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NCERT Solutions for Class 8 Sanskrit Chapter 9 कोऽरुक् ? कोऽरुक् ? कोऽरुक् ? (PDF) – 2027

NCERT Solutions for Class 8 Sanskrit Chapter 9 कोऽरुक् ? कोऽरुक् ? कोऽरुक् ? – step-by-step answers to every exercise and in-text question of the chapter, as per the latest NCERT syllabus for 2027. Read them online or download the free question-answer PDF.

दीपकम् (कक्षा 8) का नवमः पाठः — कोऽरुक् ? कोऽरुक् ? कोऽरुक् ? पाठ का शीर्षक ही उसका प्रश्न है — ‘कोऽरुक्’ अर्थात् कः अरुक् ? कौन नीरोग है ? भगवान् धन्वन्तरि शुक (तोते) का रूप धारण कर यही प्रश्न पूछते हैं और आचार्य वाग्भट तीन सूत्रों में उत्तर देते हैं — हितभुक्, मितभुक्, ऋतुभुक्। यहाँ पाठ के चित्र-संवाद, शब्दार्थ-सारणी, ‘इदम् अत्र अवधेयम्’ (विशेषण-विशेष्य), अभ्यासात् जायते सिद्धिः के छहों प्रश्न, योग्यताविस्तरः तथा परियोजनाकार्यम् — सबके उत्तर दिए गए हैं।

NCERT Solutions for Class 8 Sanskrit Chapter 9 कोऽरुक् ? कोऽरुक् ? कोऽरुक् ? PDF

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पाठ का हिंदी अनुवाद

चित्र-संवादः — माता, पिता, पुत्री, पुत्रः (पृष्ठ 97)
अम्ब ! महती बुभुक्षा बाधते, शीघ्रं भोजनं परिवेषयतु।
पुत्री — माँ! बहुत ज़ोर की भूख सता रही है, जल्दी भोजन परोसिए।
वत्से, भोजनम् अत्युष्णम् अस्ति, किञ्चित् प्रतीक्षस्व।
माता — बेटी, भोजन बहुत गरम है, थोड़ी प्रतीक्षा करो।
उष्णं भोजनं किमर्थं न ददाति ?
पुत्री — (माँ) गरम भोजन क्यों नहीं दे रही हैं?
वत्से ! मुखे दाहः भवेत्, अपि च ‘अत्युष्णं भोजनं हितकरं न भवति’ इति आयुर्वेदस्य उपदेशः ।
पिता — बेटी! (बहुत गरम भोजन से) मुँह में जलन हो सकती है, और ‘बहुत गरम भोजन हितकारी नहीं होता’ — यह आयुर्वेद का उपदेश है।
अम्ब ! आयुर्वेदे बहवः आहारनियमाः सन्ति इति अस्माकं शिक्षकः अपि बोधयति।
पुत्र — माँ! आयुर्वेद में भोजन के बहुत-से नियम हैं — यह हमारे शिक्षक भी समझाते हैं।
सत्यम् उक्तं वत्स ! आहारविषये एकः रोचकः प्रसङ्गः अस्ति। युवाम् इच्छथ चेत् श्रावयामि।
माता — बेटा, तुमने सच कहा! भोजन के विषय में एक रोचक प्रसंग है। यदि तुम दोनों चाहो तो सुनाती हूँ।
अस्तु अम्ब ! यावत् भोजनं भोक्तुं योग्यं भवति तावत् तं श्रावयतु।
पुत्री — ठीक है माँ! जब तक भोजन खाने योग्य होता है, तब तक वह (प्रसंग) सुनाइए।
अस्तु, श्रूयताम्।
माता — अच्छा, सुनो।
कथा — शुकरूपः धन्वन्तरिः वाग्भटः च (पृष्ठ 98–99)
‘भारतवर्षे वैद्याः विभिन्नानां व्याधीनां शमनं कथं कुर्वन्ति’ इति ज्ञातुं पुरा भगवान् धन्वन्तरिः मनोहरं शुकरूपं धृत्वा प्रतिग्रामम् अभ्रमत्।
‘भारतवर्ष में वैद्य भिन्न-भिन्न रोगों को कैसे शान्त (दूर) करते हैं’ — यह जानने के लिए प्राचीन काल में भगवान् धन्वन्तरि सुन्दर तोते का रूप धारण करके गाँव-गाँव घूमे।
भ्रमणकाले सः बहूनां प्रख्यातवैद्यानां भवनपार्श्वस्थे वृक्षे उपविश्य ‘कोऽरुक्’ ‘कोऽरुक्’ ‘कोऽरुक्’ इति ध्वनिम् अकरोत्। किन्तु खगस्य ‘कोऽरुक्’ इति शब्दं प्रति कस्यापि अवधानं नासीत्।
घूमते समय उन्होंने अनेक प्रसिद्ध वैद्यों के घरों के पास स्थित वृक्ष पर बैठकर ‘कोऽरुक्’ ‘कोऽरुक्’ ‘कोऽरुक्’ (कौन नीरोग है?) — ऐसी ध्वनि की। किन्तु पक्षी के ‘कोऽरुक्’ इस शब्द की ओर किसी का भी ध्यान नहीं गया।
अन्ते सः वैद्यस्य वाग्भटस्य कुटीरसमीपं गतवान्। तत्र विशाले प्राङ्गणे स्थितं पुष्पतरुम् आरुह्य मधुरया गिरा ‘कोऽरुक्’ ‘कोऽरुक्’ ‘कोऽरुक्’ इति शब्दम् अकरोत्।
अन्त में वे वैद्य वाग्भट की कुटिया के पास गए। वहाँ विशाल आँगन में खड़े फूलों के पेड़ पर चढ़कर उन्होंने मधुर वाणी में ‘कोऽरुक्’ ‘कोऽरुक्’ ‘कोऽरुक्’ — यह शब्द किया।
मधुरां वाणीं श्रुत्वा चिकित्सानिरतः वाग्भटः प्राङ्गणम् आगत्य सर्वासु दिक्षु अपश्यत्। क्षणात् वाग्भटः मनोहरं तं शुकम् अपश्यत्।
मधुर वाणी सुनकर चिकित्सा (इलाज) में लगे हुए वाग्भट ने आँगन में आकर सभी दिशाओं में देखा। क्षण भर में वाग्भट ने उस सुन्दर तोते को देख लिया।
सार्थकं मानुषध्वनिं कुर्वन्तं शुकं दृष्ट्वा विस्मितः वाग्भटः चिन्तितवान् – “नायं लौकिकः खगः । एषः निश्चयेन कश्चन देवविशेषः अस्ति”।
अर्थपूर्ण मनुष्य-वाणी बोलते हुए तोते को देखकर आश्चर्यचकित वाग्भट ने सोचा — “यह साधारण (इस लोक का) पक्षी नहीं है। यह निश्चय ही कोई विशेष देवता है।”
सः झटिति तस्मै विहगाय मधुराणि फलानि समर्पितवान् परन्तु सः खगः फलानि न गृहीत्वा पुनरपि तथैव ‘कोऽरुक्’ ‘कोऽरुक्’ ‘कोऽरुक्’ इति प्रश्नस्वरेण शब्दमकरोत्।
उन्होंने तुरन्त उस पक्षी को मीठे फल अर्पित किए, परन्तु उस पक्षी ने फल न लेकर फिर से वैसे ही प्रश्न के स्वर में ‘कोऽरुक्’ ‘कोऽरुक्’ ‘कोऽरुक्’ — यह शब्द किया।
अथ वैद्यः वाग्भटः अचिन्तयत् यत् यावत् खगः स्वप्रश्नानाम् उत्तराणि न प्राप्नोति तावत् अयं भोजनं न वाञ्छति इति।
तब वैद्य वाग्भट ने सोचा कि जब तक पक्षी को अपने प्रश्नों के उत्तर नहीं मिल जाते, तब तक यह भोजन नहीं चाहता।
ततः सः अचिरादेव सूत्ररूपाणि त्रीणि उत्तराणि प्राददात् – ‘हितभुक्’ ‘मितभुक्’ ‘ऋतुभुक्’ इति।
तब उन्होंने शीघ्र ही सूत्र के रूप में तीन उत्तर दिए — ‘हितभुक्’ (हितकारी भोजन करने वाला), ‘मितभुक्’ (सीमित मात्रा में भोजन करने वाला), ‘ऋतुभुक्’ (ऋतु के अनुसार भोजन करने वाला)।
समुचितम् उत्तरं श्रुत्वा अत्यन्तं प्रीतः सः शुकः वाग्भटेन अर्पितानि फलानि खादितवान्।
उचित उत्तर सुनकर अत्यन्त प्रसन्न उस तोते ने वाग्भट द्वारा अर्पित फल खाए।
ततः शुकरूपः धन्वन्तरिः वाग्भटम् उक्तवान् – “वत्स ! अहं धन्वन्तरिः अस्मि। उत्तमस्य वैद्यस्य अन्वेषणाय भारतवर्षे सर्वत्र परिभ्रमन् अत्र समागतः ।
तब तोते के रूप वाले धन्वन्तरि ने वाग्भट से कहा — “वत्स! मैं धन्वन्तरि हूँ। उत्तम वैद्य की खोज के लिए भारतवर्ष में सब जगह घूमता हुआ मैं यहाँ आया हूँ।
तव उत्कृष्टेन आयुर्वेदज्ञानेन अहम् अतीव सन्तुष्टः अस्मि। त्वम् अवश्यमेव आयुर्वेद-अष्टाङ्गविचार-सारभूतं तन्त्रं विरचयेः” एतद् उक्त्वा सः अन्तर्हितः ।
तुम्हारे उत्कृष्ट आयुर्वेद-ज्ञान से मैं अत्यन्त सन्तुष्ट हूँ। तुम अवश्य ही आयुर्वेद के आठ अंगों के विचार का सार-रूप एक ग्रन्थ (तन्त्र) रचना।” यह कहकर वे अन्तर्धान (अदृश्य) हो गए।
एतत् सर्वं दूरात् पश्यन्तः विस्मिताः शिष्याः आचार्यवाग्भटस्य समीपम् आगत्य अपृच्छन् – “गुरुवर ! शुकः ‘कोऽरुक् कोऽरुक् कोऽरुक्’ इति उक्तवान्, तस्य कोऽर्थः ? अपि च भवान् किम् उत्तरं दत्तवान् ?”
यह सब दूर से देखते हुए आश्चर्यचकित शिष्यों ने आचार्य वाग्भट के पास आकर पूछा — “गुरुवर! तोते ने ‘कोऽरुक् कोऽरुक् कोऽरुक्’ ऐसा कहा, उसका क्या अर्थ है? और आपने क्या उत्तर दिया?”
तदा वाग्भटः छात्राणां जिज्ञासाम् उपशमयन् कथयति – “छात्राः, शृणुत ! एषः शुकः वदति यत् कः अरुक् अर्थात् कः स्वस्थः नीरोगः वा वर्तते ?
तब वाग्भट छात्रों की जिज्ञासा शान्त करते हुए कहते हैं — “छात्रो, सुनो! यह तोता कहता है कि कौन ‘अरुक्’ है, अर्थात् कौन स्वस्थ या नीरोग है?
तदा मया उक्तम् – ‘यः हितभुक्, मितभुक्, ऋतुभुक् च, सः एव सर्वदा स्वस्थः भवति’ ।”
तब मैंने कहा — ‘जो हितकारी भोजन करता है, सीमित मात्रा में भोजन करता है और ऋतु के अनुसार भोजन करता है, वही सदा स्वस्थ रहता है।’”
छात्राः पुनः जिज्ञासया अपृच्छन् “आचार्य ! ‘हितभुक्, मितभुक्, ऋतुभुक्’ इति – एतेषां कः आशयः ?”
छात्रों ने फिर जिज्ञासा से पूछा — “आचार्य! ‘हितभुक्, मितभुक्, ऋतुभुक्’ — इनका क्या आशय (मतलब) है?”
वाग्भटः वदति – “शिष्याः ! महर्षेः चरकस्य नाम भवन्तः श्रुतवन्तः स्युः । सः हितभुक्-विषये कथयति —
वाग्भट कहते हैं — “शिष्यो! आप लोगों ने महर्षि चरक का नाम सुना होगा। वे ‘हितभुक्’ के विषय में कहते हैं —
हितभुक्, मितभुक्, ऋतुभुक् — श्लोकाः (पृष्ठ 99–101)
तच्च नित्यं प्रयुञ्जीत स्वास्थ्यं येनानुवर्तते।
अजातानां विकाराणामनुत्पत्तिकरं च यत्॥ १ ॥
उस (आहार) का सदा प्रयोग (सेवन) करना चाहिए जिससे स्वास्थ्य बना रहता है, और जो अभी तक पैदा न हुए विकारों (रोगों) को उत्पन्न न होने दे॥ १ ॥
अर्थात् यस्य आहारस्य सेवनेन स्वास्थ्यस्य रक्षणं भवेत्, न जातानाम् अर्थात् अनुत्पन्नानां विकाराणाम् उत्पत्तिः न भवेत्, तादृशः आहारः सेवनीयः ।
अर्थात् जिस आहार के सेवन से स्वास्थ्य की रक्षा हो, और जो पैदा नहीं हुए अर्थात् अभी उत्पन्न न हुए रोगों की उत्पत्ति न हो — वैसा आहार सेवन करना चाहिए।
मितभुक्-विषये कथयति आचार्यः —
‘मितभुक्’ के विषय में आचार्य (चरक) कहते हैं —
अल्पादाने गुरूणां च लघूनां चातिसेवने।
मात्राकारणमुद्दिष्टं द्रव्याणां गुरुलाघवे॥ २ ॥
भारी (गरिष्ठ) पदार्थों को थोड़ी मात्रा में लेने में और हल्के (सुपाच्य) पदार्थों को अधिक मात्रा में सेवन करने में — द्रव्यों के भारीपन और हल्केपन का कारण मात्रा ही बताई गई है॥ २ ॥
अर्थात् गरिष्ठद्रव्याणि अपि अल्पमात्रं सेवनेन सुपाच्यानि भवन्ति, लघुद्रव्याणि चापि अतिमात्रं सेवनेन हानिकराणि जायन्ते। अतः मात्रानुसारम् एव खादितव्यम्।
अर्थात् भारी (कठिनता से पचने वाले) पदार्थ भी थोड़ी मात्रा में सेवन करने से सुपाच्य हो जाते हैं, और हल्के पदार्थ भी अत्यधिक मात्रा में सेवन करने से हानिकारक हो जाते हैं। इसलिए मात्रा के अनुसार ही खाना चाहिए।
एवमेव ऋतुभुक्-विषये उच्यते —
इसी प्रकार ‘ऋतुभुक्’ के विषय में कहा जाता है —
तस्याशिताद्यादाहारात् बलं वर्णश्च वर्धते।
तस्यर्तुसात्म्यं विदितं चेष्टाहारव्यपाश्रयम्॥ ३ ॥
जिस मनुष्य को आचरण (चेष्टा) और आहार पर आधारित ऋतु-सात्म्य (ऋतु के अनुकूल क्या है) ज्ञात है, उसके खाए हुए आहार से बल और वर्ण (शरीर की कान्ति) बढ़ते हैं॥ ३ ॥
अर्थात् ग्रीष्मः, वर्षा, शरद्, शिशिरः, हेमन्तः, वसन्तः चेति षट् ऋतवः भवन्ति।
अर्थात् ग्रीष्म, वर्षा, शरद्, शिशिर, हेमन्त और वसन्त — ये छह ऋतुएँ होती हैं।
यः पुरुषः ऋतूनाम् अनुकूलं स्वास्थ्यप्रदम् आहारसेवनं जानाति तदनुसारम् आचरणं च करोति तस्य जनस्य अशितम् अर्थात् भुक्तं पीतं च सर्वमपि बलवर्धकं, वर्णकान्तिजनकं, सुखवर्धकम्, आयुर्वर्धकञ्च भवति।
जो पुरुष ऋतुओं के अनुकूल, स्वास्थ्य देने वाले आहार-सेवन को जानता है और उसके अनुसार आचरण भी करता है, उस व्यक्ति का ‘अशित’ अर्थात् खाया और पिया हुआ सब कुछ बल बढ़ाने वाला, रंग-रूप निखारने वाला, सुख बढ़ाने वाला और आयु बढ़ाने वाला होता है।
अतः ऋतोः अनुसारं भोक्तव्यम् इति। नियमितरूपेण समयानुसारं सात्त्विकं भोजनम् आवश्यकमिति ऋतुभुक्-पदेन ज्ञायते।”
इसलिए ऋतु के अनुसार भोजन करना चाहिए। नियमित रूप से, समय के अनुसार सात्त्विक भोजन आवश्यक है — यह ‘ऋतुभुक्’ पद से जाना जाता है।”
एतत् सर्वं श्रुत्वा कश्चन छात्रः वाग्भटम् अपृच्छत् – “आचार्य ! हितभुगादिविषये वयं तु ज्ञातवन्तः, किन्तु किं सः शुकः सन्तुष्टः अभवत्”?
यह सब सुनकर किसी छात्र ने वाग्भट से पूछा — “आचार्य! हितभुक् आदि के विषय में तो हमने जान लिया, किन्तु क्या वह तोता सन्तुष्ट हुआ?”
तदा वाग्भटः शुकस्य रहस्यम् उक्तवान् – “प्रियशिष्याः ! अयं विहगः न सामान्यविहगः, अपि तु आयुर्वेदस्य पूज्यः देवः भगवान् धन्वन्तरिः एव स्वयं शुकरूपेण अत्र आगच्छत्।
तब वाग्भट ने तोते का रहस्य बताया — “प्रिय शिष्यो! यह पक्षी साधारण पक्षी नहीं था, बल्कि आयुर्वेद के पूज्य देवता भगवान् धन्वन्तरि ही स्वयं तोते के रूप में यहाँ आए थे।
अस्माकं कृते संक्षेपेण स्वास्थ्यरक्षणाय सूत्ररूपेण सन्देशं च प्रदत्तवान्, भवन्तः अपि शृण्वन्तु स्मरन्तु च —
और उन्होंने हमारे लिए संक्षेप में, स्वास्थ्य की रक्षा के लिए सूत्र-रूप में सन्देश भी दिया। आप लोग भी सुनिए और याद रखिए —
व्यायामः प्रातरुत्थाय, नित्यं दन्तविशोधनम्।
स्वच्छजलेन सुस्नानं, बुभुक्षायाञ्च भोजनम्॥ ४ ॥
प्रातःकाल उठकर व्यायाम, प्रतिदिन दाँतों की सफ़ाई, स्वच्छ जल से भली-भाँति स्नान, और भूख लगने पर (ही) भोजन॥ ४ ॥
अस्माकम् ऋषयः नित्यं प्रार्थनाम् अपि कुर्वन्ति। वयमपि स्मरामः —
हमारे ऋषि प्रतिदिन प्रार्थना भी करते हैं। हम भी (उसे) स्मरण करते हैं —
सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः ।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत्॥ ५ ॥”
सभी सुखी हों, सभी नीरोग (स्वस्थ) रहें। सभी कल्याण (शुभ) को देखें, कोई भी दुःख का भागी न हो॥ ५ ॥”

NCERT Solutions for Class 8 Sanskrit Chapter 9 कोऽरुक् ? कोऽरुक् ? कोऽरुक् ? – Questions and Answers

All questions of the chapter are answered below, in the order of the book – in-text questions, activities and the end-of-chapter exercises. Each answer is written the way you would write it in the exam.

चित्र-संवादः (पाठे विद्यमानः प्रश्नः) — पृष्ठ 97पाठारम्भे चित्रसंवादः — माता, पुत्री, पुत्रः च

चित्र-संवादः
प्र.1“उष्णं भोजनं किमर्थं न ददाति ?” (भूखी पुत्री पृच्छति — पृष्ठ 97)
उत्तर
उत्तरम् — अत्युष्णं भोजनं खादितुं न योग्यम्, यतः तेन मुखे दाहः भवेत्। ‘अत्युष्णं भोजनं हितकरं न भवति’ इति आयुर्वेदस्य उपदेशः। अतः माता उष्णं भोजनं न ददाति।

चित्र-संवाद में पिता यही कारण बताते हैं — “वत्से ! मुखे दाहः भवेत्, अपि च ‘अत्युष्णं भोजनं हितकरं न भवति’ इति आयुर्वेदस्य उपदेशः।” माता भी पहले कहती है — “वत्से, भोजनम् अत्युष्णम् अस्ति, किञ्चित् प्रतीक्षस्व।”

वयं शब्दार्थान् जानीमः — पृष्ठ 101–102शब्दार्थ-सारणी तथा ‘मातृभाषया अर्थं लिखत’ स्तम्भः

शब्दार्थाः
प्र.1वयं शब्दार्थान् जानीमः — मातृभाषया अर्थं लिखत। (पाठस्य शब्दार्थ-सारणी, पृष्ठ 101–102)
उत्तर

सारणी का अन्तिम स्तम्भ जान-बूझकर खाली छोड़ा गया है — उसमें अपनी मातृभाषा (हिन्दी, मराठी, तमिल, बाङ्ग्ला … जो भी आपकी भाषा हो) में अर्थ लिखना है। नीचे पूरी सारणी संस्कृत-अर्थ, हिन्दी और अंग्रेज़ी सहित दी गई है; अन्तिम स्तम्भ के लिए नमूना उत्तर हिन्दी में दिया गया है।

शब्दःअर्थः (संस्कृतम्)हिन्दीEnglishमातृभाषया अर्थः (नमूना — हिन्दी)
निरामयाःनीरोगिणःस्वस्थHealthyरोगरहित, तन्दुरुस्त
अरुक्स्वस्थःनीरोगOne who is not sickजो बीमार न हो
झटितिशीघ्रमेवशीघ्रQuicklyतुरन्त, फ़ौरन
हितभुक्यः हितकरं खादतिहितकारक खाने वालाOne who eats nutritious foodजो लाभदायक भोजन करे
मितभुक्यः आवश्यक-मात्रा-अनुसारं भोजनं खादतिसीमित मात्रा में भोजन करने वालाOne who eats food in limited quantityजो नपा-तुला खाए
ऋतुभुक्यः ऋत्वनुकूलं पथ्यं भोजनं करोतिऋतु के अनुसार उपयुक्त भोजन करने वालाOne who eats food which is appropriate as per seasonजो मौसम के अनुसार खाए
प्रयुञ्जीतप्रयोगं कुर्यात्प्रयोग करेShould takeसेवन करना चाहिए
अनुवर्ततेअनुसरतिअनुसरण करता हैFollowsपीछे-पीछे चलता है, बना रहता है
अजातानाम्न उत्पन्नानाम्जो पैदा नहीं हुए उनकोOf those who are not bornजो अभी हुए ही नहीं
अनुत्पत्तिकरम्यत् (विकारान्) न उत्पादयतिजो (विकारों) को उत्पन्न न करेThat which may not cause (harm)जो रोग पैदा न होने दे
लघूनाम्सुपाच्यानाम्सुपाच्य खाद्यों काOf digestible foodहल्के, जल्दी पचने वाले भोजन का
उद्दिष्टम्उल्लिखितम्बताया गया हैWhich has been instructedकहा गया है
गरिष्ठम्यत् कठिनतया पच्यतेजो कठिनता से पचेDifficult to digestभारी, देर से पचने वाला
अतिमात्रम्मात्रायाः आधिक्यम्अत्यधिक मात्रा सेIn excessive quantityज़रूरत से ज़्यादा
अशिताद्यात्भुक्तात्खाए हुए सेFrom eaten foodखाए गए भोजन से
व्यपाश्रयम्आश्रयस्थानम्अवलम्बDependingजिस पर टिका हो, आधार
वर्णकान्तिजनकम्वर्णस्य सौन्दर्यस्य च उत्पादकम्रूप रंग निखारने वालाthat which enhances the beauty and complexionचेहरे का रंग-रूप निखारने वाला
बुभुक्षायाम्क्षुधायाम्भूख लगने परOn feeling hungryभूख लगे तब

इदम् अत्र अवधेयम् — पृष्ठ 102–103व्याकरण-पेटिका — विशेषणम्, विशेष्यम् तथा तयोः सम्बन्धः

व्याकरणम्
प्र.1विशेषणम् किम् ? विशेष्यम् किम् ? पाठात् उदाहरणं दत्त्वा स्पष्टयत।
उत्तर
विशेषणम् — यत् पदं कस्यचित् विशेषतां सूचयति तत् विशेषणम् इति उच्यते।
विशेष्यम् — यत् पदं मुख्यतया विशेषरूपेण उच्यते तत् पदं विशेष्यं भवति।

पाठस्य उदाहरणे — ‘उत्तमाः वैद्याः’ — अत्र ‘वैद्यस्य’ विशेषता उक्ता, अतः वैद्याः = विशेष्यपदम् तथा उत्तमाः = विशेषणपदम्। एवमेव पाठे ‘उत्तमाः’, ‘मनोहरम्’ इत्यादयः शब्दाः विशेषतां प्रकटयन्ति, अतः एते विशेषणानि सन्ति।

प्र.2विशेष्य-विशेषणयोः सम्बन्धः कीदृशः ? त्रीणि नियमानि उदाहरणसहितं लिखत।
उत्तर
नियमः (क) — लिङ्गम्: विशेष्यस्य यत् लिङ्गं भवति तत् एव लिङ्गं विशेषणस्य अपि भवति।
नियमः (ख) — वचनम्: विशेष्यस्य यत् वचनं भवति तदेव वचनं विशेषणस्य अपि भवति।
नियमः (ग) — विभक्तिः: विशेष्यस्य या विभक्तिः सा एव विभक्तिः विशेषणस्य अपि भवति।
नियमःपाठस्य उदाहरणम्विवरणम्
(क) लिङ्गम्लौकिकः खगः‘खगः’ विशेष्यपदं पुंलिङ्गम् अस्ति, अतः ‘लौकिकः’ विशेषणपदम् अपि पुंलिङ्गम् एव।
(ख) वचनम्उत्तमाः वैद्याः‘वैद्याः’ विशेष्यपदं बहुवचने वर्तते, अतः ‘उत्तमाः’ विशेषणपदम् अपि बहुवचने एव।
(ग) विभक्तिःमधुरां वाणीम्‘वाणीम्’ विशेष्यपदं द्वितीयाविभक्तौ वर्तते, अतः ‘मधुराम्’ विशेषणपदम् अपि द्वितीयाविभक्तौ एव।
सूत्ररूपेण श्लोकः —
यल्लिङ्गं यद्वचनं या च विभक्तिर्विशेष्यस्य।
तल्लिङ्गं तद्वचनं सा च विभक्तिर्विशेषणस्यापि॥
प्र.3अस्यां सारिण्यां केषाञ्चन विशेषणपदानां त्रिषु लिङ्गेषु प्रयोगः दर्शितः। एतान् पठत। (तथा वाक्यप्रयोग-सारणी अपि पठत।)
उत्तर

सारणी १ — त्रिषु लिङ्गेषु रूपाणि:

शब्दःपुंलिङ्गम्स्त्रीलिङ्गम्नपुंसकलिङ्गम्
उत्तमउत्तमःउत्तमाउत्तमम्
मनोहरमनोहरःमनोहरामनोहरम्
विस्मितविस्मितःविस्मिताविस्मितम्
उत्कृष्टउत्कृष्टःउत्कृष्टाउत्कृष्टम्
एकएकःएकाएकम्

सारणी २ — वाक्यप्रयोगः:

पुंलिङ्गम्स्त्रीलिङ्गम्नपुंसकलिङ्गम्
उत्तमः बालकःउत्तमा बालिकाउत्तमं गृहम्
मनोहरः पर्वतःमनोहरा वाटिकामनोहरम् उद्यानम्
उत्कृष्टः लेखकःउत्कृष्टा लेखिकाउत्कृष्टं पुस्तकम्
एकः विद्यालयःएका पाकशालाएकं चित्रम्

अभ्यासात् जायते सिद्धिः — पृष्ठ 104प्रश्नः १ : अधोलिखितान् प्रश्नान् एकपदेन उत्तरत

अभ्यासः
प्र.1 (क)शुकरूपं कः धृतवान् ?
उत्तर
उत्तरम् — धन्वन्तरिः (भगवान् धन्वन्तरिः)।

पाठे — “भारतवर्षे वैद्याः विभिन्नानां व्याधीनां शमनं कथं कुर्वन्ति” इति ज्ञातुं पुरा भगवान् धन्वन्तरिः मनोहरं शुकरूपं धृत्वा प्रतिग्रामम् अभ्रमत्।

प्र.1 (ख)धन्वन्तरिः (शुकः) कुत्र उपविश्य ध्वनिम् अकरोत् ?
उत्तर
उत्तरम् — वृक्षे (भवनपार्श्वस्थे वृक्षे)।

पाठे — भ्रमणकाले सः बहूनां प्रख्यातवैद्यानां भवनपार्श्वस्थे वृक्षे उपविश्य ‘कोऽरुक्’ ‘कोऽरुक्’ ‘कोऽरुक्’ इति ध्वनिम् अकरोत्।

प्र.1 (ग)अन्ते शुकः कस्य आश्रमस्य समीपं गतवान् ?
उत्तर
उत्तरम् — वाग्भटस्य (वैद्यस्य वाग्भटस्य)।

पाठे — अन्ते सः वैद्यस्य वाग्भटस्य कुटीरसमीपं गतवान्। तत्र विशाले प्राङ्गणे स्थितं पुष्पतरुम् आरुह्य मधुरया गिरा ‘कोऽरुक्’ इति शब्दम् अकरोत्।

प्र.1 (घ)ऋतवः कति सन्ति ?
उत्तर
उत्तरम् — षट् (षट् ऋतवः सन्ति)।

पाठे — ग्रीष्मः, वर्षा, शरद्, शिशिरः, हेमन्तः, वसन्तः चेति षट् ऋतवः भवन्ति।

प्र.1 (ङ)वाग्भटः शुकस्य रहस्यं केभ्यः उक्तवान् ?
उत्तर
उत्तरम् — शिष्येभ्यः (छात्रेभ्यः)।

पाठे — तदा वाग्भटः शुकस्य रहस्यम् उक्तवान् — “प्रियशिष्याः ! अयं विहगः न सामान्यविहगः, अपि तु आयुर्वेदस्य पूज्यः देवः भगवान् धन्वन्तरिः एव स्वयं शुकरूपेण अत्र आगच्छत्।”

अभ्यासात् जायते सिद्धिः — पृष्ठ 104प्रश्नः २ : पट्टिकातः उचितानि पदानि चित्वा रिक्तस्थानानि पूरयत (चरकस्य, कुटीरसमीपं, भारतवर्षे, आयुर्वेदज्ञानेन, अतिमात्रं)

अभ्यासः
प्र.2 (क)……………………… जनाः कथं निरामयाः भवन्ति ?
उत्तर
उत्तरम् — भारतवर्षे जनाः कथं निरामयाः भवन्ति ?

कारण: ‘कहाँ’ (स्थान) बताने वाला सप्तमी-पद चाहिए — पट्टिका में ऐसा पद ‘भारतवर्षे’ है।

प्र.2 (ख)अन्ते सः वैद्यस्य वाग्भटस्य ……………………… गतवान्।
उत्तर
उत्तरम् — अन्ते सः वैद्यस्य वाग्भटस्य कुटीरसमीपं गतवान्।

कारण: पाठ में — ‘अन्ते सः वैद्यस्य वाग्भटस्य कुटीरसमीपं गतवान्।’ ‘गतवान्’ के साथ स्थान (कहाँ गया) चाहिए।

प्र.2 (ग)तव उत्कृष्टेन ……………………… अहम् अतीव सन्तुष्टः अस्मि।
उत्तर
उत्तरम् — तव उत्कृष्टेन आयुर्वेदज्ञानेन अहम् अतीव सन्तुष्टः अस्मि।

कारण: विशेषण ‘उत्कृष्टेन’ तृतीया एकवचन में है, अतः विशेष्य भी तृतीया एकवचन में — ‘आयुर्वेदज्ञानेन’। (धन्वन्तरि का वाग्भट से कथन)

प्र.2 (घ)महर्षेः ……………………… नाम भवन्तः श्रुतवन्तः स्युः।
उत्तर
उत्तरम् — महर्षेः चरकस्य नाम भवन्तः श्रुतवन्तः स्युः।

कारण: ‘महर्षेः’ षष्ठी एकवचन है, अतः उसका नाम भी षष्ठी एकवचन में — ‘चरकस्य’।

प्र.2 (ङ)लघुद्रव्याणि ……………………… सेवनेन हानिकराणि जायन्ते।
उत्तर
उत्तरम् — लघुद्रव्याणि अतिमात्रं सेवनेन हानिकराणि जायन्ते।

कारण: हलके (लघु) पदार्थ भी अत्यधिक मात्रा में खाने से हानिकारक हो जाते हैं — श्लोक २ का भावार्थ।

अभ्यासात् जायते सिद्धिः — पृष्ठ 104प्रश्नः ३ : अधोलिखितानां प्रश्नानां पूर्णवाक्येन उत्तराणि लिखत

अभ्यासः
प्र.3 (क)मधुरां वाणीं श्रुत्वा चिकित्सानिरतः वाग्भटः किम् अकरोत् ?
उत्तर
उत्तरम् — मधुरां वाणीं श्रुत्वा चिकित्सानिरतः वाग्भटः प्राङ्गणम् आगत्य सर्वासु दिक्षु अपश्यत्।

क्षण भर में उसे वह मनोहर तोता दिख गया — क्षणात् वाग्भटः मनोहरं तं शुकम् अपश्यत्।

प्र.3 (ख)वाग्भटः झटिति किम् अकरोत् ?
उत्तर
उत्तरम् — वाग्भटः झटिति तस्मै विहगाय मधुराणि फलानि समर्पितवान्।

परन्तु उस पक्षी ने फल नहीं लिए — परन्तु सः खगः फलानि न गृहीत्वा पुनरपि तथैव ‘कोऽरुक्’ इति प्रश्नस्वरेण शब्दम् अकरोत्।

प्र.3 (ग)छात्राः पुनः जिज्ञासया आचार्यं किम् अपृच्छन् ?
उत्तर
उत्तरम् — छात्राः पुनः जिज्ञासया अपृच्छन् — “आचार्य ! ‘हितभुक्, मितभुक्, ऋतुभुक्’ इति एतेषां कः आशयः ?”

इसी प्रश्न के उत्तर में वाग्भट ने महर्षि चरक के तीन श्लोक सुनाए — एक हितभुक् पर, एक मितभुक् पर और एक ऋतुभुक् पर।

प्र.3 (घ)भगवान् धन्वन्तरिः अस्माकं कृते संक्षेपेण किं प्रदत्तवान् ?
उत्तर
उत्तरम् — भगवान् धन्वन्तरिः अस्माकं कृते संक्षेपेण स्वास्थ्यरक्षणाय सूत्ररूपेण सन्देशं प्रदत्तवान्।

वह सन्देश यही है — व्यायामः प्रातरुत्थाय, नित्यं दन्तविशोधनम्। स्वच्छजलेन सुस्नानं, बुभुक्षायाञ्च भोजनम्॥

प्र.3 (ङ)ऋषयः नित्यं कां प्रार्थनां कुर्वन्ति ?
उत्तर
उत्तरम् — ऋषयः नित्यम् इमां प्रार्थनां कुर्वन्ति —
सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत्॥

[अर्थ — सब सुखी हों, सब नीरोग हों, सब कल्याण देखें, कोई भी दुःख का भागी न बने।]

अभ्यासात् जायते सिद्धिः — पृष्ठ 105प्रश्नः ४ : पाठात् यथोचितानि विशेषणपदानि विशेष्यपदानि वा चित्वा रिक्तस्थानानि पूरयत

अभ्यासः
प्र.4पाठात् यथोचितानि विशेषणपदानि विशेष्यपदानि वा चित्वा रिक्तस्थानानि पूरयत —
सारणी १
विशेषणम्विशेष्यम्
विभिन्नानाम्व्याधीनाम्
मनोहरम्……………
……………प्राङ्गणे
……………वाग्भटः
मधुराणि……………
……………वैद्यस्य
महर्षेः……………
सारणी २
विशेषणम्विशेष्यम्
……………वैद्याः
……………वृक्षे
……………वाणीम्
लौकिकः……………
समुचितम्……………
……………शिष्याः
सात्त्विकम्……………
उत्तर

दोनों सारणियाँ पूरी करने पर (रिक्तस्थानों के उत्तर नारंगी रंग में) —

सारणी १

विशेषणम्विशेष्यम्पाठे प्रयोगः
विभिन्नानाम्व्याधीनाम्वैद्याः विभिन्नानां व्याधीनां शमनं कुर्वन्ति (उदाहरणम्)
मनोहरम्शुकरूपम्धन्वन्तरिः मनोहरं शुकरूपं धृत्वा अभ्रमत्
विशालेप्राङ्गणेतत्र विशाले प्राङ्गणे स्थितं पुष्पतरुम् आरुह्य
विस्मितःवाग्भटःविस्मितः वाग्भटः चिन्तितवान्
मधुराणिफलानितस्मै विहगाय मधुराणि फलानि समर्पितवान्
उत्तमस्यवैद्यस्यउत्तमस्य वैद्यस्य अन्वेषणाय भारतवर्षे परिभ्रमन्
महर्षेःचरकस्यमहर्षेः चरकस्य नाम भवन्तः श्रुतवन्तः स्युः

सारणी २

विशेषणम्विशेष्यम्पाठे प्रयोगः
उत्तमाःवैद्याःउत्तमाः वैद्याः (‘इदम् अत्र अवधेयम्’ पेटिकायाम्)
भवनपार्श्वस्थेवृक्षेप्रख्यातवैद्यानां भवनपार्श्वस्थे वृक्षे उपविश्य
मधुराम्वाणीम्मधुरां वाणीं श्रुत्वा वाग्भटः प्राङ्गणम् आगत्य …
लौकिकःखगःनायं लौकिकः खगः
समुचितम्उत्तरम्समुचितम् उत्तरं श्रुत्वा अत्यन्तं प्रीतः सः शुकः
विस्मिताःशिष्याःएतत् सर्वं दूरात् पश्यन्तः विस्मिताः शिष्याः
सात्त्विकम्भोजनम्समयानुसारं सात्त्विकं भोजनम् आवश्यकम्

अभ्यासात् जायते सिद्धिः — पृष्ठ 105प्रश्नः ५ : पाठं पठित्वा अधोलिखितपट्टिकातः पदानि चित्वा उचितसञ्चिकायां पूरयत

अभ्यासः
प्र.5पट्टिका — लौकिकः, व्याधीनाम्, देवः, वृक्षे, त्रीणि, उत्तमस्य, वाणीम्, विस्मितः, मधुरया, प्रश्नान्, पूज्यः, खगः, विशाले, शुकम्, वाग्भटः। इन पदों को ‘विशेषणपदानि’ तथा ‘विशेष्यपदानि’ नामक दो सञ्चिकाओं में भरिए। (सञ्चिकासु दत्तम् उदाहरणम् — विशेषणपदानि : लौकिकः ; विशेष्यपदानि : व्याधीनाम्)
उत्तर
विशेषणपदानि (७)विशेष्यपदानि (८)
लौकिकः (उदाहरणम्)
त्रीणि
उत्तमस्य
विस्मितः
मधुरया
पूज्यः
विशाले
व्याधीनाम् (उदाहरणम्)
देवः
वृक्षे
वाणीम्
प्रश्नान्
खगः
शुकम्
वाग्भटः

कुल — विशेषणपदानि : ७, विशेष्यपदानि : ८।

अभ्यासात् जायते सिद्धिः — पृष्ठ 106प्रश्नः ६ : अधोलिखितानि वाक्यानि पठित्वा तेन सम्बद्धं श्लोकं पाठात् चित्वा लिखत

अभ्यासः
प्र.6 (क)अस्माभिः नित्यं व्यायामः, स्नानं, दन्तधावनं, बुभुक्षायाञ्च भोजनं कर्तव्यम्।
उत्तर
सम्बद्धः श्लोकः (श्लोकः ४) —
व्यायामः प्रातरुत्थाय, नित्यं दन्तविशोधनम्।
स्वच्छजलेन सुस्नानं, बुभुक्षायाञ्च भोजनम्॥ ४॥

कारण: व्यायाम, दन्तधावन (दन्तविशोधन), स्नान और भूख लगने पर भोजन — चारों बातें इसी श्लोक में हैं।

प्र.6 (ख)अस्माभिः हितकरः आहारः सेवनीयः येन विकाराणां शमनं स्वास्थ्यस्य च रक्षणं भवेत्।
उत्तर
सम्बद्धः श्लोकः (श्लोकः १) —
तच्च नित्यं प्रयुञ्जीत, स्वास्थ्यं येनानुवर्तते।
अजातानां विकाराणामनुत्पत्तिकरं च यत्॥ १॥

कारण: स्वास्थ्य की रक्षा और विकारों का उत्पन्न न होना — दोनों बातें इसी श्लोक (हितभुक्) में हैं।

प्र.6 (ग)ऋतोः अनुसारं भोजनेन बलस्य वर्णस्य च अभिवृद्धिः भवति।
उत्तर
सम्बद्धः श्लोकः (श्लोकः ३) —
तस्याशिताद्यादाहारात् बलं वर्णश्च वर्धते।
तस्यर्तुसात्म्यं विदितं चेष्टाहारव्यपाश्रयम्॥ ३॥

कारण: ‘बलं वर्णश्च वर्धते’ तथा ‘ऋतुसात्म्यम्’ — ऋतु के अनुसार भोजन से बल और वर्ण की वृद्धि (ऋतुभुक्)।

योग्यताविस्तरः — पृष्ठ 106–108(क) श्लोकानां पदच्छेदः अन्वयः च — श्लोकाः १–५

योग्यताविस्तरः
प्र.1तच्च नित्यं प्रयुञ्जीत, स्वास्थ्यं येनानुवर्तते।
अजातानां विकाराणामनुत्पत्तिकरं च यत्॥ १॥
— अस्य श्लोकस्य पदच्छेदः, अन्वयः, अर्थः, भावार्थः च लिखत।
उत्तर
पदच्छेदः — तत् च नित्यम् प्रयुञ्जीत स्वास्थ्यम् येन अनुवर्तते, अजातानाम् विकाराणाम् अनुत्पत्तिकरम् च यत्।
अन्वयः — अजातानां विकाराणां च यत् अनुत्पत्तिकरं, येन स्वास्थ्यम् अनुवर्तते च तत् नित्यं प्रयुञ्जीत।
प्र.2अल्पादाने गुरूणां च लघूनां चातिसेवने।
मात्राकारणमुद्दिष्टं द्रव्याणां गुरुलाघवे॥ २॥
— अस्य श्लोकस्य पदच्छेदः, अन्वयः, अर्थः, भावार्थः च लिखत।
उत्तर
पदच्छेदः — अल्पादाने गुरूणाम् च लघूनाम् च अतिसेवने मात्राकारणम् उद्दिष्टम् द्रव्याणाम् गुरुलाघवे।
अन्वयः — गुरूणाम् (द्रव्याणाम्) अल्पादाने (हितं भवति) लघूनां (द्रव्याणां) च अतिसेवने (हानिः भवति)। गुरुलाघवे (भोजनग्रहणे) द्रव्याणां मात्रा कारणम् उद्दिष्टम् (अस्ति)।
प्र.3तस्याशिताद्यादाहारात् बलं वर्णश्च वर्धते।
तस्यर्तुसात्म्यं विदितं चेष्टाहारव्यपाश्रयम्॥ ३॥
— अस्य श्लोकस्य पदच्छेदः, अन्वयः, अर्थः, भावार्थः च लिखत।
उत्तर
पदच्छेदः — तस्य अशिताद्यात् आहारात् बलम् वर्णः च वर्धते, तस्य ऋतुसात्म्यम् विदितम्, चेष्टा-आहार-व्यपाश्रयम्।
अन्वयः — तस्य (जनस्य) अशिताद्यात् आहारात् बलं वर्णः च वर्धते। तस्य चेष्टा-आहार-व्यपाश्रयम् ऋतुसात्म्यं विदितम् (भोक्तव्यम्)।
प्र.4व्यायामः प्रातरुत्थाय, नित्यं दन्तविशोधनम्।
स्वच्छजलेन सुस्नानं, बुभुक्षायाञ्च भोजनम्॥ ४॥
— अस्य श्लोकस्य पदच्छेदः, अन्वयः, अर्थः, भावार्थः च लिखत।
उत्तर
पदच्छेदः — व्यायामः प्रातः उत्थाय नित्यम् दन्तविशोधनम् स्वच्छजलेन सुस्नानम् बुभुक्षायाम् च भोजनम्।
अन्वयः — नित्यं प्रातः उत्थाय व्यायामः (करणीयः), दन्तविशोधनं (कर्त्तव्यम्), स्वच्छजलेन सुस्नानं (कार्यम्), बुभुक्षायां (जातायां) भोजनं च (कर्त्तव्यम्)।
प्र.5सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत्॥ ५॥
— अस्य श्लोकस्य पदच्छेदः, अन्वयः, अर्थः, भावार्थः च लिखत।
उत्तर
पदच्छेदः — सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखभाग् भवेत्।
अन्वयः — सर्वे सुखिनः भवन्तु, सर्वे निरामयाः सन्तु। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, कश्चिद् दुःखभाक् मा भवेत्।

योग्यताविस्तरः — पृष्ठ 108(ख) चरकसंहितायाः परिचयः

योग्यताविस्तरः
प्र.1चरकसंहितायाः परिचयं लिखत — कः रचितवान् ? तस्मिन् ग्रन्थे कति स्थानानि सन्ति ? तत्र किं वर्णितम् ?
उत्तर
उत्तरम् — महर्षिः चरकः चरकसंहिताग्रन्थं रचितवान्। चरकसंहिता इति आयुर्वेदस्य प्रमुखः ग्रन्थः अस्ति। अस्मिन् ग्रन्थे अष्ट स्थानानि सन्ति।
क्रमःस्थानम्हिन्दी में
१सूत्रस्थानम्मूल सिद्धान्त एवं सूत्र
२निदानस्थानम्रोग का कारण एवं पहचान
३विमानस्थानम्माप, मात्रा एवं परीक्षा-विधि
४शरीरस्थानम्शरीर की रचना
५इन्द्रियस्थानम्इन्द्रियाँ एवं रोग-लक्षण
६चिकित्सास्थानम्चिकित्सा
७कल्पस्थानम्औषध-निर्माण
८सिद्धिस्थानम्चिकित्सा की सफलता एवं पञ्चकर्म

ग्रन्थे किं वर्णितम् — अत्र न केवलं रोगाणां चिकित्सा एव वर्णिता, अपितु स्वास्थ्यस्य संरक्षणार्थम् आयुषः च संवर्धनार्थम् उपायाः अपि निर्दिष्टाः।

योग्यताविस्तरः — पृष्ठ 108–109(ग) आहारपरिचयः — सात्त्विकः, राजसिकः, तामसिकः आहारः (श्रीमद्भगवद्गीता १७/८–१०)

योग्यताविस्तरः
प्र.1सात्त्विकः आहारः — “आयुःसत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः।
रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्याः आहाराः सात्त्विकप्रियाः॥” (श्रीमद्-भगवद्गीता १७/८) — अस्य भावार्थं लिखत।
उत्तर
प्र.2राजसिकः आहारः — “कट्वम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः।
आहारा राजसस्येष्टा दुःखशोकामयप्रदाः॥” (श्रीमद्भगवद्गीता १७/९) — अस्य भावार्थं लिखत।
उत्तर
प्र.3तामसिकः आहारः — “यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत्।
उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम्॥” (श्रीमद्भगवद्गीता १७/१०) — अस्य भावार्थं लिखत।
उत्तर

योग्यताविस्तरः — पृष्ठ 109–110(घ) काश्चन आहारविषयकसूक्तयः

योग्यताविस्तरः
प्र.1“भोजनं परमेशस्य, भक्तये जीवनाय च।
त्वं तु मूर्ख विजानासि भोजनार्थं हि जीवनम्॥” (सुमनोवाटिका) — अस्याः सूक्तेः अर्थं भावं च लिखत।
उत्तर
अन्वयः — भोजनं परमेशस्य भक्तये जीवनाय च (अस्ति)। हे मूर्ख ! त्वं तु ‘भोजनार्थं हि जीवनम्’ (इति) विजानासि।

भावः — भोजन जीवन के लिए है, जीवन भोजन के लिए नहीं; भोजन साधन है, साध्य नहीं।

प्र.2“अनारोग्यमनायुष्यमस्वर्ग्यं चातिभोजनम्।
अपुण्यं लोकविद्विष्टं तस्मात्तत्परिवर्जयेत्॥” (मनुस्मृतिः २/५७) — अस्याः सूक्तेः अर्थं भावं च लिखत।
उत्तर
पदच्छेदः — अनारोग्यम् अनायुष्यम् अस्वर्ग्यम् च अतिभोजनम् अपुण्यम् लोकविद्विष्टम् तस्मात् तत् परिवर्जयेत्।
अन्वयः — अतिभोजनम् अनारोग्यम्, अनायुष्यम्, अस्वर्ग्यम्, अपुण्यं लोकविद्विष्टं च (भवति); तस्मात् तत् परिवर्जयेत्।

भावः — अतिभोजन शरीर, आयु, पुण्य और समाज — सबकी दृष्टि से हानिकर है, अतः उसे छोड़ देना चाहिए (मितभुक्)।

प्र.3“मिताहारो नरः सोढुं शक्तः कष्ट-शतं सुखम्।
अनभ्यस्तो हि कष्टानामध्यशनो विपद्यते॥” (सुमनोवाटिका) — अस्याः सूक्तेः अर्थं भावं च लिखत।
उत्तर
पदच्छेदः — मिताहारः नरः सोढुम् शक्तः कष्ट-शतम् सुखम्। अनभ्यस्तः हि कष्टानाम् अध्यशनः विपद्यते।
अन्वयः — मिताहारः नरः कष्ट-शतं सुखं सोढुं शक्तः (भवति)। कष्टानाम् अनभ्यस्तः अध्यशनः हि विपद्यते।

भावः — मिताहार से सहनशक्ति बढ़ती है; अधिक खाने वाला कष्ट नहीं सह पाता और विपत्ति में पड़ता है।

प्र.4“अशीतेनाम्भसा स्नानं कवोष्णदुग्धसेवनम्।
एतद् वो मानुषाः पथ्यं स्निग्धमुष्णं च भोजनम्॥” (भोजप्रबन्धः) — अस्याः सूक्तेः अर्थं भावं च लिखत।
उत्तर
पदच्छेदः — अशीतेन अम्भसा स्नानम् कवोष्ण-दुग्ध-सेवनम्। एतत् वः मानुषाः पथ्यम् स्निग्धम् उष्णम् च भोजनम्।
अन्वयः — हे मानुषाः ! अशीतेन अम्भसा स्नानम्, कवोष्ण-दुग्ध-सेवनम्, स्निग्धम् उष्णं च भोजनम् — एतत् वः पथ्यम् (अस्ति)।

भावः — गुनगुने जल से स्नान, हलका गरम दूध तथा स्निग्ध और उष्ण भोजन — यही स्वास्थ्य के लिए पथ्य है।

परियोजनाकार्यम् — पृष्ठ 110परियोजना-कार्य (प्रकल्प) — त्रीणि कार्याणि

परियोजनाकार्यम्
प्र.1विद्यालयस्य परिसरे विद्यमानानां पञ्चवृक्षाणां नामानि तेषाम् औषधीयं प्रयोगं च लिखत।
उत्तर

नमूना उत्तर (नमूना — अपने विद्यालय के पेड़ों के अनुसार बदलिए):

संस्कृतनामहिन्दी नामऔषधीयः प्रयोगः (संस्कृतम्)हिन्दी में
निम्बःनीमनिम्बपत्राणि त्वग्रोगेषु व्रणशोधने च प्रयुज्यन्ते।पत्ते त्वचा-रोग तथा घाव साफ़ करने में।
आमलकीआँवलाआमलकीफलं केशानां नेत्रयोः पाचनस्य च हितकरम्।फल बाल, आँख और पाचन के लिए हितकर।
बिल्वःबेलबिल्वफलम् उदररोगेषु अतिसारे च हितकरम्।फल पेट के रोगों और दस्त में हितकर।
जम्बूःजामुनजम्बूफलं पाचने हितकरम्; तस्य बीजचूर्णं मधुमेहे परम्परया प्रयुज्यते।फल पाचन में; गुठली का चूर्ण परम्परा से मधुमेह में।
अर्जुनःअर्जुनअर्जुनस्य त्वक् हृदयाय हितकरी इति आयुर्वेदे प्रसिद्धम्।छाल हृदय के लिए हितकर मानी जाती है।
प्र.2स्वास्थ्येन सम्बद्धानां दशश्लोकानां संग्रहणं कुरुत।
उत्तर

नमूना संग्रह (दश श्लोकाः) —

क्रमःश्लोकस्य आरम्भःस्रोतःविषयः
१तच्च नित्यं प्रयुञ्जीत, स्वास्थ्यं येनानुवर्तते…चरकसंहिता (पाठे श्लोकः १)हितभुक्
२अल्पादाने गुरूणां च लघूनां चातिसेवने…चरकसंहिता (पाठे श्लोकः २)मितभुक्
३तस्याशिताद्यादाहारात् बलं वर्णश्च वर्धते…चरकसंहिता (पाठे श्लोकः ३)ऋतुभुक्
४व्यायामः प्रातरुत्थाय, नित्यं दन्तविशोधनम्…पाठे श्लोकः ४दिनचर्या
५सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः…पाठे श्लोकः ५सर्वकल्याण-प्रार्थना
६आयुःसत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः…श्रीमद्भगवद्गीता १७/८सात्त्विक आहार
७कट्वम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः…श्रीमद्भगवद्गीता १७/९राजसिक आहार
८यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत्…श्रीमद्भगवद्गीता १७/१०तामसिक आहार
९अनारोग्यमनायुष्यमस्वर्ग्यं चातिभोजनम्…मनुस्मृतिः २/५७अतिभोजन-निषेधः
१०अशीतेनाम्भसा स्नानं कवोष्णदुग्धसेवनम्…भोजप्रबन्धःस्नानं तथा पथ्यम्
प्र.3पाठे आगतान् श्लोकान् कण्ठस्थीकृत्य कक्षायां श्रावयत।
उत्तर

कैसे करें: पाठ के पाँचों श्लोक कण्ठस्थ करके कक्षा में सस्वर सुनाइए। कण्ठस्थ करने का सरल क्रम —

सुनाने योग्य पाँच श्लोक —

१. तच्च नित्यं प्रयुञ्जीत, स्वास्थ्यं येनानुवर्तते। अजातानां विकाराणामनुत्पत्तिकरं च यत्॥
२. अल्पादाने गुरूणां च लघूनां चातिसेवने। मात्राकारणमुद्दिष्टं द्रव्याणां गुरुलाघवे॥
३. तस्याशिताद्यादाहारात् बलं वर्णश्च वर्धते। तस्यर्तुसात्म्यं विदितं चेष्टाहारव्यपाश्रयम्॥
४. व्यायामः प्रातरुत्थाय, नित्यं दन्तविशोधनम्। स्वच्छजलेन सुस्नानं, बुभुक्षायाञ्च भोजनम्॥
५. सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत्॥

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