकरणम् से स्वस्थानकरणः तक — सारणी-रूप में लिखिए।
उत्तर

पुस्तक इस खण्ड का शीर्षक-वाक्य देती है — करणम् = आस्ये उच्चारणस्य उपकरणम् (मस्तक में उच्चारण का ‘उपकरण’ या ‘यन्त्र’) — ‘Tool’ of Articulation (in the Head)।

शब्दःअर्थःहिन्दीEnglish
उपकरणम्यन्त्रम्साधनTool
जिह्वारसनाजीभTongue
जिह्वा-मध्यःजिह्वायाः मध्यभागःजीभ का मध्य भागMiddle of Tongue
जिह्वा-उपाग्रःजिह्वाग्रात् किञ्चित् पूर्वभागःजीभ के अग्र भाग से थोड़ा पहले का भागNear Tip of Tongue
जिह्वा-अग्रःजिह्वायाः अग्रभागःजीभ का अग्र भागTip of Tongue
स्वस्थानकरणःनिजस्थानस्य पर-भागः एव करणं यस्य वर्णस्यजिस वर्ण का उच्चारण-स्थान का पर-भाग ही उसका करण होSuch letters where a part of the ‘Place’ of Articulation itself acts as the ‘Tool’ of Articulation

वयं शब्दार्थान् जानीमः — पृष्ठ 154पाठ के कठिन शब्दों की सारणी तथा ‘मातृभाषया अर्थं लिखत’ स्तम्भ

शब्दार्थाः
प्र.15‘वयं शब्दार्थान् जानीमः’ — पृष्ठ 154 की पूरी शब्दार्थ-सारणी (शब्दः · अर्थः · हिन्दी · English)।
उत्तर
शब्दःअर्थः (संस्कृतम्)हिन्दीEnglish
नितान्तम्अत्यन्तम्अतीवVery / Highly
निर्दुष्टम्दोष-रहितम् / शुद्धम्दोष-रहित / शुद्धImpeccable
नोदयन्तिअभिपीडयन्तिदबाते हैंPress
निःसारयतिबहिः प्रेषयतिबाहर निकालता हैPushes out
सरन्चरन्बढ़ता हुआMove
प्रकटीभवतिउत्पद्यतेउत्पन्न होता हैAppears / Is produced
निदर्शनेउदाहरणेउदाहरण मेंExample
मुरलीवंशीबाँसुरीFlute
परिभाषाशास्त्रीय-व्याख्यानम्शास्त्रीय व्याख्याTechnical definition
प्र.16मातृभाषया अर्थं लिखत — (सारणी का अन्तिम स्तम्भ रिक्त है; वहाँ अपनी मातृभाषा में अर्थ लिखना है।)
उत्तर

यह स्तम्भ अपनी मातृभाषा में भरना है — हिन्दी, मराठी, बांग्ला, गुजराती, तमिल, तेलुगु… जो भी आपकी हो। हिन्दी-माध्यम के विद्यार्थी ऊपर प्रश्न 15 की सारणी का हिन्दी स्तम्भ ही उतार लें।

नमूना उत्तर (मराठी में) —

शब्दःहिन्दीमराठी (मातृभाषया)
नितान्तम्अतीवअत्यंत
निर्दुष्टम्दोष-रहित / शुद्धदोषरहित / शुद्ध
नोदयन्तिदबाते हैंदाबतात
निःसारयतिबाहर निकालता हैबाहेर काढतो
सरन्बढ़ता हुआसरकत
प्रकटीभवतिउत्पन्न होता हैप्रकट होतो
निदर्शनेउदाहरण मेंउदाहरणात
मुरलीबाँसुरीबासरी
परिभाषाशास्त्रीय व्याख्याशास्त्रीय व्याख्या

अभ्यासात् जायते सिद्धिः — पृष्ठ 155प्रश्नः १ : अधोलिखितप्रश्नानाम् उत्तराणि एकपदेन द्विपदेन वा उत्तरत

अभ्यासः
प्र.17(क) उरसि किं तन्त्रं भवति ?
उत्तर

उत्तरम् — वायु-बल-तन्त्रम्। (छाती में वायु-बल-तन्त्र होता है — Air-pressure System।)

कारणम् — पाठे — ‘उरः (Chest) — वायु-बल-तन्त्रम् (Air-pressure System)’।

प्र.18(ख) नाभिप्रदेशे स्थिताः मांसपेश्यः किं नोदयन्ति ?
उत्तर

उत्तरम् — उरः (नोदयन्ति)। (नाभि-भाग में स्थित मांसपेशियाँ छाती को दबाती हैं।)

कारणम् — पाठे — ‘सर्वप्रथमं नाभि-प्रदेशे स्थिताः मांसपेश्यः उरः नोदयन्ति।’

प्र.19(ग) आस्यस्य आभ्यन्तरे वर्णानाम् उत्पत्त्यर्थं द्वितीयं तत्त्वं किम् अस्ति ?
उत्तर

उत्तरम् — करणम्। (दूसरा तत्त्व ‘करण’ है।)

कारणम् — त्रीणि तत्त्वानि — (क) स्थानम्, (ख) करणम्, (ग) आभ्यन्तर-प्रयत्नः।

प्र.20(घ) आस्ये कति स्थानानि सन्ति ?
उत्तर

उत्तरम् — षट् (स्थानानि)। (आस्य में छह स्थान हैं।)

कारणम् — मुखे पञ्च (कण्ठः, तालु, मूर्धा, दन्तः, ओष्ठः) तथा नासिकायाम् एकम् (नासिका) — एवं षट्।

प्र.21(ङ) स्थानस्य कार्यनिदर्शनार्थं किं समुचितम् उदाहरणम् अस्ति ?
उत्तर

उत्तरम् — मुरली। (बाँसुरी उपयुक्त उदाहरण है।)

कारणम् — मुरल्याः अङ्गुलिच्छिद्राणि आस्यस्य स्थानानि इव व्यवहरन्ति।

प्र.22(च) करणानि मुरल्याः कस्य भागम् इव व्यवहरन्ति ?
उत्तर

उत्तरम् — अङ्गुलीः इव (अङ्गुलयः इव)। (करण बाँसुरी बजाती हुई अङ्गुलियों की तरह काम करते हैं।)

कारणम् — मुरलीं वादयन्त्यः अङ्गुलयः आस्यस्य करणानि इव व्यवहरन्ति।

अभ्यासात् जायते सिद्धिः — पृष्ठ 155प्रश्नः २ : अधोलिखितप्रश्नानाम् उत्तराणि पूर्णवाक्येन लिखत

अभ्यासः
प्र.23(क) करणं किं भवति ?
उत्तर

उत्तरम् — वर्णस्य उच्चारण-समये, आस्यस्य यः भागः स्थानं स्पृशति, स्थानस्य समीपं वा याति, सः भागः ‘करणम्’ इति कथ्यते।

(वर्ण के उच्चारण के समय आस्य का जो भाग स्थान को छूता है या स्थान के पास तक जाता है, वही भाग ‘करण’ कहलाता है।)

प्र.24(ख) उरः श्वासकोशस्थितं वायुं कुत्र निःसारयति ?
उत्तर

उत्तरम् — उरः श्वासकोश-स्थितं वायुम् ऊर्ध्वं निःसारयति। (छाती फेफड़ों में स्थित वायु को ऊपर की ओर निकालती है।)

प्र.25(ग) मुरल्याः अङ्गुलिच्छिद्राणि कीदृशं व्यवहरन्ति ?
उत्तर

उत्तरम् — मुरल्याः अङ्गुलिच्छिद्राणि आस्यस्य ‘स्थानानि’ इव व्यवहरन्ति। (बाँसुरी के छिद्र आस्य के स्थानों की तरह काम करते हैं।)

प्र.26(घ) केषां वर्णानाम् उच्चारणे जिह्वा प्रायः निष्क्रिया भवति ?
उत्तर

उत्तरम् — कण्ठ्यानाम्, ओष्ठ्यानाम्, नासिक्यानां च वर्णानाम् उच्चारणे जिह्वा प्रायः निष्क्रिया भवति। (कण्ठ्य, ओष्ठ्य और नासिक्य वर्णों के उच्चारण में जीभ प्रायः निष्क्रिय रहती है।)

प्र.27(ङ) तालव्यानां, मूर्धन्यानां, दन्त्यानां च वर्णानाम् उच्चारणार्थं सामान्यं करणं किम् अस्ति ?
उत्तर

उत्तरम् — तालव्यानां, मूर्धन्यानां, दन्त्यानां च वर्णानाम् उच्चारणार्थं सामान्यं करणं ‘जिह्वा’ अस्ति। (इन तीनों प्रकार के वर्णों के उच्चारण के लिए सामान्य करण जीभ है।)

प्र.28(च) कण्ठ्यानां, ओष्ठ्यानां, नासिक्यानां च वर्णानाम् उच्चारणार्थं स्थानस्य करणस्य च मध्ये किं भवति ?
उत्तर

उत्तरम् — कण्ठ्यानां, ओष्ठ्यानां, नासिक्यानां च वर्णानाम् उच्चारणार्थं स्थानस्य करणस्य च मध्ये भेदः न भवति — स्व-स्थानम् एव करणं भवति। तत्-तत्-स्थानस्य एव कश्चित् पर-भागः, तत्-तत्-स्थानस्य पूर्व-भागं स्पृशति, समीपं वा याति।

(इन वर्णों में स्थान और करण अलग-अलग अङ्ग नहीं होते — अपना स्थान ही करण होता है। उसी स्थान का कोई पर-भाग उसी स्थान के पूर्व-भाग को छूता है या उसके पास जाता है।)

वर्गस्थानम् बनने वाला भागकरणम् बनने वाला भाग
कण्ठ्याःकण्ठस्य पृष्ठ-भागःकण्ठस्य अग्र-भागः
ओष्ठ्याःउत्तरोष्ठःअधरोष्ठः
नासिक्याःनासिका-मूलस्य उपरि-भागःनासिका-मूलस्य अधो-भागः

अभ्यासात् जायते सिद्धिः — पृष्ठ 155प्रश्नः ३ : अधोलिखितेषु वाक्येषु आम् / न इति लिखित्वा उचितभावं सूचयत

अभ्यासः
प्र.29(क) श्वासकोशस्थितः वायुः ऊर्ध्वं चरन् पूर्वम् आस्यं प्राप्नोति।
उत्तर

उत्तरम् — न। (नहीं।)

शुद्धं वाक्यम् — श्वासकोश-स्थितः वायुः ऊर्ध्वं चरन् पूर्वं कण्ठ-बिलं प्राप्नोति, ततः आस्यं प्रविशति। (फेफड़ों की वायु ऊपर चलती हुई पहले कण्ठ-बिल तक पहुँचती है, उसके बाद आस्य में प्रवेश करती है।)

प्र.30(ख) सर्वप्रथमं नाभि-प्रदेशे स्थिताः मांसपेश्याः कण्ठं नोदयन्ति।
उत्तर

उत्तरम् — न। (नहीं।)

शुद्धं वाक्यम् — सर्वप्रथमं नाभि-प्रदेशे स्थिताः मांसपेश्यः उरः नोदयन्ति। (सबसे पहले नाभि-भाग की मांसपेशियाँ छाती को दबाती हैं, कण्ठ को नहीं।)

प्र.31(ग) आस्यस्य आभ्यन्तरे वर्णानाम् उत्पत्त्यर्थम् आभ्यन्तर-प्रयत्नः आवश्यकम् अस्ति।
उत्तर

उत्तरम् — आम्। (हाँ।)

कारणम् — आस्ये वर्णोत्पत्त्यर्थं त्रीणि तत्त्वानि आवश्यकानि — स्थानम्, करणम्, आभ्यन्तर-प्रयत्नः।

प्र.32(घ) तालव्य-वर्णानाम् उच्चारणार्थं दन्तः स्थानं स्पृशति।
उत्तर

उत्तरम् — न। (नहीं।)

शुद्धं वाक्यम् — तालव्य-वर्णानाम् उच्चारणार्थं जिह्वायाः मध्य-भागः (जिह्वा-मध्यः) तालु इति स्थानं स्पृशति। (तालव्य वर्णों के उच्चारण के लिए जीभ का मध्य भाग तालु नामक स्थान को छूता है।)

प्र.33(ङ) मूर्धन्यानां वर्णानाम् उच्चारणार्थं जिह्वा स्थानं स्पृशति।
उत्तर

उत्तरम् — आम्। (हाँ।)

कारणम् — मूर्धन्य-वर्णानाम् उच्चारणार्थं जिह्वा (उपाग्र-भागेन) मूर्धानं स्पृशति, समीपं वा याति।

प्र.34(च) तत्तत्स्थानस्य एव कश्चित् पूर्वभागः, तत्तत्स्थानस्य परभागं स्पृशति।
उत्तर

उत्तरम् — न। (नहीं।)

शुद्धं वाक्यम् — तत्-तत्-स्थानस्य एव कश्चित् पर-भागः, तत्-तत्-स्थानस्य पूर्व-भागं स्पृशति, समीपं वा याति। (उसी स्थान का कोई पर-भाग, उसी स्थान के पूर्व-भाग को छूता है या उसके पास जाता है।)

अभ्यासात् जायते सिद्धिः — पृष्ठ 156प्रश्नः ४ : मुखे उपलभ्यमानानि स्थानानि बहिष्ठात् अन्तः यथाक्रमं (अर्थात् विपरीत-क्रमेण) लिखन्तु

अभ्यासः
प्र.35मुखे उपलभ्यमानानि स्थानानि बहिष्ठात् अन्तः यथाक्रमं (अर्थात् विपरीत-क्रमेण) लिखन्तु —
(क) मूर्धा ……………
(ख) दन्तः ……………
(ग) तालु ……………
(घ) कण्ठः ……………
(ङ) ओष्ठः ……………
उत्तर

उत्तरम् — बहिष्ठात् अन्तः क्रमः इत्थम् अस्ति —

रिक्तस्थानम्स्थानम् (बहिः → अन्तः)कुत्र
(क)ओष्ठःसर्वबहिः — होंठ
(ख)दन्तःहोंठ के ठीक भीतर — दाँत
(ग)मूर्धादाँतों के पीछे उठा हुआ भाग
(घ)तालुतालु — मुँह की छत
(ङ)कण्ठःसर्वान्तः — गला

एकपङ्क्त्याम् — ओष्ठः → दन्तः → मूर्धा → तालु → कण्ठः। (अर्थात् दत्तानां स्थानानां क्रमाङ्काः — मूर्धा ३, दन्तः २, तालु ४, कण्ठः ५, ओष्ठः १।)

अभ्यासात् जायते सिद्धिः — पृष्ठ 156प्रश्नः ५ : यथायोग्यं मेलनं कुरुत — सामान्य-स्थानम् · विशेष-स्थानम् · सामान्य-करणम् · विशेष-करणम्

अभ्यासः
प्र.36यथायोग्यं मेलनं कुरुत —
सामान्य-स्थानम्विशेष-स्थानम्सामान्य-करणम्विशेष-करणम्
ओष्ठःमूर्धास्वस्थानं करणम्अधरोष्ठः
दन्तःनासिकामूलस्य उपरिभागःजिह्वा करणम्जिह्वाग्रः
नासिकातालुस्वस्थानं करणम्जिह्वामध्यः
कण्ठःउत्तरोष्ठःजिह्वा करणम्कण्ठस्य अग्रभागः
मूर्धादन्तःस्वस्थानं करणम्नासिकामूलस्य अधोभागः
तालुकण्ठस्य पृष्ठभागःजिह्वा करणम्जिह्वोपाग्रः
उत्तर

उत्तरम् — शुद्धं मेलनम् इत्थम् —

सामान्य-स्थानम्विशेष-स्थानम्सामान्य-करणम्विशेष-करणम्
ओष्ठःउत्तरोष्ठःस्वस्थानं करणम्अधरोष्ठः
दन्तःदन्तःजिह्वा करणम्जिह्वाग्रः
नासिकानासिकामूलस्य उपरिभागःस्वस्थानं करणम्नासिकामूलस्य अधोभागः
कण्ठःकण्ठस्य पृष्ठभागःस्वस्थानं करणम्कण्ठस्य अग्रभागः
मूर्धामूर्धाजिह्वा करणम्जिह्वोपाग्रः
तालुतालुजिह्वा करणम्जिह्वामध्यः

अत्र इदम् अवधेयम् — पृष्ठ 157अतिरिक्त अभ्यास (ये प्रश्न पुस्तक में नहीं हैं) — परिभाषा — ‘स्वरः’ तथा ‘व्यञ्जनम्’ इत्यनयोः परिभाषा-वाक्ये

परिभाषा
प्र.37‘स्वरः’ इत्यस्य परिभाषा-वाक्यं किम् ? तस्य अर्थं च लिखत।
उत्तर

परिभाषा-वाक्यम् — स्वयं राजन्ते इति स्वराः।

पुस्तकस्य अर्थः — ये वर्णाः (स्वयं) स्वतन्त्ररूपेण (राजन्ते) उच्चार्यन्ते, ते → स्वराः भवन्ति।

(हिन्दी — जो वर्ण अपने आप, स्वतन्त्र रूप से बोले जाते हैं, वे स्वर होते हैं।)

प्र.38‘व्यञ्जनम्’ इत्यस्य परिभाषा-वाक्यं किम् ? तस्य अर्थं च लिखत।
उत्तर

परिभाषा-वाक्यम् — अन्वग् भवति व्यञ्जनम्।

पुस्तकस्य अर्थः — उच्चारणार्थं यः वर्णः अचं (स्वरं) प्रति पराश्रितः भवति, सः वर्णः → ‘व्यञ्जनं’ भवति।

(हिन्दी — उच्चारण के लिए जो वर्ण स्वर पर आश्रित रहता है, वही वर्ण व्यञ्जन होता है।)

योग्यताविस्तरः — पृष्ठ 157अतिरिक्त अभ्यास (ये प्रश्न पुस्तक में नहीं हैं) — पाणिनीय-शिक्षा-सूत्राणि — करण-प्रकरणम् (सूत्राणि तथा तेषाम् अर्थाः)

योग्यताविस्तरः
प्र.39‘करण-प्रकरणम्’ किमर्थम् अत्र दीयते ? षष्ठ-कक्षायाः ‘स्थान-प्रकरणेन’ सह अस्य कः सम्बन्धः ?
उत्तर

पुस्तकस्य वाक्यम् — षष्ठ-कक्षायां ‘स्थान-प्रकरणस्य’ सूत्राणि दृष्टवन्तः। अधुना ‘करण-प्रकरणस्य’ सूत्राणि — (छठी कक्षा में हमने ‘स्थान-प्रकरण’ के सूत्र देखे थे; अब ‘करण-प्रकरण’ के सूत्र देखते हैं।)

सम्बन्धः — स्थानं करणं च — उभे वर्णोच्चारणस्य तत्त्वे। षष्ठ्यां कक्षायां स्थान-प्रकरणस्य सूत्राणि पठितानि, अस्मिन् पाठे करणस्य चर्चा अभवत्; अतः करणस्य शास्त्रीय-सूत्राणि (पाणिनीय-शिक्षायाः करण-प्रकरणम्) अत्र दीयन्ते। एतत् स्थान-प्रकरणस्य अग्रिमः भागः अस्ति। (स्थान और करण दोनों उच्चारण के तत्त्व हैं। कक्षा 6 में स्थान-प्रकरण पढ़ा, इस पाठ में करण समझा — इसलिए करण के शास्त्रीय सूत्र यहाँ दिए गए हैं। यह स्थान-प्रकरण का अगला भाग है।)

प्र.40सूत्रम् — ‘करणम् अपि।’ अस्य अर्थः कः ?
उत्तर

अर्थः (पुस्तकानुसारम्) — अधुना (वर्णोच्चारणस्य) ‘करणं’ जानीमः। (अब हम वर्णोच्चारण का ‘करण’ जानते हैं।)

प्र.41सूत्रम् — ‘तालव्य-मूर्धन्य-दन्त्यानां — जिह्वा करणम्।’ अस्य अर्थः कः ?
उत्तर

अर्थः (पुस्तकानुसारम्) — तालव्यानां मूर्धन्यानां दन्त्यानां च वर्णानाम् उच्चारणे → ‘जिह्वा’ करणं भवति। (तालव्य, मूर्धन्य और दन्त्य वर्णों के उच्चारण में करण जीभ होती है।)

प्र.42सूत्रम् — ‘जिह्वामध्येन — तालव्यानाम्।’ अस्य अर्थः कः ?
उत्तर

अर्थः (पुस्तकानुसारम्) — तालव्य-वर्णानाम् उच्चारणे → जिह्वायाः ‘मध्य-भागः’ करणं भवति। (तालव्य वर्णों के उच्चारण में जीभ का मध्य भाग करण होता है।)

प्र.43सूत्रम् — ‘जिह्वोपाग्रेण — मूर्धन्यानाम्।’ अस्य अर्थः कः ?
उत्तर

अर्थः (पुस्तकानुसारम्) — मूर्धन्य-वर्णानाम् उच्चारणे → जिह्वायाः ‘उपाग्र-भागः’ करणं भवति। (मूर्धन्य वर्णों के उच्चारण में जीभ का उपाग्र भाग करण होता है।)

प्र.44सूत्रम् — ‘जिह्वाग्रेण — दन्त्यानाम्।’ अस्य अर्थः कः ?
उत्तर

अर्थः (पुस्तकानुसारम्) — दन्त्य-वर्णानाम् उच्चारणे → जिह्वायाः ‘अग्र-भागः’ करणं भवति। (दन्त्य वर्णों के उच्चारण में जीभ का अग्र भाग — नोक — करण होता है।)

प्र.45सूत्रम् — ‘शेषाः — स्वस्थानकरणाः।’ अस्य अर्थः कः ? ‘शेषाः’ इति के ?
उत्तर

अर्थः (पुस्तकानुसारम्) — शेषाणां (कण्ठ्य-ओष्ठ्य-नासिक्यानां) वर्णानाम् उच्चारणे → ‘स्वस्थानं’ (स्वस्य स्थानस्य कश्चिद् भागविशेषः) एव → करणं भवति।

(शेष वर्णों के — अर्थात् कण्ठ्य, ओष्ठ्य तथा नासिक्य वर्णों के — उच्चारण में उनका अपना स्थान ही, ठीक-ठीक कहें तो उसी स्थान का कोई विशेष भाग, करण बन जाता है।)

प्र.46सूत्रम् — ‘इत्येतत् करणम्।’ अस्य अर्थः कः ?
उत्तर

अर्थः (पुस्तकानुसारम्) — अत्र पर्यन्तम् एतत् उच्चारणस्य ‘करणं’ चर्चितम्। (यहाँ तक उच्चारण के ‘करण’ की चर्चा हुई।)

आस्यस्य अभ्यन्तरे षट् स्थानानि, षट् करणानि च (वर्ण-चक्रम्) — पृष्ठ 158अतिरिक्त अभ्यास (ये प्रश्न पुस्तक में नहीं हैं) — पाठस्य अन्तिमं चित्रम् — षट्सु स्थानेषु उत्पद्यमानाः वर्णाः तथा तेषां करणानि

वर्ण-चक्रम्
प्र.47पृष्ठे 158 स्थितस्य वर्ण-चक्रस्य अनुसारं — कस्मिन् स्थाने के वर्णाः उत्पद्यन्ते तथा तत्र किं करणं भवति ?
(चित्र-परिचयः — पृष्ठ 158 पर सिर के पार्श्व-चित्र के ऊपर एक अर्ध-चक्र है। उसके ऊपरी खण्डों पर छह स्थानों के नाम हैं; बीच के रंगीन छल्लों में उन स्थानों के वर्ण हैं — बाहर से भीतर : समानाक्षराणि, सन्ध्यक्षराणि, स्पर्शाः, अन्तःस्थाः, ऊष्माणः, अयोगवाहौ; और नीचे के अर्ध-वृत्त में ‘षट् करणानि’ दिखाए गए हैं।)
उत्तर

पुस्तक का अन्तिम चित्र ‘आस्यस्य अभ्यन्तरे षट् स्थानानि, षट् करणानि च’ पूरे पाठ को एक ही चक्र में समेट देता है। बाहरी अर्ध-वृत्त में षट् स्थानानि हैं, भीतरी अर्ध-वृत्त में षट् करणानि, और बीच के छल्लों में उन स्थानों से निकलने वाले वर्ण।

स्थानम्वर्ग-नामतत्र उत्पद्यमानाः वर्णाः (चक्रानुसारम्)करणम्
१. कण्ठःकण्ठ्याःअ आ अ३ · क् ख् ग् घ् ङ् · ह् · विसर्गः ःस्व-स्थानं करणम् (कण्ठस्य अग्रभागः)
२. तालुतालव्याःइ ई इ३ · च् छ् ज् झ् ञ् · य् · श्जिह्वा-मध्यः
३. मूर्धामूर्धन्याःऋ ॠ ऋ३ · ट् ठ् ड् ढ् ण् · र् · ष्जिह्वा-उपाग्रः
४. दन्तःदन्त्याःऌ ऌ३ · त् थ् द् ध् न् · ल् · स्जिह्वा-अग्रः
५. ओष्ठःओष्ठ्याःउ ऊ उ३ · प् फ् ब् भ् म् · व् (दन्त्योष्ठ्यः)स्व-स्थानं करणम् (अधरोष्ठः)
६. नासिकानासिक्याःङ् ञ् ण् न् म् · अनुस्वारः ंस्व-स्थानं करणम् (नासिकामूलस्य अधोभागः)

चक्रे ए ए३ ऐ ऐ३ कण्ठे तालौ च, ओ ओ३ औ औ३ कण्ठे ओष्ठे च, व दन्ते ओष्ठे च — उभयत्र दर्शिताः (एते द्वि-स्थानीयाः वर्णाः — प्रश्नः 48)।

प्र.48कण्ठ-तालव्यः, कण्ठौष्ठ्यः, दन्त्योष्ठ्यः — एते के वर्णाः ? एतेषां स्थानं कति ?
उत्तर

उत्तरम् — एते ते वर्णाः, येषाम् उच्चारणे एकं न, अपितु द्वे स्थाने कार्यं कुरुतः। (ये वे वर्ण हैं जिनके उच्चारण में एक नहीं, बल्कि दो स्थान काम करते हैं।) पारिभाषिक-शब्दार्थ-सारणी में पुस्तक इन तीनों को अलग से गिनाती है —

पारिभाषिकः शब्दःअर्थः (पुस्तकानुसारम्)वर्णाःEnglish
कण्ठ-तालव्यःकण्ठ-तालु-स्थानयोः उत्पन्नः वर्णःए ए३, ऐ ऐ३Velar-palatal / Palato-velar
कण्ठौष्ठ्यःकण्ठ-ओष्ठ-स्थानयोः उत्पन्नः वर्णःओ ओ३, औ औ३Velar-labial / Labio-velar
दन्त्योष्ठ्यःदन्त-ओष्ठ-स्थानयोः उत्पन्नः वर्णःव्Dento-labial / Labio-dental

Chapter 13 of 13 – Sanskrit

Also for This Chapter

NCERT Solutions Class 8 Sanskrit Chapter 13 वर्णोच्चारण-शिक्षा १ – Overview

ClassClass 8
SubjectSanskrit
Chapter13 – वर्णोच्चारण-शिक्षा १
Session2027
FormatFull answers on this page + PDF

NCERT Solutions Class 8 Sanskrit Chapter 13 – FAQs

Where can I download NCERT Solutions Class 8 Sanskrit Chapter 13 वर्णोच्चारण-शिक्षा १ PDF?

Read every answer on this page, or download the free PDF from the table at the top.

Is this for the 2027 session?

Yes, it follows the latest NCERT Class 8 Sanskrit book for 2027.

How many questions are solved in NCERT Class 8 Sanskrit Chapter 13?

All questions of the chapter – the in-text questions, activities and the end-of-chapter exercises.

How should I use these solutions?

Read the chapter in the NCERT book first, attempt the questions yourself, then check your answers here.

Official website: ncert.nic.inNational Council of Educational Research and Training publishes date sheets, admit cards and results here
Visit

Ask a question

?

Loading comments…