NCERT Solutions for Class 8 Sanskrit Chapter 9 कोऽरुक् ? कोऽरुक् ? कोऽरुक् ? – step-by-step answers to every exercise and in-text question of the chapter, as per the latest NCERT syllabus for 2027. Read them online or download the free question-answer PDF.
दीपकम् (कक्षा 8) का नवमः पाठः — कोऽरुक् ? कोऽरुक् ? कोऽरुक् ? पाठ का शीर्षक ही उसका प्रश्न है — ‘कोऽरुक्’ अर्थात् कः अरुक् ? कौन नीरोग है ? भगवान् धन्वन्तरि शुक (तोते) का रूप धारण कर यही प्रश्न पूछते हैं और आचार्य वाग्भट तीन सूत्रों में उत्तर देते हैं — हितभुक्, मितभुक्, ऋतुभुक्। यहाँ पाठ के चित्र-संवाद, शब्दार्थ-सारणी, ‘इदम् अत्र अवधेयम्’ (विशेषण-विशेष्य), अभ्यासात् जायते सिद्धिः के छहों प्रश्न, योग्यताविस्तरः तथा परियोजनाकार्यम् — सबके उत्तर दिए गए हैं।
NCERT Solutions for Class 8 Sanskrit Chapter 9 कोऽरुक् ? कोऽरुक् ? कोऽरुक् ? PDF
All the answers are on this page below. The PDF also explains every answer – why it is right and how to check it – so download it for revision.
| Chapter | Download | |
|---|---|---|
| Solutions PDF | कोऽरुक् ? कोऽरुक् ? कोऽरुक् ? | View PDF |
पाठ का हिंदी अनुवाद
चित्र-संवादः — माता, पिता, पुत्री, पुत्रः (पृष्ठ 97)
कथा — शुकरूपः धन्वन्तरिः वाग्भटः च (पृष्ठ 98–99)
हितभुक्, मितभुक्, ऋतुभुक् — श्लोकाः (पृष्ठ 99–101)
अजातानां विकाराणामनुत्पत्तिकरं च यत्॥ १ ॥
मात्राकारणमुद्दिष्टं द्रव्याणां गुरुलाघवे॥ २ ॥
तस्यर्तुसात्म्यं विदितं चेष्टाहारव्यपाश्रयम्॥ ३ ॥
स्वच्छजलेन सुस्नानं, बुभुक्षायाञ्च भोजनम्॥ ४ ॥
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत्॥ ५ ॥”
NCERT Solutions for Class 8 Sanskrit Chapter 9 कोऽरुक् ? कोऽरुक् ? कोऽरुक् ? – Questions and Answers
All questions of the chapter are answered below, in the order of the book – in-text questions, activities and the end-of-chapter exercises. Each answer is written the way you would write it in the exam.
चित्र-संवादः (पाठे विद्यमानः प्रश्नः) — पृष्ठ 97पाठारम्भे चित्रसंवादः — माता, पुत्री, पुत्रः च
चित्र-संवाद में पिता यही कारण बताते हैं — “वत्से ! मुखे दाहः भवेत्, अपि च ‘अत्युष्णं भोजनं हितकरं न भवति’ इति आयुर्वेदस्य उपदेशः।” माता भी पहले कहती है — “वत्से, भोजनम् अत्युष्णम् अस्ति, किञ्चित् प्रतीक्षस्व।”
वयं शब्दार्थान् जानीमः — पृष्ठ 101–102शब्दार्थ-सारणी तथा ‘मातृभाषया अर्थं लिखत’ स्तम्भः
सारणी का अन्तिम स्तम्भ जान-बूझकर खाली छोड़ा गया है — उसमें अपनी मातृभाषा (हिन्दी, मराठी, तमिल, बाङ्ग्ला … जो भी आपकी भाषा हो) में अर्थ लिखना है। नीचे पूरी सारणी संस्कृत-अर्थ, हिन्दी और अंग्रेज़ी सहित दी गई है; अन्तिम स्तम्भ के लिए नमूना उत्तर हिन्दी में दिया गया है।
| शब्दः | अर्थः (संस्कृतम्) | हिन्दी | English | मातृभाषया अर्थः (नमूना — हिन्दी) |
|---|---|---|---|---|
| निरामयाः | नीरोगिणः | स्वस्थ | Healthy | रोगरहित, तन्दुरुस्त |
| अरुक् | स्वस्थः | नीरोग | One who is not sick | जो बीमार न हो |
| झटिति | शीघ्रमेव | शीघ्र | Quickly | तुरन्त, फ़ौरन |
| हितभुक् | यः हितकरं खादति | हितकारक खाने वाला | One who eats nutritious food | जो लाभदायक भोजन करे |
| मितभुक् | यः आवश्यक-मात्रा-अनुसारं भोजनं खादति | सीमित मात्रा में भोजन करने वाला | One who eats food in limited quantity | जो नपा-तुला खाए |
| ऋतुभुक् | यः ऋत्वनुकूलं पथ्यं भोजनं करोति | ऋतु के अनुसार उपयुक्त भोजन करने वाला | One who eats food which is appropriate as per season | जो मौसम के अनुसार खाए |
| प्रयुञ्जीत | प्रयोगं कुर्यात् | प्रयोग करे | Should take | सेवन करना चाहिए |
| अनुवर्तते | अनुसरति | अनुसरण करता है | Follows | पीछे-पीछे चलता है, बना रहता है |
| अजातानाम् | न उत्पन्नानाम् | जो पैदा नहीं हुए उनको | Of those who are not born | जो अभी हुए ही नहीं |
| अनुत्पत्तिकरम् | यत् (विकारान्) न उत्पादयति | जो (विकारों) को उत्पन्न न करे | That which may not cause (harm) | जो रोग पैदा न होने दे |
| लघूनाम् | सुपाच्यानाम् | सुपाच्य खाद्यों का | Of digestible food | हल्के, जल्दी पचने वाले भोजन का |
| उद्दिष्टम् | उल्लिखितम् | बताया गया है | Which has been instructed | कहा गया है |
| गरिष्ठम् | यत् कठिनतया पच्यते | जो कठिनता से पचे | Difficult to digest | भारी, देर से पचने वाला |
| अतिमात्रम् | मात्रायाः आधिक्यम् | अत्यधिक मात्रा से | In excessive quantity | ज़रूरत से ज़्यादा |
| अशिताद्यात् | भुक्तात् | खाए हुए से | From eaten food | खाए गए भोजन से |
| व्यपाश्रयम् | आश्रयस्थानम् | अवलम्ब | Depending | जिस पर टिका हो, आधार |
| वर्णकान्तिजनकम् | वर्णस्य सौन्दर्यस्य च उत्पादकम् | रूप रंग निखारने वाला | that which enhances the beauty and complexion | चेहरे का रंग-रूप निखारने वाला |
| बुभुक्षायाम् | क्षुधायाम् | भूख लगने पर | On feeling hungry | भूख लगे तब |
इदम् अत्र अवधेयम् — पृष्ठ 102–103व्याकरण-पेटिका — विशेषणम्, विशेष्यम् तथा तयोः सम्बन्धः
विशेष्यम् — यत् पदं मुख्यतया विशेषरूपेण उच्यते तत् पदं विशेष्यं भवति।
पाठस्य उदाहरणे — ‘उत्तमाः वैद्याः’ — अत्र ‘वैद्यस्य’ विशेषता उक्ता, अतः वैद्याः = विशेष्यपदम् तथा उत्तमाः = विशेषणपदम्। एवमेव पाठे ‘उत्तमाः’, ‘मनोहरम्’ इत्यादयः शब्दाः विशेषतां प्रकटयन्ति, अतः एते विशेषणानि सन्ति।
नियमः (ख) — वचनम्: विशेष्यस्य यत् वचनं भवति तदेव वचनं विशेषणस्य अपि भवति।
नियमः (ग) — विभक्तिः: विशेष्यस्य या विभक्तिः सा एव विभक्तिः विशेषणस्य अपि भवति।
| नियमः | पाठस्य उदाहरणम् | विवरणम् |
|---|---|---|
| (क) लिङ्गम् | लौकिकः खगः | ‘खगः’ विशेष्यपदं पुंलिङ्गम् अस्ति, अतः ‘लौकिकः’ विशेषणपदम् अपि पुंलिङ्गम् एव। |
| (ख) वचनम् | उत्तमाः वैद्याः | ‘वैद्याः’ विशेष्यपदं बहुवचने वर्तते, अतः ‘उत्तमाः’ विशेषणपदम् अपि बहुवचने एव। |
| (ग) विभक्तिः | मधुरां वाणीम् | ‘वाणीम्’ विशेष्यपदं द्वितीयाविभक्तौ वर्तते, अतः ‘मधुराम्’ विशेषणपदम् अपि द्वितीयाविभक्तौ एव। |
यल्लिङ्गं यद्वचनं या च विभक्तिर्विशेष्यस्य।
तल्लिङ्गं तद्वचनं सा च विभक्तिर्विशेषणस्यापि॥
सारणी १ — त्रिषु लिङ्गेषु रूपाणि:
| शब्दः | पुंलिङ्गम् | स्त्रीलिङ्गम् | नपुंसकलिङ्गम् |
|---|---|---|---|
| उत्तम | उत्तमः | उत्तमा | उत्तमम् |
| मनोहर | मनोहरः | मनोहरा | मनोहरम् |
| विस्मित | विस्मितः | विस्मिता | विस्मितम् |
| उत्कृष्ट | उत्कृष्टः | उत्कृष्टा | उत्कृष्टम् |
| एक | एकः | एका | एकम् |
सारणी २ — वाक्यप्रयोगः:
| पुंलिङ्गम् | स्त्रीलिङ्गम् | नपुंसकलिङ्गम् |
|---|---|---|
| उत्तमः बालकः | उत्तमा बालिका | उत्तमं गृहम् |
| मनोहरः पर्वतः | मनोहरा वाटिका | मनोहरम् उद्यानम् |
| उत्कृष्टः लेखकः | उत्कृष्टा लेखिका | उत्कृष्टं पुस्तकम् |
| एकः विद्यालयः | एका पाकशाला | एकं चित्रम् |
अभ्यासात् जायते सिद्धिः — पृष्ठ 104प्रश्नः १ : अधोलिखितान् प्रश्नान् एकपदेन उत्तरत
पाठे — “भारतवर्षे वैद्याः विभिन्नानां व्याधीनां शमनं कथं कुर्वन्ति” इति ज्ञातुं पुरा भगवान् धन्वन्तरिः मनोहरं शुकरूपं धृत्वा प्रतिग्रामम् अभ्रमत्।
पाठे — भ्रमणकाले सः बहूनां प्रख्यातवैद्यानां भवनपार्श्वस्थे वृक्षे उपविश्य ‘कोऽरुक्’ ‘कोऽरुक्’ ‘कोऽरुक्’ इति ध्वनिम् अकरोत्।
पाठे — अन्ते सः वैद्यस्य वाग्भटस्य कुटीरसमीपं गतवान्। तत्र विशाले प्राङ्गणे स्थितं पुष्पतरुम् आरुह्य मधुरया गिरा ‘कोऽरुक्’ इति शब्दम् अकरोत्।
पाठे — ग्रीष्मः, वर्षा, शरद्, शिशिरः, हेमन्तः, वसन्तः चेति षट् ऋतवः भवन्ति।
पाठे — तदा वाग्भटः शुकस्य रहस्यम् उक्तवान् — “प्रियशिष्याः ! अयं विहगः न सामान्यविहगः, अपि तु आयुर्वेदस्य पूज्यः देवः भगवान् धन्वन्तरिः एव स्वयं शुकरूपेण अत्र आगच्छत्।”
अभ्यासात् जायते सिद्धिः — पृष्ठ 104प्रश्नः २ : पट्टिकातः उचितानि पदानि चित्वा रिक्तस्थानानि पूरयत (चरकस्य, कुटीरसमीपं, भारतवर्षे, आयुर्वेदज्ञानेन, अतिमात्रं)
कारण: ‘कहाँ’ (स्थान) बताने वाला सप्तमी-पद चाहिए — पट्टिका में ऐसा पद ‘भारतवर्षे’ है।
कारण: पाठ में — ‘अन्ते सः वैद्यस्य वाग्भटस्य कुटीरसमीपं गतवान्।’ ‘गतवान्’ के साथ स्थान (कहाँ गया) चाहिए।
कारण: विशेषण ‘उत्कृष्टेन’ तृतीया एकवचन में है, अतः विशेष्य भी तृतीया एकवचन में — ‘आयुर्वेदज्ञानेन’। (धन्वन्तरि का वाग्भट से कथन)
कारण: ‘महर्षेः’ षष्ठी एकवचन है, अतः उसका नाम भी षष्ठी एकवचन में — ‘चरकस्य’।
कारण: हलके (लघु) पदार्थ भी अत्यधिक मात्रा में खाने से हानिकारक हो जाते हैं — श्लोक २ का भावार्थ।
अभ्यासात् जायते सिद्धिः — पृष्ठ 104प्रश्नः ३ : अधोलिखितानां प्रश्नानां पूर्णवाक्येन उत्तराणि लिखत
क्षण भर में उसे वह मनोहर तोता दिख गया — क्षणात् वाग्भटः मनोहरं तं शुकम् अपश्यत्।
परन्तु उस पक्षी ने फल नहीं लिए — परन्तु सः खगः फलानि न गृहीत्वा पुनरपि तथैव ‘कोऽरुक्’ इति प्रश्नस्वरेण शब्दम् अकरोत्।
इसी प्रश्न के उत्तर में वाग्भट ने महर्षि चरक के तीन श्लोक सुनाए — एक हितभुक् पर, एक मितभुक् पर और एक ऋतुभुक् पर।
वह सन्देश यही है — व्यायामः प्रातरुत्थाय, नित्यं दन्तविशोधनम्। स्वच्छजलेन सुस्नानं, बुभुक्षायाञ्च भोजनम्॥
सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत्॥
[अर्थ — सब सुखी हों, सब नीरोग हों, सब कल्याण देखें, कोई भी दुःख का भागी न बने।]
अभ्यासात् जायते सिद्धिः — पृष्ठ 105प्रश्नः ४ : पाठात् यथोचितानि विशेषणपदानि विशेष्यपदानि वा चित्वा रिक्तस्थानानि पूरयत
सारणी १
| विशेषणम् | विशेष्यम् |
|---|---|
| विभिन्नानाम् | व्याधीनाम् |
| मनोहरम् | …………… |
| …………… | प्राङ्गणे |
| …………… | वाग्भटः |
| मधुराणि | …………… |
| …………… | वैद्यस्य |
| महर्षेः | …………… |
| विशेषणम् | विशेष्यम् |
|---|---|
| …………… | वैद्याः |
| …………… | वृक्षे |
| …………… | वाणीम् |
| लौकिकः | …………… |
| समुचितम् | …………… |
| …………… | शिष्याः |
| सात्त्विकम् | …………… |
दोनों सारणियाँ पूरी करने पर (रिक्तस्थानों के उत्तर नारंगी रंग में) —
सारणी १
| विशेषणम् | विशेष्यम् | पाठे प्रयोगः |
|---|---|---|
| विभिन्नानाम् | व्याधीनाम् | वैद्याः विभिन्नानां व्याधीनां शमनं कुर्वन्ति (उदाहरणम्) |
| मनोहरम् | शुकरूपम् | धन्वन्तरिः मनोहरं शुकरूपं धृत्वा अभ्रमत् |
| विशाले | प्राङ्गणे | तत्र विशाले प्राङ्गणे स्थितं पुष्पतरुम् आरुह्य |
| विस्मितः | वाग्भटः | विस्मितः वाग्भटः चिन्तितवान् |
| मधुराणि | फलानि | तस्मै विहगाय मधुराणि फलानि समर्पितवान् |
| उत्तमस्य | वैद्यस्य | उत्तमस्य वैद्यस्य अन्वेषणाय भारतवर्षे परिभ्रमन् |
| महर्षेः | चरकस्य | महर्षेः चरकस्य नाम भवन्तः श्रुतवन्तः स्युः |
सारणी २
| विशेषणम् | विशेष्यम् | पाठे प्रयोगः |
|---|---|---|
| उत्तमाः | वैद्याः | उत्तमाः वैद्याः (‘इदम् अत्र अवधेयम्’ पेटिकायाम्) |
| भवनपार्श्वस्थे | वृक्षे | प्रख्यातवैद्यानां भवनपार्श्वस्थे वृक्षे उपविश्य |
| मधुराम् | वाणीम् | मधुरां वाणीं श्रुत्वा वाग्भटः प्राङ्गणम् आगत्य … |
| लौकिकः | खगः | नायं लौकिकः खगः |
| समुचितम् | उत्तरम् | समुचितम् उत्तरं श्रुत्वा अत्यन्तं प्रीतः सः शुकः |
| विस्मिताः | शिष्याः | एतत् सर्वं दूरात् पश्यन्तः विस्मिताः शिष्याः |
| सात्त्विकम् | भोजनम् | समयानुसारं सात्त्विकं भोजनम् आवश्यकम् |
अभ्यासात् जायते सिद्धिः — पृष्ठ 105प्रश्नः ५ : पाठं पठित्वा अधोलिखितपट्टिकातः पदानि चित्वा उचितसञ्चिकायां पूरयत
| विशेषणपदानि (७) | विशेष्यपदानि (८) |
|---|---|
| लौकिकः (उदाहरणम्) त्रीणि उत्तमस्य विस्मितः मधुरया पूज्यः विशाले | व्याधीनाम् (उदाहरणम्) देवः वृक्षे वाणीम् प्रश्नान् खगः शुकम् वाग्भटः |
कुल — विशेषणपदानि : ७, विशेष्यपदानि : ८।
अभ्यासात् जायते सिद्धिः — पृष्ठ 106प्रश्नः ६ : अधोलिखितानि वाक्यानि पठित्वा तेन सम्बद्धं श्लोकं पाठात् चित्वा लिखत
व्यायामः प्रातरुत्थाय, नित्यं दन्तविशोधनम्।
स्वच्छजलेन सुस्नानं, बुभुक्षायाञ्च भोजनम्॥ ४॥
कारण: व्यायाम, दन्तधावन (दन्तविशोधन), स्नान और भूख लगने पर भोजन — चारों बातें इसी श्लोक में हैं।
तच्च नित्यं प्रयुञ्जीत, स्वास्थ्यं येनानुवर्तते।
अजातानां विकाराणामनुत्पत्तिकरं च यत्॥ १॥
कारण: स्वास्थ्य की रक्षा और विकारों का उत्पन्न न होना — दोनों बातें इसी श्लोक (हितभुक्) में हैं।
तस्याशिताद्यादाहारात् बलं वर्णश्च वर्धते।
तस्यर्तुसात्म्यं विदितं चेष्टाहारव्यपाश्रयम्॥ ३॥
कारण: ‘बलं वर्णश्च वर्धते’ तथा ‘ऋतुसात्म्यम्’ — ऋतु के अनुसार भोजन से बल और वर्ण की वृद्धि (ऋतुभुक्)।
योग्यताविस्तरः — पृष्ठ 106–108(क) श्लोकानां पदच्छेदः अन्वयः च — श्लोकाः १–५
अजातानां विकाराणामनुत्पत्तिकरं च यत्॥ १॥
— अस्य श्लोकस्य पदच्छेदः, अन्वयः, अर्थः, भावार्थः च लिखत।
अन्वयः — अजातानां विकाराणां च यत् अनुत्पत्तिकरं, येन स्वास्थ्यम् अनुवर्तते च तत् नित्यं प्रयुञ्जीत।
मात्राकारणमुद्दिष्टं द्रव्याणां गुरुलाघवे॥ २॥
— अस्य श्लोकस्य पदच्छेदः, अन्वयः, अर्थः, भावार्थः च लिखत।
अन्वयः — गुरूणाम् (द्रव्याणाम्) अल्पादाने (हितं भवति) लघूनां (द्रव्याणां) च अतिसेवने (हानिः भवति)। गुरुलाघवे (भोजनग्रहणे) द्रव्याणां मात्रा कारणम् उद्दिष्टम् (अस्ति)।
तस्यर्तुसात्म्यं विदितं चेष्टाहारव्यपाश्रयम्॥ ३॥
— अस्य श्लोकस्य पदच्छेदः, अन्वयः, अर्थः, भावार्थः च लिखत।
अन्वयः — तस्य (जनस्य) अशिताद्यात् आहारात् बलं वर्णः च वर्धते। तस्य चेष्टा-आहार-व्यपाश्रयम् ऋतुसात्म्यं विदितम् (भोक्तव्यम्)।
स्वच्छजलेन सुस्नानं, बुभुक्षायाञ्च भोजनम्॥ ४॥
— अस्य श्लोकस्य पदच्छेदः, अन्वयः, अर्थः, भावार्थः च लिखत।
अन्वयः — नित्यं प्रातः उत्थाय व्यायामः (करणीयः), दन्तविशोधनं (कर्त्तव्यम्), स्वच्छजलेन सुस्नानं (कार्यम्), बुभुक्षायां (जातायां) भोजनं च (कर्त्तव्यम्)।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत्॥ ५॥
— अस्य श्लोकस्य पदच्छेदः, अन्वयः, अर्थः, भावार्थः च लिखत।
अन्वयः — सर्वे सुखिनः भवन्तु, सर्वे निरामयाः सन्तु। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, कश्चिद् दुःखभाक् मा भवेत्।
योग्यताविस्तरः — पृष्ठ 108(ख) चरकसंहितायाः परिचयः
| क्रमः | स्थानम् | हिन्दी में |
|---|---|---|
| १ | सूत्रस्थानम् | मूल सिद्धान्त एवं सूत्र |
| २ | निदानस्थानम् | रोग का कारण एवं पहचान |
| ३ | विमानस्थानम् | माप, मात्रा एवं परीक्षा-विधि |
| ४ | शरीरस्थानम् | शरीर की रचना |
| ५ | इन्द्रियस्थानम् | इन्द्रियाँ एवं रोग-लक्षण |
| ६ | चिकित्सास्थानम् | चिकित्सा |
| ७ | कल्पस्थानम् | औषध-निर्माण |
| ८ | सिद्धिस्थानम् | चिकित्सा की सफलता एवं पञ्चकर्म |
ग्रन्थे किं वर्णितम् — अत्र न केवलं रोगाणां चिकित्सा एव वर्णिता, अपितु स्वास्थ्यस्य संरक्षणार्थम् आयुषः च संवर्धनार्थम् उपायाः अपि निर्दिष्टाः।
योग्यताविस्तरः — पृष्ठ 108–109(ग) आहारपरिचयः — सात्त्विकः, राजसिकः, तामसिकः आहारः (श्रीमद्भगवद्गीता १७/८–१०)
रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्याः आहाराः सात्त्विकप्रियाः॥” (श्रीमद्-भगवद्गीता १७/८) — अस्य भावार्थं लिखत।
आहारा राजसस्येष्टा दुःखशोकामयप्रदाः॥” (श्रीमद्भगवद्गीता १७/९) — अस्य भावार्थं लिखत।
उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम्॥” (श्रीमद्भगवद्गीता १७/१०) — अस्य भावार्थं लिखत।
योग्यताविस्तरः — पृष्ठ 109–110(घ) काश्चन आहारविषयकसूक्तयः
त्वं तु मूर्ख विजानासि भोजनार्थं हि जीवनम्॥” (सुमनोवाटिका) — अस्याः सूक्तेः अर्थं भावं च लिखत।
भावः — भोजन जीवन के लिए है, जीवन भोजन के लिए नहीं; भोजन साधन है, साध्य नहीं।
अपुण्यं लोकविद्विष्टं तस्मात्तत्परिवर्जयेत्॥” (मनुस्मृतिः २/५७) — अस्याः सूक्तेः अर्थं भावं च लिखत।
अन्वयः — अतिभोजनम् अनारोग्यम्, अनायुष्यम्, अस्वर्ग्यम्, अपुण्यं लोकविद्विष्टं च (भवति); तस्मात् तत् परिवर्जयेत्।
भावः — अतिभोजन शरीर, आयु, पुण्य और समाज — सबकी दृष्टि से हानिकर है, अतः उसे छोड़ देना चाहिए (मितभुक्)।
अनभ्यस्तो हि कष्टानामध्यशनो विपद्यते॥” (सुमनोवाटिका) — अस्याः सूक्तेः अर्थं भावं च लिखत।
अन्वयः — मिताहारः नरः कष्ट-शतं सुखं सोढुं शक्तः (भवति)। कष्टानाम् अनभ्यस्तः अध्यशनः हि विपद्यते।
भावः — मिताहार से सहनशक्ति बढ़ती है; अधिक खाने वाला कष्ट नहीं सह पाता और विपत्ति में पड़ता है।
एतद् वो मानुषाः पथ्यं स्निग्धमुष्णं च भोजनम्॥” (भोजप्रबन्धः) — अस्याः सूक्तेः अर्थं भावं च लिखत।
अन्वयः — हे मानुषाः ! अशीतेन अम्भसा स्नानम्, कवोष्ण-दुग्ध-सेवनम्, स्निग्धम् उष्णं च भोजनम् — एतत् वः पथ्यम् (अस्ति)।
भावः — गुनगुने जल से स्नान, हलका गरम दूध तथा स्निग्ध और उष्ण भोजन — यही स्वास्थ्य के लिए पथ्य है।
परियोजनाकार्यम् — पृष्ठ 110परियोजना-कार्य (प्रकल्प) — त्रीणि कार्याणि
नमूना उत्तर (नमूना — अपने विद्यालय के पेड़ों के अनुसार बदलिए):
| संस्कृतनाम | हिन्दी नाम | औषधीयः प्रयोगः (संस्कृतम्) | हिन्दी में |
|---|---|---|---|
| निम्बः | नीम | निम्बपत्राणि त्वग्रोगेषु व्रणशोधने च प्रयुज्यन्ते। | पत्ते त्वचा-रोग तथा घाव साफ़ करने में। |
| आमलकी | आँवला | आमलकीफलं केशानां नेत्रयोः पाचनस्य च हितकरम्। | फल बाल, आँख और पाचन के लिए हितकर। |
| बिल्वः | बेल | बिल्वफलम् उदररोगेषु अतिसारे च हितकरम्। | फल पेट के रोगों और दस्त में हितकर। |
| जम्बूः | जामुन | जम्बूफलं पाचने हितकरम्; तस्य बीजचूर्णं मधुमेहे परम्परया प्रयुज्यते। | फल पाचन में; गुठली का चूर्ण परम्परा से मधुमेह में। |
| अर्जुनः | अर्जुन | अर्जुनस्य त्वक् हृदयाय हितकरी इति आयुर्वेदे प्रसिद्धम्। | छाल हृदय के लिए हितकर मानी जाती है। |
नमूना संग्रह (दश श्लोकाः) —
| क्रमः | श्लोकस्य आरम्भः | स्रोतः | विषयः |
|---|---|---|---|
| १ | तच्च नित्यं प्रयुञ्जीत, स्वास्थ्यं येनानुवर्तते… | चरकसंहिता (पाठे श्लोकः १) | हितभुक् |
| २ | अल्पादाने गुरूणां च लघूनां चातिसेवने… | चरकसंहिता (पाठे श्लोकः २) | मितभुक् |
| ३ | तस्याशिताद्यादाहारात् बलं वर्णश्च वर्धते… | चरकसंहिता (पाठे श्लोकः ३) | ऋतुभुक् |
| ४ | व्यायामः प्रातरुत्थाय, नित्यं दन्तविशोधनम्… | पाठे श्लोकः ४ | दिनचर्या |
| ५ | सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः… | पाठे श्लोकः ५ | सर्वकल्याण-प्रार्थना |
| ६ | आयुःसत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः… | श्रीमद्भगवद्गीता १७/८ | सात्त्विक आहार |
| ७ | कट्वम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः… | श्रीमद्भगवद्गीता १७/९ | राजसिक आहार |
| ८ | यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत्… | श्रीमद्भगवद्गीता १७/१० | तामसिक आहार |
| ९ | अनारोग्यमनायुष्यमस्वर्ग्यं चातिभोजनम्… | मनुस्मृतिः २/५७ | अतिभोजन-निषेधः |
| १० | अशीतेनाम्भसा स्नानं कवोष्णदुग्धसेवनम्… | भोजप्रबन्धः | स्नानं तथा पथ्यम् |
कैसे करें: पाठ के पाँचों श्लोक कण्ठस्थ करके कक्षा में सस्वर सुनाइए। कण्ठस्थ करने का सरल क्रम —
सुनाने योग्य पाँच श्लोक —
२. अल्पादाने गुरूणां च लघूनां चातिसेवने। मात्राकारणमुद्दिष्टं द्रव्याणां गुरुलाघवे॥
३. तस्याशिताद्यादाहारात् बलं वर्णश्च वर्धते। तस्यर्तुसात्म्यं विदितं चेष्टाहारव्यपाश्रयम्॥
४. व्यायामः प्रातरुत्थाय, नित्यं दन्तविशोधनम्। स्वच्छजलेन सुस्नानं, बुभुक्षायाञ्च भोजनम्॥
५. सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत्॥
Chapter 9 of 13 – Sanskrit
- Previous: Chapter 8 पश्यत कोणमैशान्यं भारतस्य मनोहरम्
- Next: Chapter 10 सन्निमित्ते वरं त्यागः
- All chapters: NCERT Solutions Class 8 Sanskrit
Also for This Chapter
NCERT Solutions Class 8 Sanskrit Chapter 9 कोऽरुक् ? कोऽरुक् ? कोऽरुक् ? – Overview
| Class | Class 8 |
| Subject | Sanskrit |
| Chapter | 9 – कोऽरुक् ? कोऽरुक् ? कोऽरुक् ? |
| Session | 2027 |
| Format | Full answers on this page + PDF |
NCERT Solutions Class 8 Sanskrit Chapter 9 – FAQs
Where can I download NCERT Solutions Class 8 Sanskrit Chapter 9 कोऽरुक् ? कोऽरुक् ? कोऽरुक् ? PDF?
Read every answer on this page, or download the free PDF from the table at the top.
Is this for the 2027 session?
Yes, it follows the latest NCERT Class 8 Sanskrit book for 2027.
How many questions are solved in NCERT Class 8 Sanskrit Chapter 9?
All questions of the chapter – the in-text questions, activities and the end-of-chapter exercises.
How should I use these solutions?
Read the chapter in the NCERT book first, attempt the questions yourself, then check your answers here.