NCERT Solutions for Class 8 Sanskrit Chapter 13 वर्णोच्चारण-शिक्षा १ – step-by-step answers to every exercise and in-text question of the chapter, as per the latest NCERT syllabus for 2027. Read them online or download the free question-answer PDF.
दीपकम् (कक्षा 8) का त्रयोदशः पाठः — वर्णोच्चारण-शिक्षा १। यह पुस्तक का अन्तिम पाठ है और शिक्षा (वेदाङ्ग) का व्यावहारिक भाग — इसमें बताया गया है कि मुँह के भीतर वर्ण बनता कैसे है। नाभि-प्रदेश → उरः → कण्ठ-बिलः → आस्यम् — इन चार अङ्गों से चलकर वायु आस्य में पहुँचती है और वहाँ षट् स्थानानि — कण्ठः, तालु, मूर्धा, दन्तः, ओष्ठः, नासिका में वर्ण-रूप में प्रकट होती है। पाठ स्थानम् (जहाँ वर्ण बनता है) और करणम् (जो अङ्ग उसे छूता है) — इन दो तत्त्वों की चर्चा करता है; तीसरा तत्त्व आभ्यन्तर-प्रयत्नः अगली कक्षा के लिए छोड़ा गया है। नीचे पृष्ठ 146 से 158 तक का पूरा पाठ, मुरली का दृष्टान्त, पारिभाषिक-शब्दार्थान् जानीमः तथा वयं शब्दार्थान् जानीमः की पूरी सारणियाँ, अभ्यासात् जायते सिद्धिः के प्रश्न १–५ का प्रत्येक उपभाग, अत्र इदम् अवधेयम् (स्वर तथा व्यञ्जन की परिभाषा), योग्यताविस्तरः के पाणिनीय-शिक्षा-सूत्र (करण-प्रकरणम्) तथा पृष्ठ 158 का षट् स्थानानि–षट् करणानि वर्ण-चक्र क्रमशः हल किए गए हैं — पहले संस्कृत उत्तर, फिर कोष्ठक में हिन्दी अर्थ।
NCERT Solutions for Class 8 Sanskrit Chapter 13 वर्णोच्चारण-शिक्षा १ PDF
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|---|---|---|
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पाठ का हिंदी अनुवाद
पाठ-प्रवेशः (पृष्ठ 146)
वाणी के उत्पन्न होने में शरीर के चार अङ्ग
मांसपेशी-बल–तन्त्रम् – (Muscular-pressure System)
वायु-बल–तन्त्रम् – (Air-pressure System)
ध्वनि–तन्त्रम् – (Phonatory & Resonatory System)
उच्चारण–तन्त्रम् – (Articulatory System)
(ख) नासिका – (Nose / Nasal cavity) – च उभौ भवतः।
वायु का मार्ग — उच्चारण की प्रक्रिया
चित्रम् — मनुष्येषु वाग्-उत्पत्ति-प्रक्रिया (Voice Production Mechanism in Humans) — पृष्ठ 147
मुखम् (Mouth / Oral cavity)
जिह्वा (Tongue)
गल-बिलः (Lower Pharynx)
कण्ठ-बिलः (Larynx/Vocal-cords)
मुख – मुँह (का भीतरी खोखला भाग)
जिह्वा – जीभ
गल-बिल – गले का निचला भाग (अधो-ग्रसनी)
कण्ठ-बिल – स्वर-यन्त्र / स्वरतन्त्रियाँ
श्वासकोशः (Lungs)
पार्श्वास्थि-पञ्जरम् (Rib-cage)
उरःप्राचीरम् (Diaphragm)
श्वासकोश – फेफड़े
पार्श्वास्थि-पञ्जर – पसलियों का ढाँचा
उरःप्राचीर – छाती और पेट के बीच की पेशी-परत
नाभिः (Navel)
नाभि – नाभि (पेट के बीच का छोटा गड्ढा)
वर्णों की उत्पत्ति के तीन तत्त्व
(क) प्रथमम् – स्थानम्
(ख) द्वितीयम् – करणम्
(ग) तृतीयम् – आभ्यन्तर-प्रयत्नः
(क) पहला – स्थान
(ख) दूसरा – करण
(ग) तीसरा – आभ्यन्तर-प्रयत्न (मुख के भीतर किया जाने वाला प्रयत्न)
(क) स्थानम् — पृष्ठ 148–149
नासिकायां – नासिका – इत्येव षष्ठं स्थानम्।
मुखे – कण्ठः, तालु, मूर्धा, दन्तः, ओष्ठः च – इति पञ्च स्थानानि।
नासिका में — नासिका — यही छठा स्थान है।
मुख में — कण्ठ, तालु, मूर्धा, दन्त और ओष्ठ — ये पाँच स्थान हैं।
१. कण्ठः
२. तालु
३. मूर्धा
४. दन्तः
५. ओष्ठः
६. नासिका
१. कण्ठ (गला)
२. तालु (मुँह के भीतर ऊपर का कठोर भाग)
३. मूर्धा (दाँतों के पीछे तालु का उठा हुआ भाग)
४. दन्त (दाँत)
५. ओष्ठ (होंठ)
६. नासिका (नाक)
(ख) करणम् — पृष्ठ 150–151
तालु – स्थानम्
जिह्वा – करणम्
[जिह्वा-मध्यः]
मूर्धा – स्थानम्
जिह्वा – करणम्
[जिह्वा-उपाग्रः]
दन्तः – स्थानम्
जिह्वा – करणम्
[जिह्वा-अग्रः]
[कण्ठस्य पृष्ठ-भागः]
कण्ठः – स्थानम्
कण्ठः – करणम्
[कण्ठस्य अग्र-भागः]
[उत्तरोष्ठः]
ओष्ठः – स्थानम्
ओष्ठः – करणम्
[अधरोष्ठः]
[नासिका-मूलस्य उपरि-भागः]
नासिका – स्थानम्
नासिका – करणम्
[नासिका-मूलस्य अधो-भागः]
अत्र इदम् अवधेयम् — पृष्ठ 157
‘स्वरः’ इत्यस्य परिभाषा-वाक्यम् —
स्वयं राजन्ते इति स्वराः।
‘स्वर’ का परिभाषा-वाक्य —
जो स्वयं (स्वतन्त्र रूप से) उच्चारित होते हैं, वे स्वर हैं।
अन्वग् भवति व्यञ्जनम्।
व्यञ्जन (स्वर के) पीछे-पीछे चलने वाला (उस पर आश्रित) होता है।
योग्यताविस्तरः — पाणिनीय-शिक्षा-सूत्राणि (करण-प्रकरणम्) — पृष्ठ 157
अधुना (वर्णोच्चारणस्य) ‘करणं’ जानीमः।
अर्थ — अब हम (वर्णों के उच्चारण का) ‘करण’ जानते हैं।
तालव्यानां मूर्धन्यानां दन्त्यानां च वर्णानाम् उच्चारणे → ‘जिह्वा’ करणं भवति।
अर्थ — तालव्य, मूर्धन्य और दन्त्य वर्णों के उच्चारण में ‘जीभ’ करण होती है।
तालव्य-वर्णानाम् उच्चारणे → जिह्वायाः ‘मध्य-भागः’ करणं भवति।
अर्थ — तालव्य वर्णों के उच्चारण में जीभ का ‘मध्य भाग’ करण होता है।
मूर्धन्य-वर्णानाम् उच्चारणे → जिह्वायाः ‘उपाग्र-भागः’ करणं भवति।
अर्थ — मूर्धन्य वर्णों के उच्चारण में जीभ का ‘उपाग्र भाग’ (अग्र भाग से थोड़ा पहले का भाग) करण होता है।
दन्त्य-वर्णानाम् उच्चारणे → जिह्वायाः ‘अग्र-भागः’ करणं भवति।
अर्थ — दन्त्य वर्णों के उच्चारण में जीभ का ‘अग्र भाग’ करण होता है।
शेषाणां (कण्ठ्य-ओष्ठ्य-नासिक्यानां) वर्णानाम् उच्चारणे → ‘स्वस्थानं’ (स्वस्य स्थानस्य कश्चिद् भागविशेषः) एव → करणं भवति।
अर्थ — शेष (कण्ठ्य, ओष्ठ्य और नासिक्य) वर्णों के उच्चारण में ‘स्वस्थान’ (अपने ही स्थान का कोई विशेष भाग) ही करण होता है।
अत्र पर्यन्तम् एतत् उच्चारणस्य ‘करणं’ चर्चितम्।
अर्थ — यहाँ तक उच्चारण के इस ‘करण’ की चर्चा की गई।
NCERT Solutions for Class 8 Sanskrit Chapter 13 वर्णोच्चारण-शिक्षा १ – Questions and Answers
All questions of the chapter are answered below, in the order of the book – in-text questions, activities and the end-of-chapter exercises. Each answer is written the way you would write it in the exam.
पाठः — मनुष्येषु वाग्-उत्पत्ति-प्रक्रिया (पाठे विद्यमानः प्रश्नः) — पृष्ठ 146–147अतिरिक्त अभ्यास (प्र.3 पाठ का अपना प्रश्न है; शेष प्रश्न पुस्तक में नहीं हैं) — वर्णोच्चारणे शरीरस्य चत्वारि अङ्गानि, वायोः मार्गः तथा त्रीणि तत्त्वानि
उत्तरम् — वर्णानाम् उच्चारणे केवलम् आस्यस्य एव उपयोगः न भवति; आस्येन सह शरीरस्य चत्वारि अङ्गानि उपयुज्यन्ते। (वर्णों के उच्चारण में केवल मुख का ही उपयोग नहीं होता; मुख के साथ शरीर के चार अङ्ग काम करते हैं।)
| क्रमः | अङ्गम् (संस्कृतम्) | तन्त्रम् | हिन्दी में | English |
|---|---|---|---|---|
| १. | नाभि-प्रदेशः | मांसपेशी-बल-तन्त्रम् | नाभि-भाग की मांसपेशियाँ — पेशी-दाब तन्त्र | Navel-region — Abdominal Muscles (Muscular-pressure System) |
| २. | उरः | वायु-बल-तन्त्रम् | छाती — फेफड़े और उरःप्राचीर (डायाफ्राम) — वायु-दाब तन्त्र | Chest — Lungs & Diaphragm (Air-pressure System) |
| ३. | कण्ठ-बिलः | ध्वनि-तन्त्रम् | स्वर-यन्त्र / स्वरतन्त्रियाँ — ध्वनि तन्त्र | Voice-box — Larynx / Vocal-cords (Phonatory & Resonatory System) |
| ४. | आस्यम् | उच्चारण-तन्त्रम् | मस्तक — मुख और नाक — उच्चारण तन्त्र | Head — Mouth & Nose (Articulatory System) |
उत्तरम् — चत्वारि सोपानानि भवन्ति —
- सर्वप्रथमं नाभि-प्रदेशे स्थिताः मांसपेश्यः उरः नोदयन्ति। (सबसे पहले नाभि-भाग की मांसपेशियाँ छाती को दबाती हैं।)
- उरः पुनः श्वासकोश-स्थितं वायुम् ऊर्ध्वं निःसारयति। (फिर छाती फेफड़ों में भरी वायु को ऊपर की ओर बाहर निकालती है।)
- सः वायुः ऊर्ध्वं सरन् कण्ठ-बिलं प्राप्नोति। (वह वायु ऊपर चलती हुई कण्ठ-बिल — स्वर-यन्त्र — तक पहुँचती है।)
- ततः, सः वायुः पुनः ऊर्ध्वं सरन् आस्यं प्रविशति। (उसके बाद वह वायु फिर ऊपर चलकर आस्य में प्रवेश करती है।)
आस्य में प्रवेश करने के बाद — मुखे, नासिकायां च स्थितेषु षट्सु उच्चारण-स्थानेषु वर्णानुसारं स्वकीयं स्थानं प्राप्य, सः वायुः तस्मिन् स्थाने वर्ण-रूपेण प्रकटीभवति। (मुख और नाक में स्थित छह उच्चारण-स्थानों में से वर्ण के अनुसार अपना स्थान पाकर वही वायु उस स्थान पर वर्ण के रूप में प्रकट होती है।)
उत्तरम् — आस्यस्य अभ्यन्तरं प्रविश्य सः वायुः वर्णानुसारं स्वकीयं स्थानं प्राप्नोति। तत्र करणम् (जिह्वा, स्व-स्थानं वा) तत् स्थानं स्पृशति, समीपं वा याति। एवं स्थानस्य, करणस्य, आभ्यन्तर-प्रयत्नस्य च योगेन सः वायुः तस्मिन् स्थाने वर्णरूपेण प्रकटीभवति। (आस्य में प्रवेश करके वह वायु वर्ण के अनुसार अपना स्थान पाती है। वहाँ करण — जीभ या उसी स्थान का कोई भाग — उस स्थान को छूता है या उसके पास जाता है। इस प्रकार स्थान, करण और आभ्यन्तर-प्रयत्न — इन तीन तत्त्वों के मेल से वायु उस स्थान पर वर्ण के रूप में प्रकट होती है।)
उत्तरम् — त्रीणि तत्त्वानि आवश्यकानि भवन्ति — (क) प्रथमम् — स्थानम्, (ख) द्वितीयम् — करणम्, (ग) तृतीयम् — आभ्यन्तर-प्रयत्नः। (तीन तत्त्व आवश्यक हैं — पहला स्थान, दूसरा करण, तीसरा आभ्यन्तर-प्रयत्न।)
पुस्तक स्वयं कहती है — ‘अस्मिन् पाठे स्थानस्य, करणस्य च चर्चां कुर्मः। आभ्यन्तर-प्रयत्नस्य विषये अग्रिमायां कक्षायां ज्ञास्यामः।’ (इस पाठ में हम ‘स्थान’ और ‘करण’ की ही चर्चा करेंगे; ‘आभ्यन्तर-प्रयत्न’ के विषय में अगली कक्षा में जानेंगे।)
(क) स्थानम् — पृष्ठ 148–149अतिरिक्त अभ्यास (ये प्रश्न पुस्तक में नहीं हैं) — ‘स्थानम्’ इत्यस्य परिभाषा, आस्ये षट् उच्चारण-स्थानानि तथा मुरली-दृष्टान्तः
उत्तरम् (पुस्तकस्य वाक्यम्) — वर्णस्य उच्चारण-समये, श्वासकोशतः ऊर्ध्वं सरन् वायुः, कण्ठ-बिल-माध्यमेन आस्यस्य अभ्यन्तरं प्रविश्य, तत्र मुखे नासिकायां वा यस्मिन् स्थले वर्णरूपेण प्रकटीभवति, तत् — ‘स्थानम्’ इति उच्यते।
(हिन्दी अर्थ — वर्ण के उच्चारण के समय फेफड़ों से ऊपर चलती हुई वायु, कण्ठ-बिल के रास्ते आस्य के भीतर प्रवेश करके, वहाँ मुख में या नाक में जिस स्थल पर वर्ण के रूप में प्रकट होती है, वही ‘स्थान’ कहलाता है।)
(चित्र-परिचयः — पृष्ठ 148 के चित्र ‘आस्ये वर्णानां षट् उच्चारण-स्थानानि’ में सिर का भीतरी पार्श्व-चित्र है; उस पर छह स्थान १ से ६ क्रमाङ्कों सहित रेखाओं द्वारा चिह्नित हैं — पाँच मुख के भीतर और एक नासिका में।)
उत्तरम् — आस्ये षट् स्थानानि सन्ति — मुखे पञ्च, नासिकायाम् एकम्। (आस्य में छह स्थान हैं — मुख में पाँच और नाक में एक।)
- मुखे — कण्ठः, तालु, मूर्धा, दन्तः, ओष्ठः — इति पञ्च स्थानानि।
- नासिकायाम् — नासिका — इत्येव षष्ठं स्थानम्।
पृष्ठ 148 का चित्र ‘आस्ये वर्णानां षट् उच्चारण-स्थानानि’ इन्हें इसी क्रम में अङ्कित करता है —
| चित्रे अङ्कः | स्थानम् | कुत्र | हिन्दी | English |
|---|---|---|---|---|
| १. | कण्ठः | मुखे (सर्वान्तः) | गला / कण्ठ-स्थान | Throat / Glottis / Soft Palate |
| २. | तालु | मुखे | तालु-स्थान | Hard Palate |
| ३. | मूर्धा | मुखे | मूर्धा-स्थान | Alveolar Ridge |
| ४. | दन्तः | मुखे | दाँत / दन्त-स्थान | (Base of) Tooth |
| ५. | ओष्ठः | मुखे (सर्वबहिः) | होंठ / ओष्ठ-स्थान | Lip |
| ६. | नासिका | नासिकायाम् | नाक / नासिका-स्थान | Nose / Nasal cavity |
उत्तरम् (पुस्तकस्य वाक्यम्) — स्थानस्य सम्यक् कार्य-निदर्शनार्थं ‘मुरली’ समुचितम् उदाहरणम् अस्ति। मुरल्याः ‘अङ्गुलिच्छिद्राणि’ आस्यस्य ‘स्थानानि’ इव व्यवहरन्ति। मुरली-नलिकया आगच्छन् वायुः अङ्गुलिच्छिद्रेषु एव विविध-ध्वनि-रूपेण प्रकटीभवति।
(हिन्दी अर्थ — ‘स्थान’ का काम अच्छी तरह दिखाने के लिए बाँसुरी उपयुक्त उदाहरण है। बाँसुरी के छिद्र आस्य के स्थानों की तरह काम करते हैं। बाँसुरी की नली से आती हुई हवा उन्हीं छिद्रों पर तरह-तरह की ध्वनि के रूप में प्रकट होती है।)
| मुरल्याम् | आस्ये | क्या समझाता है |
|---|---|---|
| मुरली-नलिकया आगच्छन् वायुः | श्वासकोशात् ऊर्ध्वं सरन् वायुः | दोनों में मूल कारण एक ही है — वायु |
| अङ्गुलिच्छिद्राणि | स्थानानि (कण्ठ, तालु, मूर्धा, दन्त, ओष्ठ, नासिका) | जहाँ ध्वनि/वर्ण प्रकट होता है |
| अङ्गुलयः (मुरलीं वादयन्त्यः) | करणानि (जिह्वा, स्व-स्थानम्) | जो छूता है या पास जाता है (पृष्ठ 150–151) |
(ख) करणम् — पृष्ठ 150–151अतिरिक्त अभ्यास (ये प्रश्न पुस्तक में नहीं हैं) — ‘करणम्’ इत्यस्य परिभाषा, जिह्वा-करणम् (तालव्य-मूर्धन्य-दन्त्य) तथा स्व-स्थानं करणम् (कण्ठ्य-ओष्ठ्य-नासिक्य)
उत्तरम् (पुस्तकस्य वाक्यम्) — वर्णस्य उच्चारण-समये, आस्यस्य यः भागः स्थानं स्पृशति, स्थानस्य समीपं वा याति, सः भागः — ‘करणम्’ इति कथ्यते।
(हिन्दी अर्थ — वर्ण के उच्चारण के समय आस्य का जो भाग स्थान को छूता है या स्थान के पास तक जाता है, वही भाग ‘करण’ कहलाता है।)
मुरली-निदर्शने — मुरलीं वादयन्त्यः ‘अङ्गुलयः’ — आस्यस्य करणानि इव व्यवहरन्ति। अङ्गुलयः यदा अङ्गुलिच्छिद्राणि विविधरूपेण स्पृशन्ति, तेषां समीपं वा यान्ति; तदा तेषु अङ्गुलिच्छिद्रेषु विविध-ध्वनयः प्रकटीभवन्ति। (बाँसुरी बजाती हुई अङ्गुलियाँ आस्य के करणों की तरह काम करती हैं। अङ्गुलियाँ जब छिद्रों को भाँति-भाँति से छूती हैं या उनके पास जाती हैं, तब उन छिद्रों पर अलग-अलग ध्वनियाँ प्रकट होती हैं।)
उत्तरम् (पुस्तकस्य पेटिका-वाक्यम्) — तालु, मूर्धा, दन्तः च — एतेषु त्रिषु स्थानेषु → ‘जिह्वा’ करणं भवति। (तालु, मूर्धा और दन्त — इन तीनों स्थानों में करण जीभ होती है।)
पुस्तक विस्तार से कहती है — तालव्यानां, मूर्धन्यानां, दन्त्यानां च वर्णानाम् उच्चारणार्थं → जिह्वा — यथाक्रमं तालु, मूर्धानं, दन्तं च स्थानं स्पृशति, समीपं वा याति, येन यथाक्रमं तत्-तद्-वर्णानाम् उत्पत्तिः भवति। अतः एतेषां त्रिविधानां वर्णानाम् उच्चारणार्थं → जिह्वा — ‘करणम्’, अर्थात् ‘उपकरणं’ भवति।
किन्तु प्रत्येक वर्ग में जीभ का अलग-अलग भाग काम करता है — यही विशेष-करणम् है —
| वर्णाः | स्थानम् | सामान्य-करणम् | विशेष-करणम् (जिह्वायाः भागः) | पाणिनीय-सूत्रम् |
|---|---|---|---|---|
| तालव्याः वर्णाः | तालु | जिह्वा | जिह्वा-मध्यः (जीभ का मध्य भाग) | जिह्वामध्येन – तालव्यानाम्। |
| मूर्धन्याः वर्णाः | मूर्धा | जिह्वा | जिह्वा-उपाग्रः (जीभ के अग्र भाग से थोड़ा पहले का भाग) | जिह्वोपाग्रेण – मूर्धन्यानाम्। |
| दन्त्याः वर्णाः | दन्तः | जिह्वा | जिह्वा-अग्रः (जीभ का अग्र भाग / नोक) | जिह्वाग्रेण – दन्त्यानाम्। |
उत्तरम् (पुस्तकस्य पेटिका-वाक्यम्) — कण्ठः, ओष्ठः, नासिका च — एतेषु त्रिषु स्थानेषु → ‘स्व-स्थानम्’ एव करणं भवति। (कण्ठ, ओष्ठ और नासिका — इन तीनों स्थानों में करण वही स्थान स्वयं होता है।)
पुस्तक का विस्तार — कण्ठ्यानाम्, ओष्ठ्यानाम्, नासिक्यानां च वर्णानाम् उच्चारणे जिह्वा प्रायः निष्क्रिया भवति। एतेषां वर्णानाम् उच्चारणार्थं → तत्-तत्-स्थानस्य एव कश्चित् पर-भागः, तत्-तत्-स्थानस्य पूर्व-भागं स्पृशति, समीपं वा याति। अतः एतेषां त्रिविधानां वर्णानाम् उच्चारणार्थं → स्व-स्थानं — ‘करणम्’, अर्थात् ‘उपकरणं’ भवति।
(हिन्दी अर्थ — कण्ठ्य, ओष्ठ्य और नासिक्य वर्णों के उच्चारण में जीभ प्रायः निष्क्रिय रहती है। इनके लिए उसी स्थान का कोई पर-भाग उसी स्थान के पूर्व-भाग को छूता है या उसके पास जाता है। इसीलिए इनमें ‘स्व-स्थान’ ही करण बन जाता है।)
| वर्णाः | विशेष-स्थानम् (जिसे छुआ जाता है) | विशेष-करणम् (जो छूता है) |
|---|---|---|
| कण्ठ्याः वर्णाः | कण्ठस्य पृष्ठ-भागः | कण्ठस्य अग्र-भागः |
| ओष्ठ्याः वर्णाः | उत्तरोष्ठः (ऊपर का होंठ) | अधरोष्ठः (नीचे का होंठ) |
| नासिक्याः वर्णाः | नासिका-मूलस्य उपरि-भागः | नासिका-मूलस्य अधो-भागः |
पारिभाषिक-शब्दार्थान् जानीमः — पृष्ठ 152–154अतिरिक्त अभ्यास (ये प्रश्न पुस्तक में नहीं हैं) — शिक्षा-शास्त्र की पूरी पारिभाषिक शब्दावली — शब्दः · अर्थः · हिन्दी · English
पुस्तक की सारणी ज्यों-की-त्यों —
| शब्दः | अर्थः | हिन्दी | English |
|---|---|---|---|
| शिक्षा | वर्णोच्चारण-शास्त्रम् | वर्णों के शुद्ध उच्चारण का विधान एवं विज्ञान | Phonetics (& Phonology) |
| उच्चारणम् | कथनम् / वाङ्-निष्पत्तिः | कथन | Articulation (Speech) / Pronunciation |
| ध्वनिः | ध्वानः | ध्वनि | Sound / Phonation / Resonation |
| शब्दः | पदम् | शब्द | Word |
| वाक्यम् | वचः / परस्परान्वित-पद-समूहः | वाक्य | Sentence |
| वाक् | वाणी / गीः | वाणी | Speech / Spoken words |
| वर्णः | शब्दस्य अवयवभूतः लघुतमः ध्वनिः | वर्ण | Letter / Phoneme / Grapheme |
| आस्यम् | शिरः / मस्तकम् | मस्तक | Head |
| मुखम् | वक्त्रम् / वदनम् | मुँह | Mouth / Oral cavity |
| नासिका | नासा | नाक / नासिका-स्थान | Nose / Nasal cavity |
| कण्ठ-बिलम् | स्वरयन्त्रम् / ध्वनियन्त्रम् / कण्ठ-कूपः / कुहरम् | स्वरतन्त्री / घोषतन्त्री | Voice-box / Larynx [Vocal-cords] |
| गल-बिलम् | अधो-ग्रसनी | अधो-ग्रसनी | Lower Pharynx / Hypopharynx / Laryngopharynx |
| उरः | वक्षः | छाती | Chest |
| श्वासकोशः | फुप्फुसः | फेफड़े | Lungs |
| नाभि-प्रदेशः | तुन्दकूपी-क्षेत्रः | नाभि-भाग | Navel-region / Abdominal Muscles |
| मांसपेश्यः | स्नायवः | स्नायु | Muscles |
| बलम् | प्रणोदः / अभिपीडनम् | दबाव | Pressure |
| तन्त्रम् | प्रणाली | प्रणाली | (Anatomy) System / System (of Human Body) |
| शब्दः | अर्थः | हिन्दी | English |
|---|---|---|---|
| वर्णमाला | वर्णानां क्रम-पूर्वक-व्यवस्था | वर्णों की क्रम-पूर्वक व्यवस्था | Alphabet / Sequence of Letters |
| स्वरः | अच् / अच्-वर्णः | स्वर (स्वतन्त्र-वर्ण) | Vowel [V] |
| अक्षरम् | स्वरः, एक-स्वर-केन्द्रित-वर्ण-समूहः वा | स्वर या एक-स्वर-केन्द्रित-वर्ण-समूह | Syllable / A Single Vowel or group of letters comprising a single Vowel |
| समानाक्षरम् | सिम् | सामान्य-स्वर | Simple-Vowel / Monophthong [V] |
| सन्ध्यक्षरम् | सन्धि-स्वरः | सन्धि-स्वर | Compound-Vowel / Diphthong [V] |
| व्यञ्जनम् | हल्, हल्-वर्णः | व्यञ्जन | Consonant [C] |
| स्पर्शः | वर्गीय-वर्णः | स्पर्श-वर्ण | Stop / Plosive [C], (Touch) |
| वर्गीयः | स्पर्श-वर्णः | वर्गीय-वर्ण | Class-Consonants / Grouped [C] |
| अन्तःस्थः | वर्णमालायां स्पर्शानाम् ऊष्मणां च मध्ये स्थितः व्यञ्जन-वर्णः | वर्णमाला में स्पर्श एवं ऊष्मा वर्णों के मध्य स्थित व्यञ्जन-वर्ण | Glide (Situated In-between) |
| अर्ध-स्वरः | स्वरस्य किञ्चिद्-गुण-सदृशः व्यञ्जन-वर्णः | स्वर के समान कुछ गुण वाले व्यञ्जन-वर्ण | Semivowel / Semiconsonant [C] |
| ऊष्मा | संघर्षी / वायुप्रधानम् | वाष्प / भाप निःसृत करने वाले संघर्षी वर्ण | Fricative [C]; Sibilant (श, ष, स); Aspirate (ह) |
| अयोगवाहः | संयोगवाहः / प्रत्याहार-सूत्रेभ्यः बहिर्भूतः विशिष्टः व्यञ्जन-वर्णः | माहेश्वर-सूत्रों में अपठित विशिष्ट व्यञ्जन-वर्ण | After-sound [C] (Special Consonant that is not enumerated in Śiva-sūtras) |
| अनुस्वारः | स्वरानुगः | बिन्दु / स्वर के बाद उच्चारित शुद्ध नासिक्य व्यञ्जन वर्ण [ ं ] | Nasalised Resonant sound uttered after a Vowel [C] (Following the vowel) |
| विसर्गः | विसर्जनीयः | विसर्ग [ ः ] | Released “h” like sound (ḥ) [C] (To send out / To release) |
| अनुनासिकः | स्वस्थानेन सह नासिकया अपि उच्चारितः वर्णः | चन्द्र-बिन्दु [ ँ ] | Nasalised Letter |
| सानुनासिकः | अनुनासिक-गुण-सहितः | अनुनासिक गुण के सहित | Letter with Nasalisation |
| निरनुनासिकः | अनुनासिक-गुण-रहितः | अनुनासिक गुण के रहित | Letter without Nasalisation |
| संयुक्त-व्यञ्जनानि | संयोगः | स्वर-रहित व्यञ्जनों का समूह | Conjunct Consonants [C] |
पुस्तक इस खण्ड का शीर्षक-वाक्य देती है — स्थानम् = आस्ये उच्चारणस्य स्थलम् (मस्तक में उच्चारण का ‘स्थल’) — ‘Place’ of Articulation (in the head)।
| शब्दः | अर्थः | हिन्दी | English |
|---|---|---|---|
| कण्ठः | गलः (जिह्वामूलः) | गला / कण्ठ-स्थान | Throat / Glottis / Soft Palate / Velum (Uvula, Upper-Pharynx / Oropharynx) |
| कण्ठ्यः | कण्ठ-स्थानोत्पन्नः वर्णः | कण्ठ-स्थान में उत्पन्न वर्ण | Guttural / Velar (Letter) (Uvular, Pharyngeal) |
| तालु | तालुकम् / काकुदम् | तालु-स्थान | Hard Palate |
| तालव्यः | तालु-स्थानोत्पन्नः वर्णः | तालु-स्थान में उत्पन्न वर्ण | Palatal (Letter) |
| मूर्धा | मूर्द्ध्वा / मूर्द्धा | मूर्धा-स्थान | Alveolar Ridge |
| मूर्धन्यः | मूर्ध-स्थानोत्पन्नः वर्णः | मूर्धा-स्थान में उत्पन्न वर्ण | Retroflex / Alveolar / Cerebral |
| दन्तः | रदनः / दशनः | दाँत / दन्त-स्थान | (Base of) Tooth |
| दन्त्यः | दन्त-स्थानोत्पन्नः वर्णः | दन्त-स्थान में उत्पन्न वर्ण | Dental (Letter) |
| ओष्ठः | दन्तवासः / दशनवासः | होंठ / ओष्ठ-स्थान | Lip |
| ओष्ठ्यः | ओष्ठ-स्थानोत्पन्नः वर्णः | ओष्ठ-स्थान में उत्पन्न वर्ण | Labial / Bilabial (Letter) |
| नासिक्यः | नासा-स्थानोत्पन्नः वर्णः | नासिका-स्थान में उत्पन्न वर्ण | Nasal (Letter) |
| कण्ठ-तालव्यः | कण्ठ-तालु-स्थानयोः उत्पन्नः वर्णः | कण्ठ एवं तालु स्थानों में उत्पन्न वर्ण | Velar-palatal / Palato-velar |
| कण्ठौष्ठ्यः | कण्ठ-ओष्ठ-स्थानयोः उत्पन्नः वर्णः | कण्ठ एवं ओष्ठ स्थानों में उत्पन्न वर्ण | Velar-labial / Labio-velar |
| दन्त्योष्ठ्यः | दन्त-ओष्ठ-स्थानयोः उत्पन्नः वर्णः | दन्त एवं ओष्ठ स्थानों में उत्पन्न वर्ण | Dento-labial / Labio-dental |
पुस्तक इस खण्ड का शीर्षक-वाक्य देती है — करणम् = आस्ये उच्चारणस्य उपकरणम् (मस्तक में उच्चारण का ‘उपकरण’ या ‘यन्त्र’) — ‘Tool’ of Articulation (in the Head)।
| शब्दः | अर्थः | हिन्दी | English |
|---|---|---|---|
| उपकरणम् | यन्त्रम् | साधन | Tool |
| जिह्वा | रसना | जीभ | Tongue |
| जिह्वा-मध्यः | जिह्वायाः मध्यभागः | जीभ का मध्य भाग | Middle of Tongue |
| जिह्वा-उपाग्रः | जिह्वाग्रात् किञ्चित् पूर्वभागः | जीभ के अग्र भाग से थोड़ा पहले का भाग | Near Tip of Tongue |
| जिह्वा-अग्रः | जिह्वायाः अग्रभागः | जीभ का अग्र भाग | Tip of Tongue |
| स्वस्थानकरणः | निजस्थानस्य पर-भागः एव करणं यस्य वर्णस्य | जिस वर्ण का उच्चारण-स्थान का पर-भाग ही उसका करण हो | Such letters where a part of the ‘Place’ of Articulation itself acts as the ‘Tool’ of Articulation |
वयं शब्दार्थान् जानीमः — पृष्ठ 154पाठ के कठिन शब्दों की सारणी तथा ‘मातृभाषया अर्थं लिखत’ स्तम्भ
| शब्दः | अर्थः (संस्कृतम्) | हिन्दी | English |
|---|---|---|---|
| नितान्तम् | अत्यन्तम् | अतीव | Very / Highly |
| निर्दुष्टम् | दोष-रहितम् / शुद्धम् | दोष-रहित / शुद्ध | Impeccable |
| नोदयन्ति | अभिपीडयन्ति | दबाते हैं | Press |
| निःसारयति | बहिः प्रेषयति | बाहर निकालता है | Pushes out |
| सरन् | चरन् | बढ़ता हुआ | Move |
| प्रकटीभवति | उत्पद्यते | उत्पन्न होता है | Appears / Is produced |
| निदर्शने | उदाहरणे | उदाहरण में | Example |
| मुरली | वंशी | बाँसुरी | Flute |
| परिभाषा | शास्त्रीय-व्याख्यानम् | शास्त्रीय व्याख्या | Technical definition |
यह स्तम्भ अपनी मातृभाषा में भरना है — हिन्दी, मराठी, बांग्ला, गुजराती, तमिल, तेलुगु… जो भी आपकी हो। हिन्दी-माध्यम के विद्यार्थी ऊपर प्रश्न 15 की सारणी का हिन्दी स्तम्भ ही उतार लें।
नमूना उत्तर (मराठी में) —
| शब्दः | हिन्दी | मराठी (मातृभाषया) |
|---|---|---|
| नितान्तम् | अतीव | अत्यंत |
| निर्दुष्टम् | दोष-रहित / शुद्ध | दोषरहित / शुद्ध |
| नोदयन्ति | दबाते हैं | दाबतात |
| निःसारयति | बाहर निकालता है | बाहेर काढतो |
| सरन् | बढ़ता हुआ | सरकत |
| प्रकटीभवति | उत्पन्न होता है | प्रकट होतो |
| निदर्शने | उदाहरण में | उदाहरणात |
| मुरली | बाँसुरी | बासरी |
| परिभाषा | शास्त्रीय व्याख्या | शास्त्रीय व्याख्या |
अभ्यासात् जायते सिद्धिः — पृष्ठ 155प्रश्नः १ : अधोलिखितप्रश्नानाम् उत्तराणि एकपदेन द्विपदेन वा उत्तरत
उत्तरम् — वायु-बल-तन्त्रम्। (छाती में वायु-बल-तन्त्र होता है — Air-pressure System।)
कारणम् — पाठे — ‘उरः (Chest) — वायु-बल-तन्त्रम् (Air-pressure System)’।
उत्तरम् — उरः (नोदयन्ति)। (नाभि-भाग में स्थित मांसपेशियाँ छाती को दबाती हैं।)
कारणम् — पाठे — ‘सर्वप्रथमं नाभि-प्रदेशे स्थिताः मांसपेश्यः उरः नोदयन्ति।’
उत्तरम् — करणम्। (दूसरा तत्त्व ‘करण’ है।)
कारणम् — त्रीणि तत्त्वानि — (क) स्थानम्, (ख) करणम्, (ग) आभ्यन्तर-प्रयत्नः।
उत्तरम् — षट् (स्थानानि)। (आस्य में छह स्थान हैं।)
कारणम् — मुखे पञ्च (कण्ठः, तालु, मूर्धा, दन्तः, ओष्ठः) तथा नासिकायाम् एकम् (नासिका) — एवं षट्।
उत्तरम् — मुरली। (बाँसुरी उपयुक्त उदाहरण है।)
कारणम् — मुरल्याः अङ्गुलिच्छिद्राणि आस्यस्य स्थानानि इव व्यवहरन्ति।
उत्तरम् — अङ्गुलीः इव (अङ्गुलयः इव)। (करण बाँसुरी बजाती हुई अङ्गुलियों की तरह काम करते हैं।)
कारणम् — मुरलीं वादयन्त्यः अङ्गुलयः आस्यस्य करणानि इव व्यवहरन्ति।
अभ्यासात् जायते सिद्धिः — पृष्ठ 155प्रश्नः २ : अधोलिखितप्रश्नानाम् उत्तराणि पूर्णवाक्येन लिखत
उत्तरम् — वर्णस्य उच्चारण-समये, आस्यस्य यः भागः स्थानं स्पृशति, स्थानस्य समीपं वा याति, सः भागः ‘करणम्’ इति कथ्यते।
(वर्ण के उच्चारण के समय आस्य का जो भाग स्थान को छूता है या स्थान के पास तक जाता है, वही भाग ‘करण’ कहलाता है।)
उत्तरम् — उरः श्वासकोश-स्थितं वायुम् ऊर्ध्वं निःसारयति। (छाती फेफड़ों में स्थित वायु को ऊपर की ओर निकालती है।)
उत्तरम् — मुरल्याः अङ्गुलिच्छिद्राणि आस्यस्य ‘स्थानानि’ इव व्यवहरन्ति। (बाँसुरी के छिद्र आस्य के स्थानों की तरह काम करते हैं।)
उत्तरम् — कण्ठ्यानाम्, ओष्ठ्यानाम्, नासिक्यानां च वर्णानाम् उच्चारणे जिह्वा प्रायः निष्क्रिया भवति। (कण्ठ्य, ओष्ठ्य और नासिक्य वर्णों के उच्चारण में जीभ प्रायः निष्क्रिय रहती है।)
उत्तरम् — तालव्यानां, मूर्धन्यानां, दन्त्यानां च वर्णानाम् उच्चारणार्थं सामान्यं करणं ‘जिह्वा’ अस्ति। (इन तीनों प्रकार के वर्णों के उच्चारण के लिए सामान्य करण जीभ है।)
उत्तरम् — कण्ठ्यानां, ओष्ठ्यानां, नासिक्यानां च वर्णानाम् उच्चारणार्थं स्थानस्य करणस्य च मध्ये भेदः न भवति — स्व-स्थानम् एव करणं भवति। तत्-तत्-स्थानस्य एव कश्चित् पर-भागः, तत्-तत्-स्थानस्य पूर्व-भागं स्पृशति, समीपं वा याति।
(इन वर्णों में स्थान और करण अलग-अलग अङ्ग नहीं होते — अपना स्थान ही करण होता है। उसी स्थान का कोई पर-भाग उसी स्थान के पूर्व-भाग को छूता है या उसके पास जाता है।)
| वर्ग | स्थानम् बनने वाला भाग | करणम् बनने वाला भाग |
|---|---|---|
| कण्ठ्याः | कण्ठस्य पृष्ठ-भागः | कण्ठस्य अग्र-भागः |
| ओष्ठ्याः | उत्तरोष्ठः | अधरोष्ठः |
| नासिक्याः | नासिका-मूलस्य उपरि-भागः | नासिका-मूलस्य अधो-भागः |
अभ्यासात् जायते सिद्धिः — पृष्ठ 155प्रश्नः ३ : अधोलिखितेषु वाक्येषु आम् / न इति लिखित्वा उचितभावं सूचयत
उत्तरम् — न। (नहीं।)
शुद्धं वाक्यम् — श्वासकोश-स्थितः वायुः ऊर्ध्वं चरन् पूर्वं कण्ठ-बिलं प्राप्नोति, ततः आस्यं प्रविशति। (फेफड़ों की वायु ऊपर चलती हुई पहले कण्ठ-बिल तक पहुँचती है, उसके बाद आस्य में प्रवेश करती है।)
उत्तरम् — न। (नहीं।)
शुद्धं वाक्यम् — सर्वप्रथमं नाभि-प्रदेशे स्थिताः मांसपेश्यः उरः नोदयन्ति। (सबसे पहले नाभि-भाग की मांसपेशियाँ छाती को दबाती हैं, कण्ठ को नहीं।)
उत्तरम् — आम्। (हाँ।)
कारणम् — आस्ये वर्णोत्पत्त्यर्थं त्रीणि तत्त्वानि आवश्यकानि — स्थानम्, करणम्, आभ्यन्तर-प्रयत्नः।
उत्तरम् — न। (नहीं।)
शुद्धं वाक्यम् — तालव्य-वर्णानाम् उच्चारणार्थं जिह्वायाः मध्य-भागः (जिह्वा-मध्यः) तालु इति स्थानं स्पृशति। (तालव्य वर्णों के उच्चारण के लिए जीभ का मध्य भाग तालु नामक स्थान को छूता है।)
उत्तरम् — आम्। (हाँ।)
कारणम् — मूर्धन्य-वर्णानाम् उच्चारणार्थं जिह्वा (उपाग्र-भागेन) मूर्धानं स्पृशति, समीपं वा याति।
उत्तरम् — न। (नहीं।)
शुद्धं वाक्यम् — तत्-तत्-स्थानस्य एव कश्चित् पर-भागः, तत्-तत्-स्थानस्य पूर्व-भागं स्पृशति, समीपं वा याति। (उसी स्थान का कोई पर-भाग, उसी स्थान के पूर्व-भाग को छूता है या उसके पास जाता है।)
अभ्यासात् जायते सिद्धिः — पृष्ठ 156प्रश्नः ४ : मुखे उपलभ्यमानानि स्थानानि बहिष्ठात् अन्तः यथाक्रमं (अर्थात् विपरीत-क्रमेण) लिखन्तु
(क) मूर्धा ……………
(ख) दन्तः ……………
(ग) तालु ……………
(घ) कण्ठः ……………
(ङ) ओष्ठः ……………
उत्तरम् — बहिष्ठात् अन्तः क्रमः इत्थम् अस्ति —
| रिक्तस्थानम् | स्थानम् (बहिः → अन्तः) | कुत्र |
|---|---|---|
| (क) | ओष्ठः | सर्वबहिः — होंठ |
| (ख) | दन्तः | होंठ के ठीक भीतर — दाँत |
| (ग) | मूर्धा | दाँतों के पीछे उठा हुआ भाग |
| (घ) | तालु | तालु — मुँह की छत |
| (ङ) | कण्ठः | सर्वान्तः — गला |
एकपङ्क्त्याम् — ओष्ठः → दन्तः → मूर्धा → तालु → कण्ठः। (अर्थात् दत्तानां स्थानानां क्रमाङ्काः — मूर्धा ३, दन्तः २, तालु ४, कण्ठः ५, ओष्ठः १।)
अभ्यासात् जायते सिद्धिः — पृष्ठ 156प्रश्नः ५ : यथायोग्यं मेलनं कुरुत — सामान्य-स्थानम् · विशेष-स्थानम् · सामान्य-करणम् · विशेष-करणम्
| सामान्य-स्थानम् | विशेष-स्थानम् | सामान्य-करणम् | विशेष-करणम् |
|---|---|---|---|
| ओष्ठः | मूर्धा | स्वस्थानं करणम् | अधरोष्ठः |
| दन्तः | नासिकामूलस्य उपरिभागः | जिह्वा करणम् | जिह्वाग्रः |
| नासिका | तालु | स्वस्थानं करणम् | जिह्वामध्यः |
| कण्ठः | उत्तरोष्ठः | जिह्वा करणम् | कण्ठस्य अग्रभागः |
| मूर्धा | दन्तः | स्वस्थानं करणम् | नासिकामूलस्य अधोभागः |
| तालु | कण्ठस्य पृष्ठभागः | जिह्वा करणम् | जिह्वोपाग्रः |
उत्तरम् — शुद्धं मेलनम् इत्थम् —
| सामान्य-स्थानम् | विशेष-स्थानम् | सामान्य-करणम् | विशेष-करणम् |
|---|---|---|---|
| ओष्ठः | उत्तरोष्ठः | स्वस्थानं करणम् | अधरोष्ठः |
| दन्तः | दन्तः | जिह्वा करणम् | जिह्वाग्रः |
| नासिका | नासिकामूलस्य उपरिभागः | स्वस्थानं करणम् | नासिकामूलस्य अधोभागः |
| कण्ठः | कण्ठस्य पृष्ठभागः | स्वस्थानं करणम् | कण्ठस्य अग्रभागः |
| मूर्धा | मूर्धा | जिह्वा करणम् | जिह्वोपाग्रः |
| तालु | तालु | जिह्वा करणम् | जिह्वामध्यः |
अत्र इदम् अवधेयम् — पृष्ठ 157अतिरिक्त अभ्यास (ये प्रश्न पुस्तक में नहीं हैं) — परिभाषा — ‘स्वरः’ तथा ‘व्यञ्जनम्’ इत्यनयोः परिभाषा-वाक्ये
परिभाषा-वाक्यम् — स्वयं राजन्ते इति स्वराः।
पुस्तकस्य अर्थः — ये वर्णाः (स्वयं) स्वतन्त्ररूपेण (राजन्ते) उच्चार्यन्ते, ते → स्वराः भवन्ति।
(हिन्दी — जो वर्ण अपने आप, स्वतन्त्र रूप से बोले जाते हैं, वे स्वर होते हैं।)
परिभाषा-वाक्यम् — अन्वग् भवति व्यञ्जनम्।
पुस्तकस्य अर्थः — उच्चारणार्थं यः वर्णः अचं (स्वरं) प्रति पराश्रितः भवति, सः वर्णः → ‘व्यञ्जनं’ भवति।
(हिन्दी — उच्चारण के लिए जो वर्ण स्वर पर आश्रित रहता है, वही वर्ण व्यञ्जन होता है।)
योग्यताविस्तरः — पृष्ठ 157अतिरिक्त अभ्यास (ये प्रश्न पुस्तक में नहीं हैं) — पाणिनीय-शिक्षा-सूत्राणि — करण-प्रकरणम् (सूत्राणि तथा तेषाम् अर्थाः)
पुस्तकस्य वाक्यम् — षष्ठ-कक्षायां ‘स्थान-प्रकरणस्य’ सूत्राणि दृष्टवन्तः। अधुना ‘करण-प्रकरणस्य’ सूत्राणि — (छठी कक्षा में हमने ‘स्थान-प्रकरण’ के सूत्र देखे थे; अब ‘करण-प्रकरण’ के सूत्र देखते हैं।)
सम्बन्धः — स्थानं करणं च — उभे वर्णोच्चारणस्य तत्त्वे। षष्ठ्यां कक्षायां स्थान-प्रकरणस्य सूत्राणि पठितानि, अस्मिन् पाठे करणस्य चर्चा अभवत्; अतः करणस्य शास्त्रीय-सूत्राणि (पाणिनीय-शिक्षायाः करण-प्रकरणम्) अत्र दीयन्ते। एतत् स्थान-प्रकरणस्य अग्रिमः भागः अस्ति। (स्थान और करण दोनों उच्चारण के तत्त्व हैं। कक्षा 6 में स्थान-प्रकरण पढ़ा, इस पाठ में करण समझा — इसलिए करण के शास्त्रीय सूत्र यहाँ दिए गए हैं। यह स्थान-प्रकरण का अगला भाग है।)
अर्थः (पुस्तकानुसारम्) — अधुना (वर्णोच्चारणस्य) ‘करणं’ जानीमः। (अब हम वर्णोच्चारण का ‘करण’ जानते हैं।)
अर्थः (पुस्तकानुसारम्) — तालव्यानां मूर्धन्यानां दन्त्यानां च वर्णानाम् उच्चारणे → ‘जिह्वा’ करणं भवति। (तालव्य, मूर्धन्य और दन्त्य वर्णों के उच्चारण में करण जीभ होती है।)
अर्थः (पुस्तकानुसारम्) — तालव्य-वर्णानाम् उच्चारणे → जिह्वायाः ‘मध्य-भागः’ करणं भवति। (तालव्य वर्णों के उच्चारण में जीभ का मध्य भाग करण होता है।)
अर्थः (पुस्तकानुसारम्) — मूर्धन्य-वर्णानाम् उच्चारणे → जिह्वायाः ‘उपाग्र-भागः’ करणं भवति। (मूर्धन्य वर्णों के उच्चारण में जीभ का उपाग्र भाग करण होता है।)
अर्थः (पुस्तकानुसारम्) — दन्त्य-वर्णानाम् उच्चारणे → जिह्वायाः ‘अग्र-भागः’ करणं भवति। (दन्त्य वर्णों के उच्चारण में जीभ का अग्र भाग — नोक — करण होता है।)
अर्थः (पुस्तकानुसारम्) — शेषाणां (कण्ठ्य-ओष्ठ्य-नासिक्यानां) वर्णानाम् उच्चारणे → ‘स्वस्थानं’ (स्वस्य स्थानस्य कश्चिद् भागविशेषः) एव → करणं भवति।
(शेष वर्णों के — अर्थात् कण्ठ्य, ओष्ठ्य तथा नासिक्य वर्णों के — उच्चारण में उनका अपना स्थान ही, ठीक-ठीक कहें तो उसी स्थान का कोई विशेष भाग, करण बन जाता है।)
अर्थः (पुस्तकानुसारम्) — अत्र पर्यन्तम् एतत् उच्चारणस्य ‘करणं’ चर्चितम्। (यहाँ तक उच्चारण के ‘करण’ की चर्चा हुई।)
आस्यस्य अभ्यन्तरे षट् स्थानानि, षट् करणानि च (वर्ण-चक्रम्) — पृष्ठ 158अतिरिक्त अभ्यास (ये प्रश्न पुस्तक में नहीं हैं) — पाठस्य अन्तिमं चित्रम् — षट्सु स्थानेषु उत्पद्यमानाः वर्णाः तथा तेषां करणानि
(चित्र-परिचयः — पृष्ठ 158 पर सिर के पार्श्व-चित्र के ऊपर एक अर्ध-चक्र है। उसके ऊपरी खण्डों पर छह स्थानों के नाम हैं; बीच के रंगीन छल्लों में उन स्थानों के वर्ण हैं — बाहर से भीतर : समानाक्षराणि, सन्ध्यक्षराणि, स्पर्शाः, अन्तःस्थाः, ऊष्माणः, अयोगवाहौ; और नीचे के अर्ध-वृत्त में ‘षट् करणानि’ दिखाए गए हैं।)
पुस्तक का अन्तिम चित्र ‘आस्यस्य अभ्यन्तरे षट् स्थानानि, षट् करणानि च’ पूरे पाठ को एक ही चक्र में समेट देता है। बाहरी अर्ध-वृत्त में षट् स्थानानि हैं, भीतरी अर्ध-वृत्त में षट् करणानि, और बीच के छल्लों में उन स्थानों से निकलने वाले वर्ण।
| स्थानम् | वर्ग-नाम | तत्र उत्पद्यमानाः वर्णाः (चक्रानुसारम्) | करणम् |
|---|---|---|---|
| १. कण्ठः | कण्ठ्याः | अ आ अ३ · क् ख् ग् घ् ङ् · ह् · विसर्गः ः | स्व-स्थानं करणम् (कण्ठस्य अग्रभागः) |
| २. तालु | तालव्याः | इ ई इ३ · च् छ् ज् झ् ञ् · य् · श् | जिह्वा-मध्यः |
| ३. मूर्धा | मूर्धन्याः | ऋ ॠ ऋ३ · ट् ठ् ड् ढ् ण् · र् · ष् | जिह्वा-उपाग्रः |
| ४. दन्तः | दन्त्याः | ऌ ऌ३ · त् थ् द् ध् न् · ल् · स् | जिह्वा-अग्रः |
| ५. ओष्ठः | ओष्ठ्याः | उ ऊ उ३ · प् फ् ब् भ् म् · व् (दन्त्योष्ठ्यः) | स्व-स्थानं करणम् (अधरोष्ठः) |
| ६. नासिका | नासिक्याः | ङ् ञ् ण् न् म् · अनुस्वारः ं | स्व-स्थानं करणम् (नासिकामूलस्य अधोभागः) |
चक्रे ए ए३ ऐ ऐ३ कण्ठे तालौ च, ओ ओ३ औ औ३ कण्ठे ओष्ठे च, व दन्ते ओष्ठे च — उभयत्र दर्शिताः (एते द्वि-स्थानीयाः वर्णाः — प्रश्नः 48)।
उत्तरम् — एते ते वर्णाः, येषाम् उच्चारणे एकं न, अपितु द्वे स्थाने कार्यं कुरुतः। (ये वे वर्ण हैं जिनके उच्चारण में एक नहीं, बल्कि दो स्थान काम करते हैं।) पारिभाषिक-शब्दार्थ-सारणी में पुस्तक इन तीनों को अलग से गिनाती है —
| पारिभाषिकः शब्दः | अर्थः (पुस्तकानुसारम्) | वर्णाः | English |
|---|---|---|---|
| कण्ठ-तालव्यः | कण्ठ-तालु-स्थानयोः उत्पन्नः वर्णः | ए ए३, ऐ ऐ३ | Velar-palatal / Palato-velar |
| कण्ठौष्ठ्यः | कण्ठ-ओष्ठ-स्थानयोः उत्पन्नः वर्णः | ओ ओ३, औ औ३ | Velar-labial / Labio-velar |
| दन्त्योष्ठ्यः | दन्त-ओष्ठ-स्थानयोः उत्पन्नः वर्णः | व् | Dento-labial / Labio-dental |
Chapter 13 of 13 – Sanskrit
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